Wednesday, 22 April 2020

अब क्यों रोवत अंध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        अब क्यों रोवत अंध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     क्या बने बात जब बात बनाए न बने , जब अंगराज कर्ण से भीष्म जैसे सवाल करते हैं युद्ध होने की बात को लेकर। वो अपनी ही धुन में सौ राजाओं के मुकट लाकर धृतराष्ट्र के कदमों में डालने की बात कह कर चल देते हैं और नये एपीसोड में जैसे किसी कबाड़ी की दुकान से लेकर दरबार में आ जाते हैं मानो युद्ध कोई मज़ाक है और उनके कोई युद्ध लड़ते कोई ज़ख्म लगते कोई सैनिक मरते दिखाना ज़रूरी था ही नहीं। सवाल था जब आखेट करने गए दुर्योधन को कोई बंदी बनाकर उठाकर ले गए जब उसने किसी की बहन बेटी को अपमानित किया और बांध कर सज़ा देने वाले थे। जो पांडव अपनी पत्नी के अपमान पर खामोश रहे वही फिर से ऐसा करने वाले को बचाने चले आये चचेरा भाई होने के कारण। तब दुर्योधन के संगी साथी समय पर नहीं पहुंचे बाद में पहुंचे भी तो क्या फायदा। ये सवालों से बचना है जो बदले में राजा को कितने राज्य जीत कर देने की बात है। दुर्योधन ख़ुदकुशी की धमकी अक्सर देते रहते हैं कर्ण उनको कहते हैं ऐसा करना कायरता है। कर्ण ने तो जुए चौसर छल कपट और शकुनि की चालों को भी कायरता ही बताया था मगर दुर्योधन को तब कायरता भी गौरवशाली लगी थी। कहते हैं जो जीता वही सिकंदर।

     हम जीत जाएंगे हम जीत रहे हैं भले लोग मर रहे हैं उनका डंका बज रहा है। उनको याद दिलाओ कोई राफेल विमान मिला है क्या  इस रोग के जीवाणु का अंत करने का काम कर सकता है। आपने जिस विदेशी कंपनी के अपने देश में भागीदार बनने की चर्चा को महत्व नहीं दिया कि उसका कोई अनुभव ही नहीं है शायद वही इस लड़ाई में कोई दवा कोई वैक्सीन झट-पट ईजाद कर दे। हमने सुना है आप हैं तो सब मुमकिन है कुछ भी नामुकिन नहीं है। और कोई नहीं तो आपके पास इक आधुनिक चाणक्य तो है जो जिस जगह चाहे सरकार बना भी सकता है और गिरा भी सकता है। उसी से कहो इस दुश्मन का अता पता ही बता दें। वो जो आपने विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बनवाई थी जाने कितने हज़ार करोड़ खर्च कर उस से जाकर देखते देश कैसा लगता है। 

      खबर है देश का सबसे बड़ा किला 150 से अधिक एकड़ में बनाया भवन जिस में सुरक्षा चाक चौबंद रहती है और जिसकी अपनी अलग दुनिया है अपना मुगल गार्डन है अपना अतिआधुनिक अस्पताल है कुछ भी दुनिया में नहीं जो उस जगह उपलब्ध नहीं है। वहां भी ये दुश्मन ख़ामोशी से भीतर पहुंच गया है , पहले राज्य के नेताओं तक पहुंचा था अब तो कोई और उस से बढ़कर बड़ा नहीं है। ये जंग जारी है ये कोई आमने सामने की लड़ाई नहीं छुपा छुपी का खेल जारी है। भ्र्ष्टाचार राजनीति के अपराधीकरण दल बदल और सत्ता की मनमानी और बहुमत के कारोबार के खेल से भी भयानक बीमारी है। हमारी सेना ने कभी नब्बे हज़ार सैनिकों को बंदी बनाने का शौर्य दिखलाया था इस अदृश्य जीवाणु ने सौ करोड़ को अपने घरों में बंदी बनाने का काम किया है। कोई सर्जिकल स्ट्राइक ही नहीं सूझी किसी को। 

              उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ ना दवा ने काम किया , 
              देखा इस बीमारी-ए -दिल ने आखिर काम तमाम किया।          (   मीर तक़ी मीर  )

          लोग फिर से पुनर्जन्म की बातें करने लगे हैं वीडियो मिलते हैं कोई अपने पिछले जन्म की बात बताता है। ज्योतिषाचार्य यजमान को पिछले जन्म के क़र्ज़ और कर्मफल की बात कहते हैं जब उनसे कोई समाधान तमाम कर्मकांड करवा बहुत धन लेकर भी समस्या का निकलता नहीं है। चलो हम भी यकीन करते हैं जो हुआ हो गया अब अगले जन्म में समझदारी से जीवन जीना है। उलझन बढ़ जाएगी जब आपको कोई बताएगा आपको ये जन्म इंसान बनने का मिला था पिछले जन्म के अच्छे कर्म किये थे उनका फल था। मगर इस जन्म में तो अपने गधे और भेड़ बकरी की तरह किस किस का अनुसरण नहीं किया तो अगले जन्म आपको वही बनकर संसार में जन्म लेना ही पड़ सकता है।  

    खैर इसकी चिंता बेकार है अब अगर आपको पिछले जन्म की बातें याद रहती तो क्या आप जो जैसे किया करते रहते। सोचो विचार करो अगले जन्म पति-पत्नी का सात जन्म का रिश्ता कौन निभाना चाहेगा। झूठ मत बोलना जो महिला जो पुरुष कहते हैं पछताते हैं शादी कर के क्या अगले जन्म इस झंझट और फिर पालने की सोच भी सकते हैं। नहीं जिनको कोई और लगा कि काश इस से नहीं उस से विवाह होता उनकी भी मनोकामना पूर्ण नहीं होने वाली। सभी की चाहत अलग अलग अपनी अपनी है और जिसे जो मिला उसी पाकर खुश नहीं है। शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। ये विषय बदल गया क्योंकि उनकी याद आई जो इस जन्म अपनी पत्नी को छोड़ आये थे क्या अगले जन्म भी यही दोहराएंगे। लेकिन उनकी चिंता अलग है दुनिया में उनसे पॉपुलर कोई और नहीं हो सकता है अभी भी उनकी कोशिश जारी है टीवी मीडिया सब उनकी महिमा का गुणगान करते हैं। मगर उनको भी मालूम है जो रुतबा इक जीवाणु का बन गया है उसने इनकी शोहरत को पछाड़ दिया है। शायद जाने कब तक वही नंबर वन के पायदान पर सुशोभित रहे।

तजनेताओं के साथ ये होता है कि सत्ता के आखिरी साल चुनाव से पहले पिछले चुनावी वादे याद आते हैं और तब नया घोषणापत्र जारी किया जाता है अगले दस बीस साल तक सब ठीक हो ही जाएगा। जनाब अब्दुल कलाम जी ने 2020 का भारत की तस्वीर बनाई दिखलाई थी अब उनकी वो किताब जिसकी कीमत भी आम पाठक नहीं दे सकता था किसी पुस्तकालय की अलमारी में धूल जमी होगी उस पर। अटल बिहारी बाजपेयी जी की जीवनी दस हज़ार मूल्य की भी यू जी सी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन अर्थात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कहने पर सभी विश्वविद्यायों ने खरीदी थी। ऐसी कितनी किताबें लिखने और लिखवाने वालों को झूठी आत्मसंतुष्टि भी दे सकीं या नहीं कौन जानता है मगर उनकी दशा देश की हालत से बेहतर नहीं है। जब जो करना था किया नहीं बस करने की चर्चा करने की बात लिखते रहे , किया नहीं वास्तव में जो करना चाहिए था। अभी भी जो करना है उसको करने से बढ़कर शोर और सभी बातों का है। नानक की बाणी में इक शब्द आता है जो यहां उपयुक्त है।

करणो हुतो सु ना कियो परियो  लोभ के फंद ,

नानक समियो रमी गईओ अब क्यों रोवत अंध।







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