Sunday, 26 April 2020

शिक्षा का अमृत छोड़ विष पीना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

   शिक्षा का अमृत छोड़ विष पीना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

पढ़ना अवश्य ये काम की बात है। शिक्षा का महत्व सभी जानते हैं जो स्कूल कॉलेज नहीं जा पाते उनको भी अफ़सोस रहता है कभी हालत कभी खुद पढ़ने में मन नहीं लगने के कारण वंचित रह गए। मैंने देखा है जो खुद पढ़ाई नहीं कर पाए थे पछताते हैं मगर अब अपनी संतान को शिक्षा दिलवाने को तमाम कोशिश करते हैं। मगर शिक्षा का मतलब केवल स्कूल कॉलेज की पढ़ाई पढ़ना ताकि नौकरी व्यवसाय आदि कर खूब धन दौलत कमाई जा सके नहीं होता है। पैसा तो चोर डाकू से अपना जिस्म बेचने वाली वैश्या तक कमा लेती है शिक्षा पाने का अर्थ है अपने जीवन को सार्थकता पूर्वक जीने का ढंग सीखना समझना। और शिक्षा कभी भी पूर्ण नहीं होती है किताबी शिक्षा के बाद भी जीवन से हम हर दिल कुछ नए सबक सीखते हैं। ये शायद बेहद खेदजनक बात है कि आधुनिक समाज में एक तरफ शिक्षा का विस्तार बढ़ा है दूसरी तरफ शिक्षित लोग भी शिक्षा को केवल ज़रूरत को उपयोग करना ही उदेश्य समझने लगे हैं। विचार करें तो हमने किताबें पढ़ कर सिमित जानकारी को हासिल कर ये समझ लिया सब जान लिया है अब और जानने की कोई आवश्यकता नहीं रही है। चलो बोर मत होना आगे विषय को मोड़ते हैं फेसबुक व्हाट्सएप्प और स्मार्ट फोन की दुनिया की चर्चा करते हैं। 

      फेसबुक सोशल मीडिया का उपयोग अथवा समय की बर्बादी और इक नशे की लत पागलपन 

सोशल मीडिया पर लिखी दो चार लाइनें ही पढ़ सकते हैं कौन इतना समय पढ़ने पर लगाने का काम करे। फोटो अवश्य देखते हैं और कई लोग फोटो बनाकर संदेश देने का काम करते हैं। मगर अधिकांश फोटो पर लिखे शब्द इधर उधर से उठाए हुए होते हैं और शब्द तक सही नहीं लिखे होते जिस से पता चलता है कि संदेश भेजने वाला शायद अशिक्षित ही होगा। फोटो और लिखावट को समझना है तो ये सोचो किसी की सूरत उसकी वेशभूषा को देख कर आकर्षित होते हैं या किसी के स्वभाव उसके चाल चलन आचरण और समझदारी को जानकर उसको चाहते हैं। चेहरे की सुंदरता हमेशा नहीं रहती है मगर विचारशीलता और चाल चलन और निखरता रहता है। खूबसूरत औरत या आकर्षक पुरुष भी अच्छे और समझदार होते हैं उनको लेकर नहीं कह रहा मगर जो केवल ख़ूबसूरती और सुंदरता को देख कर किसी से नाता बनाते हैं उनको बाद में बहुत पछतावा होता है। मैं उन शायर से सहमत नहीं जिसने कहा है " खूबसूरत है वफादार नहीं हो सकता " मगर शायद इक और शेर उपयुक्त है " खूबसूरती और वफ़ा देखी न दोनों एक जगह "।  कारण है की जिनको अपने खूबसूरत होने का अहंकार हो जाता है उनको वास्तविक आत्मिक सुंदरता नहीं शारीरिक सुंदरता ही सब कुछ लगती है। 

    विषय पर आते हैं शिक्षित लोग भी सोशल मीडिया को समय बिताने या मनोरंजन का साधन समझ या तो निर्रथक पोस्ट लिखते पढ़ते हैं या कोई गेम खेलते दिखाई देते हैं। थोड़ी देर अपने मन को आराम या शांति देने को आप और अच्छा कार्य कर सकते हैं टहलना या कोई खेल जो टीवी फोन पर नहीं खुले मैदान में खेला जाता है। आजकल छोटे छोटे बच्चों को हमने ये नामुराद रोग उपहार में दे दिया है दिन भर उनको यही करते देखते हैं और समझते हैं कितना कुछ सीख रहा है। मगर फोन पर खेलना जीतना उनको जीवन में कठिनाई से लड़ना नहीं सिखलाता है और ऐसे में हमने देखा है जब कोई परेशानी आती है तब घबराकर कभी बहुत गलत कदम उठा लेते हैं। आधुनिकता की दौड़ में हम कहीं इन सबका उपयोग वास्तविक कार्य को छोड़ ऐसे कार्यों के लिए करने लगे जो फायदेमंद नहीं नुकसानदायक हो सकते हैं। 

ज़रूरी नहीं किसी की भी लिखी हर पोस्ट सार्थक जानकारी और उपयोगी साबित हो मगर ये निर्णय भी आपको ही करना है। पर चुनकर अच्छी और सार्थक पोस्ट को पढ़ने से आपको कुछ न कुछ मिलेगा ज़रूर। और अगर दिन भर आप ऐसा काम करते हैं जिसका वास्तव में आपको कोई लाभ ही नहीं है तब वो समय की बर्बादी है। क्या आप मानते हैं समय से कीमती  कुछ भी नहीं है और सबसे मूल्यवान चीज़ को गंवाना कितनी बड़ी नासमझी है।

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