Thursday, 30 April 2020

मेरी ज़िंदगी में शामिल सभी अपनो और ज़माने वालो धन्यवाद - डॉ लोक सेतिया

   मेरी ज़िंदगी में शामिल सभी अपनो और ज़माने वालो धन्यवाद 

                                             - डॉ लोक सेतिया 

  शुरआत इसी बात से करता हूं सभी जो भी मेरे जीवन का हिस्सा बनकर रहे उनकी मेहरबानी मुझे अपनाने के लिए। ज़िंदगी के इस मोड़ पर जब 69 वां साल पूरा होने और 70 वां शुरू होने को है दिल से हर शिकवे गिले भुलाकर शिकायत नहीं बस आभार व्यक्त करना है सभी से जितना भी प्यार अपनापन मिला उसके लिए धन्यवाद करता हूं। ये अच्छा है मेरी आदत रही है जब भी किसी से अनबन मनमुटाव हुआ कुछ समय बाद दिल से बात निकल जाती है और विचार करता हूं कि उन्हीं ने कितनी बार मुझे भी तमाम खामियों कमियों को छोड़कर अपनाया भी है। आज इसलिए सब परिवार के सदस्यों दोस्तों के साथ बाकी समाज से भी ये कहना है कि जाने अनजाने किसी भी तरह जिस किसी को ठेस पहुंचाई हो मुमकिन हो तो क्षमा कर दिल से बात निकाल दें। दुनिया में किसी को भी सभी कुछ नहीं हासिल होता है और खुश रहना हो तो जितना मिला उसी को बहुत समझना चाहिए। 

अब अपनी ज़िंदगी की बात सच सच लिखना चाहता हूं। कुछ साल पहले तक मुझे तकदीर से ईश्वर से कई शिकायत रहती थी। मुझे निराशा ने जकड़ा हुआ था मगर धीरे धीरे मैंने अपने भीतर से निराशा को निकाल बाहर किया और सकारात्मक ढंग से सोचना शुरू किया भले जीवन में घटनाएं हालात विपरीत भी क्यों नहीं रहे हों। जो बीत गया उसे छोड़ भविष्य को लेकर आशावादी सोच रखने की कोशिश की है। और मैंने खुद के नज़रिए से नहीं बाकी लोगों के नज़रिए को ध्यान रखकर समझना चाहा है कि उन सभी की आशाओं आकांक्षाओं को लेकर मैं भी कभी पूर्णतया खरा नहीं उतरा हूं। शायद अधिकांश लोग अपनी जगह सही होते हैं या फिर खुद अपनी कमी गलती कोई भी समझ नहीं पाता है। ऐसे में व्यर्थ मन में शिकायत रखना किसी काम नहीं आता बल्कि जिस ने जितना भी साथ निभाया उतना ही काफी है। ये बात शायद कम लोग विश्वास करेंगे कि मुझे कभी भी लंबी आयु की आरज़ू नहीं रही और जैसा मैंने शायरी में लिखा कई जगह मौत तो दरअसल इक सौगात है पर सभी ने इसे हादिसा कह दिया। बेशक इतना हर कोई चाहता है कि जितने भी अपने हैं जिनको शायद ज़रूरत है उनकी खातिर जब तक संभव हो ज़िंदा रहकर अपना कर्तव्य निभा सके। बेशक ऐसा पूर्णतया संभव नहीं फिर भी अब लगता है जितना कर पाया बहुत है और जब तक जिया किसी से कुछ भी चाहत नहीं बस सबके साथ का मेहरबानियों का बदला चुकाना है।  हर लिखने वाला इक सपना देखता है ऐसे समाज का जिस में समानता हो अन्याय नहीं हो मानवीय संवेदना का समाज हो इंसानियत भाईचारा हो और जब देखता है समाज की वास्तविकता विपरीत है विसंगति विडंबना को देख कर अपनी भावनाओं को रचना का सवरूप देता है। मेरा भी विश्वास यही रहा है ऐसे देश समाज का निर्माण करने को। क्योंकि मुझे लगता है मैंने जितना भी जीवन जिया है सार्थक जीने का जतन किया है इसलिए मुझे नहीं लगता कि मौत से कोई अंतर पड़ेगा और अपने लेखन में मैं हमेशा ज़िंदा रहूंगा। जब हर किसी को इक दिन दुनिया से जाना है तो घबराना किस लिए और रोना धोना क्यों।

मैं बेहद भावुक रहा हूं और मेरे स्वभाव में अपनी भावनाओं ख़ुशी नाराज़गी या किसी बात को नापसंद करने को संयम नहीं रख पाने की आदत रही है जो कई बार अतिउत्तेजना में अपनों पराओं को ठेस पहुंचाती रही है। मगर सच तो ये है कि मेरे मन में किसी के लिए भी अनादर की भावना नहीं रही है। और न ही कोई अहंकार कभी रखता रहा हूं जैसा मुमकिन है कई लोग समझते रहे हैं। समाज में जिन बातों को अनुचित और गलत समझता रहा उनको लेकर मेरा विरोध मुखर ही नहीं बल्कि कितनी बार सामने स्पष्ट कहने जतलाने के कारण कई दोस्त बचते रहे हैं खुलकर चर्चा करने से जबकि मैंने आपसी संबंध और देश समाज की बातों को उचित ढंग से समझा है और अपने लेखन में कभी निजि व्यक्तिगत विषयों की बात उजागर नहीं की है। हां सामाजिक सरोकार में संभव है अपने अनुभव को खुद की बात नहीं पूरे समाज से जोड़कर देखने की बात की है जो शायर कवि लेखक करते हैं। अपने दर्द को हर किसी के दर्द से जोड़कर देखना। मैंने जीवन भर अपने समय को सार्थक ढंग से हर पल को उपयोग किया है। अपने कामकाज के साथ मिलने जुलने बात करने के साथ बाकी वक़्त चिंतन मनन और लेखन में व्यतीत किया है। संगीत से बचपन से लगाव रहा है और हमेशा गुनगुनाना मेरी आदत में शामिल है क्योंकि पुराने गीत ग़ज़ल से मुझे सुकून मिलता है। मैं मानता हूं कि मैंने अपनी ज़िंदगी को अपनी मर्ज़ी से जिया है और जितना जैसे जीवन बिताया है उस से संतोष है।


इक बात मुझे लगती है कि जब भी मेरी ज़िंदगी का अध्याय खत्म हो मेरे अपने कोई अफ़सोस या दुःख का अहसास नहीं कर मुझे हंसते हुए विदा करें और कोई शोकसभा नहीं थोड़ा जश्न जैसा हो जिस में हो सके तो मेरी बातों और रचनाओं की चर्चा हो। स्वर्ग मोक्ष की चाहत नहीं और कोई अनावश्यक कर्मकांड नहीं। तीस साल पहले 1990 में लिखी अपनी नज़्म वसीयत दोहराता हूं।

  जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ( वसीयत-नज़्म )   डॉ लोक सेतिया 

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।   


अंत में मुझे जो बात सभी से कहनी है वो अपने लेखन धर्म को लेकर है। शायद बहुत लोग लिखने को केवल समय बिताने या अपनी पहचान अथवा शोहरत हासिल करने का माध्यम समझते हैं। जबकि मुझे लिखना उसी तरह पसंद लगता है जैसे किसी को ईबादत पूजा अर्चना या कोई खेल या किसी कलाकार को अभिनय या संगीत। मेरे लिए बिना लिखे जीना संभव ही नहीं था ठीक जैसे सांस लेना ज़रूरी है। इक संतोष का अनुभव होता है कि मैं कुछ सार्थक कर रहा हूं सृजन का सुखद एहसास मुझे अच्छा लगता है। मुमकिन है ऐसा करते हुए कुछ लोगों के अनुसार मैंने कोई अपराध जैसा किया है तो मुझे अपना जुर्म स्वीकार है और उनकी सज़ा भी मंज़ूर है। चाहे जो भी जिस विषय को लेकर लिखता रहा पूरी ईमानदारी से लिखा है और मुझे इस को लेकर कोई खेद या ग्लानि कदापि नहीं हो सकती है। लिखना मुझे लगता है जैसे विधाता ने मुझे इसी काम करने को बनाया था भले जिनको साहित्य से सरोकार नहीं उनको ये व्यर्थ समय की बर्बादी करना लगता है ऐसा समझा है देखा है। मेरे लिए यही सार्थक जीना और सांस लेने की तरह आवश्यक भी है क्योंकि इसको छोड़ मैं जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। ज़िंदगी भर इक दोहा तुलसी जी का मुझे जो सबक देता है मेरे स्वभाव का हिस्सा है। पावत ही हर्षत नहीं नयनन नहीं स्नेह , तुलसी तहां न जाइए कंचन बरसे मेह। अपनी इक ग़ज़ल में बस इक यही शिकायत की है जाने किस से। मतला और इक शेर उसी ग़ज़ल से यहां दोहराता हूं।

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता , हो जीना मौत से बदतर न ऐसी ज़िंदगी देता। 

मुहब्बत कर नहीं सकते अगर नफ़रत नहीं करना , यही मांगा सभी से था नहीं कोई यही देता।


(  ये पोस्ट आज 22 मार्च से लिखना शुरू कर रहा हूं। पब्लिश 30 अप्रैल को शड्यूल कर रहा हूं। )

Wednesday, 29 April 2020

क्यों हंसे सोचा रोने के बाद ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

      क्यों हंसे सोचा रोने के बाद ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

कभी रोने लगे किसी बात पर , 

मुस्कुराने लगे फिर ये सोचकर 

आती है मिलन की मधुर बेला , 

विदाई  दुल्हन की होने के बाद। 

चार दिन के मुसाफिर रहे साथ , 

चल दिए भविष्य की मंज़िल को 

राह अपनी अपनी को जाना है ,  

मोड़ से अलविदा कहने के बाद। 

मिलना और बिछुड़ना है ज़िंदगी , 

बहती नदी निरंतर बहे जाती है

कितना लंबा  सफर भूल जाती , 

सागर में अपने समाने के बाद। 

हम लोग दोहराते हैं इसको भी , 

ख़ुशी की बात पर अश्क बहाते हैं 

और हंसते भी हैं कितनी बार फिर  , 

दर्द ए दिल की दवा पाने के बाद। 

दोस्त कितने बनाते हर रोज़ ही ,

जाने समझे बिना खुश होकर भी

टूट जाता नाता छोड़ देते हैं फिर 

वक़्त बुरा जब आज़माने के बाद।

 

 

 


Tuesday, 28 April 2020

उन्हें मिल ही जाते हैं इक दिन किनारे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        उन्हें मिल ही जाते हैं इक दिन किनारे ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा" 


उन्हें मिल ही जाते हैं इक दिन किनारे 
जो रहते नहीं नाख़ुदा के सहारे। 

कभी तुम भी खेलो मुहब्बत की बाज़ी 
नहीं कोई जीता सभी इस में हारे। 

लिखी जिसने तकदीर हाथों से अपने 
कहो मत उसे तुम नसीबों के मारे। 

हैं खामोशियां छा गईं महफ़िलों में 
कहीं से दे आवाज़ कोई पुकारे। 

सदा अब किसी की नहीं वो भी सुनते 
खड़े किसलिए लोग उनके हैं द्वारे। 

बिना बात देखो सभी लड़ रहे हैं 
सबक प्यार का भूल बैठे हैं सारे। 

ज़रूरत जिसे दोस्ती की है "तनहा"
इनायत करो उसको मुझसे मिला रे।

Monday, 27 April 2020

हमें चाहिए वो पुराना ज़माना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 हमें चाहिए वो पुराना ज़माना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

हमें चाहिए वो पुराना ज़माना
मिला सबको करता था जब आबो दाना। 

फ़रिश्ते तुझे अब बताना पड़ेगा  
बचा है कहीं पर हमारा ठिकाना। 

बड़ी खूबसूरत थी सोने की चिड़िया 
कहानी वही फिर हमें मत सुनाना। 

कहां ले के आईं उड़ानें तुम्हारी 
कभी एक दिन सच सभी को बताना। 

कहोगे न जाने अभी और क्या क्या 
हो फ़रमान जो भी पड़ा सर झुकाना। 

दिखाए तो हमको बहुत ख्वाब लेकिन 
ज़रूरी न समझा था ताबीर लाना। 

हैं शीशे के उनके महल सारे "तनहा" 
बना जोड़ तिनके तेरा आशियाना।

Sunday, 26 April 2020

अगले जन्म के साथी ( वयंग्य-विनोद कथा ) डॉ लोक सेतिया

   अगले जन्म के साथी ( वयंग्य-विनोद कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      ईश्वर हर आत्मा से ये सवाल करते हैं कि अपने पिछले जन्म के किस संबंध को आप अपने आने वाले जन्म में भी रखना चाहते हैं। ये सवाल आपको आसान लगेगा और खुश भी हो जाओगे मगर जो होने वाला है उससे अनभिज्ञ मुमकिन है आपको पछतावा भी हो। सबसे पहले दो बातें जान लेना कि जिसे भी आप अगले जन्म में मांगने लगे हैं उस से आपका नाता वही नहीं हो सकता है जिसकी आपने कल्पना की हो। क्योंकि विधाता ने आपका उसका ही नहीं सभी का पिछले जन्म का बकाया हिसाब लेना-देना बराबर करना है। इक आत्मा की बात से उदाहरण लेकर समझते हैं। आत्मा ने कहा मुझे अमुक व्यक्ति से नाता रखना है तथास्तु कह ईश्वर ने उसको पंछी बना दिया क्योंकि जिस से नाता मांगा था उसको सय्याद बनाया जा चुका था। अब पंछी और सय्याद का नाता तो कोई प्यार मुहब्बत का हो नहीं सकता है। आत्मा चाहती कुछ थी और सामने जो आना है उसकी कल्पना भी नहीं की थी। 

कई लोग जीवन भर निराश होकर सोचते हैं कि माता पिता भाई बहन पत्नी दोस्त जो हैं उनकी जगह किसी और को लेकर विचार करते हैं। पिता हो तो उस धनवान या बड़े नाम वाले या किसी शासक या जाने क्या क्या जिसके पास हो माता कैसी भाई दोस्त कैसा इस तरह से। पत्नी को लेकर किसी बेहद खूबसूरत और भोली आज्ञाकारी महिला की कल्पना करते हैं जब आत्मा ने ऐसी किसी नारी से संबंध की बात की तो जो हुआ बेहद अजीब था। ये बताना थोड़ा अवांछित है मगर इतना समझ लो उनका संबंध बाज़ारी बन गया इक बिकने दूजा उसे बेचने का काम करने वाला है। समझदार कोई कोई आत्मा होती है जो ईश्वर से कहती है विधाता आपने पिछले जन्म जिनसे जो भी संबंध बनाकर जन्म दिया मैंने आपकी मर्ज़ी समझ स्वीकार किया था। पति पत्नी पिता माता भाई बहन जो भी थे सभी अपनी जगह ठीक थे भले उन सभी में अच्छाईयां भी थीं बुराईयां भी थीं लेकिन मुझमें भी ये सब था ही। अपने जो उचित समझा किया था मैंने कभी भी आपसे कोई शिकायत नहीं की थी। बस अब भी आपको जैसा उचित लगता है वही मेरे लिए अगले जन्म में रख देना मगर इतना अवश्य करना कि तब भी मुझे जो भी लोग मिलें उनको दिल से अपनाने का साहस मुझमें हो। ऐसे में ईश्वर कभी कुछ भी खराब नहीं कर सकते हैं जो अच्छा है हमारे लिए विधाता को हम से अधिक पता है। 

किसी आत्मा ने मांगा उसको अगले जन्म में उस शासक से संबंध रखने की चाहत है जिसकी भक्ति से बढ़कर ईश्वर की भी भक्ति नहीं लगती थी उसे। तथास्तु कह दिया और ये भी बताया कि अगले जन्म उसे इक शिकारी बनना है इसलिए तुमको जानवर बन उसका शिकार बनना होगा मगर तुम्हारा जन्म फिर ऐसे जानवर के रूप में होगा उस का अंत भी तुम्हें ही करना होगा। शिकारी भी खुद शिकार हो जाते हैं। अनजान लोग नहीं जानते हैं कि हम क्या चाहत रखते हैं और उसका नतीजा क्या हो सकता है। आपको इस बात की तसल्ली ज़रूर हो गई होगी कि न केवल अगला जन्म होना ही है बल्कि वो भी आपकी इच्छा को पूछकर ही विधाता निर्णय करेगा।

        अब मरने से घबराने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि फिर से जन्म लेना भी है।
                        वो इक ग़ज़ल है सुनोगे। 

हरेक रंज में राहत है ज़िंदगी के लिए , पय्याम ए मौत भी मुजदा है ज़िंदगी के लिए। 
                                   ( मुजदा = तोहफ़ा )
हमारी ख़ाक को दामन से झाड़ने वाले , सब इस मुकाम से गुज़रेंगे ज़िंदगी के लिए। 

उन्हीं के  शीशा ए दिल चूर चूर होके रहे  , तरस रहे थे जो दुनिया में दोस्ती के लिए। 

मैं सोचता हूं के दुनिया को क्या हुआ या रब , किसी के दिल में मुहब्बत नहीं किसी के लिए। 

चमन में फूल भी हर एक को नहीं मिलते , बहार आती है लेकिन किसी किसी के लिए। 

हमारे बाद अंधेरा रहेगा महफ़िल में , बहुत चराग़ जलाओगे रोशनी के लिए। 

जो काम आए मेरी ज़िंदगी तेरे हमदम , तो छोड़ देंगे दुनिया तेरी ख़ुशी के लिए। 

किसी ने दाग़ दिए दोस्ती के दामन पर , किसी ने जान भी लुटा दी दोस्ती के लिए। 

                               शायर :- मख़मूर देहलवी 

( मुझे ये ग़ज़ल बेहद पसंद है और कॉलेज के ज़माने से मैंने इस को बहुत गुनगुनाया है सुनाई है गाकर )

मौत तो दरअसल इक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया 

ये मेरी ग़ज़ल का शेर है और मेरा यकीन भी यही है। मौत तू इक कविता है सुनी है आपने कविता।



शिक्षा का अमृत छोड़ विष पीना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

   शिक्षा का अमृत छोड़ विष पीना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

पढ़ना अवश्य ये काम की बात है। शिक्षा का महत्व सभी जानते हैं जो स्कूल कॉलेज नहीं जा पाते उनको भी अफ़सोस रहता है कभी हालत कभी खुद पढ़ने में मन नहीं लगने के कारण वंचित रह गए। मैंने देखा है जो खुद पढ़ाई नहीं कर पाए थे पछताते हैं मगर अब अपनी संतान को शिक्षा दिलवाने को तमाम कोशिश करते हैं। मगर शिक्षा का मतलब केवल स्कूल कॉलेज की पढ़ाई पढ़ना ताकि नौकरी व्यवसाय आदि कर खूब धन दौलत कमाई जा सके नहीं होता है। पैसा तो चोर डाकू से अपना जिस्म बेचने वाली वैश्या तक कमा लेती है शिक्षा पाने का अर्थ है अपने जीवन को सार्थकता पूर्वक जीने का ढंग सीखना समझना। और शिक्षा कभी भी पूर्ण नहीं होती है किताबी शिक्षा के बाद भी जीवन से हम हर दिल कुछ नए सबक सीखते हैं। ये शायद बेहद खेदजनक बात है कि आधुनिक समाज में एक तरफ शिक्षा का विस्तार बढ़ा है दूसरी तरफ शिक्षित लोग भी शिक्षा को केवल ज़रूरत को उपयोग करना ही उदेश्य समझने लगे हैं। विचार करें तो हमने किताबें पढ़ कर सिमित जानकारी को हासिल कर ये समझ लिया सब जान लिया है अब और जानने की कोई आवश्यकता नहीं रही है। चलो बोर मत होना आगे विषय को मोड़ते हैं फेसबुक व्हाट्सएप्प और स्मार्ट फोन की दुनिया की चर्चा करते हैं। 

      फेसबुक सोशल मीडिया का उपयोग अथवा समय की बर्बादी और इक नशे की लत पागलपन 

सोशल मीडिया पर लिखी दो चार लाइनें ही पढ़ सकते हैं कौन इतना समय पढ़ने पर लगाने का काम करे। फोटो अवश्य देखते हैं और कई लोग फोटो बनाकर संदेश देने का काम करते हैं। मगर अधिकांश फोटो पर लिखे शब्द इधर उधर से उठाए हुए होते हैं और शब्द तक सही नहीं लिखे होते जिस से पता चलता है कि संदेश भेजने वाला शायद अशिक्षित ही होगा। फोटो और लिखावट को समझना है तो ये सोचो किसी की सूरत उसकी वेशभूषा को देख कर आकर्षित होते हैं या किसी के स्वभाव उसके चाल चलन आचरण और समझदारी को जानकर उसको चाहते हैं। चेहरे की सुंदरता हमेशा नहीं रहती है मगर विचारशीलता और चाल चलन और निखरता रहता है। खूबसूरत औरत या आकर्षक पुरुष भी अच्छे और समझदार होते हैं उनको लेकर नहीं कह रहा मगर जो केवल ख़ूबसूरती और सुंदरता को देख कर किसी से नाता बनाते हैं उनको बाद में बहुत पछतावा होता है। मैं उन शायर से सहमत नहीं जिसने कहा है " खूबसूरत है वफादार नहीं हो सकता " मगर शायद इक और शेर उपयुक्त है " खूबसूरती और वफ़ा देखी न दोनों एक जगह "।  कारण है की जिनको अपने खूबसूरत होने का अहंकार हो जाता है उनको वास्तविक आत्मिक सुंदरता नहीं शारीरिक सुंदरता ही सब कुछ लगती है। 

    विषय पर आते हैं शिक्षित लोग भी सोशल मीडिया को समय बिताने या मनोरंजन का साधन समझ या तो निर्रथक पोस्ट लिखते पढ़ते हैं या कोई गेम खेलते दिखाई देते हैं। थोड़ी देर अपने मन को आराम या शांति देने को आप और अच्छा कार्य कर सकते हैं टहलना या कोई खेल जो टीवी फोन पर नहीं खुले मैदान में खेला जाता है। आजकल छोटे छोटे बच्चों को हमने ये नामुराद रोग उपहार में दे दिया है दिन भर उनको यही करते देखते हैं और समझते हैं कितना कुछ सीख रहा है। मगर फोन पर खेलना जीतना उनको जीवन में कठिनाई से लड़ना नहीं सिखलाता है और ऐसे में हमने देखा है जब कोई परेशानी आती है तब घबराकर कभी बहुत गलत कदम उठा लेते हैं। आधुनिकता की दौड़ में हम कहीं इन सबका उपयोग वास्तविक कार्य को छोड़ ऐसे कार्यों के लिए करने लगे जो फायदेमंद नहीं नुकसानदायक हो सकते हैं। 

ज़रूरी नहीं किसी की भी लिखी हर पोस्ट सार्थक जानकारी और उपयोगी साबित हो मगर ये निर्णय भी आपको ही करना है। पर चुनकर अच्छी और सार्थक पोस्ट को पढ़ने से आपको कुछ न कुछ मिलेगा ज़रूर। और अगर दिन भर आप ऐसा काम करते हैं जिसका वास्तव में आपको कोई लाभ ही नहीं है तब वो समय की बर्बादी है। क्या आप मानते हैं समय से कीमती  कुछ भी नहीं है और सबसे मूल्यवान चीज़ को गंवाना कितनी बड़ी नासमझी है।

कोरोना के साक्षात दर्शन ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना के साक्षात दर्शन ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    सोशल मीडिया का मुझ पर भी असर हुआ लोग भगवान धनवंतरी जी की वंदना के संदेश भेजने लगे। आयुर्वेद का स्नातक होने और आयुर्वेदिक दवाओं से उपचार करने से मुझे भी लगा जो तब नहीं लिखा समझाया अब तो जानकारी दे सकते हैं धनवंतरी जी। कोई और साधन उनसे वार्तालाप का उपलब्ध नहीं मैंने गूगल से सर्च किया फेसबुक और वेबसाइट्स भी खोजी उनका कहीं कोई अकाउंट नहीं ईमेल नहीं कांटेक्ट नंबर नहीं मिला। तब उपाय सूझा जो कथाओं पुराणों में किसी भी देवता की उपासना निरंतर करने जब तक वो खुश होकर दर्शन देते हैं और वरदान मांगने की बात खुद ही कहते हैं यह एक ही विधान है। घर खाली बैठा क्लिनिक बंद कर दी थी 45 साल रोग और रोगियों से नाता रखने के बाद। फुर्सत ही फुर्सत है बस ध्यान लगाने अलग अकेले आंखे बंद कर भगवान धनवंतरी  जी की तस्वीर के सामने उन्हीं का नाम जपने लगा। ऐसे में कितने दिन बीते कुछ भी ध्यान नहीं रहता है आखिर उनको सामने आकर पूछना ही पड़ा कि जब मैंने ये व्यवसाय ही छोड़ दिया है तब उनको क्यों बुलाना चाहता हूं। मैंने कहा भगवान सबको आपकी ज़रूरत है और भरोसा है या इक उम्मीद है कोई दवा कोरोना रोग की आप ही बता सकते हैं।

   धनवंतरी जी ने अपने हाथ में पकड़ी किताब खोली और एक एक पन्ना छान मारा उनको ऐसे किसी रोग रोगाणु की कोई बात नहीं मिली ढूंढने से। नहीं ऐसा कोई रोग नहीं है न कभी था न ही होना ही है। मैंने उनको बताया और दिखलाया कि आजकल यही सबसे भयानक रोग है और विश्व भर में फैला हुआ है। अख़बार टीवी वीडियो सब उनको दिखाए मगर उनको भरोसा नहीं हुआ क्योंकि उनकी जानकारी के बाहर कोई रोग हो नहीं सकता और कोई रोग नहीं जिसकी दवा उनके पास नहीं हो। मैंने कहा इधर आयुर्वेद का बहुत नाम होने लगा है , भगवान धनवंतरी जी हंस दिए कहने लगे तुम भी जानते हो मुझे भी पता है आयुर्वेद का नाम नहीं हो रहा है उसका बाजार सजाकर पैसा बनाने का कारोबार किया जाने लगा है।  पिछले पचास साल में कोई उपचार नहीं रोगों का खोजा गया कोई शोध नहीं किया गया केवल आयुर्वेद को ठगी का माध्यम बनाया गया है। झूठ दावा करते हैं हमने कोई खोज की है उनको आयुर्वेद का कुछ भी ज्ञान नहीं न ये जानते हैं कि आयुर्वेद का मकसद कमाई करना नहीं सबको स्वस्थ और निरोग रखना है। मुझे चिंता नहीं करने और भरोसा दिलाने को समझाया कि ये कोई बुराई बनकर आया हुआ दानव लगता है। और ऐसे लोग कभी अधिक समय तक रहते नहीं हैं ये जिस तरह अचानक तेज़ी से आया है आंधी बनकर उस से लगता है जल्दी ही इसका अंत भी हो जाएगा। सवाल इतना है कि ये चला गया तब भी उसके बाद क्या दुनिया के लोग अपनी गल्तियों को समझेंगे और फिर नहीं दोहराएंगे। विपत्ति भी आपको अवसर देती है सुधार करने का। 

उनकी बात सच्ची थी मेरे पास कोई जवाब नहीं था मगर मैंने उनसे विनती की हाथ जोड़कर कि कोई तो मार्ग मुझे बताएं कि कोरोना अगर रोग ही नहीं है तो फिर क्या है। तब उन्होंने मुझे उपाय बताया कि कोरोना जो भी कोई है देव दानव या कुछ भी और वही खुद अपना परिचय दे सकता है। वही आपको कारण भी बता सकता है क्यों दुनिया को भयभीत किया हुआ है और कैसे उस से मुक्ति भी मिल सकती है। तब भगवान धनवंतरी जी ने मुझे अतिगोपनीय उपाय बतलाया कि इस तरह कोरोना से आपका साक्षत्कार हो सकता है। इतना समझा कर धनवंतरी जी अंतर्ध्यान हो गए। अब मुझे डर लगने लगा कि जिस के नाम से हर कोई थर थर कांपता है मैं खुद उसको अपने पास आने की मूर्खता कैसे कर सकता हूं। ये पागलपन नहीं किया जा सकता है। 

  सोचते सोचते मुझे नींद आ गई लेकिन सपने में बिना बुलाये ही कोरोना चले आये दर्शन देने को। बोले जब तुम अपने आयुर्वेद के जन्मदाता को याद कर रहे थे तभी मुझे मालूम हो गया था। और उत्सुकता थी वो आकर क्या जानकारी देते हैं इसलिए उनके पीछे पीछे चला आया था और सब वार्तालाप सुन लिया था। मुझे आशा थी अब तुम मुझे बुलाने की कोशिश करोगे अवश्य पर बड़े डरपोक हो घबरा गए जाने क्या सोचकर। कभी सुना है किसी की आरधना उपासना की हो और उसने दर्शन देकर वरदान के सिवा कुछ भी दिया हो। चलो कोई बात नहीं जबकि तुम मौत से घबराते नहीं हो बस कोरोना शब्द से ही तुम्हें परेशानी है। मैंने कहा महोदय आपने दर्शन दे ही दिए हैं तो मेरी चिंता का भी समाधान करें कि कौन हैं आप। अगर रोग नहीं हैं तो आपके कारण कितने लोग बिमार हैं और मरे हैं मर रहे हैं डरते हैं मर जाएंगे। कोरोना कहने लगे क्या आपको मेरे कारण कुछ भी अच्छा नहीं दिखाई दिया आपने ही खबर पढ़ी वीडियो दिखाया टीवी पर भी कह रहे थे हवा साफ हुई है नदी का जल निर्मल हुआ है पशु पक्षी जानवर तक विचरण करने लगे हैं। सड़क दुर्घटना कम हो रही हैं लोग घर में बैठ कितने अच्छे अनुभव कर रहे हैं। ठीक है भयभीत होना अच्छा नहीं मगर भय किस कारण है मौत के डर से , बताओ क्या मुझसे पहचान नहीं थी तब कोई नहीं मरता था। देखो आपकी सरकार भी कितनी बार कोई कठोर कदम उठाती है और कहती है ये जनता की देश की भलाई के लिए है। सब जानते हो क्या क्या याद दिलाऊं और आपको क्यों। अभी भी लॉक डाउन घोषित किया गया है तब भी यही बताया गया है आपकी जान की सुरक्षा की खातिर ज़रूरी है। कुदरत भी जब विवश होती है तब ऐसे कई कठोर कदम उठाती है आपने विकास के नाम पर विज्ञान के अनुचित उपयोग को कितने गलत कार्य किये हैं। क्या आवश्यकता थी जंग करने को भयानक हथियार बनाने की परमाणु बंब क्या कोई ज़रूरत की चीज़ हैं। 

      किस किस ने जो भी कुदरत या ऊपर वाले ने सबकी खातिर दिया उसका बड़ा हिस्सा हथिया कर खुद को स्वामी घोषित कर रखा है। अब भी नहीं समझे सब बराबर हैं मेरे सामने फिर भी आरोप लगाने और सच झूठ को बिना जाने समझे मनमाने दावे करने लगे हैं। मैंने पूछा आप इतना तो बताओ ये सब कब तक , हर कोई इसी सवाल में उलझा हुआ है। कोरोना ने कहा जब सभी देश विश्व के सभी जीव मानव एक समान हो जाएंगे मुझे यहां कोई काम नहीं होगा और जैसे आया ख़ामोशी से चुपचाप चला जाऊंगा। और इतने में कोई आवाज़ बाहर से सुनाई दे रही थी मेरा सपना भंग हो गया मेरी नींद खुल गई। सोचता हूं शायद हम दुनिया वाले किसी गहरी नींद में ही हैं और जिस दिन जाग गए सब ठीक नज़र आएगा। बिस्तर से उठते ही किताब खोली पहले पन्ने पर लिखा हुआ था ये जगत इक सपना है। उठ जाग मुसाफिर भौर भाई अब रैन कहां जो सोवत है। कोरोना समझाना चाहता था उसकी बुराई ही नहीं और भी देखें उसके आने से लोग कितने बदल रहे हैं जाने किस बात का क्या नतीजा हो सकता है वक़्त बताएगा। कोरोना  किसी भयानक ख्वाब की तरह है जिसको खत्म होना ही है लेकिन उसके बाद हमको जो करना और जो नहीं करना है दोनों को समझना होगा। 

Saturday, 25 April 2020

नये दौर की लिख रहे हम कहानी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नये दौर की लिख रहे हम कहानी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

नये दौर की लिख रहे हम कहानी 
बढ़ी प्यास जितना पिया जिसने पानी। 

कहां खो गईं आज सारी बहारें 
सुनो ये हक़ीक़त खिज़ा की ज़ुबानी। 

खुदा कल जिसे हर किसी ने कहा था 
मिटाने लगा है खुदा की निशानी। 

सियासत की तलवार चलने लगी अब 
मुहब्बत के किस्से थीं बातें पुरानी। 

बगावत दिखाई किया जुर्म कैसे 
तुम्हें मार देगी कभी राजधानी। 

लगा जिस पे इल्ज़ाम लूटा चमन को
सभी कह रहे आपकी मेहरबानी । 

रही खुशनसीबी यही हमने देखे 
वो दिन और "तनहा" वो रातें सुहानी।

Thursday, 23 April 2020

मौत का नहीं ऊपरवाले का डर ( चिंतन - मनन ) डॉ लोक सेतिया

  मौत का नहीं ऊपरवाले का डर ( चिंतन - मनन ) डॉ लोक सेतिया 

लगता है अभी भी समझने की बात नहीं समझे हम दुनिया भर के लोग। घबराते हैं कहीं इस तरह से मौत से सामना नहीं हो जाए। जैसे कोरोना से बच गए तो मौत से सुरक्षित हो जाएंगे। सोचना चाहिए तो ये था कि इक दिन मौत से मुलाकात होनी है लेकिन जीवन को इस तरह जिया जाए कि मौत को देख कर शान से सर उठाकर जैसे जीते हैं मरने को भी तैयार हो जाते। सब जानते हैं मरना आखिर है ज़िंदगी का अंतिम पड़ाव मौत ही है कब कैसे अगल बात है। ये मौत का डर रहेगा हमेशा बेशक हम नासमझी में गफ़लत में रहें कि हमने जाने क्या क्या मनसूबे बना रखे हैं सौ साल की भी सीमा नहीं है अभी भी चाहत बाकी अधूरी ही होती है कि ये करना पाना शेष था। जाने कितना जीने का सामान जमा करते हैं जीने को अभी भी समझे नहीं कि क्या चाहिए। बस दो वक़्त खाना दो जोड़ी कपड़े और इक जगह सर छुपाने को जहां जीते जी चैन की नींद आ जाए। मरना होगा मर जाएंगे जीना है जब तक आदमी आदमी बनकर जी तो ले। मगर हम जीते भी हैं तो ज़िंदगी के बिना क्योंकि ज़िंदगी उसको कहते हैं जो किसी अच्छे मकसद से बिताई जाए। सच तो ये है कि आधुनकिता की दौड़ और सब कुछ हासिल करने की चाहत ने हमसे जीने का सुख और सलीका छीन लिया है। वास्तव में हम जीते नहीं हैं जीने का अभिनय करते हैं क्योंकि कथा कहानिओं में ही नहीं संगीत और तमाम तरह की बातों में संदेश कुछ और मिलता रहा है जिसको हमने समझ कर भी समझना नहीं चाहा कभी भी। 

अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ए दिल ज़माने के लिए। जिओ तो ऐसे कि जैसे सब तुम्हारा है मरो तो ऐसे कि जैसा तुम्हारा कुछ भी नहीं। किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार जीना इसी का नाम है। जीना यही पल है इसी को ऐसे जीओ कि मौत आए तो मलाल नहीं हो कि अभी जिए भी नहीं। स्वर्ग नर्क मोक्ष की चिंता व्यर्थ की बात है चाहे ज़िंदगी थोड़ी हो या ज़्यादा जितनी है उसका इक इक लम्हा ऐसे बिताओ कि खुद को लगे बेकार साल दिन की गिनती नहीं बढ़ाई जीने का कोई मकसद रहा है दुनिया को और भी अच्छा और खूबसूरत बनाने का काम किया है। पर हमने तो मतलब की खातिर अंधे होकर पैसे को कभी नाम को कभी शोहरत को अपने जीने का उदेश्य समझ कर दुनिया को अपने स्वार्थ में और भी दिन पर दिन बर्बाद करने का ही काम किया है। कुदरत ने दुनिया केवल हमारे लिए नहीं बनाई थी सभी के लिए सब कुछ है यहां मगर हर किसी ने अपने लिए ज़रूरत से बढ़कर हासिल करने को कोई रास्ता नहीं छोड़ा अच्छा बुरा कोई भी। भौतिकता की हवस की बड़ी महंगी कीमत चुकाई है हमने अपने बाद आने वाली पीढ़ी को ऐसी विरासत देकर जाना चाहते हैं जिस में जीवन हर क्षण मौत से भी बदतर लगने लगे। अपने पिता बाप दादा की ज़मीन जायदाद धन दौलत को तो बढ़ाने को सब किया मगर जिस किसी ने दुनिया बनाई उस कुदरत को हमने कभी संवारा नहीं बल्कि उसको बर्बाद किया है। हवा पानी ही नहीं समाज में भी ज़हर घोलते रहे हैं हम नफरत ईर्ष्या और मतलब में अंधे होकर अपने पास इतना अधिक जमा किया जो कभी उपयोग नहीं करना है। और इस तरह औरों के लिए कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते हैं। आज देख रहे हैं कितने हैं जिनको दो समय रोटी भी नसीब नहीं होती है कभी सोचा है हम कितने खुशनसीब हैं जिनके पास जीने को सभी कुछ है। फिर भी हमारी अधिक पाने की लालसा का कोई अंत नहीं है। 

आपको जो भी जैसे भी मिला अपने उसका सही उपयोग किया है या नहीं। सत्ता मिली शासक बने तो बनकर किया क्या देश समाज को जितना मिला उससे अधिक वापस लौटाया क्या नहीं किया तो अर्थ है आप ने कर्तव्य नहीं निभाया है। पढ़ लिख कर जो भी पद मिले उसको समाज और देश की भलाई के काम और ईमानदारी से महनत की कमाई खाने की बात भूलकर जमकर लूट खसौट की ऐश आराम की खातिर। जनता के सेवक बनकर जनता से कैसा व्यवहार किया आपने कभी शर्म नहीं आई जिन से सब मिलता है उन्हीं को अपमानित करते खुद को बड़ा समझते रहे। मालिक देश की जनता है हर नागरिक है जिनको सरकारी अधिकारी कर्मचारी इंसान भी नहीं समझते हैं। ये कोई ऊंचाई नहीं बड़ा होना नहीं है फलदार पेड़ झुकते हैं इतना तो आपको भी मालूम है। कभी ये समाज इक मिसाल होता था मिलकर साथ जितना है थोड़े में भी बांटकर ख़ुशी मिलती थी जैसे जैसे हमारी सोच बदलती गई हम न केवल मतलबी और संवेदनारहित बनते गए बल्कि हमने अपने इंसान होने की बात को ही त्याग दिया और हम आदमी से भेड़िये ही नहीं गिद्ध तक बन गए हैं। विकास के नाम पर विनाश का सामान जमा करते रहे हैं और किसी ज्वालामुखी के ऊपर बैठे हुए अपने अंजाम की राह देख रहे हैं। 

आज सोचो क्या हमको केवल सज़ा का डर हो तभी सही मार्ग चलना है। नियम कानून बदलते रहते हैं मगर अच्छाई क्या है बुराई क्या है हर कोई जानता है ऊपरवाले से या मौत के डर से नहीं खुद अपने विवेक से अपने भीतर की अंतरात्मा की आवाज़ को सुनकर सही और सभी के कल्याण के मार्ग पर नहीं चल सकते क्योंकि वास्तविक जीना यही होगा। छल कपट और दिखावा आडंबर झूठ के साथ अपने ज़मीर को मारकर जिए भी तो किसी निर्जीव पत्थर के बुत की तरह और बुत ज़िंदा लोगों के कभी नहीं बनते मुर्दा लोगों के ही बनवाते हैं। ये किसी एक वर्ग की बात नहीं है राजनेता अधिकारी या कारोबार करने वाले ही नहीं अन्य भी जो भी शिक्षक हैं डॉक्टर हैं या कोई भी काम खेल अभिनय से लेकर धर्म की बात करते हैं सभी को इस बात को समझना होगा कि उनको समाज से देश से जितना मिलता है उस से बढ़कर लौटते हैं तो वास्तविक योगदान करते हैं अन्यथा इक क़र्ज़ है उनपर अपने कर्तव्य को निभाने का इंसानियत का जिसे चुकाना ठीक उसी तरह ज़रूरी है जैसे दूध का क़र्ज़ जन्म देने वाली मां का नहीं चुकाया तो किसी स्वर्ग जन्नत में कोई स्थान नहीं मिलता मानते हैं। जिस भी धरती पर रहते हैं हवा में सांस लेते हैं जिस से जीवन पाते हैं उस माटी का क़र्ज़ सबसे पहले चुकाना ज़रूरी है। कोई ऊपरवाला देख रहा है या नहीं देख रहा इक है जो आपकी आत्मा है आपका ज़मीर है जिससे कुछ भी छिपा नहीं है। खुद अपने आप से नज़र मिला सकते हैं ये सोचना अवश्य।

           कोई माने या नहीं माने अधिकांश लोग ऐसे ही हैं आजकल दिखावे को अच्छे कर्म करने वाले भी कल तक कोई अवसर नहीं छोड़ते थे किसी से रिश्वत लेने या मनचाही कीमत ऊंचे दाम वसूलने से किसी भी ढंग से अपनी तिजोरी भरने के लिए। अब समय है जिनके पास कुछ भी नहीं है और इसका कारण है कि कुछ लोग हैं जिनके पास अंबार लगे हैं उन्हें ऐसे वंचित लोगों को कोई दान समझ कर नहीं उनका अधिकार है इस दुनिया पर बराबर का ये मानते हुए बांटना चाहिए। साथ नहीं जाना कुछ भी किसी ने लेकर। और ये कोई धर्म नहीं भूल सुधार है करना खुद अपने कल्याण के लिए भी अच्छा है।

Wednesday, 22 April 2020

अब क्यों रोवत अंध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        अब क्यों रोवत अंध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     क्या बने बात जब बात बनाए न बने , जब अंगराज कर्ण से भीष्म जैसे सवाल करते हैं युद्ध होने की बात को लेकर। वो अपनी ही धुन में सौ राजाओं के मुकट लाकर धृतराष्ट्र के कदमों में डालने की बात कह कर चल देते हैं और नये एपीसोड में जैसे किसी कबाड़ी की दुकान से लेकर दरबार में आ जाते हैं मानो युद्ध कोई मज़ाक है और उनके कोई युद्ध लड़ते कोई ज़ख्म लगते कोई सैनिक मरते दिखाना ज़रूरी था ही नहीं। सवाल था जब आखेट करने गए दुर्योधन को कोई बंदी बनाकर उठाकर ले गए जब उसने किसी की बहन बेटी को अपमानित किया और बांध कर सज़ा देने वाले थे। जो पांडव अपनी पत्नी के अपमान पर खामोश रहे वही फिर से ऐसा करने वाले को बचाने चले आये चचेरा भाई होने के कारण। तब दुर्योधन के संगी साथी समय पर नहीं पहुंचे बाद में पहुंचे भी तो क्या फायदा। ये सवालों से बचना है जो बदले में राजा को कितने राज्य जीत कर देने की बात है। दुर्योधन ख़ुदकुशी की धमकी अक्सर देते रहते हैं कर्ण उनको कहते हैं ऐसा करना कायरता है। कर्ण ने तो जुए चौसर छल कपट और शकुनि की चालों को भी कायरता ही बताया था मगर दुर्योधन को तब कायरता भी गौरवशाली लगी थी। कहते हैं जो जीता वही सिकंदर।

     हम जीत जाएंगे हम जीत रहे हैं भले लोग मर रहे हैं उनका डंका बज रहा है। उनको याद दिलाओ कोई राफेल विमान मिला है क्या  इस रोग के जीवाणु का अंत करने का काम कर सकता है। आपने जिस विदेशी कंपनी के अपने देश में भागीदार बनने की चर्चा को महत्व नहीं दिया कि उसका कोई अनुभव ही नहीं है शायद वही इस लड़ाई में कोई दवा कोई वैक्सीन झट-पट ईजाद कर दे। हमने सुना है आप हैं तो सब मुमकिन है कुछ भी नामुकिन नहीं है। और कोई नहीं तो आपके पास इक आधुनिक चाणक्य तो है जो जिस जगह चाहे सरकार बना भी सकता है और गिरा भी सकता है। उसी से कहो इस दुश्मन का अता पता ही बता दें। वो जो आपने विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बनवाई थी जाने कितने हज़ार करोड़ खर्च कर उस से जाकर देखते देश कैसा लगता है। 

      खबर है देश का सबसे बड़ा किला 150 से अधिक एकड़ में बनाया भवन जिस में सुरक्षा चाक चौबंद रहती है और जिसकी अपनी अलग दुनिया है अपना मुगल गार्डन है अपना अतिआधुनिक अस्पताल है कुछ भी दुनिया में नहीं जो उस जगह उपलब्ध नहीं है। वहां भी ये दुश्मन ख़ामोशी से भीतर पहुंच गया है , पहले राज्य के नेताओं तक पहुंचा था अब तो कोई और उस से बढ़कर बड़ा नहीं है। ये जंग जारी है ये कोई आमने सामने की लड़ाई नहीं छुपा छुपी का खेल जारी है। भ्र्ष्टाचार राजनीति के अपराधीकरण दल बदल और सत्ता की मनमानी और बहुमत के कारोबार के खेल से भी भयानक बीमारी है। हमारी सेना ने कभी नब्बे हज़ार सैनिकों को बंदी बनाने का शौर्य दिखलाया था इस अदृश्य जीवाणु ने सौ करोड़ को अपने घरों में बंदी बनाने का काम किया है। कोई सर्जिकल स्ट्राइक ही नहीं सूझी किसी को। 

              उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ ना दवा ने काम किया , 
              देखा इस बीमारी-ए -दिल ने आखिर काम तमाम किया।          (   मीर तक़ी मीर  )

          लोग फिर से पुनर्जन्म की बातें करने लगे हैं वीडियो मिलते हैं कोई अपने पिछले जन्म की बात बताता है। ज्योतिषाचार्य यजमान को पिछले जन्म के क़र्ज़ और कर्मफल की बात कहते हैं जब उनसे कोई समाधान तमाम कर्मकांड करवा बहुत धन लेकर भी समस्या का निकलता नहीं है। चलो हम भी यकीन करते हैं जो हुआ हो गया अब अगले जन्म में समझदारी से जीवन जीना है। उलझन बढ़ जाएगी जब आपको कोई बताएगा आपको ये जन्म इंसान बनने का मिला था पिछले जन्म के अच्छे कर्म किये थे उनका फल था। मगर इस जन्म में तो अपने गधे और भेड़ बकरी की तरह किस किस का अनुसरण नहीं किया तो अगले जन्म आपको वही बनकर संसार में जन्म लेना ही पड़ सकता है।  

    खैर इसकी चिंता बेकार है अब अगर आपको पिछले जन्म की बातें याद रहती तो क्या आप जो जैसे किया करते रहते। सोचो विचार करो अगले जन्म पति-पत्नी का सात जन्म का रिश्ता कौन निभाना चाहेगा। झूठ मत बोलना जो महिला जो पुरुष कहते हैं पछताते हैं शादी कर के क्या अगले जन्म इस झंझट और फिर पालने की सोच भी सकते हैं। नहीं जिनको कोई और लगा कि काश इस से नहीं उस से विवाह होता उनकी भी मनोकामना पूर्ण नहीं होने वाली। सभी की चाहत अलग अलग अपनी अपनी है और जिसे जो मिला उसी पाकर खुश नहीं है। शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। ये विषय बदल गया क्योंकि उनकी याद आई जो इस जन्म अपनी पत्नी को छोड़ आये थे क्या अगले जन्म भी यही दोहराएंगे। लेकिन उनकी चिंता अलग है दुनिया में उनसे पॉपुलर कोई और नहीं हो सकता है अभी भी उनकी कोशिश जारी है टीवी मीडिया सब उनकी महिमा का गुणगान करते हैं। मगर उनको भी मालूम है जो रुतबा इक जीवाणु का बन गया है उसने इनकी शोहरत को पछाड़ दिया है। शायद जाने कब तक वही नंबर वन के पायदान पर सुशोभित रहे।

तजनेताओं के साथ ये होता है कि सत्ता के आखिरी साल चुनाव से पहले पिछले चुनावी वादे याद आते हैं और तब नया घोषणापत्र जारी किया जाता है अगले दस बीस साल तक सब ठीक हो ही जाएगा। जनाब अब्दुल कलाम जी ने 2020 का भारत की तस्वीर बनाई दिखलाई थी अब उनकी वो किताब जिसकी कीमत भी आम पाठक नहीं दे सकता था किसी पुस्तकालय की अलमारी में धूल जमी होगी उस पर। अटल बिहारी बाजपेयी जी की जीवनी दस हज़ार मूल्य की भी यू जी सी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन अर्थात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कहने पर सभी विश्वविद्यायों ने खरीदी थी। ऐसी कितनी किताबें लिखने और लिखवाने वालों को झूठी आत्मसंतुष्टि भी दे सकीं या नहीं कौन जानता है मगर उनकी दशा देश की हालत से बेहतर नहीं है। जब जो करना था किया नहीं बस करने की चर्चा करने की बात लिखते रहे , किया नहीं वास्तव में जो करना चाहिए था। अभी भी जो करना है उसको करने से बढ़कर शोर और सभी बातों का है। नानक की बाणी में इक शब्द आता है जो यहां उपयुक्त है।

करणो हुतो सु ना कियो परियो  लोभ के फंद ,

नानक समियो रमी गईओ अब क्यों रोवत अंध।







सभी ख़ौफ़ दिल से मिटा कर तो देखो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        सभी ख़ौफ़ दिल से मिटा कर तो देखो ( ग़ज़ल ) 

                                 डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

सभी ख़ौफ़ दिल से मिटा कर तो देखो 
कभी हौंसला आज़मा कर तो देखो। 

ख़ुदा के भरोसे रहे हो हमेशा 
भरोसा खुदी पर जगा कर तो देखो। 

भंवर और तूफ़ान से अब डरो मत 
किनारे पे कश्ती लगा कर तो देखो। 

सिकंदर कलंदर सभी मिट गए हैं 
है जीना अगर सर उठाकर तो देखो।

घुटन खत्म ऐसे नहीं कर सकोगे
रुके जितने आंसू बहा कर तो देखो।

है वादा तुम्हारे लिए जां भी देंगे
मुझे दोस्तो आज़मा कर तो देखो।

गिले और शिकवे सभी छोड़ "तनहा"
खताएं जफ़ाएं भुला कर तो देखो।

Tuesday, 21 April 2020

अफ़वाह उड़ा दी जाए ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     अफ़वाह उड़ा दी जाए ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

                 जाँनिसार अख़्तर जी ( जावेद अख्तर के वालिद ) का शेर है :-

      हमने इंसानों के दुःख दर्द का हल ढूंढ लिया , क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाए। 

सबसे पहले ये वैधानिक चेतावनी देना ज़रूरी है कि आगे जो भी लिखने जा रहा हूं वो शत प्रतिशत खालिस झूठ है और झूठ के सिवा कुछ भी नहीं है। ऐसा लिखना ज़रूरी है क्योंकि अफ़वाह उड़ाना अपराध घोषित किया हुआ है इतना ही नहीं अब तो इसको सबसे बढ़कर डराने का भी अलंकार टीवी पर इश्तिहार में दे रहे हैं। 

सब जानते हैं आजकल दुनिया में सबसे ख़तरनाक एक ही नाम है मगर कोई नहीं जानता उसका नाम भी उच्चारण नहीं किया जाना चाहिए। कहते हैं कि शैतान को याद किया और शैतान हाज़िर हुआ फिर भी जिधर भी देखो भगवान तक को छोड़ उसी का गुणगान करते दिखाई देते हैं सभी लोग। जानकारी ये है कि इस समस्या का समाधान पता चल गया है। और इस के लिए कोई मुश्किल काम भी किसी को नहीं करना है। जैसा कि सबको मालूम है सभी देवी देवता छुट्टी मना रहे हैं मगर इक यही झूठ का देवता है जो रात दिन अपने चाहने वालों को दर्शन दे रहा है। झूठ के देवता का घर हरियाणा के फतेहाबाद में बनवाया गया था ये जिनको खबर नहीं उनको सूचना देना ज़रूरी है। 

अफ़वाह यही है कि जो कोई भी झूठ के देवता के घर आकर दर्शन करेगा उसको जो नाम सबसे बदनाम है वो शैतान छू भी नहीं सकेगा क्योंकि ऐसा विदित हुआ है कि उस पर किसी और अस्त्र शस्त्र दवा दारू का असर नहीं होता मगर झूठ से एलर्जी है। झूठ के सामने उसका कोई बस नहीं चलता है झूठ ही एक ही उपाय है जो उसको बेअसर बना देता है। अब आपको ये भी बताना होगा कि झूठ के देवता के दर्शन करने में कोई भी कठिनाई नहीं है। उसके घर कोई भी कभी भी आ सकता है 24 *7 *365 चौबीस घंटे रात दिन साल भर। और कोई भी चढ़ावा भी नहीं चढ़ाना है आप जब जैसे भी आना हो आ सकते हैं क्या पहना नहाये हैं जैसी कोई शर्त नहीं है। आकर आपको सर झुकाने भीख मांगने की भी ज़रूरत नहीं है आपको गर्व से कहना है मैं झूठ के देवता का उपासक हूं उसका चाहने वाला हूं। और झूठ बोलना कभी नहीं छोड़ना है यही शपथ लेनी है। उसके बाद कोई आपका बाल भी बांका नहीं कर सकता है। बताओ इस में क्या कोई कठिनाई है। कोई है जो झूठ नहीं बोलता है अगर ऐसा कहता है तो वो सबसे बड़ा झूठा है। सैंयां झूठों का बड़ा सरदार निकला। 

देवताओं की विशेषता है कि उनके पास हर समस्या का निदान होता ही है। अभी आपने शायद ये विचार किया होगा कि देश में घर में बंद हैं सभी ऐसे में कैसे दुनिया के अकेले झूठ के देवता के घर जाकर दर्शन कर सकते हैं। तो जब तक ऐसा मुमकिन नहीं है आप अपने घर दफ्तर में झूठ के देवता की कोई तस्वीर लगाकर उसके सामने ये मनौती मांग सकते हैं कि जैसे ही संभव हुआ आप चलकर आएंगे दर्शन करने को। कोई समय सीमा नहीं है न कोई घबराने की चिंता करने की ज़रूरत है कि साल में महीने में या कितनी अवधि में नहीं आए तो अनर्थ होगा कदापि नहीं कोई डर दिखाकर झूठ का देवता अपने घर नहीं बुलाता है। जब तक नहीं आ सकते बस झूठ के देवता की अपने घर दफ्तर में जो तस्वीर लगाई हुई है उसी के दर्शन करते रहें आपका कल्याण होना ही है। इस दुनिया में जितने भी लोग सफल हैं जिस भी कार्य में सभी झूठ बोलकर ही इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हैं मगर उन्होंने ये राज़ आपको नहीं बताया क्योंकि यही सबकी समस्या है कोई भी किसी और की कमीज़ अपने से बढ़कर सफेद हो कभी नहीं चाहता है। झूठ का चमत्कार है कि पत्थर भी हीरा लोहा भी सोना और घना अंधेरा भी सूरज नज़र आता है। सच बोलने की पढ़ाई सभी पढ़ाते हैं मगर कितने लोग सच बोलना सीख पाए हैं सब जानते हैं। लेकिन झूठ बोलने की कला हर किसी को आती है समस्या कभी कभी इतनी है कि जो झूठ को बड़ी सफाई से बोलते हैं लोग उनके झूठ पर ही भरोसा करते हैं कुछ लोग झूठ बोलते हुए पकड़े जाते हैं क्योंकि उनके चेहरे से हाव भाव से पता चल जाता है कि बंदा झूठ बोल रहा है। 

आपको झूठ बोलने का निरंतर अभ्यास करते रहना है ऐसा करते करते आप खुद झूठ को ही सच समझने लग जाओगे। जिस दिन आप ऐसे शिखर पर पहुंच गए आपकी महिमा हर तरफ फ़ैल जाएगी। झूठ बोलने के लिए यही आत्मविश्वास चाहिए कि आपको अपने झूठ पर यकीन हो कि इस से बढ़कर सत्य कोई नहीं है। यहां इक पुरानी कथा को ध्यान में रख सकते हैं जो इस तरह है। 

एक बार सच और झूठ नदी में स्नान करने पहुंचे। दोनों ने अपने कपड़े उतार कर नदी के तट पर रख दिए और झट-पट नदी में कूद पड़े। सबसे पहले झूठ नहाकर नदी से बाहर आया और सच के कपड़े पहनकर चला गया। सच अभी भी नहा रहा था। जब वह स्नान कर बाहर निकला तो उसके कपड़े ग़ायब थे। वहां तो झूठ के कपड़े पड़े थे। भला सच उसके कपड़े कैसे पहनता ? कहते हैं तब से सच नंगा है और झूठ सच के कपड़े पहनकर सच के रूप में प्रतिष्ठित है। 

   इक चुटकुला भी आपने नहीं सुना तो सुनकर आनंद ले सकते हैं। कुछ छोटे बच्चे खेल रहे थे इक कुत्ते का पिल्ला लिए हुए। स्कूल के अध्यापक ने देखा तो उनसे पूछ लिया कि ये क्या खेल खेल रहे हो। बच्चों ने बताया मास्टरजी हमने शर्त लगाई है झूठ बोलने की। जो भी सबसे बड़ा झूठ बोलेगा ये पिल्ला उसी को मिलेगा। मास्टरजी कहने लगे कितनी अजीब बात है जब हम तुम्हारी आयु के बालक थे तो हम जानते तक नहीं थे झूठ कैसे बोलते हैं। ये सुनते ही सभी बच्चे कह उठे मास्टरजी ले जाओ ये पिल्ला आपका हुआ।



Sunday, 19 April 2020

सोच-समझकर रणनीति बनाकर ( विपत्ति से जंग ) डॉ लोक सेतिया

 सोच-समझकर रणनीति बनाकर ( विपत्ति से जंग ) डॉ लोक सेतिया 

 नहीं मैं कोई जानकर नहीं शोधकर्ता नहीं वैज्ञानिक नहीं फिर भी सोचता रहता हूं हर सामाजिक धार्मिक राजनैतिक विषय को लेकर। कल इक फिल्म देखते देखते विचार आया जैसा फिल्म में आतंकवाद को खिलाफ जंग जीतने के लिए लड़ने की रणनीति दुश्मन के तरीके और ढंग को ध्यान पूर्वक समझ कर उसी तरह से सामना कर निडरता से लड़ी और जीती जाती है ही इस समय उचित नहीं होगा। कोरोना को लेकर अभी कयास ही लगाए जा रहे हैं ठीक से कुछ भी नहीं मालूम तो क्या केवल बंद कमरे में अथवा किसी भी शहर देश को बंद किले में रहकर हमेशा सुरक्षित रखा जा सकता है। ये सोच लिया सामाजिक दूरी बनाकर घर में कैद होकर खुद को बचा सकते हैं मगर कोई नहीं जानता कि कब बाहर ऐसा दुश्मन जिसे हम देख भी नहीं सकते वास्तव में पूर्णतया खत्म हो जाएगा और हम घर से बाहर निकल कर भी उसके शिकार नहीं होंगे। जब तक उसका उपचार या बचाव का कोई तरीका नहीं ढूंढा जाता हम ये नहीं समझ सकते न ही अनंतकाल तक देश को डर और घबराहट में जीने की बात करना सही होगा। ये तो मौत से घबराकर जीना छोड़ केवल ज़िंदा होने का अभिनय होगा। आधुनिक युग में जब शायद ये भी समझ आ जाना चाहिए कि कोई भगवान किसी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे में से आपको बचाने को नहीं आने वाला है। और समय के अनुसार हर समस्या की जड़ तक पहुंचकर उसका समाधान करना ही समझदारी है न कि काल्पनिक अथवा ऐतहासिक कथा कहानियों में खोकर सामने खड़ी वास्तविकता से भागना नज़र चुराकर। 

बहुत कारण हैं कुदरत से मनमानी खिलवाड़ करने से तमाम तरह की अंधी दौड़ में हमने इंसान इंसानियत को लेकर विचार करना ही छोड़ दिया है। जब जिस किसी ने जो भी बताया अपने मकसद से अपनी राजनीति के लिए या धर्म के नाम पर अथवा अलग अलग तरह के लोगों ने अपने हितों को ध्यान में रखकर कोई व्यौपार कारोबार उद्योग स्थापित करने से टीवी सिनेमा अभिनय यहां तक खेल को लेकर आर्थिक लाभ की खातिर देश की जनता की भलाई या जागरूकता के लिए नहीं सिर्फ अपनी खुदगर्ज़ी के लिए। हमने काठ के उल्लू बनकर अपने मस्तिष्क से काम लिए बिना स्वीकार कर लिया कि ये बड़े लोग हैं जाने माने लोग हैं जो कहते हैं सही होगा। मगर हम नहीं जानते कि ये तमाम लोग जो संदेश उपदेश हम सभी को देते हैं खुद उस का पालन नहीं करते। सामने सब कुछ साफ है धर्म वाले संचय करते रहे हमें थोड़े में सुख से रहने की बात कहते हुए , राजनेता जनसेवा  का दम भरते हुए देश के खज़ाने पर कुंडली मारे बैठे उसका उपयोग अपनी अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करने में बर्बाद करते रहे। उन्होंने शासक  बनकर खैरात भी छीनकर ली और देश के नागरिकों को अधिकार भी भीख की तरह मांगने की नौबत आ गई। और हम उनको दोष देते हैं जबकि दोषी हम खुद हैं जो ऐसा झूठे मक्कार और मतलबी लोगों को क्या क्या बना दिया और इतना ही नहीं उनको भगवान होने का अहंकार होने लगा। जिस देश समाज में काबलित और ईमानदारी की कीमत नहीं होती और झूठ एवं चालबाज़ी सिर्फ चिकनी चुपड़ी बातें सुनकर हाथ जोड़ने ताली बजाने का काम लोग करेंगे उसको बबूल बोकर कांटे ही मिलने हैं। 

हमको मूर्ख बनाया जाता है क्योंकि हम मूर्ख बनने और कहलाने में शर्म नहीं महसूस करते हैं। किसी की भी हर बात को आकाशवाणी की तरह विचारे बगैर स्वीकार करना हमारी समझदारी का सबूत तो नहीं हो सकता है। पिता से भाई से दोस्त से असहमत होकर शंका करते हैं पूछते हैं क्या कैसे है तो फिर जिनको शासन के अधिकार देकर बनाया है उनसे कोई सवाल कैसे नहीं किया जा सकता। ऐसे तमाम लोग आपको उपदेश देते हैं भाषण देते हैं कभी आपकी बात नहीं सुनते न ही समझना चाहते हैं। हमने बार बार कुल्हाड़ी को अपने पांव पर मारने की मूर्खता की है। सच्चे और काबिल लोगों को हमने कभी उचित आदर नहीं दिया है खुद हम भी महनत और काबलियत से नहीं भाग्य भरोसे या जोड़ तोड़ किसी भी उचित अनुचित ढंग से सफलता हासिल करने में यकीन रखते हैं। बातें बहुत होती हैं पिछली गलतियों को लेकर मगर आज भी उसी किसी अंधी सुरंग में और आगे चलते जा रहे हैं हम रौशनी की बातें करते हैं मगर पुजारी अंधियारे के हैं। अभी देश के हालात पर बहुत कुछ और समझना विचार करना बाकी है मगर इक शेर किसी शायर का विराम देने से पहले। 

    क्या बतलाएं हमने कैसे सांझ सवेरे देखे हैं , सूरज के आसन पर बैठे घने अंधेरे देखे हैं। 

संकट के समय शासक और सरकार की परीक्षा होती है कि जिनको देश चलाने का अधिकार मिला अथवा जनता ने दिया वो किस सीमा तक सफल रहे हैं नागरिक को अच्छा जीवन और निर्भय होकर सुरक्षित रहने के लिए। मगर अभी जब कोरोना से वास्तविक लड़ाई देश की जनता लड़ रही है और सरकार के पास कोई योजना ही नहीं है कि कैसे करोड़ों लोगों को सुरक्षित अपने घर या राज्य में किस तरह इक विश्वास से और कब तक रहना है किसी नेता का ये कहना कि ये उनके सही समय पर निर्णय करने और कदम उठाने से संभव हुआ है कि कई देशों से हमारे देश में कम संख्या है कोरोना से रोगी लोगों की। अभी तो वास्तव में लड़ाई लड़नी बाकी है और कितनी लंबी लड़ाई होगी ये भी नहीं जानते और उसके बाद विवेचना की जा सकेगी कि क्या जैसा किया गया वही सही था अथवा कुछ और था जो किया जाना चाहिए था मगर समय पर नहीं किया गया। और ये निर्णय कोई शासक अपने बारे खुद नहीं कर सकता है बाद में इतिहास तय करता है कि किस शासक ने कब कोई निर्णय अनुचित लिया था जैसे आपात्काल का निर्णय जैसे इसी सरकार के बहुत सरे निर्णय देश की अर्थव्यवस्था को लेकर संवैधानिक संस्थाओं को नैतिक मूल्यों को लेकर जनता की भलाई के लिए थे या किसी व्यक्ति की आंकाक्षा और किसी विचारधारा को लादने के मकसद से। 

ये खेदजनक बात है कि कोई भी शासक कभी अपनी भूल या गलती को स्वीकार करने का साहस नहीं करता है। मगर हमारे समाज में कुछ बहुत अच्छी बातें हैं जो पुरातन मूल्यों संस्कारों से सीखी हुई हैं जैसे जब संकट की घड़ी आई है तो तमाम लोग औरों की सहायता को आगे बढ़कर वास्तविक इंसानियत के धर्म का पालन करते नज़र आये हैं आते रहे हैं। मगर काश यही भावना हर दिन बनी रहे और हम सभी जिस किसी को भी भूखा बेबस या बेआसरा देखें उसके लिए हाथ बढ़ाएं। इक और बात अगर संभव हो तो बहुत अच्छा होगा। हमको आस्तिक होना धर्म की राह चलना है तो इसके लिए हम अपने अपने आराध्य की वंदना कर सकते हैं अपने घर पर अपने निजि स्थान पर और इसके लिए किसी और नये धर्म स्थल की आवश्यकता नहीं है बल्कि जितना धन सभी ऐसे स्थलों पर चढ़ाते हैं उसे अपने ही आस पास असहाय गरीब भूखे नंगे लोगों की भलाई के लिए खर्च कर देश समाज से इक बड़ी समस्या को दूर कर सकते हैं। अथवा अगर कुछ नया बनाना भी है तो निःशुल्क उपचार के अस्पताल या शिक्षा के मंदिर बनाने और बेआसरा लोगों के लिए घर बनाने का कार्य किया जाए। किसी भी देश का वास्तविक विकास तभी सार्थक होता है जब हर नागरिक को जीवन की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाना पहला उदेश्य हो। 

देश की बेहद गंदी स्वार्थ की राजनीति जी अनीति बन गई है जिस में अपराधी और भेदभाव बढ़ाने वाले बाहुबली जो जनता को भयभीत करते हैं उनका अंत हो और स्वच्छ देशसेवा की भावना की राजनीति शुरू हो जिस में शिक्षित और काबिल लोग सत्ता को उचित मार्गदर्शन देकर अपना कर्तव्य पालन ईमानदारी से करें। न्यायपालिका सामाजिक संस्थाओं संवैधानिक संस्थाओं को फिर से अपने आदर्शों पर खरे उतरने को अपनी निष्ठा देश के संविधान के लिए रख कर किसी व्यक्ति या सरकार के लिए अपने मूल्यों को नहीं भुलाना चाहिए।  


Monday, 13 April 2020

सच उन्हें देखना नहीं आता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  सच उन्हें देखना नहीं आता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

सच उन्हें देखना नहीं आता 
और कुछ बोलना नहीं आता। 

हम शिकायत भला करें कैसे 
राज़ सब खोलना नहीं आता। 

रूठते हम कोई मनाता भी 
पर हमें रूठना नहीं आता। 

जब कभी साथ साथ होते हैं 
सब तभी पूछना नहीं आता। 

क्या हुआ जो नहीं मिला "तनहा"
इस तरह सोचना नहीं आता।

Sunday, 12 April 2020

कोरोना के अंत के बाद ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       कोरोना के अंत के बाद ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

अंत होना ही था हर बुराई हर रोग हर समस्या का कभी न कभी आखिर ख़ात्मा होता ही है। ये तब की बात है जब विश्व में सभी देश की जनता और सरकारों ने कोरोना नाम की चीज़ को जड़ से मिटा दिया है। अब जब दुनिया के तमाम लोग फिर से ज़िंदगी की लड़ाई लड़ने लगे हैं वहीं कुछ लोग जो खुद को आम इंसानों से अलग और बड़ा महान और महत्वपूर्ण मानते हैं जिनका निधन होने पर शोर होता है उनके निधन से जो क्षति समाज को हुई है उसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता है। बाद में उनके नाम के भवन मूर्तियां बुत और सरकारी योजनाओं का नाम से पार्क चौराहे का नाम रखते हैं। मगर सच यही है कि ये सब फज़ूल ही है जैसे आपने समझा भी होगा शाहजहां ने ताजमहल बनवाया मगर मुमताज को उस से क्या मिला। दुनिया देखती है मुमताज ने नहीं देखा इसलिए मुझे हमेशा लगता है अपनी पत्नी को इक छोटा सा घर बनवा कर देना अधिक अच्छा है उसके रहने को न कि उसके बाद उसकी याद में कोई महल बनवाने का काम करना। 

      बाद ए फ़नाह फज़ूल है नामो - निशां की फ़िक्र , जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या। 

शायर की बात उचित है। बादशाहों की तरह राजसी ढंग से जीने वाले तमाम ऐसे बड़े नाम पद या शोहरत वाले धनवान लोगों को कोरोना के अंत के बाद भी चिंता है जाने कब किसी और तरीके से यमराज आ कर उनको अपनी खूबसूरत दुनिया से दूर किसी और दुनिया में ले जा सकते हैं। इसलिए इन सभी की खातिर कोई ऐसी जगह उनके निवास को तलाश की जाए जिस जगह यमराज उन तक नहीं पहुंच सकते हों। धरती पाताल समंदर सब जगह सुरक्षित नहीं समझी गईं मगर अभी अंतरिक्ष को लेकर कुछ एक घटनाओं को छोड़ कोई ऐसी बात नहीं दिखाई दी और जो भी घटना या दुर्घटना अंतरिक्ष में हुई उस में भी मौत धरती पर समंदर में गिरकर या किसी पाताल में समाने जैसा ही हुआ है। चांद और मंगल पर जीवन संभव है या नहीं अभी मुश्किल है मगर अंतरिक्ष में जितने दिन चाहें लोग रहते ही नहीं रहे जो जो भी करना था करने में सफल रहे हैं। 

अब इन सभी लोगों को जिनका रुतबा वास्तव में भगवान खुदा जैसा ही है ऐसी किसी जगह बस्ती कॉलोनी या कोई निवासीय सोसाइटी निर्मित कर बसाने का उपाय किया जा सकता है। उनको अपने सभी काम धंधे कारोबार या शासन या शासकीय व्यवस्था चलाने को धरती पर आने की ज़रूरत ही नहीं होगी और ऊपर अंतरिक्ष से ही अपना सब कार्य अपनी एप्पस या इंटरनेट से संपर्क कर करेंगे। अभी तक लोग अपने पास थोड़ा पैसा जमा होने पर देश विदेश घूमने जाते थे अब उनको अंतरिक्ष में घर नहीं मिलने का नियम होने के बाद भी जाकर देखने की अनुमति मिल सकेगी। चेतावनी ज़रूरी है कि कोई जायदाद ज़मीन बेचने खरीदने का दलाल आपको ठग सकता है अंतरिक्ष में प्लॉट दिलवाने की बात कहकर जबकि वहां आम इंसान को आम आदमी को रहने को किराये पर भी जगह देना निषेध होगा। लुटियन ज़ोन की तरह आपको देखने की अनुमति मिल सकती है भीतर जाने को इजाज़त भी नियत समय तक देख बाहर निकलना होगा। 

     नाम बताने की ज़रूरत नहीं है आज विश्व के बड़े बड़े देशों के महान शासकों से उनकी दोस्ती दोस्ती फिल्म के दो दोस्तों या फिर शोले फिल्म के जय वीरू से भी अधिक है। इतनी है कि कोई अपनी मांग नहीं मानने पर अंजाम की धमकी देता है और जिसको धमकाया गया वो मान जाता है मगर दोस्त की धमकी को धमकी नहीं मज़ाक मानकर बदले में वही दोस्त अपनी मनवाने के बाद दोस्ती की बात कहते हुए और पक्की यारी की बात कहता है। ऐसे जिन देशों के शासकों से उनकी गाढ़ी छनती है जो चुनाव के समय भी दो देशों की आपसी संबंधों में दलगत विषय से परे देशों की आपसी दोस्ती के उसूल को नहीं जानते और आपसी भाईचारा निभाने अपने दोस्त की राजनैतिक सभाओं में जाकर उनका साथ देते हैं को भी अंतरिक्ष में हम सब साथ साथ हैं की मिसाल बनाते हुए शामिल किया जाना है। चांद के पार चलो आशिक़ कहते थे ये दोस्त अंतरिक्ष को सब यार चलो का गीत मिलकर गाएंगे। हम घर दफ्तर वहीं बनाएंगे जिस जगह मौत के फ़रिश्ते भी देखने से घबराएंगे। जनाब ने अपने पुराणों की बात से सभी को भरोसा दिलवाया है कि हमारे यहां काल अर्थात मौत के फ़रिश्ते को भी बंधक बनाकर रखने का कीर्तिमान किया जा चुका है अगर अंतरिक्ष में यमराज का कोई दूत आएगा तो वापस नहीं जाने पाएगा। शक्तिमान टीवी सीरियल की नहीं देशों के शासकों की बात हो रही है कि ये समस्या खड़ी होनी ज़रूरी है कि सबसे अधिक शक्तिमान कौन है। अर्थात उनकी बनाई मायानगरी से उनका शासन तो चलेगा मगर उस अंतरिक्ष की नगरी का राजा कौन होगा। अब मुझसे बढ़कर भला कौन हो सकता है उनका दावा है रहेगा यही इक विषय है जिस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता है। कोई भी खुद को नंबर वन से कम नहीं समझता है और बारी बारी बनने की भी सहमति नहीं हो सकती क्योंकि सभी जानते हैं इक दूसरे को इक बार सत्ता हथिया ली तो हटने को तैयार नहीं होगा कभी कोई।


समझना अच्छे कर्म दान धर्म कर्तव्य आदर्श और नैतिक मूल्यों को ( आलेख - चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

 समझना अच्छे कर्म दान धर्म कर्तव्य आदर्श और नैतिक मूल्यों को 

                                 ( आलेख - चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

आज जो भी लिख रहा हूं वास्तव में खुद मेरा अपना लिखा या समझाने का विषय नहीं है। हमने जिन जिन किताबों को धार्मिक आदेश उपदेश माना स्वीकार किया हुआ है उनकी ही बताई बात को आधुनिक काल के युग में आचरण को देखने समझने और विवेचना करने समाज को जो भी जैसा है आईना दिखलाने की बात है। दो शायरों के शेर आपको सुनाता हूं यूं कोई भी शायर कवि ऐसा नहीं जिसने आईना दिखलाने को लेकर कहा नहीं हो। कृष्ण बिहारी नूर कहते हैं " चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो आईना झूठ बोलता ही नहीं। " अब जो लोग टीआरपी विज्ञापन या पैसे के लिए काम करते हैं वो सच का आईना नहीं हैं ये किसी तरह मनचाहे ढंग से छवि बनाने का छल करने वाले आईने हैं जैसे अजायबघर में देखे हैं। राजेश रेड्डी जी कहते हैं " न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊं। " सच कहना आसान नहीं है सच का स्वाद मीठा नहीं होता और कड़वा सच कोई नहीं सुनना चाहता है। 

आज पहला विषय अच्छे कर्म और दान की परिभाषा को समझना है। शायद ही कोई होगा जिसने राजनेता सरकारी विभाग के कर्मचारी अधिकारी पुलिस के सिपाही से थानेदार दरोगा तक सभी के घूस रिश्वत या कोई काम करने के बदले उपहार की मांग किसी भी रूप में लेने को लेकर देखा नहीं हो। अब कुछ लोगों को हम देख रहे हैं जो जेबें भरते थे अन्याय करते थे दानवीर और अच्छे कर्म करने लगे हैं जनता की सहायता करने लगे हैं। क्या उनकी सोच बदल गई है कदापि नहीं , ये बिलकुल उसी तरह है जैसे काली कमाई झूठ धोखा व्यवसाय कारोबार में गड़बड़ मिलावट जैसे ही नहीं हर किसी की जान से खिलवाड़ कर ज़हर बेचने तक का कारोबार करने के बाद किसी धार्मिक जगह दान आदि करते हैं ये मानकर कि उनके पाप अपराध का भार कम हो गया मगर पापी की पाप की कमाई के दान से वो डाकू से धर्मात्मा बन नहीं जाते हां चाहते हैं लोग उनके अधर्मों को नहीं दान देने की चर्चा करें। ये धर्म है ही नहीं जब कोई किसी जगह पाप करता रहता और जाकर माफ़ी मांगता रहता है या फिर पूजा अर्चना करता ही किसी स्वार्थ की चाहत से है। 

अपने बड़े बड़े धनवान लोगों के दान देने की भी चर्चा सुनी है जो घोषणा करते हैं सरकार को किसी संस्था को या किसी और समय पर दाता बनकर अच्छे काम की। लेकिन इनका ये काम दो कारण से होता है या तो पहले से नाम शोहरत अथवा सरकार से कोई मतलब लेने के बाद या भी देने के बाद उसका कई गुणा पाने की खातिर। वास्तविक दान या अच्छा काम वो होता है जो हम अपनी खून पसीने की कमाई से अपनी ज़रूरत को छोड़ किसी की सहायता करते हैं कठिनाई में। ऐसे अधिकतर दस बीस सौ या हज़ार का दानकर्म को लेकर कोई शोर नहीं करते न ही बदले में कुछ चाहते हैं। 

अब बात सरकार शासक की राजधर्म की। चाणक्य उपनिषिद रामायण गीता गुरुग्रंथ साहिब बाईबल कुरान सभी राजा और शासक का कर्तव्य बताते हैं जब नागरिक विपदा में हों उनकी देखभाल सहायता करने को अपने खज़ाने का मुंह खोलना। मगर यहां तो जब भी समस्या होती है सरकार का मुखिया जनता से ही मांगता है और लोग देते हैं ऐसा सरकार विवशता की खातिर नहीं करती कि उसका खज़ाना खाली है। हमने देखा है उनको अपने उचित क्या अनुचित खर्च को जनता के पैसे से ही नहीं देश के संसाधन को संपत्ति को बेचकर गिरवी रखकर भी शान से रोज़ धन की बर्बादी करते रहना। क्या जब देश की जनता को ज़रूरत है तब भी किसी तरह से उसी से लेकर उसको देने को अपनी महानता बताना उचित है। कहीं किसी भी धर्म में ऐसा नहीं सबक सिखाया गया। मगर आपको समझाया जाएगा कि ऐसे में बहुत धन की ज़रूरत है मज़बूरी है तभी जो दे सकते हैं उनसे विनती है और वास्तव में सरकारी विनती आदेश की तरह से होती है जिस को जो भी अधिकारी या नेता कहते हैं नहीं देने पर अंजाम जानते हैं। मगर कोई कुछ नहीं कहता ये सोचकर कि जो भी कर रहे भलाई का काम कर तो रहे हैं। 

अब आपको वास्तविकता बताते हैं हर नेता हर सरकार पिछली सरकार के पास धन का अंबार होने पर सवाल करती है। खुद सत्ता में हैं तब इनके पास भी सत्ता के अधिकार के उपयोग कर चंदा और जगह जगह ज़मीन जायदाद आलीशान दफ्तर और साधन आ जाते हैं। किस तरह से किस किस से सब को पता है माजरा लेन देन का है। आपने अपने शासन में जिन लोगों की सेवा की बात और ये जो भी अनुचित होता था उसको बदलने की बात कही थी मगर अपने भी वही किया और पिछली सरकारों से बढ़कर किया। तभी आज उन सबसे अधिक धन आपके पास है क्या इस कठिन समय आपने अपने नेताओं की जमा की करोड़ों की पूंजी और दल के पास जमा धन जायदाद से इक कौड़ी भी जनता को देने की बात की है। एक महीने का वेतन या कम वेतन जनता की आंखों में धूल झौंकने की बात है। नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। 

अंत में बात आदर्श और नैतिक मूल्यों की। कोई कहता है लॉक डाउन में शराब की दुकान खोलनी चाहिएं क्योंकि उनसे सरकार को खूब आमदनी होती है। मगर वास्तव में ये जितने भी धंधे होते हैं सत्ता धारी नेताओं का हिस्सा होता है भले दो नंबर का। उनकी आमदनी का सवाल है। अब सबसे बड़ा सवाल ये कह रहे हैं कि किसान को फसल काटनी है कुछ उद्योग को काम करना है उनको अनुमति देनी होगी और उनकी मज़बूरी है पेट भरना है तो अपनी उगाई फसल को छोड़ नहीं सकते। मगर क्या उनकी जान की कोई कीमत है क्योंकि दावा कुछ भी करें उनकी सभी की जीवन की रक्षा नहीं की जा सकेगी। कोई कह सकता है रास्ता क्या है। अब आपको बताते हैं जो राह हो सकती है आप के पास संसाधन हैं और संसाधन हासिल करने को अधिकार भी हैं। क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि सरकार किसान की फसल खुद खेत से कटवाने और उसकी कीमत चुकाने का काम करे। जब आप देश भर में हर किसी के घर की जानकारी अपने सरकारी विभाग के कर्मचारी अधिकारी भेजकर कुछ दिन में कागज़ पर लिख सकती है तो अब ज़मीन पर भी काम कर दिखाने का काम किया जाना मुमकिन है। मगर खेद की बात यही है कि सरकार को जनता की सुविधा ज़रूरत के समय कर्तव्य नहीं निभाने ज़रूरी लगते आदेश लागू करना आता है। ये सब मापदंड साबित करते हैं कि वास्तव में हमारे समाज की धर्म की सरकार की कारोबारी लोगों की समाचार और समाज की वास्तविकता दिखाने वालों की जो असलियत है उसको आदर्श तो हर्गिज़ नहीं कह सकते हैं।

Saturday, 11 April 2020

झूठ सच से बड़ा हो गया ( विश्वगुरु होने का सच ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ सच से बड़ा हो गया ( विश्वगुरु होने का सच ) डॉ लोक सेतिया 

    कल शाम को इक पोस्ट लिखी थी हमारे देश के हालात को लेकर मगर फिर विचार किया उसको पढ़कर हो सकता है अभी भी जो विश्वास बचा है वो भी नहीं रहे इसलिए उसको ही नहीं और भी कुछ बातों को अपनी फेसबुक से हटवा दिया था। जाने क्यों लगा कि आज जब विश्व कठिन दौर से गुज़र रहा है और लगने लगा है अधिकांश लोग सही दिशा को जाते हुए नज़र आते हैं शायद नंगा सच दिखाने का उचित समय नहीं है। मगर रत भर इसी को लेकर चिंतन करता रहा और निर्णय किया कि सच का सामना करने का साहस होना ही चाहिए और झूठ का जितना भी शोर करें सच नहीं बन जाता है। शायद दो साल होने को हैं जब 30 जून 2018 को झूठ के देवता के मंदिर शीर्षक से व्यंग्य रचना लिखी थी। जहां गीता रामायण कुरान बाईबल से लोग सबक नहीं सीख पाए वहां मेरे या किसी के सच लिखने या झूठ का पर्दा फाश करने की कोशिश से भला क्या हो सकता है। मगर आज जब हर कोई डरा हुआ है मौत सामने खड़ी है लगता है उस समय भी हम लोग झूठ ही झूठ बोलते जा रहे हैं तो फिर सच कब बोलेंगे या समझेंगे। किसी पर आक्षेप आरोप नहीं कोई
विरोध नहीं और किसी को नीचा दिखाना नहीं चाहता बस बिना घटनाओं की चर्चा इक बोध कथा की तरह इशारे में वास्तविकता बताने का कठिन कार्य करने की कोशिश है। अपनी बहुत पुरानी ग़ज़ल से बात शुरू करता हूं।

फिर वही हादिसा हो गया ,
झूठ सच से बड़ा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से ,
कद में कितना बड़ा हो गया।

कश्तियां डूबने लग गई ,
नाखुदाओ ये क्या हो गया।

सच था पूछा ,बताया उसे ,
किसलिये फिर खफ़ा हो गया।

साथ रहने की खा कर कसम ,
यार फिर से जुदा हो गया।

राज़ खुलने लगे जब कई ,
ज़ख्म फिर इक नया हो गया।

हाल अपना   , बतायें किसे ,
जो हुआ , बस हुआ , हो गया।

देख हैरान "तनहा" हुआ ,
एक पत्थर खुदा हो गया।

किस किस की बात की जाए जब जिधर भी देखते हैं हर कोई झूठ को सच बनाने को लगा है। सरकार जो सच है बताती नहीं छुपाती है और जो नहीं हुआ जो किया नहीं करते हैं का दावा करती है। नज़र आता है बाहर से सब ठीक है मगर भीतर सब खोखला है कोई भरोसा नहीं कब क्या अंजाम हो। बहुत शोर मचाया पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया कभी ये नहीं बताया खुद आपने क्या कर दिखाया है। इक महामारी से देश क्या दुनिया परेशान है और आप आंकड़ों से बहला रहे हैं कहते हैं जो वास्तविकता नहीं है दिखाने को बहुत मगर असलियत में कुछ नहीं क्या ऐसे सामना करते हैं समस्या का। अपनी गलती का दोष किसी और को गुनहगार बनाकर बच नहीं सकते हैं। हमने सभी ने मिलकर ताली थाली बजाई दिया जलाया क्या वास्तव में जिस मकसद से करना था वो मकसद हासिल हुआ भी। जिनका आभार व्यक्त करना था फिर कितनी जगह उन्हीं से आपराधिक आचरण नहीं किया कितने लोगों ने वो किसी और देश समाज से नहीं हैं। और एकता हम साथ साथ साथ हैं का दिया जलाने वाले एकता का अर्थ भी जानते हैं। हर कोई किसी न किसी को लेकर अपने अंदर की नफरत को दर्शाता लगता है और जो सबक पढ़ाने वाले हैं खुद वही अमल नहीं करते हैं।
हम आदी हैं घर की चमक बाहरी दिखावे को और भीतर कितनी गंदगी कालीन के नीचे छिपी रहती है। ज़रा सी बात को बढ़ा चढ़ा कर खुद को महान विश्वगुरु कहने की नासमझी करते हैं अपना गुणगान करना कोई अकलमंदी की बात नहीं होती है।

इक बोधकथा है किसी नगर में इक राक्षस से सभी डरे हुए थे और किसी ने उपाय बताया कि अगर इक अंधेरी रात को नगर के हर घर का वासी बाहर जो कुंवा है उस में इक इक बाल्टी दूध डालेगा तो राक्षस का अंत हो जाएगा। मेरा मकसद अंधविश्वास को बढ़ावा देना कदापि नहीं है समझने को उद्दारहण लिया है। इक बुढ़िया ने सोचा कि मुझे दूध की कमी है अगर मैं नहीं डालती तब भी बाकी सभी डालेंगे और कुंवा भर जाएगा किसी को खबर नहीं होगी कि मैंने नहीं डाला दूध और बाल्टी भर पानी डाल आई थी। अगली सुबह सबने जाकर देखा तो कुंवे में इक बूंद भी दूध की नहीं थी पानी भरा था क्योंकि जो बात उस बुढ़िया को सूझी वही सबने किया था। हम सब लोग यही करते हैं ये समझते हैं और हैं करने को हमने नहीं किया तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। बूंद बूंद से समंदर भरता है और थोड़ा थोड़ा हर कोई बेईमानी करता है तो सब व्यर्थ जाता है।

अब बात किस किस ने नहीं किया यही , धर्म वालों ने धर्म की नहीं आडंबर की राह दिखाई और धर्म को इक कारोबार बनाकर वास्तव में धर्म का अंत ही कर दिया। सामाजिक संस्थाओं ने कब से समाज सेवा को इक सीढ़ी बना लिया अपने अपने मकसद की खातिर। राजनेताओं और सरकारों ने जनता की सेवा के नाम पर खुद अपने आप पर बेतहाशा धन आंबटित किया बर्बाद किया ऐशो आराम पर खर्च करने का गुनाह किया है। न्यायपालिका से सवैंधानिक संस्थाओं तक ने निजि स्वार्थ और अपने लोभ लालच या डरकर कर्तव्य को भुलाने का कार्य किया है। बड़े बड़े पद मिलने पर अधिकारी देश समाज को बेहतर बनाने की बात भूलकर धन दौलत और नाम शोहरत की दौड़ में शामिल होते रहे तभी ऐसा हुआ जिनको आदर सम्मान तमगे मिले बाद में उन्हीं को अनुचित आपराधिक कार्य करते पाया गया। देश की संसद राज्यों की विधानसभाएं जैसे अपराधी और बाहुबली गुंडागर्दी करने वालों का अड्डा बन गईं हैं। किसी भी राजनैतिक दल को चुनाव जीतने की खातिर अपराध को बढ़ावा देते कोई संकोच नहीं हुआ। अंजाम हर देश उस मोड़ पर है जहां कोई राह नहीं सूझती है।

सत्यमेव जयते का वाक्य लिखा हुआ है मगर सत्य का पक्ष कोई नहीं लेता है हर कोई दरबारी बनकर झूठ का साथी बन बहुत कुछ पाना चाहता है कोई देश समाज को देना कुछ भी नहीं चाहता है। टीवी मीडिया अख़बार लिखने वाले कलम के सिपाही कला संगीत के उपासक समाज की वास्तविकता को उजागर करने का फ़र्ज़ भूलकर धन वैभव तमगे या किसी तरह से अपनी शोहरत को भुनाकर सांसद बनने या कोई एनजीओ बनाकर अपने मकसद पूरे करते हैं। झूठ को सच साबित करते हैं झूठ का गुणगान करते हैं बिकते हैं या चाटुकार बन जाते हैं। सच का झंडाबरदार होने का दम भरने वाले सच को कत्ल करते हैं। तीस साल पुरानी इक ग़ज़ल फिर से याद आती है।

इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।

मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।

Thursday, 9 April 2020

कौन भले कौन मंदे ( अफ़साना ए कुदरत ) डॉ लोक सेतिया

  कौन भले कौन मंदे ( अफ़साना ए कुदरत ) डॉ लोक सेतिया 

आपने जाने किस किस को खुदा भगवान मसीहा समझा हुआ था घोषित किया हुआ था। और जाने किस किस को अपनी ताकत दौलत शोहरत और किस किस का अहंकार है या रहा है। आज इक अनाम या बदनाम शब्द ने सबको अपने सामने बौना ही नहीं साबित कर दिया बल्कि सोचने को विवश कर दिया है कि मौत के सामने किसी की नहीं चलती है और जब मौत का डर सताता है तो कुछ भी और याद नहीं रहता है। दुनिया बनाने वाले ने किसी को बड़ा छोटा अच्छा बुरा नहीं बनाया था हमने ही कितनी तरह से इंसान को इंसान से और इंसानियत से अलग करने का अपराध किया है। हम भूल गए थे मौत से डरना चाहिए और ये भी कि सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं। अपने अपने स्वार्थ में अंधे होकर हर किसी ने केवल खुदगर्ज़ी की सोच रखकर अपने लिए इतना जमा कर लिया कि बाकी के लिए छोड़ा नहीं कुछ भी। आपके ऊंचे ऊंचे महल और कितने ही साधन धन दौलत किसी काम के नहीं हैं जब कोई इक ऐसा शब्द आपके सामने खड़ा हो।

   भारत में ही बताते हैं कि सौ लोगों के पास जितना है उसका दस बीस फीसदी बाकी करोड़ों को मिला है क्या ये अनुचित और अपराध नहीं है। चाहे किसी ने मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे के नाम पर या उपदेशक बनकर शहर शहर गांव गांव अपने डेरे अपने आलीशान बड़े बड़े भवन बना रखे हैं और उनकी कोई सीमा नहीं है और अधिक की चाह की या कोई उद्योगपति या कारोबारी या इधर तो समाज सुधारक से योग सिखाने से स्कूल कॉलेज में शिक्षा का व्यौपार करने या बड़े बड़े अस्पतालों में उपचार के नाम पर अधिक से अधिक धन संचय करने वाले लोग एवं राजनीति और सरकारी विभाग के अधिकारी से कलाजगत से टीवी अख़बार के लोग ये सभी अपने वास्तविक धर्म कर्म को छोड़ केवल इक अंधी दौड़ में शामिल हैं। और बड़ा और ऊंचा और अमीर और ताकतवर बन जाने के पागलपन में ये जानते हुए भी आखिर इंसान को दो ग़ज़ ज़मीन ही चाहिए या शायद वो भी नहीं बस राख बनकर बिखर जाना है। अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि किसी के अधिक तभी होता है जब किसी को कम मिलता है और अमीर बनने का तरीका किसी को गरीब बनाकर हासिल होता है। जब सबको अपनी काबलियत महनत का सही मूल्य मिले तब अमीर और अमीर गरीब और गरीब नहीं हो सकते हैं। 

  कभी आपने सोचा है हमने क्या किया है धरती को कुदरत को सुरक्षित नहीं रख सके बल्कि उसका अस्तित्व खतरे में डालते रहे हैं अपनी ज़रूरत और चाहत पूरी करने को। बड़े बड़े विनाशकारी हथियार बनाते रहे मगर बातें विश्व कल्याण की करने का आडंबर करते रहे। हर कोई आदमी से देश तक अपने से कमज़ोर को मिटाने की कोशिश करता रहा सबसे बड़ा ताकतवर होने को। चांद को छूना कितना ज़रूरी है क्या चांद पर जाओगे आज भागकर मौत से घबराकर। मौत इक हक़ीक़त है आनी ही है ये जानते हैं मगर फिर भी समझते रहे जैसे करोड़ों साल जीना है इतना सामान इकट्ठा किया है कुछ मुट्ठी भर लोगों ने क्या आज अपना सब कुछ दे कर इक पल भी जीवन खरीद सकते हैं। आज वैज्ञानिक करोड़ों रूपये खर्च कर गार्ड पार्टिकल की खोज कर समझते हैं हम शायद कोई अपनी दुनिया बना सकते हैं। नानक जी ने ये बात कितनी आसानी से समझाई थी कुछ शब्दों में।

  अव्वल अल्लाह नूर उपाया , कुदरत दे सब बंदे। एक नूर ते सब जग उपजेआ कौन भले कौन मंदे। 

  धर्म की महनत की कमाई मिलकर बांटकर खाना सबकी भलाई का सबक देकर आदमी को अंधविश्वास और भरमजाल से जागरूक करने का कार्य किया। ईश्वर को मानते थे सर्वेश्वरवादी थे रूढ़ियों कुसंस्कारों का विरोध किया और ईश्वर का साक्षात्कार बाह्य साधनों से नहीं वरन आंतरिक साधना से संभव है ये कहा। उनके दर्शन में वैराग्य तो है साथ ही तत्कालीन राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक दशाओं पर भी नज़र डाली। संत साहित्य में शायद वही अकेले हैं जिन्होंने उस युग में भी नारी को बड़प्पन दिया है। हिंदू मुस्लिम या अन्य सभी को उपासना की अच्छे मार्ग पर चलने की बात की है। यहां सिख धर्म की बात नहीं है मगर ऐसे सभी साधु संतों की बात है जो समानता और आपसी मेल मिलाप की सीख देते रहे हैं।

   पिछले कई सालों से नफरत की फसल बोने का काम करते रहे हैं लोग लोकलाज छोड़ किसी व्यक्ति को बदनाम करते रहे झूठ सच की मिलावट से। गांधी को आपने भी अपनाया कब उपयोग किया है समाधि पर फूल चढ़ाने से गांधीवादी नहीं हो जाते बल्कि गांधी को जाने कितनों ने मरने के बाद भी उनकी आत्मा को घायल किया है। अंतिम व्यक्ति की आंख का आंसू पौछना छोड़ आपने अपने बाणों से हर किसी को रुलाया भी और करोड़ों की मुश्किल बढ़ाई पर अपनी भूल नहीं स्वीकार की। ये किस धर्म की शिक्षा है कि जिस देश में करोड़ों लोग बेघर हैं भूखे हैं उनको जीने की बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें नहीं मिलती सरकार या सत्ताधारी लोग अथवा धनवान अपने पैसे को आडंबर करने अपने ऐशो आराम करने ही नहीं उन लोगों की समाधियां और मूर्तियां बुत बनाने पर देश का धन सम्पदा बर्बाद करने का पाप करें। ऐसा करके उनको जीवित नहीं बार बार मरते हैं। अपने से पहले हुए राजनेताओं की गलतियां बुराईयां आपको दिखाई देती हैं मगर ये नहीं नज़र आया उनका योगदान भी रहा है देश समाज को बनाने में। औरों को छोटा साबित करने को आपने नफरत का ज़हर हर तरफ फैलने दिया या फैलाया है। नानक कबीर को छोड़ो आपने तो जेपी जैसे व्यक्ति या विनोबा भावे जैसे संत की भी विचारधारा को नहीं समझा है। मंदिर मस्जिद के झगड़े किसी देश समाज की भलाई नहीं कर सकते हैं आपसी बैर भेदभाव को बढ़ाना देशभक्ति कदापि नहीं है। 

     सत्ता पाने की खातिर कितना धन खर्च किया क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाये और सत्ता का गलत उपयोग कर ही आपके दल को कोई नहीं जानता किस किस ढंग से इतना पैसा मिला कि दुनिया का सबसे अमीर राजनैतिक दल आपके दल को समझने लगे हैं। जिनको लगता है यही सब होना ताकतवर होना है उनको पिछले इतिहास को पढ़ना समझना होगा। भारतवर्ष की परंपरा उनको आदर्श मानने की रही है जिन्होंने अपना सब कुछ जनकल्याण पर खर्च किया न कि जिन्होंने अपने नाम अपनी आकांक्षाओं पर देश का धन बर्बाद किया। जिनको आपने खराब समझा समझाया और साबित करने की कोशिश की उन्होंने भी अपने आप पर बेतहाशा धन खर्च नहीं किया होगा। लोग औरों की की गलतियों से सबक लेते हैं उनको दोहराते नहीं तभी समझदार कहलाते हैं अन्यथा जो आज ज़िंदा नहीं उनकी आलोचना कर उनका क्या बिगाड़ लेंगे खुद को ही इक ऐसा व्यक्ति साबित कर सकते हैं जो ऊंचा होकर भी किसी को साया नहीं देता न ही उसके फल किसी को मिलते हैं। खजूर की तरह ऊंचे पेड़ जैसी मूर्तियां बनाना व्यर्थ है ये मिसाल जानते हैं। अच्छी अच्छी चिकनी चुपड़ी बातें करने से क्या हासिल जब भी कोई निष्पक्ष होकर विवेचना करेगा तो न केवल आपके गलत निर्णय की बात होगी बल्कि आपने जिन जिन संस्थाओं को अपने मतलब की खातिर नुकसान पहुंचाया उसकी भी चर्चा अवश्य की जाएगी। 

  आपके सामने उद्दाहरण है जब विपत्ति आई तो अमेरिका को उसके हथियार या लड़ाकू विमान नहीं काम आये और भारत से इक दवा की मांग करनी पड़ी। किसी भी अहंकारी का अहंकार हमेशा कायम नहीं रहता है। कहते हैं फलदार पेड़ झुकता है और इतना ही नहीं फलदार पेड़ को कोई पत्थर भी मारता है तो बदले में फल देता है। जिन जिनको भी कुदरत ने समय ने नसीब ने ये सब दिया है उनको कुदरत या ऊपर वाले का उपकार समझ इसका उपयोग औरों की भलाई को करना चाहिए। इतना सबक नहीं सीखा पढ़ा तो धर्म को नहीं जाना है इन लोगों ने मंदिर मस्जिद जाकर बेकार समय और साधन उपयोग किये हैं। मुझे फिर से कवि गंगभाट और रहीम जी की चर्चा याद आई है आखिर में उसकी बात करते हैं। 

रहीम इक रियासत के नवाब थे जो अपने पास आने वाले लोगों की सहयता किया करते थे। इक दिन उनकी सभा में कवि गंगभाट ने देख कर उनसे इक दोहा पढ़कर सवाल किया :-

     सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन , ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन। 

अर्थात नवाब जी आपका ये क्या ढंग है कि जैसे ही किसी को कुछ देते हैं आपका हाथ आगे बढ़ता है ऊपर जाता है मगर तब आपकी आंखें झुकी हुए रहती हैं। रहीम ने उनको जवाब दिया था :-

         देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें या ते नीचे नैन। 

अर्थात देने वाला तो कोई और है जो रात दिन देता रहता है मगर लोग समझते हैं मैं दे रहा हूं यही सोचकर मुझे एहसास होता है और मेरी नज़र झुक जाती है। 

   अब जो भी राजनेता सरकार कुछ भी समाज पर खर्च करती है वास्तव में उनकी अपनी कमाई नहीं है देश की जनता का ही धन जनता को देना उपकार नहीं है बल्कि शायद इक अपराध ही है जिस देश में करोड़ों लोग गरीब बदहाल हैं उसके शासक खुद शानो शौकत पर अपने खुद पर इतना धन व्यर्थ खर्च करते हैं। 

        कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर , न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।

    समाज की असलियत बताना अपना कर्तव्य है किसी से कोई विरोध नहीं समर्थन नहीं।


       

Monday, 6 April 2020

बात काम की या समय की बर्बादी ( संदेश ) डॉ लोक सेतिया

   बात काम की या समय की बर्बादी ( संदेश ) डॉ लोक सेतिया 

    विषय फेसबुक व्हाट्सएप्प और आपसी चर्चा में बातचीत को लेकर है। सबसे पहले आपको विचार करना है किस संदेश से आपको क्या हासिल होता है। आपको अधिकतर संदेश ऐसे मिलते हैं जिनका कोई महत्व नहीं होता आपका समय बीत जाए या थोड़ा हंसी मज़ाक चुटकले जैसे आपको कोई सोच विचार नहीं देते हैं। जो लोग आपको बीस संदेश फॉरवर्ड करते हैं कभी पूछना उन्होंने खुद देखे सुने या समझे भी हैं। और कुछ लोग जो किसी राजनितिक विचारधारा या अपने फायदे के मकसद से भेजते हैं उनकी सोचने समझने की शक्ति जंग लगे हथिहार या सामान की तरह हानिकारक होती है खुद रोगी हैं आपको भी बीमार बना सकते हैं। अगर आपको अपनी पसंद की बात ही सुनना अच्छा लगता है तो ये खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारना है। भले कोई शासक हो या अधिकारी या धनवान अपना गुणगान उसी को वास्तविकता से दूर करता है और कभी बाद में उसको खेद होता है जब अहंकार में अपना ही नुकसान करता हुआ पछताता है कि काश कोई पहले उसको सच बताता। अपने सुना तो होगा निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छुवाये , बिन साबुन पानी बिना मैल साफ कर जाए। शब्द अलग हो सकते हैं भाव ये है कि आप अपनी कमी बताने वाले से दूरी मत रखना उनका साथ उसी तरह है जैसे साबुन पानी से आप अपना मैल साफ करते हैं। आपने सुना होगा कभी फकीर गली गली कोई गीत गाते थे नानक कबीर की वाणी सुनी है तब धर्म वाले उनको जाने क्या क्या कहते थे क्योंकि वो निडरता से धर्म के नाम पर अंधविश्वास या आडंबर को गलत कहते थे। ईश्वर को वास्तव में वह अधिक जानते मानते थे अन्यथा उनकी कही बात जन जन तक नहीं पहुंचती और किसी धर्म की किताब में दर्ज होती नहीं कभी। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाना कोई धर्म नहीं है धर्म है उस जगह से आपको संदेश क्या मिलता है अच्छा क्या बुरा क्या है ये चिंतन करने की बात है केवल जाकर सर झुकना माथा टेकना या कुछ पैसे वस्तु कोई खाने को चढ़ाना धर्म नहीं धार्मिकता का दिखावा भर है। 

अब बात इस युग के समय की , होना तो यही संभव था कि कोरोना जैसी आपदा पर जब हम घर में बैठे हैं तो विवेक से काम लेते सोचते समझते कि आज कोई भगवान धर्म मंदिर मस्जिद का उपदेश नहीं विज्ञान और शिक्षा डॉक्टर अस्पताल और हमारा वास्तविक विकास उपयोगी है। शायद अगर हम विचार करते तो व्यर्थ के कार्यों या धार्मिक आडंबरों से बाहर निकलते और साहस से सामना करने समाधान खोजने की बात करते। मगर जिन लोगों को अपना धंधा ही देश की जनता को मूर्ख बनाने से चलाना है उन्होंने अपने मकसद के लिए फिर आपको वापस भूलभुलैयां में उलझाने का कार्य किया है। आपको ताली बजानी है या दिया जलाना है कोई बुराई नहीं है लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर ये करने की बात है क्या वो सच में होते हैं। अपने ताली बजाई उनको आभार जताने को जो आपकी जान की रक्षा करते हैं मगर क्या ये आपको पहले भी नहीं मालूम मगर आप तो जाने क्या क्या समझते हैं कहते हैं। क्या आपको नहीं लगता अपने उनको फीस या पैसा दिया है जबकि आपकी जान की कीमत किसी पैसे से आंकी नहीं जा सकती और न ही जिनको अपना कर्म धर्म केवल धन कमाने को करना है उनका भी बचाव मुझे करना है। समझना है कि डॉक्टर और रोगी या हमारे समाज का संबंध आपसी विश्वास और ईमानदारी का हो। उपचार करने का पैसा लेकर अपनी आजीविका चलाना सही है मगर पैसे कमाने को ही उपचार करने को साधन बनाना अनुचित है। इनमें अंतर है। कुछ इसी तरह अपने दिया जलाया एकता के नाम पर मगर दिन भर भेदभाव और बड़े छोटे या समर्थक विरोधी की चर्चा से मन नहीं मिलते हाथ मिलाने की औपचारिकता निभाते हैं। 

उधर आपको रामायण महाभारत दिखाने की बात हो रही है मगर सवाल ये है कि अपने गीता रामयण अन्य धार्मिक किताबों से कोई सबक सीखा है शायद आपके घर पर धूल चाटती हैं ये किताबें जिनको अपने पढ़ा ही नहीं समझने की बात क्या करें। फिर भी अगर आपको इन सीरियल को देखना है तो विचार करना उनसे क्या हासिल होता है और अवश्य आपको समझ आएगा कि देश में शासन और न्याय कैसा होना चाहिए। ये मुझे भी रामायण देख कर पता चला कि तब राजा होते थे मगर जनता को विरोध करने की मनाही नहीं थी और जब कोई सामने खड़ा होकर दरबार में सवाल करता था तब राजा उसको ताकत भय सत्ता से अधिकार का उपयोग करवा खामोश नहीं करता था बल्कि न्याय और सत्य का पक्ष लिया जाता था। महाभारत से खुद कृष्ण संदेश देते हैं कि राजा को कर देने नहीं देने का औचित्य क्या है और इतना ही नहीं किसी भी देवता की पूजा उसके कोप से डरकर नहीं करनी चाहिए। देवता या जो भी आपको सुरक्षा देता है आपको प्यार देता है वही आदर योग्य है और देवराज इंद्र का अभिमान समाप्त कर उसको अपनी गलती मानने पर विवश करते हैं। अपने समझा किसकी पूजा की जानी चाहिए जिनसे हम को जीवन मिलता है उन सभी की। कोई कह सकता है ये नास्तिकता की बात है जो आपके ही धर्म की किताब की कथा है किसी ने लिखी होगी कोई आज नहीं बदल रहा है। महभारत की विशेषता है कि समय का पहिया घूमता है जो अपनी बात बताता है और समय कभी किसी के आदेश से वापस नहीं लौटता है। लेकिन शायद कुछ लोग समय को बांधना ही नहीं चाहते पीछे ले जाना चाहते हैं।

Sunday, 5 April 2020

बात (को) रोने की है फिर भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  बात (को) रोने की है फिर भी  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   ये सोचने विचारने समझने या मतलब क्या है की बात नहीं है। आपने कितनी पुरानी फिल्मों में हंसाने वाले
किरदार देखे हैं उनकी बातें हरकतें देख कर सब हंसते थे। जोकर फिल्म राजकपूर की असफल होकर भी बेमिसाल थी। ऐसे कुछ दृश्य मुझे याद आते हैं। हंसते ज़ख्म में नशे में चूर सब बस्ती वाले बारात बनकर निकलते हैं और पुलिस थाने में भी सभी इक वाक्य दोहराते हैं। तेरा धोबन से वास्ता क्या है। ख़ामोशी फिल्म में नायक पागल है और नायिका उसका ईलाज अपने डॉक्टर के आदेश पर इक अनुसंधान करते हुए उसकी महबूबा बनकर करती है। ये उपचार सफल रहता है जाने क्यों ऐसे पागलखाने बनाये नहीं गये। मगर उस फिल्म में नायक का दोस्त उसका हाल चाल देखने आता है और सभी पागल पागलपन की हरकतें कर रहे होते हैं और उसको स्वयं डॉक्टर भी पागलखाने का रोगी लगता है। थोड़ा थोड़ा पागलपन हम सभी में होता ही है तभी हम किसी की बात को बिना सोचे विचारे मानते ही नहीं औरों को भी समझाते हैं। विषय को गंभीर होने से बचाना है इसलिए कोई चिंतन की सोचने की बात नहीं करनी और बेसिर पैर की हांकनी है।

       घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में , ख़ुशी की तलाश में। ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिए।
खुद दिल से दिल की बात कही और रो दिए। अच्छे दिन लाने को निकले थे गले पड़ गए खराब दिन।
अब नसीब में जिसके जो लिखा था वो तेरी महफ़िल में काम आया , किसी के हिस्से में प्यास आई किसी के हिस्से में जाम आया। अब आपको इन गीतों की पैरोडी बनानी है टीवी पर एंकर आपको अपनी समस्या का यही समाधान बता रही है। गोविंदा को याद करो कृष्ण नहीं अभिनेता गोविंदा उनकी हर फिल्म हिट रहती थी जबकि उस में तार्किक कोई बात नहीं होती थी फूहड़ हास्य पर हम कहकहे लगाते हैं। अपने वास्तविक हास्य कलाकार भी देखे तो होंगे जिनकी बात गुदगुदाती भी थी मगर कोई संदेश भी छुपा रहता था। अपने चार्ल्स चैपलिन का नाम सुना होगा 1889 में 16 अप्रैल को जन्म लंदन में 25 दिसंबर 1977 को स्विट्ज़रलैंड में निधन हुआ और ऐसे ही किशोर कुमार अभिनेता निर्माता निर्देशक भारत में हुए हैं। उन्होने जब महमूद से मिलकर पड़ोसन फिल्म बनाई तो अभिनेता सुनील दत्त को हैरानी होती थी जब उनसे अजीब अजीब ऊट पटांग हरकतें करने को निर्देशक कहते थे। मगर फिल्म बेहद सफल रही और अभी तक इक लाजवाब समझी जाती है।

    हमारे समाज में सफलता को मापदंड समझा जाता है और गुरु दत्त जैसे फ़िल्मकार की लाजवाब फिल्म प्यासा कागज़ के फूल लोग नहीं देखते मगर चौदवीं का चांद देखते हैं। जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं आपको हैरानी होगी देश की बदहाली को दर्शाने वाले इस गीत पर रोक लगाई गई थी मगर बाद में अदालत ने ऐसा करने को अनुचित करार दिया था। आज विषम हालात पर विचार करने और भविष्य की चिंता करने की जगह हम मिलकर ऐसे कार्य करने की बात करने वाले हैं जिनका हासिल केवल वास्तविकता से नज़र चुराना घबराकर भागना है। अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। अपने भूलभुलियां के बारे में सुना होगा जिस में भीतर जाने वाले को भटकाने को व्यूह रचना की तरह रास्ते बनाये गए होते हैं जिस तरफ बाहर निकलने को जाओ घूम फिर कर किसी और दिशा में अंदर ही पहुंच जाते हैं। कोई जो दावा करता है हमको निकलने की राह समझा सकता है वास्तव में खुद कभी ऐसी उलझनों में रहा ही नहीं होता है। कल्पना से बिना विषय की गंभीरता को जाने सबको अतिविश्वास से कई उपाय सुझाता है और नासमझ उसकी कही बात को कोई छुपी हुई शक्ति या भविष्यवाणी की तरह मानकर जो बताया अमल करते हैं। जाने कितनी बार उसने कितने कार्य यही कहते हुए किये कि ऐसा करने से अमुक समस्या का नाम तक नहीं रहेगा लेकिन कोई भी समस्या हल हुई नहीं। गरीबी बेरोज़गारी से किसानों की हालत अच्छी होने की जगह और खराब हुई है। खास बात ये है कि उस ने कभी अपनी किसी योजना की नाकामी को स्वीकार नहीं किया है। अब जाने किस आधार पर अंधेरे रौशनी का नया खेल खेलने की बात कही है सभी से। उनके बताये समय पर घर की सभी रौशनियां बंद कर उनके अनुसार बताये मिंटों तक दिया टॉर्च मोमबत्ती या फोन की सर्च लाइट से उजाला करना है। हमारे देश में लोग विश्वास अंधविश्वास के बीच अधर में लटके रहते हैं और ऐसे में डरते हैं घबराते हैं कि ये नहीं किया तो जाने क्या होगा और क्या सही ढंग से नहीं हुआ तो कोई चिंता की बात नहीं होगी। नौ मिंट बाद दिया जलता रहने देना है कि बुझाना है और लोग दिया जलाकर बुझाना उचित नहीं समझते हैं। पहले अंधकार बढ़ाना घर भर की रौशनी बंद करना फिर कुछ मिंट को ये सब करना क्या कोई जादू टोटका या कोई लाल किताब का उपाय है। मगर समस्या उनकी है जो अखंड ज्योति जलाने की बात करते हैं। नहीं ये फ़िल्मी पारो और देवदास की बात नहीं है देश भर में कितनी जगह अखंड ज्योति जलती रहती है। कहीं ये केवल इक नया कीर्तिमान या इतिहास रचने की बात ही तो नहीं है क्योंकि खुद को विश्व इतिहास में महान कहलाने को बाकी कोई भी कार्य सफल हुए लगे नहीं हैं। मगर इतिहास की कथाओं में ऐसे निर्णय करने वाले शासक भी हुए हैं पहले भी।

      बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है।     

Friday, 3 April 2020

साथ-साथ हैं दिल में चाहत के बिना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   साथ-साथ हैं दिल में चाहत के बिना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   ये वही लोग हैं जो हमेशा हमें आपस में लड़वाते  बांटने और नफरत का सबक पढ़ाने को लगे रहते हैं। राजनेताओं की ही नहीं धर्म वालों की ही नहीं टीवी चैनल वालों की क्या समाज के हर वर्ग की मानसिकता हम सबसे अच्छे बाकी सभी खराब हैं का शोर मचाते रहने की बन गई है। मगर जब दिखावा करने को कहते हैं किसी दिन किसी अवसर पर हम गले मिलते हैं हाथ मिलाते हैं दिल नहीं मिलते हैं। हैरानी है जिस को विवाह करने के बाद अपनी पत्नी को हम साथ साथ हैं जीवन भर को कहना था मगर साथ छोड़ दिया और जिसने कभी विरोधी दल वाले को दिल से अपना नहीं समझा हर किसी का उपहास किया तमाम पहले हुए नेताओं को खराब और सिर्फ मैं अच्छा साबित करने की राजनीती की देश की जनता को एकता का दिखावा करने को कह रहा है। जब से सत्ता मिली देश भर में नफरत की गंदी राजनीति और न केवल किसी एक संगठन के लोगों को मनोनीत करने तमाम राज्यों और उच्च पदों पर नियुक्त करने जैसे काम बल्कि सत्ता की खातिर अपराधी दाग़ी लोगों को अपने दल में शामिल करने का काम किया बल्कि जब भी सत्ताधारी दल के नेताओं ने हिंसा और नफरत फ़ैलाने वाले ब्यान भाषण दिए खामोश होकर उनको बढ़ावा देने का काम किया। देश के सबसे बड़े पद पर रहते झूठ को सच सच को झूठ साबित करने को उचित अनुचित की चिंता नहीं की अचानक देशवासिओं को एक साथ खड़े होने का सबक सिखा रहा है।

  मगर बस नौ मिंट की बात है और दिखाना किसे है जब खुद आप हम जानते हैं कितने साथ साथ हैं। कभी गांव भर इक साथ होता था फिर गली के लोग फिर संयुक्त परिवार साथ साथ हुआ करता था अब भाई भाई क्या पति पत्नी किसी विषय पर एकमत नहीं होते आपस में तकरार बिना कारण होती है मगर रहना साथ साथ है। ईश्वर तो एक है सभी जानते हैं फिर भी हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनाते हैं और अपने अपने धर्म को औरों से अच्छा साबित करते हैं। शायर कहता है " जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है , फिर ज़मीं पर कहीं मंदिर कहीं मस्जिद क्यों है। क्रिकेट के खेल और 15 अगस्त 26 जनवरी वाली देशभक्ति नहीं वास्तविक देशभक्ति हर देशवासी को हमेशा अपना और अपने समान समझने की वास्तिक एकता होनी चाहिए। क्या ऐसा नहीं होगा कि नौ मिंट रौशनी करने में भी हम एक दूसरे को गलत समझने की बात को भूल जाएं , और उसने दिया जलाया उसने मोमबत्ती उसने टॉर्च या फोन मगर किसकी रौशनी किस का समय किस का तरीका सही था हर कोई यही देखता समझता वास्तविक मकसद से भटका हो।

देश की एकता वास्तविक होनी चाहिए जो कुछ मिंट का दिखावा नहीं असली हो। जब कोई किसी पर अन्याय करे जब कोई भी विपदा में हो जब कोई भी भूखा हो बेबस हो जब कोई भी अकेला हो बेबस हो हम बढ़कर उनका हाथ थामकर अपना बनाएं। मगर हम तो हर दिन आपसी अनावश्यक मुकाबले में हर किसी को पीछे छोड़ने को लगे रहते हैं हमने साथ साथ चलने का ढंग सीखा कब है। अपने पक्षिओं जानवरों को साथ साथ उड़ते देखा है बिना टकराए बिना किसी की राह में टंगड़ी लगाए सुविधा से। हम समझते हैं किसी को नीचे दिखला कर हम बड़े बन जाते हैं और ऐसा आचरण करने के बाद सबसे बड़ा झूठ ये आडंबर करना है कि हम साथ साथ हैं।

शायर बशीर बद्र जी की ग़ज़ल पेश है  :-

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला ,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे ,
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला।

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था ,
फिर उसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला।

खुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने ,
बस एक शख़्स को मांगा मुझे वही न मिला।

बहुत अजीब है ये कुर्बतों की दूरी भी ,
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला।

Thursday, 2 April 2020

सवालों से भागते लोग ( आईने के सामने ) डॉ लोक सेतिया

   सवालों से भागते लोग ( आईने के सामने ) डॉ लोक सेतिया 

अब जब देश समाज अन्य विश्व के साथ इक ऐसे कठिन दौर में खड़ा है तब आरोप आक्षेप लगाना सही नहीं मगर क्या हमको वास्तविकता को समझने की ज़रूरत भी होनी नहीं चाहिए। बहुत मुमकिन है ऐसे में कुछ लोग वास्तविक धर्म और धर्म के नाम पर आडंबर का अंतर समझना चाहते। जब ये सवाल खड़े होने संभव थे कि जिन भी तमाम धर्म के पूजा अर्चना इबादत के स्थलों पर ईश्वर के होने का विश्वास करते हैं और सोचते हैं उनकी पूजा अर्चना इबादत से सभी कष्ट दूर हो सकते है और सब सुख हासिल हो सकते हैं उनकी स्तुति चढ़ावा अन्य बातें करने से। समझ आने लगा था उनकी वास्तविकता कुछ और ही है और इस से आगे जो सवाल उठ सकते थे वो धर्म और अंधविश्वास की परतें खोल सकते थे जिस से धार्मिक भावनाओं का उपयोग अपने मकसद से करने वाले के स्वार्थ को क्षति हो सकती थी अगर लोग विचार करते कि उन सभी को जिन जिन लोगों ने भी धन वैभव और सोने चांदी हीरे जवाहरात अर्पित किये अगर सच्चे धर्म की राह पर दीन दुखिओं की सहायता और अच्छे सामाजिक कार्यों पर व्यय किये गए होते तो अधिक सार्थकता होती। 

शिक्षित आधुनिक विवेकशील धर्मों के बनाये जाल से उनके चंगुल से निकलते और विज्ञान और विचार एवं तर्क की कसौटी पर परखते तो मुमकिन था किसी अंधे कुंवे से निकलते और रौशनी और हवा आज़ादी को जान पाते। मगर ऐसे में जिनको डर था कि देश की जागरूक जनता धर्म वालों से सवाल करे या नहीं उनसे तो सवाल कर ही सकती है कि कल तक आप देश को विश्वगुरु और आर्थिक शक्ति और महानता का डंका बजने का दावा करते थे और आज बताते हैं कि इस विपत्ति कठिन समय हम कितना पीछे हैं स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर। क्या ऐसे में इतने साल तक तमाम आडंबर करने और झूठी शानो शौकत पर धन बर्बाद करने का अपराध नहीं किया जाता रहा है। अभी भी आपको आम नागरिक को बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा की सेवाएं उपलब्ध करवाने से अधिक महत्व अनावश्यक अपने गुणगान और अहंकार के दिखावे पर पैसा खर्च करना सही लगता है। 

ऐसे में जैसे कोई नासमझ बच्चों को बहलाने को खेल तमाशे करता है अपने अपने दूरदर्शन के बंद बक्से से धर्म के नाम वाले टीवी सीरीयल दिखाने का कार्य शुरू किया है जिस से खाली समय अपने सामने खड़े सवालों से टकराने की जगह ऐसी कथा कहानियों में गुम हो जाएं जिनसे उनको अपनी बदहाली किसी सरकार या योजनाओं की गलती नहीं और अपने भाग्य की रेखाओं और दुर्भाग्य या किस्मत को समझने लगें।  अपनी वास्तविकता से नज़र चुराना लगता है।

अब अगर रामायण की बात करनी है तो सबसे पहले भारत देश और राज्यों के सत्ताधारी नेताओं को उसको देखना समझना चाहिए। राम दशरथ के बेटे राजकुमार हैं फिर भी सत्ता का कोई मोह नहीं और आदर्श की राह पर महल शासन करने का त्याग करते तनिक भी विचलित नहीं होते जबकि तथकथित राम के अनुयायी सत्ता की खातिर हर मर्यादा को ताक पर रखते हैं। आज जब विषय होना चाहिए था सत्ता पाकर किस ने देश की जनता को शिक्षा स्वास्थ्य बुनियादी सुविधाओं में क्या उपलब्ध करवाया और कैसे अपने आडंबर और अपनी महत्वांक्षाओं को हासिल करने पर देश विदेश घूमने और अपने रहन सहन गुणगान पर गरीब देश की जनता का धन बर्बाद किया , तब इक माहमारी में ऐसे शासक का गुणगान किया जाने लगा है इसको भी इक अवसर बनाया गया है। शायद ही किसी ने अपनी माता के नाम पर राजनितिक फायदा उठाने का कार्य किया हो मगर इक तरफ कहने को घर परिवार छोड़ने का दम भरते हैं साथ ही माता के नाम का उपयोग किसी न किसी तरह किया जाता है।

केवल भारत ही नहीं विश्व भर में सत्ताधारी शासकों का आचरण विश्व कल्याण की बातें ही करने और वास्तव में निरंकुशता और ताकत का गलत उपयोग विश्व को विनाश की राह पर धकेलने का रहा है। कहीं न कहीं उनके अनुचित कर्मों का नतीजा बेकसूर नागरिक बेबस होकर हर दिन समस्याओं से घिरे हुए हैं। राम तो कहीं दिखाई नहीं देते मगर रावण जैसा अहंकार कितने शासकों में नज़र आता है। देश की संस्थाओं को पंगु बनाने उनको अपनी कठपुतली बनाने और संविधान न्यायपालिका के साथ मनमानी करने जैसे कार्य करते कोई संकोच नहीं किया गया और आलोचना या वास्तविकता दिखलाना जान जोखिम में डालना लगता है। मगर अभी भी लगता नहीं कोई देश और समाज की वास्तव में भलाई करने को अपनी पिछली गलतियों को सुधारना चाहेगा और मंदिरों मूर्तियों पर धन बर्बाद करना बंद कर देश की गरीब जनता को शिक्षा स्वास्थ्य खाने को रोटी रहने को घर पीने को पानी उपलब्ध करवाने को अधिक महत्व देगा। और सबसे बड़ा जो अपराध लोकतंत्र के नाम पर जनसेवकों का राजसी जीवन जीने पर देश के खज़ाने को लूटने का चलन चलता रहा है और सांसद विधायक अधिकारी किसी महाराजा जैसा जीवन बिताते रहे हैं और देश के वास्तविक मालिक नागरिक भूखे नंगे बेबस बना दिए गए जो अपने ही सेवकों के सामने हाथ फैलाये भीख मांगते नज़र आते हैं उसको बदलना होगा। अब रामायण का अर्थ जनता को अंधविश्वास के लिए नहीं इन शासन करने वालों को अपने भीतर झांकने को करना होगा।

जिसको शायद सरकार जवाब समझ रही थी असल में वही रामायण महाभारत और भी कठिन सवाल बनकर सामने है क्योंकि अब लोग सोचने लगे हैं समझने लगे हैं और समय आ गया है जब बोलने भी लगेंगे।

Wednesday, 1 April 2020

कोरोना के अंत की शोध-कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कोरोना के अंत की शोध-कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   आप सभी जानने को उत्सुक हैं कि कोरोना क्या बला है और क्या इस से बचा जा सकता है कब इसका अंत होगा। आप के मन की दुविधा और संशय का अंत करने को ये अध्याय शुरू किया गया है। कोरोना डर है और कायरता है और डर और कायरता का अंत निडरता और साहस से किया जा सकता है। क्या कोई भी रोग ऐसा है जो अगर नहीं होता तो लोग अमर हो जाते ये तो आपको विदित है जो भी आया है उसको जाना है ये कोरोना भी केवल बहाना है। मौत के सौ नहीं असंख्य बहाने हैं जाने किस बहाने कब कहां उस से मिलन या मुलाकात हो जाये , ज़िंदगी से पहचान हो नहीं हो मौत से सामना होना विधि का विधान है। अपने सुना होगा जब कभी किसी जगह कोई मानवीय आपदा कोई महामारी फैलती थी तब शासक अन्य भले लोग खुद जाते थे उन की सहायता करने को घबराते नहीं थे कि हमको भी वहां जाकर कोई रोग हो सकता है और मौत के डर से भलाई का कार्य करना नहीं छोड़ते थे। अब आपको उनसे दूर रहकर घर में छिपने की सलाह देने वाले आपकी सुरक्षा नहीं करने और आपको खुद अपनी जान बचाने की सलाह देते हैं क्योंकि उनको केवल अपने जीवन ही नहीं जो जो भी हासिल किया है जिस किसी भी तरह से सत्ता धन ताकत उन सभी के खोने का भय है उनकी मोहमाया उन्हें अपने जाल में जकड़े हुए है। अब आपको रामायण और महाभारत टीवी सीरीयल से बहलाने की बात करते हैं मगर क्या वास्तव में उस में जैसा बताया सब उचित और आदर्श था फिर किस बात का झगड़ा था , राजा की गद्दी और सुंदर महिला को हासिल करना और दुश्मनी और सत्ता ताकत का अहंकार ये सभी तो थे और कोई भी बचा हुआ नहीं था। आपको जब जिस बात को जैसे चाहा अच्छा खराब उचित अनुचित बता दिया गया और आपको समझाया गया इस पर कोई शक कोई सवाल नहीं करना ये अधर्म है। जो धर्म खुद को विवेचना की कसौटी पर खरा साबित करने से डरता घबराता है उसको कैसे कोई कसौटी अच्छाई बुराई को तय करने को मापदंड बना सकते हैं। 

   किसी को कोई वरदान किसी को अभिशाप किसी को क्या क्या अधिकार कैसे कैसे हथियार असंभव को संभव बनाने के उपाय कपोल कल्पना के पंख लगाकर दादी नानी की कहानियां जैसा स्वप्नलोक बना दिया। लेकिन जिनके बारे अमरत्व और काल को बंधक बनाने की बात बताई गई उनका भी अंत हुआ ही। कोरोना भी कोई सदा रहने का वरदान नहीं पाया हुआ कोई राक्षस ये भी स्वयं बुलाया हुआ संकट है। आपको मंत्र की शक्ति और आवाहन करने की बातें बताई गई हैं अगर उनमें सच्चाई है तो याद करो कौन है जो अभी कुछ महीने पहले इस शब्द को ऊंची ऊंची आवाज़ में कह रहा था "कोरोनोलॉजी को समझिये "। और हर कोई रटने लगा था क्या ये वही दैत्य तो नहीं जिसको कोई नफरत की आग जलाकर उसकी रट लगा रहा था जब सामने आया कोरोना तो वो खुद कहीं छुपा हुआ है। आपको अपने इतिहास से सबक सीखने को मिले तो बहुत हैं मगर आपने समझा नहीं सीखना क्या था सीखा जो नहीं सिखलाया गया था। ये राजनीति युग युग से उल्टी पढ़ाई पढ़ती पढ़ाती रही है और कोई भी राजा कोई भी शासक विशेषकर राजनेता कभी मसीहा नहीं होते हैं। सत्ता सिंहासन के लिए इन्होंने क्या क्या नहीं किया है। जिनको वफ़ा का अर्थ नहीं मालूम उन्हीं से लोग वफ़ादारी की अपेक्षा रखते हैं। भूल गए राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के सबसे पुराने पेशे हैं और इन दोनों में बहुत समानता है। वैश्या तो फिर भी खुद को बेचती है ये सत्ता की खातिर ईमान तक बेच देते हैं। 

    आपको अब तो प्यार मुहब्बत की कोई बात कोई कहानी याद नहीं है। जबकि दार्शनिक और अध्यात्म से साधु महात्मा तक आपको इंसान से इंसान को प्यार करने की बात करते रहे हैं। आपके भीतर कितनी नफरत कितने लोगों को लेकर भरी हुई है और प्यार तो उस हृदय में रहता ही नहीं जिस में नफरत हो। आपको नफरत वाले अच्छे लगते हैं उनकी जयजयकार करते हैं तो खुद आप विषपान करते हैं और ज़हर पीकर जीने की आशा करते हैं। ज़िंदगी चार घड़ी की है और वही जीवन है जो प्यार भाईचारे और मानव कल्याण की खातिर जी जाये अन्यथा सौ साल जीना व्यर्थ है। मुसीबत के समय लोग मिलकर मुकाबला करते थे और मुसीबत को खत्म कर देते थे मगर अब हम मुसीबत से नहीं आपस से मुकाबला कर इक दूजे को दोष देकर हराना चाहते हैं ये इतिहास समझाता है कि भेदभाव और बांटने की नीति हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है जो दुश्मन को ताकतवर बनाती है और हमें विवश और कमज़ोर। कोरोना ही नहीं हर दुश्मन और समस्या का अंत इस कथा को समझने से मुमकिन है। विवेकशील बनकर विचार करें।