फ़रवरी 25, 2020

POST : 1244 अतिथि फिर मत आना ( आदर्शों मानवीय मूल्यों से भटके हम लोग ) डॉ लोक सेतिया

 अतिथि फिर मत आना ( आदर्शों मानवीय मूल्यों से भटके हम लोग )

                                   डॉ लोक सेतिया 

     धूम मची है सरकारी महमान की राजसी आवभगत करने की। हर कोई महमान तो भगवान होता है कहता दिखाई देता है। कल मैंने कुछ ऐसे दोस्तों से कहा आपसे मिलने आपके निवास आना है हर कोई बहाने बनाता मिला आज तो बाहर जाना है कोई ज़रूरी काम है सब की विवशता थी। घर आये बिना बुलाये महमान को कब जाओगे नज़र पूछती है। ये सत्ताधारी नेता और सरकारी अधिकारी देश के खज़ाने को जम कर लुटाते हैं अपने संबंध बनाने को। सामाजिक संस्थाओं के समाजसेवी कहलाने वाले लोग भी चंदा देने से लेकर नेताओं अफसरों को सभाओं में बुलाकर उपहार देने तक सब संस्था के खाते से करते हैं। किसी पद पर आसीन होते ही उस का धन संसाधन निजी स्वार्थ की खातिर खूब उड़ाते हैं। माले-मुफ्त , दिले -बेरहम। 

     शासक राजा रहे हों या अब जनता के निर्वाचित कहने को जनता के सेवक सभी पाषाण हृदय होते हैं जिनको किसी पर भी दया नहीं आती है। देश का खज़ाना बर्बाद करते उनको कोई संकोच नहीं होता कोई अपराधबोध नहीं होता कि जिनकी खातिर ये धन है उनकी दशा अभी भी कितनी बदहाल है। और ये बात केवल इक विदेशी महमान पर सौ करोड़ खर्च करने की नहीं है हर दिन कितने आयोजन समारोह मानते हुए वास्तव में आप अपनी अमानवीयता का ही सबूत देते हैं। आपकी बनाई करोड़ों की मूर्ति या फिर किसी राजा का बनाया ताजमहल दोनों की कहानी इक जैसी है। अपने आखिरी समय में वही शासक अपने बनवाये ताजमहल को कैद में बंद झरोखों से देखता था तब शायद सोचा हो कितने गरीबों की भलाई हो सकती थी अपनी झूठी मुहब्बत की इक निशानी बनाने की आरज़ू ने कितना बड़ा गुनाह करवा दिया। 

      अपने घोटालों की कितनी कहानियां सुनी हैं मगर घोटाले और भी हैं जैसे जिनकी लाशें नहीं मिलीं उनके कत्ल करने वाले भी मसीहा बने बैठे रहे। जितना धन सरकारों ने आडंबरों पर आये दिन बर्बाद किया और अपनी शोहरत के झूठे सच्चे इश्तिहार छपवाने पर खर्च किया किसी अपराध से कम नहीं था। करोड़ों लोग भूख से मर जाते है याद है भात भात करती इक बच्ची मर गई थी वो इक उदारहण था अकेली वही नहीं मरी। सरकारों को इस लिए माफ़ नहीं किया जा सकता कि उनके गुनाह साबित नहीं किये जा सके। किसी शायर का इक शेर है जो समझाता है :-

                वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,

                  यो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं।

     इस देश की बदनसीबी है शासकों ने कभी समय पर जनता की समस्याओं का समाधान नहीं किया है। बल्कि शायद उनकी राजनीती ही समस्याओं को बढ़ाये रखने की रही है। मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। धर्म और ईश्वर की बात करना मत अगर उनसे डरते तो शासक अपने वास्तविक धर्म से कभी नहीं भटकते।

 कोई दिन पंडित जी बताया करते हैं कि आने जाने को अशुभ होता है। मैंने कभी इन बातों पर यकीन नहीं किया था। जाने क्यों याद आया यही तारीख थी नमस्ते नमस्ते का शोर था भारत से अमेरिका तक। आज दो महीने बाद अपने इस आलेख को पढ़कर लगा ये कैसा महमान आया था जिसके जाने के ठीक एक महीने बाद देश भर को घर में बंद रहने का फरमान जारी किया गया था पिछले महीने 24 मार्च को और आज 24 अप्रैल को भी हम सभी घर में बंद हैं या छुपकर बैठे हैं। कोई अतिथि आता भी नहीं और कोई किसी को बुलाता भी नहीं। हर कोई हर किसी से दूर रहने को विवश है दिल से दिल मिलने की बात क्या करें हाथ से हाथ मिलाना छोड़ दिया है। नमस्ते ट्रम्प से शुरुआत हुई और ऐसा हुआ कि दूर ही से हाथ जोड़ नमस्कार करने की विवशता बन गई है। नमस्ते आदर सूचक शब्द हुआ करता था जो आजकल विवशता का अभिप्राय बन गया है। आज के युग की भी कोई नई महाभारत लिखता तो कोई यक्ष अंतिम सवाल बदलकर  पूछता कि हैरानी क्या है तो जवाब मिलता सब जानते हैं मौत घर पर छुपने से भी लौटेगी नहीं और जब भी आमना सामना होगा भागकर नहीं बच सकते हैं किसी दुश्मन से लड़ाई लड़कर ही जीती जाएगी।



फ़रवरी 22, 2020

POST : 1243 भगवान किस के कितने भगवान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान किस के कितने भगवान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

 सबसे पहले ईश्वर को लेकर सबसे बढ़कर अज्ञानता उन्हीं लोगों में है जिनका दावा कि हम धर्म और ईश्वर की बात करते हैं । मंदिर मस्जिद गिरजा गुरुद्वारा अथवा ऐसे तमाम स्थान धर्म की दुकानदारी करते हैं अगर ईश्वर को समझते तो इंसान इंसानियत की बात करते अपने अपने भगवान देवी देवता नहीं बनाते फिरते । जिनको इतना भी नहीं मालूम कि भगवान एक ही हो सकता है जो सभी का है इनका उनका नहीं और उसका जन्म अंत नहीं हो सकता । जिनको लेकर जाने कितनी कथा कहानियां घड़ी गई हैं उन के बारे में अच्छी भी और कुछ ऐसी जो अच्छी नहीं समझी जानी चाहिए हर तरह की बातें होती हैं जबकि ईश्वर में ऐसा हो कहना ही अनुचित होगा । दुनिया एक ही है और दुनिया के सभी इंसान उसी ने पैदा किये हैं मगर जो भी इंसान इंसान में अंतर करते भेदभाव करते हैं उनको ईश्वर को लेकर रत्ती भर भी जानकारी नहीं है । 

ईश्वर को लेकर तमाम संतों महात्माओं साधु ज्ञानी लोग एकमत रहे हैं कि " सत्य ही ईश्वर है "। जिनको सच की राह चलना नहीं आता उनको भगवान भी नहीं समझा सकता है । वास्तव में तथाकथित धर्म वालों खुदा ईश्वर अल्लाह यीसु मसीह किसी को भी लेकर समझने की चाहत नहीं है उनको अपने अपने हित साधने हैं । हमने धार्मिक किताबों में सच्चाई फरेब झूठ पाप पुण्य देवता दानव मसीहा शैतान जैसे कितने किरदार पढ़े समझे हैं । सवाल उनका काल्पनिक या वास्तविक होने का नहीं बल्कि उनको समझने का है । इस दुनिया में हम देखते हैं तरह तरह के लोग कभी विचार किया जाए तो यहीं वो सब किरदार जीते जागते दिखाई देते हैं ।

राक्षस अथवा शैतान अपनी ज़रूरत हवस की खातिर औरों से छीनते हैं और मसीहा देवता वो हैं जो अपने पास जितना है दूसरों की भलाई सहायता को देते हैं । ईश्वर में दुनिया में इतना सब उपलब्ध किया है जो सभी की ज़रूरत को काफी है लेकिन किसी की हवस को पूरा करने को काफी नहीं है । विचार करना होगा भगवान ने हवा पानी और कुदरती तमाम संसाधनों को किसी के लिए कम या अधिक नहीं दिया उसने हम सबको इक जैसा बनाया सब को समान हवा धूप रौशनी पानी हाथ पांव दिमाग़ बराबर दिए हैं । यकीनन उसने धरती किसी के नाम नहीं लिखी है न किसी को अलॉट की है कि आपको जो चाहे करने का अधिकार है । मगर क्योंकि चालाक और जालसाज़ लोगों ने औरों को समान नहीं देने और खुद अधिक पर कब्ज़ा जमाने को कई ढंग अपना कर ऊपर वाले की मर्ज़ी को बिना समझे खुद जितना अधिक हो सका हथिया लिया है इसलिए बाकी को उनके हिस्से का मिलता नहीं है । अपने देखा है जिनको उद्योगपति राजनेता धर्म उपदेशक बन कर बातें भली भली करते हैं मगर असल में सबको दान धर्म करने संचय नहीं करने की बात करते हुए खुद सब अपने अधिकार में लेते हैं जमा करते हैं , जैसे कोई लुटेरा डाकू साधु बनकर छलता है लूटता है । नाम राम का रख कर कर्म रावण जैसे करते हैं । कारोबारी लोग जब मनमाने ढंग से अनुचित मुनाफ़ा कमाते हैं मगर जब कभी उनको अपनी वस्तु मनमाने मूल्य पर बिकती नहीं तब उनको लगता है बदहाल हैं । अभी ऐसे कुछ लोगों की बात सामने आई जिनको व्यौपार धंधे में घाटे की नौबत हुई मगर जब उन्होंने पास कुछ भी नहीं था और समय का अनुचित उपयोग करते हुए अकूत दौलत कमाई थी उनको नहीं विचार आया था कि ऐसा उन्होंने जाने कितनों की जेब पर डाका डालकर हासिल किया है ।

  जनता की सेवा के नाम पर देश के खज़ाने को अपने आप पर राजसी ढंग से खर्च करने वाले चाहते हैं उनको मसीहा माना जाए जबकि उनका आचरण शैतान जैसा है जो अपनी भूख अपनी हवस की खातिर गरीब नागरिक के हक पर डाका डाल रहे हैं । बाहर से पहनावे से मीठी मीठी बातों से मसीहा होने का अभिनय करते हैं मगर हैं लोभी लालची सत्ता के भूखे लोग । धर्म के नाम पर करोड़ों के चढ़ावे को वास्तविक धर्म दीन दुःखी लोगों की सहायता करने की बात भूलकर अंबार लगाए हुए हैं सोने चांदी और दौलत अपनी तिजोरियों में भरकर । शायद तभी इस को कलयुग कहना उचित है जहां अच्छाई पर बुराई की विजय सत्य पर झूठ और आडंबर की जीत होती है । आपको अगर लगता है कोई मसीहा कोई भगवान जन्म लेकर इन सबको खत्म करेगा तो ये इन अत्याचारी लुटेरे लोगों को समझाई बात है क्योंकि वास्तव में ईश्वर ने अपनी व्यवस्था इस तरह बनाई है कि आपको अच्छा खराब करते खुद सामने आकर नहीं रोकते हैं । जब भी हम कुछ भी गलत करते हैं तब हमारा विवेक या आत्मा हमें अवश्य समझाती है ये हम पर है कि अपने ज़मीर की बात को सुनते हैं समझते हैं या फिर अपने ज़मीर को मार देते है अथवा बेच देते हैं । अख़बार टीवी चैनल मीडिया जब पीत पत्रकारिता करता है खबर पैसे की खातिर लिखता दिखाता है तब खुद को सच का पैरोकार बताने वाला झूठ को सच साबित कर असली तस्वीर नहीं कुछ और पेश करता है । ये आईना सच नहीं दिखलाता इसको देखने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है ।  मुझे आजकल कहीं भी ढूंढने से कोई देवता जैसा किरदार नज़र नहीं आता है किस को आदर्श बनाने की बात की जाए। लगता है ईश्वर अपनी बनाई दुनिया की ऐसी दुर्दशा देख सोचता अवश्य होगा मैंने कुछ और बनाया था ये वो संसार वो दुनिया तो रही नहीं है । अंत में भगवान को लेकर दशा इस कदर अजीब है कि उसके होने पर सवाल उठने लगे हैं ।

  फ़िलहाल   कुछ साल पहले लिखी मेरी ये ग़ज़ल पढ़ कर कोशिश करते हैं समझने की।


 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु ) 
 

 

फ़रवरी 19, 2020

POST : 1242 सत्ता के राजसी ढंग लोकतंत्र संग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  सत्ता के राजसी ढंग लोकतंत्र संग  ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

 भारत और अमेरिका विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाते हैं । जब भारत में चुनाव होने वाले थे तब कुछ भारतीय अमेरिका में हौडी मोदी नाम से आयोजन करते हैं जिस में अमेरिका के शासक मोदी जी के समर्थक की तरह सहयोग करते हैं । जबकि दो देशों के संबंध दो लोगों के बीच की दोस्ती से बहुत ऊपर देशों की जनता के साथ साथ और सहयोग से बनते हैं । अब बदले में या फिर उस क़र्ज़ को चुकाने को भारत देश की सरकार नमस्कार ट्रम्प नाम से गुजरती में केम छो आयोजित करने जा रहे हैं अमेरिका में चुनाव से ठीक पहले इक शुरुआत की तरह से । कोई सौ करोड़ खर्च कर लाख लोगों की भीड़ जमा कर भव्य आयोजन किया जाना है । शायद इस से बढ़कर उपहास नहीं हो सकता कि ऐसे आयोजन में देश की वास्तविकता गरीबी अथवा झुगी झोपड़ी को छिपाने को इक सात फ़ीट ऊंची दीवार बनाई गई है ये बेशर्मी की हद है । सौ करोड़ में ऐसे गरीबों के घर भी बन सकते थे मगर जब सत्ता की राजनीति की विचारधारा ही जनता के शासन में अपने आप को राजा समझने जैसी बन गई है तब राजनेताओं से आम नागरिक के लिए संवेनशीलता की बात बेमायने हो जाती है । 

   मगर असली सवाल ये है कि लोकतंत्र में जनता के शासन में कोई भी शासक राजा की तरह आचरण कैसे कर सकता है और क्या तमाम संवैधानिक संस्थान अपनी आंखें और कान बंद कर खामोश तमाशाई बने हुए हैं । लगता है किसी बड़े अमीर देश का महाराजा इस गरीब देश में अपनी शान बढ़ाने को आने वाला है । क्या अमेरिका नहीं जनता कि इस समय भारत की सरकार देश की अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ में उपयोग कर कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचा बर्बाद करने के बाद देश की जनता को दमन पूर्वक दबाने का कार्य कर रही है और पुलिस न्यायपालिका सत्ता के हाथ की कठपुतली बनकर न्याय कानून को अपनी मनमानी से इस्तेमाल कर रहे हैं । अमेरिका की निति लोकतंत्र को लेकर कितनी उचित या अनुचित है ये उस देश के नागरिक भली तरह से समझते हैं । लेकिन भारत देश में कोई अच्छे दिन के सुनहरे सपने दिखला कर सेवक और चौकीदार होने की बात करने वाला नेता जब देश की गरीबों की कमाई अपने शानो शौकत आडंबर और झूठे गुणगान पर खर्च करता है तो कथनी करनी का विरोधाभास साफ हो जाता है । 

भविष्य के भारत की राजनीति को साफ स्वच्छ करने की बात छोड़ धर्म के नाम पर आपस में नफरत की दीवार खड़ी कर बांटने का कार्य सत्ता हासिल करने को देश भक्ति नहीं हो सकती है । और देश के कई राज्यों की जनता ने इस को समझा है और ऐसे विचार वाले लोगों को हाशिये पर पहुंचाया है । अभी दिल्ली में उनका ये ढंग पूरी तरह असफल हुआ है । जाने ये कैसी मानसिकता है जो देश के संसद में बैठे लोग बड़े बड़े पद पाने के बाद अपने देश के नागरिकों को हो गाली अपशब्द बोलकर जो मर्ज़ी कहते हैं मगर न्याय कानून चुपचाप खड़ा रहता है । मगर जब संसद में करीब आधे लोग आपराधिक छवि के हों तो उनसे गीता रामायण पाठ की उम्मीद नहीं की जा सकती है । जब हम लोग ख़लनायक के कारनामों पर तालियां बजाते हैं तब केवक किसी फिल्म की कमाई और सफलता की बात होती है मगर जब आपराधिक छवि के लोगों को संसद चुनते हैं तब कांटे बोने का काम करते है और बबूल बोकर आम नहीं खा सकते हैं । 

इस देश को इक गुलशन फूलों का चमन बनाना था मगर अब इसको कांटों भरा रेगिस्तान बनाने की राह जाने लगे हैं । वक़्त फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहां कोई सत्तानशीन खुद को देश समझने लगा है मगर देश केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं देश की जनता उसके नागरिक आवाम होते हैं । ये बात रेखांकित करने की ज़रूरत है कि जनता के निर्वाचित लोग देश के सेवक बनकर कर्तव्य निभाने को होते हैं शासक बनकर राजाओं की तरह मनमानी दमन और ऐशो आराम शानो शौकत दिखाने की कदापि नहीं । 
 

 



फ़रवरी 07, 2020

POST : 1241 मैं मेनका हूं , मुझे पहचान लो ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मैं मेनका हूं ,  मुझे पहचान लो  ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    मेरा मुकाबला किसी से नहीं है कोई भी मेरी तरह इतनी जगह इतने भेस इतने रंग इतने चेहरे एक साथ नहीं रख सकता है । सबको ज्ञान देने वाले भी मेरी आगोश में आकर अपनी सुध-बुध अपना विवेक अपनी सोच समझ खोकर मदहोश हो जाते हैं । मेरा अस्तित्व कण कण में बसता है । राजनीति में सत्ता मेरा ही रूप है और घर बार दुनिया के रिश्ते मोह माया छोड़ने वाले साधु सन्यासी संत महात्मा तक मुझे देखते ही सब को छोड़ मेरे बन जाते हैं । सत्ता किसी की नहीं हुई न कभी हो सकती है ये जानते हुए भी सभी आखिरी सांस तक मेरे आगोश में रहना चाहते हैं । मुझ बिन जीना नहीं चाहते मेरे लिए मरने को मारने को तैयार हैं मगर मैं भला किसी के साथ मरती हूं कभी नहीं । पुराने युग में राजा पिता की मौत युवराज पिता के लिए राजा बन गद्दी पाकर मुकट धारण करने का जश्न का अवसर हुआ करता था । सत्ता कभी विधवा नहीं होती है सदा सुहागन दुनिया में मेरे सिवा कौन है अर्थी उठती नहीं शासक की और डोली पहले सजने लगती है । आजकल बदला रूप है शपथ उठाने की रिवायत निभाई जाती है और संविधान की शपथ खाई जाती है । पल भर बाद कसम भुलाई जाती है और मुझसे निभाई जाती है । माना भारत देश गांधी और जेपी जैसे महान लोगों का देश है जो कभी सत्ता पर आसीन हुए नहीं मगर जो लोग भी सन्यास लेकर भी सत्ता की गद्दी पर आये उनका ईमान पल भर में डगमगा जाता रहा है । भारत के इतिहास में ऐसा उद्दाहरण एक ही है हरियाणा के गुलज़ारी लाल नंदा जी का जो तीन तीन बार कार्यवाहक पीएम बन कर भी सत्ता से मोहित हो नहीं सके । जब उनको आखिर में सरकारी आवास खाली करवाया गया तो उनके पास इक चारपाई एक बिछाने को दरी और पहने हुए धोती कमीज़ के ईलावा थैले में दो जोड़ी कपड़े थे जिस सामान को खुद ही बिना किसी सरकारी वाहन के उठा कर चले आये थे अपने नगर कुरुक्षेत्र समाज की वास्तविक सेवा करने । दिल्ली या किसी और महानगर जाकर बसने का विचार भी नहीं आया था । अब बड़े से लेकर छोटे पद पर बैठे सभी मेरे दीवाने हैं मसताने हैं मुझ शमां के सब परवाने हैं जल जाने हैं ।

             सरकारी अधिकारी कर्मचारी सरकारी अमले के लिए भी मैं अधिकार सुविधा का रूप बनकर उनकी तपस्या भंग करती हूं । मेरे हम्माम में सभी नंगे हैं और लाज शर्म की बात क्या शिक्षा और प्रशिक्षण की सभी बातें त्याग देते हैं । हमने ईमानदारी से नौकरी करनी है की भावना किस दिन किस जगह छूट जाती है कोई सोचता भी नहीं है । डॉक्टर शिक्षक भी बनते उपचार करने की कसम उठाकर हैं मगर मेरा लक्ष्मी रूप देखते ही मुझे पाने को सब करने को तैयार हो जाते हैं । धंधा कारोबार उद्योग करने वाले लोभ लालच का मेरा दुपट्टा पकड़ कर आगे बढ़ने लगते हैं तो खरीदार क्या अपने बेगाने किसी को नहीं छोड़ते हैं । मुझसे लगन लगती है तो भाई भाई का दुश्मन बन जाता है । दुनिया में मेरे प्यार के सामने बाकी सभी की मुहब्बत टिकती नहीं है । तुम मुझे कोई दोष नहीं दे सकते हो , विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के समय विधाता ने मुझे वरदान दिया था कि मैं कोई भी रूप धारण कर किसी को अपने पर आसक्त करने को आज़ाद हूं और दोषी मेनका नहीं मेनका के संसर्ग में फंसने वाला माना जाएगा ।

          बाकी छोटे मोटे लोगों की बात क्या आज का सबसे ताकतवर समझा जाता मीडिया टीवी अख़बार वाले सब मेरे ही जाल में फंसे हुए हैं । टीआरपी मैं ही हूं और विज्ञापन भी मेरा ही स्वरूप है । सब अपना ज़मीर बेचते हैं भाव कम अधिक मांगते हैं कोई भी अनमोल नहीं जिसको कोई खरीदार खरीद नहीं सकता हो । अपने दाम लगवाना बढ़वाना ऊंचे भाव बिकना हर अभिनेता नायिका खिलाड़ी तक चाहते हैं । मेनका ही मेनका सब कहीं मौजूद रहती हूं मैं ।  स्वर्ग की परी मेनका विश्वामित्र की तपस्या भंग कर उस से विवाह कर सकती है और इक सन्यासी घर परिवार बनाकर कन्या संतान को जन्म दे सकता है लेकिन ऋषि का क्या जब वास्तविकता पता चलती है कि मेनका इक जाल था इंद्र देवता का उनकी तपस्या भंग करने को तब वो मेनका के  प्रेम को ठोकर लगा छोड़ जाता है , तब से कोई मेनका किसी से प्रेम नहीं करती हमेशा जिसे चाहे अपने सम्मोहन में कैद कर लेती है । विरह की घड़ी मेनका का चाहने वाला तड़पता है मेनका कभी नहीं करती वास्तविक प्रेम हमेशा झूठा प्रदर्शन करती है । सत्ता और राजनेताओं का चरित्र मेनका को अवसर प्रदान करता है अपनी सुंदरता से मोहित करने को । राजनीति में अप्सराओं का वर्चस्व कायम है । 

                               ( पहला अध्याय समाप्त ) 
 
 पौराणिक प्रेम कथाएं: मेनका ने क्यों ठुकरा दिया विश्वामित्र का प्यार - vishwamitra  menka love story - Navbharat Times

फ़रवरी 06, 2020

POST : 1240 कौन करता भला उसूल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 कौन करता भला उसूल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कौन करता भला उसूल की बात 
सब यहां  कर रहे फ़ज़ूल की बात । 

पतझड़ों ने बहार से कही आज 
एक मसले हुए  से फूल की बात । 

उनकी खातिर बिछा हुआ है कालीन 
उनको मालूम क्या है धूल की बात । 

कह रहे हम बहार की हैं सरकार 
हर ज़ुबां बोलती है शूल की बात । 

ख़वाब टूटे हुए की देख ताबीर 
याद उनको कहां है तूल की बात । 
 

 

फ़रवरी 03, 2020

POST : 1239 एक नई कहानी चाहत की ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया

    एक नई कहानी चाहत की ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 हर बार की तरह सत्ता पर बैठे शासक ने सपनों का नया जाल बनाया है । जनता को लुभाने को शानदार भविष्य की तस्वीर बना कर समझाया है कि जो पहले नहीं हुआ मुझसे और किसी से भी मुमकिन नहीं था इस बार अवश्य संभव होगा । शर्त इतनी सी है जैसा मुझे करना पसंद है उसका बिना सोचे समझे समर्थन करना होगा । जो मेरी बात नहीं मानेगा उसको बेवफ़ा समझा जाएगा । इस तरह से सरकार ने अपने बजट में जनता की वफ़ा और अपनी ज़फ़ा का खुला सौदा सरेआम रख दिया है । जनता को इक सदियों पुरानी मुहब्बत की कहानी याद आई है जिसको सत्ताधारी को सुनाना चाहती है मगर डर लग रहा है अंजाम को सोचकर । फिर भी साहस कर सुना रही है । शासक जी अपने पहले भी वादा किया था सेवक बनकर रहोगे मगर कभी भी ऐसा लगा नहीं । हमेशा मालिक बनकर देश का ख़ज़ाना अपने खुद पे लुटाते रहे और जब खज़ाना ख़ाली हुआ तब घर मकान सामान बेचकर सपनों की दुनिया बसाने के ख्वाब दिखला रहे हो । आपको दो आशिक़ों की बात बताते हैं । 

इक औरत के दो चाहने वाले थे और हर दिन उसको खुश करने को बहुत कुछ करते रहते थे । आखिर दोनों को इक इम्तिहान से गुज़रना पड़ा और क्या कर सकते हैं विवाह के बाद बताना था । इक आशिक़ ने बहुत खूबसूरत घर बनवा कर दिखलाया दूजे ने दौलत का अंबार लगा कर दिखलाया । उस औरत ने दोनों को इनकार कर दिया ये कहते हुए कि तुम मुझे प्यार नहीं करते पाना चाहते हो और मेरी कीमत सिक्कों में लगा मुझे खरीदना चाहते हो । मुझे उसकी तलाश है जो मुझे वास्तव में खुश रखना चाहता हो आज़ाद होकर अपनी मर्ज़ी से जीने देना चाहता हो । किसी की कविता है जिस में बेटी अपने बाबुल से अपना विवाह किसी लौहार से करने को कहती है जो उसकी जंज़ीरों को काट सके । और वो औरत अभी भी उसी की तलाश में है जो अपनी शर्तें नहीं थोपना चाहे और नारी को सम्मान से जीने देना चाहता हो अधिकार की तरह न कि किसी का उपकार समझ कर । आपने भी सत्ता पर आसीन होकर देश की जनता को अपनी शर्तों में बांधना चाहा है मगर इस युग की जनता और आधुनिक महिला सोने चांदी के गहनों और महल की चाह नहीं रखती है उसको अपने हक और समानता सुरक्षा और आदर का महत्व पता है । अब मीठी मीठी बातों से बहलती नहीं है और घबराती भी नहीं इस बात से कि किसी के बगैर कैसे रह सकेंगे । अपनी ताकत को पहचानती है जानती है अपने अधिकार भीख में नहीं मिलते हासिल करने होते हैं । 
 

 

जनवरी 24, 2020

POST : 1238 फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       राम और रावण दो किरदार हैं समय समय पर इंसान किरदार बदलता रहता है । उन के भीतर हमेशा से इक ऐसा इंसान छुपा हुआ था जो महिला को अपनी बनाकर छोड़ना अपना अधिकार समझता है । उसने कभी अच्छे होने का किरदार निभाना नहीं चाहा मगर कोई नहीं जानता वो देखने को असली चेहरा रखता है वास्तव में किसी और का मुखौटा है जैसे कठपुतली नाचती है ऊपर किसी के हाथ में पकड़े धागे के इशारे पर उसे भले होने का किरदार अनचाहे निभाना पड़ा है । अभिनेता की तरह निर्देशक की हर बात को स्वीकार करना उसकी नियति है । आखिर अब उसने जो चाहा करने की अनुमति मिल गई है और उसको नाच नचवाने वाले ने उसे नायक नहीं खलनायक बनाने की बात मान कर उसे खुली छूट दे दी है अपना किरदार खुद लिखने और दिल में छुपे सभी अरमान जी भर पूरे करने को डायलॉग क्या कथा तक अपनी इच्छा से लिखवाने की । कब से उसकी हसरत थी सीता रुपी जनता का हरण करने की और इस के लिए अब और इंतज़ार भी उसको नहीं करना तभी उसने शुरुआत ही उसी अध्याय से करने का निर्णय कर लिया है । जनता बेचारी हमेशा से कैद रही है सुरक्षा के नाम पर सत्ता की बनाई परिधि के भीतर । और हर युग में रावण को खुली छूट मिली होती है छलने को भेस बदलने से लेकर अहंकार पूर्वक नारी को हरने की राम से बदला लेने की खातिर । पुरुषों की कायरता ढकी रहती है हर हाल में रावण बनकर सीता हरण करने पर भी और राम होकर सीता से अग्नि परीक्षा लेने पर भी । अपनी पत्नी को असुक्षित अकेली छोड़ने की बात कोई नहीं पूछता महिला उद्धार की कथा सुन ताली बजाते हैं सभी । 

        कलयुग के समय भी कोई देश की जनता को छलने साधु बनकर मधुर भाषा और सुनहरे सपने दिखा सत्ता की वरमाला डलवा कर असली रंग ढंग में सामने आने लगा है । सेवक बनने की बात भूल सत्ता की लाठी चलाने लगा है । आधुनिक रावण अयोध्या को लंका बनाना चाहता है अपने हाथ से आग लगाकर दुनिया को नई रौशनी दिखाना चाहता है । अपनी नाभि में अमृत कलश समझता है जिस समर्थन को वास्तव में वही उसकी सत्ता की संजीवनी को सबसे बड़ा खतरा हैं ये विभीषण भी नहीं समझा पाएगा । अब विभीषण रावण के दर की चौखट नहीं लांघ पाएगा । आधुनिक युग की रामायण कोई बाल्मीकि नहीं लिखेगा कोई तुलसी नहीं लिख सकेगा । रावण का शासन है उसकी मर्ज़ी उसकी पसंद उसकी अनुमति लेकर भाड़े पर रखे सोशल मीडिया टीवी अख़बार मिलकर लाइव सीधा मंच से सब होता जो नहीं होना चाहिए उसे भी हो रहा दिखलाने को बेताब हैं । सीता से सवाल किया जाएगा उसने रावण को पहले क्यों नहीं पहचाना उसकी गलती है जो कलयुग में मर्यादा पुरषोत्तम की चाहत भी की । सीता को विरोध किस की अनुमति नहीं मिल सकती और सत्ता के अधिकारी की हर आज्ञा का पालन करना उसका फ़र्ज़ है ।


    मगर कुछ ऐसा हो गया है जिसकी कल्पना आधुनिक रावण ने नहीं की थी । देश की जनता रुपी सीता उठ खड़ी हुई है कायरता का त्याग कर साहस के साथ । सीता ने अपनी नारी शक्ति और हर महिला की वास्तविक ताकत को पहचान लिया है और रावण को चेतावनी दे रही है कि बिना अनुमति उसको अपहरण करने की बात तो दूर उसको छूना भी चाहा तो सती अपनी शक्ति से उसको भस्म कर देगी । अपनी सुरक्षा किसी लक्ष्मण की बनाई रेखा के भरोसे नहीं खुद अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान के दम पर लड़कर करने को तैयार है । किरदार बदले हुए खलनायक को कहीं भीतर डर लगने लगा है पुरुष होकर अपनी छाती का नाप बताने वाले को औरत से मात खाने हारने के अपमान झेलने का । इतने साल तक उसने महिला जगत से छल किया उसको लुभावने नारे और समानता के अधिकार देने की बात कहकर बहलाता रहा है सत्ता पाने को उनकी सुरक्षा शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर देने की करते हुए जबकि दिल से उसने नारी को कभी आदर देने की क्या महत्व समझने का भी काम किया नहीं । मगर फिर इक बार अहंकारी का अहंकार ज़िद पर अड़ा है औरत से टकराने की एतिहासिक गलती दोहरा रहा है । उसको खबर नहीं सीता हरण के बाद की कथा क्या होगी और उस से पिछली जो कहानी नहीं दिखाई गई अभी और अगले अध्याय में फ़्लैशबैक में समझाने का विचार है उस का क्या होगा । मंदोदरी और सीता दोनों साथ मिलकर उसकी दशा वो कर सकती हैं कि अयोध्या और लंका दोनों जगह उसको अपने किरदार निभाने में कठिनाई होगी क्योंकि राम बनना अब संभव नहीं और रावण होने की कीमत जान से प्यारी सत्ता हाथ से निकलना हो सकता है ।  




                                

जनवरी 22, 2020

POST : 1237 मिलिए इनसे जन्म सफल हो जाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 मिलिए इनसे जन्म सफल हो जाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     ( इस कथा को सुनने-पढ़ने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती और मुक्ति मिलती है )

ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी अपने माता पिता की बात नहीं मानी शिक्षा हासिल की किसी तरह उपाधि पाने को जानकारी पाना समझना मकसद नहीं था। नौकरी व्यवसाय कारोबार में सफल होने को अच्छे बुरे की चिंता कभी की नहीं। अपने फायदा करने को चोरी हेराफेरी छल कपट सब किया बिना कोई अपराधबोध मन में लाये हुए। गीता कुरान बाईबल रामायण सब की बात सुनी समझी किसी की भी नहीं। नानक बुद्ध तुलसी कबीर सभी संतो के नाम रट लिए उनकी वाणी को नहीं जाना समझा। खुद को आईने में नहीं देखा और अपनी बढ़ाई खुद औरों से करते रहे दुनिया को बुरा कहते समझते बतलाते रहे। जीवन भर अपने स्वार्थ पूरे करने को मनचाहे कर्म करते रहे और अपने और अपने बच्चों को जैसे भी संभव हुआ दुनिया का सुख देने का काम करते रहे। आदर्श सच्चाई नैतिकता शब्दों को लेकर कभी भूले से भी विचार नहीं किया। देश समाज में जितना भी पतन होता रहे इसकी चिंता कभी नहीं की। पैसे कमाना साधन जमा करना मौज मस्ती करना यही बस मकसद बन गया और खूब हंसे नाचे झूमे आनंद लिया। पाप अपराध के साथ कभी लड़ना नहीं चाहा और उनसे बचने की जगह साथ निभाते रहे। धर्म को समझा नहीं जाना नहीं धर्म की रह चले नहीं बस धर्म धर्म का शोर करते रहे आडंबर करते रहे जीवन भर धार्मिक होने का। कभी कोई धर्मगुरु मिल गया तो शिष्य बन गए मगर कभी नहीं देखा कि जो खुद लोभी लालची है और और जमा करता है अकूत धन सम्पति जमा करता रहता है कोई रास्ता अच्छा बुरा छोड़ता नहीं दुनियादारी का उसके उपदेश कितने सार्थक हो सकते हैं। सबको त्याग की बात कहता खुद मोह माया में फंसा उलझा हुआ है। ये लोग जीवन भर मनमानी करते रहे हैं मगर देश समाज को कभी कुछ भी योगदान नहीं दिया बल्कि जो भी जैसे गलत खराब हुआ उस में ख़ामोशी से सहयोगी बने रहे हैं। 

   जो कोई भी समाज की सच्चाई की बात करता झूठ को झूठ कहने का साहस करता वो इन लोगों को नासमझ पागल लगता था। ये हमेशा ऐसे लोगों से दोस्ती करने से बचते रहे। देश के इतिहास और समाज की पुरानी मर्यादाओं की इनकी समझ सतही रही और महान लोगों की गहरी बातों को समझना ज़रूरी नहीं लगा इनको। जिन गांधी भगतसिंह सुभाष जैसे नेताओं ने मिलकर देश की खातिर सब कुछ न्यौछावर किया उनको भी ऐसे लोगों ने अपनी मर्ज़ी और साहूलियत से बांटने की कोशिश की। महान नेताओं की महानता उनकी सादगी उनका त्याग ऐसे लोगों को पसंद नहीं आया और जिस किसी ने आडंबर बड़े बड़े झूठे दावे भाषण ही देने का कार्य किया इनको वही अपना आदर्श लगा जो बात कुछ नहीं चाहत की करता हो मगर चाहता हो सब उसी को हासिल हो और उसके लिए सही गलत की भी परवाह नहीं करता हो। बस इनको ऐसा इक नेता मिल गया जिसने पहले सभी नेताओं को खराब और खुद को मसीहा घोषित करने को हर तरीका अपनाया आज़माया। पहली बार किसी ने ऐसा वातावरण देश में बना दिया कि देशभक्त होने का अर्थ उस नेता की महिमा का गुणगान करना हो गया। जो भी देशवासी उसकी विचारधारा से सहमत नहीं उसको देश भक्त नहीं होने का आरोप झेलना पड़ गया। 

ये वही ऊपर बताये लोग हैं जिन्होंने देश समाज की रत्ती भर परवाह नहीं की थी मगर अब इक नेता की जय जयकार कर खुद को सच्चे देशभक्त बताने लगे और जो हमेशा देश की समाज की बात करते रहे उनकी देशभक्ति पर सवाल करने लगे हैं। इनके दिमागों में भाषा में आचरण में नफरत भरी पड़ी है अपने ही देश के भाई बहनों दोस्तों से लड़ने लो तैयार हैं इक नेता की आलोचना करने पर। देश का संविधान देश का कानून और वास्तविक धार्मिक सदभावना मानवता की बात इनके लिए व्यर्थ है। देश के लिए सबसे अधिक खतरा इसी आवारा भीड़ का है जैसा व्यंग्यकार परसाई जी को डर था होता लग रहा है। जाने इस कहानी को राजा नंगा है कहानी से क्या नाता हो सकता है शायद ये उस का अगला अध्याय है। अब राजा की पोशाक हर पल शानदार बेहद कीमती है चमकती हुई भी है मगर देश की अर्थव्यवस्था की बदहाली को छिपाने ढकने में फिर भी नमाम है। नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात गुरुनानक ने भगवान को लेकर कहा था ये इक आदमी को भगवान बना बैठे उसी की नाम की माला जपने लगे हैं। इन्होने अपना जीवन सफल कर लिया है और ये भी पक्की बात है जिस दिन सत्ता नहीं रही इन लोगों ने कोई दूसरा और भगवान बना लेना है क्योंकि अब इनको कोई न कोई चाहिए ईबादत करने को। चाटुकारिता की सीमा गुज़र गई गुलामी में मज़ा आने लगा है। 
 
 

 

जनवरी 18, 2020

POST : 1236 विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया

  विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया 

             बस इसी इक बात से समझ लो सच क्या है , आप भगवान का गुणगान अल्लाह की इबादत वाहेगुरु या जीसस की महानता को भले किसी भी कथा कहानी आरती अदि से कहते हैं कोई आपसे सवाल नहीं करेगा कि जो अपने कहा लिखा दावा किया मुमकिन है भी या केवल कपोल कल्पना है विश्वास दिलाने को। मगर जैसे ही आप किसी बात को लेकर सवाल खड़े करते हैं कि ये सही नहीं हो सकता है या फिर जो भी कथा कहानी में बताया उचित नहीं कहला सकता आप कटघरे में खड़े कर दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों ने भगवान अल्लाह जीसस वाहेगुरु को जानने समझने की बात नहीं की केवल आंखें बंद कर अंधविश्वास किया है। अन्यथा ऊपर वाले को जो सबसे शक्तिशाली है ऐसे लोगों के सहारे की बचाव को ज़रूरत नहीं हो सकती है। 

     कुछ ऐसा ही इस समय किसी नेता या दल की सरकार के समर्थक कर रहे हैं। उनकी किसी बात की भी आलोचना को सहन नहीं करते और विरोध करने वाले को कटघरे में खड़े करने लगते हैं। उनको देश की गरीबी भूख बेरोज़गारी और अर्थव्यवस्था की बदहाली से सामाजिक सदभाव की चिंता नहीं है चिंता है किसी नेता की खुद को सबसे महान कहलाने की चाह की। हज़ार झूठ ऐसे लोगों को सच लगते हैं और देश के संविधान की भावना या जनता के जनमत की उपेक्षा को अनदेखा करना उनको आपत्तिजनक नहीं लगता है। आप इनकी तुलना उस व्यक्ति से कर सकते हैं जो उसी शाख को काट रहा होता है जिस पर बैठा हुआ है।  मगर ये उच्च शिक्षा हासिल कर विलासितापूर्ण जीवन जीते लोग सोशल मीडिया और एकतरफा शोर से इकतरफ़ा जानकारी लिए गांधी नहरू को दोष देते हैं। उनको लगता है जो लोग आजकल सत्ता पर हैं वही देशभक्त हैं और उनसे पहले सभी देश को लूटते रहे। उनको विश्वास ही नहीं है कि जिस नेहरू को लेकर अपशब्द उपयोग करते हैं उन्होंने अपनी जवानी के 3259 दिन नौ बार विदेशी शासकों के ख़िलाफ़ आंदोलन करते हुए जेल में बिताये हैं इतना ही नहीं ये भी नहीं मानते कि उनके पिता एक धनवान वकील थे जो अपने बेटे को विलायत में पढ़ाई करवा रहे थे जिनको ये तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे सड़क छाप कोई गरीब का बेटा समझते हैं। खुद ये लोग देश समाज की खातिर कुछ करने की बात पर जवाब देते हैं इस के लिए तमाम अन्य लोग हैं। मगर जिनको ये देशभक्त मानते हैं उनके संगठन के लोग आज़ादी से पहले विदेशी शासकों के लिए सूचना देने का काम किया करते थे। इतिहास में दर्ज है उनके माफ़ीनामे भी और ये भी कि उनका आज़ादी की लड़ाई में कोई भी योगदान नहीं था।

   इक बात और है जो ये आज के शासक नेहरू और पटेल को लेकर कहते हैं उनको शायद पता नहीं है कि उन्हीं पटेल जी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था और उस संगठन को लेकर क्या कहा था। सबसे अजीब बात ये है कि इनको ये भी नहीं मालूम कि नेहरू जी अटल जी के बारे क्या राय रखते थे और लोहिया से लेकर तमाम विपक्षी दल के लोग क्या कहते थे। कैसे नेहरू विपक्षी नेताओं का आदर ही नहीं देते थे बल्कि उनको संसद में देखने को कोशिश करने की खातिर अपने विरुद्ध चुनाव हारने के बाद अपने दल के किसी सांसद से जगह खाली करवाते थे। नेहरू जी के निधन पर अटल जी का संसद में भाषण इन को समझ नहीं आएगा क्योंकि इनको मानवीय संवेदनाओं से मतलब नहीं है। क्या आपको पता है अटल बिहारी बाजपेयी ने खुद स्वीकार किया था कि युवा अवस्था में उन्होंने अंग्रेजी हकूमत को सूचना दी थी उन देशभक्त आज़ादी के आंदोलन करने वालों के बारे में। क्योंकि तब उनको ये समझ नहीं थी कि सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना अपराध नहीं देशभक्ति था।

                                 नहरू का पहला चुनाव अभियान

       जब उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने। कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा। लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं। आज कोई कल्पना कर सकता है आज के सत्ताधारी नेता से ऐसी सलाह जनता को देने की बात संभव है।

       कितने लोग जेपी के आंदोलन के बारे जानते हैं शायद ये आधुनिक सोशल मीडिया से शिक्षित लोग तो नहीं। लोकतंत्र में विरोध करना नागरिक का अधिकार है ये बात अभी कल ही दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत की इक न्यायधीश ने कही है पुलिस के तौर तरीके पर कटाक्ष करते हुए। जीपी ने भी 25 जून 1975 को भाषण में यही बात कही थी जिस सभा में उस दिन मैं भी शामिल था सुनने वालों में। अपनी क्लिनिक बंद कर रामलीला मैदान आया हुआ था। उन्होंने कहा था पुलिस जनता की सुरक्षा को है और सुरक्षबलों को संविधान की भावना का आदर करना है और शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन करने पर कोई लाठीचार्ज या गोली चलाने का आदेश नहीं मानना चाहिए। जो बात उस समय इंदिरा सरकार के वक़्त कही थी जो लोग उस आंदोलन में शामिल थे और बाद में सत्ता पर रहे आपात्काल के बाद अब खुद उनकी तरह नहीं उनसे भी अधिक निरंकुश लग रहे हैं।  

  लोग आज गुमराह हैं किसी के नफरत के प्रचार से सोशल मीडिया की बातों से। समय के साथ बहुत चीज़ें बदल जाती हैं सालों बाद आपको भविष्य की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए न कि इतिहास की बीती बातों को लेकर बहस में उलझना चाहिए। कश्मीर को लेकर तब क्या क्यों किया ये चर्चा करना उसी तरह बेकार है जैसे अयोध्या में संविधान कानून को दरकिनार कर राम मंदिर बनवाने के नाम पर ढांचा गिराना ताकि अपनी राजनीति को सत्ता पाने की सीढ़ी बनाया जा सके। अभी आपको समझ नहीं आया उन लोगों को धर्म नहीं अपनी राजनीति से मकसद है। क्या आज सत्ताधारी नेताओं को देश की जनता से अपने कार्यों की बात करनी चाहिए या फिर वास्तविक समस्याओं को भूलकर अन्य विषयों में उलझाने का काम करना चाहिए। अच्छे दिन नहीं हैं गरीबी भूख और बेरोज़गारी की हालत और बिगड़ी है देश में आपसी भाईचारा और सदभावना को खतरा लगने लगा है। 1964 और 2014 के बीच पचास साल बहुत पानी गंगा जमुना में बहा है मगर कुछ लोगों को पचास साल पहले देश के सत्ताधारी नेता को दोष देने से फुर्सत नहीं है जबकि उनको विचार करना चाहिए कि इस नेता ने पांच साल से अधिक समय में देश को क्या दिया है , क्या नेहरू जी के शासन के 17 साल का तीसरा भाग क्या दसवां हिस्सा भी देश को आगे बढ़ाया है। जी नहीं मोदी जी की तुलना नेहरू जी से कभी नहीं की जा सकती क्योंकि अपने निधन के पचास साल बाद भी नहरू जी जो हैं शायद कोई और नहीं रह सकेगा।


                       

जनवरी 17, 2020

POST : 1235 जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये गुनाह तो मुझसे भी हुआ है शायद , उन्होंने संदेश भेजा कभी इन सभी का कोई वीडियो बड़े सरकार की तारीफ़ का भी देखा सुना है। कितनी ज़िंदगी बिता दी मैंने भी हर सरकार की आलोचना करते हुए , ये हसरत ही रही कोई तो सरकार नेता हो जिनकी जी भर तारीफ़ करने को मन करे। अख़बार वाले संपादक टीवी वाले एंकर अपने मतलब को साधने को कलाकारी दिखलाते हैं हर नेता को खुश करने को ऐसे सलीके से बात कहते हैं जिस से लगता है जनता की नागरिक की तरफ हैं होते सरकार की ओर हैं। उनकी सलाह और भी दोस्तों चाहने वालों की राय का आदर करते हुए आज ये जुर्म बेलज़्ज़त भी करने चला हूं। शायद जिन लोगों ने मुझे व्हाट्सएप्प फेसबुक पर ब्लॉक किया हुआ है उनके भगवान की आलोचना के अपराध के कारण उनको खबर मिल जाए और मुझे अनब्लॉक करने की अनुकंपा करें। 

          पहला अध्याय ( नेता जी पर आलेख लिखना है ) 50 अंक का अनिवार्य सवाल। 

  नेताजी अच्छे दिन लाने वाले थे देश को खूबसूरत सपने दिखलाने वाले थे। चाय की चौपाल पे चर्चा करवाने वाले थे। सेवक बनकर गरीबों के दुःख दर्द मिटाने वाले थे। घायल थी जनता मरहम लगाने वाले थे मगर नहीं था मालूम कैसे दिन दिखलाने वाले थे दर्द को दवा बताने वाले थे घायल को ज़ख्म पर नमक छिड़कने वाले थे उसको तड़पा कर अट्टहास लगाने वाले थे। इक नया इतिहास रचाने वाले थे शहंशाह की तरह हर घड़ी पोशाक लिबास बदलने का कीर्तिमान स्थापित करने वाले थे।  देश को नई दिशा दिखलाने वाले थे हर घड़ी झूमने गाने वाले थे। रोज़ कोई नया मजमा लगाने वाले थे देश की जमापूंजी ऐशो-आराम पे उड़ाने वाले थे। कुछ नहीं नया बनाने वाले थे जो भी स्थापित था एक एक कर गिराने-मिटाने वाले थे। हम सबको चार्वाक ऋषि की बात का अर्थ समझाने वाले थे क़र्ज़ लेकर घी पीओ की मिसाल बनाने वाले थे। अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने वाले थे , रिज़र्व बैंक से भी उलझने टकराने वाले थे। रिज़र्व बैंक का सुरक्षित धन हथियाने वाले थे अपने लिए उस को उड़ाने वाले थे। अंधे कुएं में गाड़ी चलाने का जादू दिखलाने वाले थे आग से आग बुझाने वाले थे जितना भी पानी था खुद पी जाने वाले थे। होश सबके उड़ाने वाले थे हर किसी को सज़ा देने को अपराधी बतलाने वाले थे अपनी अदालत लगाने वाले थे वकील गवाह न्यायधीश सब खुद बनकर फैसला सुनाने वाले थे। लोग ये ग़ज़ल दोहराने वाले थे , मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। आदमी आदमी को क्या देगा।

         दूसरा अध्याय ( उनकी अदालत का निर्णय ) 50 अंक का सवाल अनावश्यक है।

ऊंचे सिंहासन पर बैठे न्यायधीश बन जनता को कटघरे में खड़ा कर आरोप लगा अपनी बेगुनाही साबित करने को कह रहे हैं। लोग कह रहे हैं ये सच है हमें अपने किये का फल मिल रहा है ऐसे व्यक्ति की झूठी बातों पर भरोसा किया और उसकी सरकार बनवा दी। अब वही हम पर इल्ज़ाम लगाता है और अपने गुनाहों का दोष हम पर लगाता है। जितने अपराधी हैं राजनीति में उनको गले लगाता है अपने दल में शामिल करता है और जिनको देश विरोधी कहता था सहयोगी बनाता है। जनता को उल्लू बनाता है। चार सौ करोड़ विदेशी दौरों पर खर्च कर इतराता है खुद को विश्व का महान राजनेता बतलाता है इतने पैसे से देश की भलाई करता तो बहुत किया जा सकता था मगर उसकी जेब से क्या जाता है। दोस्तों संग जश्न हर दिन मनाता है। अपनी संस्था के लोग बड़े बड़े पदों पर बिठाता है अपनी मनमानी करने को उचित अनुचित का भेद मिटाता है। इक पुरानी कहावत सच दोहराता है , अगर संतान काबिल है तो जमा करने की ज़रूरत क्या है खुद अपने आप कमाई कर लेगी और नाकाबिल है तो जमा किया हुआ बर्बाद कर उड़ा देगी। यही कर दिखाता है ,रिज़र्व बैंक जब ये समझाता है ये सुरक्षित धन बुरे समय काम आता है। मुझ जैसा शासक हो बुरा समय खुद ही बुलाता है मेरा आदेश है मुझे चाहिए किसी का क्या जाता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस फैसला सुनाता है। भैंस के सामने बांसुरी बजाता है। 

                  तीसरा अध्याय ( अंतिम उत्तीर्ण होने को ) खरैती पास कॉपी-पेस्ट 

इक स्कूल के शिक्षक को नेता जी की बचपन की कापी रद्दी से मिल गई है। अगर मैं शासक बन गया। शीर्षक पर लेख लिखवाया गया था। तब उस बच्चे ने जो लिखा था लिखावट जैसी भी रही लेख पढ़कर अध्यापक ने नंबर शून्य दिए थे। शासक बन गया तो करना कुछ भी किसलिए है बस अपना गुणगान करवाना है उस पर खज़ाना खर्च करवाना है। अपनी सभी इच्छाएं पूरी करनी है जो मेरी बात नहीं मानेगा उसकी ऐसी की तैसी करनी है जिस टीचर ने मुझे गलती करने की सज़ा दी या भले घर के किसी बड़े ने शरारत करने पर डांट लगाई सभी को खूब मज़ा चखाना है। इक इक का हिसाब चुकाना है। बदमाश कहते हैं बदमाश क्या गुंडा बनकर सबक सिखाना है। 

वैधानिक चेतावनी :- ये इक काल्पनिक कथा की रचना है और इसका किसी की ज़िंदगी से कोई वास्ता नहीं है। किसी घटना से समानता हो ऐसा केवल इत्तेफ़ाक़ से हो सकता है । 


 


जनवरी 10, 2020

POST : 1234 अंधे कुआं में झूठ की नाव की आज़ादी ( ये किसे चाहिए ) डॉ लोक सेतिया

     अंधे कुआं में झूठ की नाव की आज़ादी ( ये किसे चाहिए ) 

                                            डॉ लोक सेतिया 

  आज देश की सबसे बड़ी अदालत के लिए परीक्षा की घड़ी है। उसको निर्णय देना है कि जिस कश्मीर राज्य की जनता को 158 दिनों से आधुनिक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है उस के संविधान से मिले मौलिक अधिकार की सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका कितनी संवेदनशील है। पांच महीने से विपक्षी नेताओं को बंधक बना रखा गया है देश के विरोधी दल के सांसदों को कश्मीर जाने की अनुमति नहीं है मगर सरकार 15 विदेशी देशों के सांसदों को कश्मीर ले जाकर सब ठीक है दिखलाने की बात करती है। जो लोग विरोध या असहमति जताने को अपने ही देश के भाई बहनों को गद्दार या देश विरोधी कहने का कार्य करते हैं उनको समझना होगा कि उनकी निष्ठा किसी नेता या दल अथवा सरकार के लिए हो सकती है लेकिन देश और संविधान तथा लोकतंत्र के लिए नहीं है। लोकतंत्र में देश और संविधान सबसे महत्वपूर्ण है। उनको कभी पांच महीने अपने बुनियादी अधिकारों सुविधाओं से वंचित रहना पड़े तभी समझ आएगा। विडंबना की बात ये है कि ये लोग भूल गए हैं आपात्काल में जो हुआ उसको लोकतंत्र की हत्या बताने वाले खुद अघोषित आपात्काल जैसे हालत बनाए हुए हैं। 

   ये कैसी व्यवस्था है जिस में एक विश्वविद्यालय में पुलिस भीतर घुसकर छात्रों को मारती पीटती है और एक विश्वविद्यालय में नकाबपोश गुंडे जाकर मार पीट दहशत फैलते हैं तो पुलिस नहीं आती बचाने को और किसी भी नकाबपोश को पकड़ती नहीं न ही कोई एफआईआर दर्ज करती है। शिक्षा के मंदिरों की बदनाम करने को यही पुलिस मनघड़ंत कहानियां बनाती है किसी को देश विरोधी साबित करने को मगर अदालत में झूठी साबित हो जाती है। हमने 1975 से सभी दल की देश की और राज्यों की सरकारों को देखा है समझा है और उनकी असंवैधानिक बातों का खुलकर विरोध किया भी है मगर कभी जनहित की बात को अनुचित कहने का कार्य किसी ने नहीं किया जैसा आजकल तथाकथित भक्त लोग करते हैं। उनको समझना होगा ये वही देश है जिस के नागरिक अहिंसा के मार्ग पर चलकर विश्व की तब की सबसे ताकतवर हक़ूमत से लड़ कर देश को आज़ाद करवाते हैं। आपात्काल घोषित करने वाली नेता की ज़मानत ज़ब्त करवाते हैं और इक नया विकल्प तलाश कर जनता दल की सरकार बनवाते हैं। 

मगर इन चाटुकार लोगों को तो इसी भाजपा के नेता अटल बिहारी बाजपेयी जी की कही बात भी याद नहीं है। उन्होंने कहा था सरकारें बदलती रहती हैं नेता आते जाते रहेंगे मगर आपसी मतभेद या विरोध के बावजूद भी देश की एकता और संविधान की भावना को कायम रखना चाहिए और ऐसा नहीं कहना चाहिए कि पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया है। जो भी ऐसा कहता है वो देश के किसानों मज़दूरों और नगरिकों के पुरुषार्थ का अपमान करता है। शायद भाजपा को इस पर चिंतन करने की ज़रूरत है। वास्तविक देशभक्ति  किसी नेता दल की नहीं संविधान और न्याय की बात निडरता से कहना है। 

  सोशल मीडिया पर अंकुश लगाकर टीवी चैनल अख़बार को विज्ञापन से मालामाल कर खरीद कर आप अपनी महिमा का गुणगान करवा सकते हैं। अंधे कुएं में झूठ की नाव तेज़ दौड़ेगी मगर बाहर दुनिया आपसे सच बुलवाएगी। और भूलना नहीं सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता है। 
 

 

दिसंबर 30, 2019

POST : 1233 तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया

 तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया 

        आपको समझना है धर्म क्या है और ईश्वर अल्लाह खुदा भगवान क्या है। चलो आज मिलकर उसी से पूछते हैं जिस ने दुनिया बनाई है। आपको बाहर नहीं नज़र आएगा अपने भीतर झांकना है। आंखें बंद करते हैं और सुनते हैं इक आवाज़ सुनाई दे रही है , अगर आपको सुनाई नहीं दे रही तो आपका विश्वास अभी पूर्ण नहीं है। आवाज़ आ रही है , ये जो सब धर्म धर्म का शोर है कौन कर रहा है धर्म वालों को खुद नहीं पता मैं कौन हूं। उनको ऊपरवाला इक सामान जैसा लगा जिसको बाज़ार में बेचकर इनको अपने स्वार्थ साधने हैं। इक बात बड़ी आसान है और सीधी भी कि मेरी मर्ज़ी से जन्म मृत्यु से लेकर सभी कुछ होता है निर्माण विनाश सब कोई और नहीं कर सकता है जो लोग मिट्टी के खिलौने बनाना जानते हैं खुद को निर्माता मानते हैं मगर उनकी बनाई रचना को पल भर में जो मिट्टी बना देता है उस का उनको पता ही नहीं है। इंसान विज्ञान लाख कोशिश कर ले जीवन का संचार कदापि नहीं कर सकता है। धर्म के नाम पर दंगे फसाद क़त्ल करने वाले सिर्फ गुनाहगार हो सकते हैं परमात्मा को समझने वाले नहीं। मैंने किसी इंसान को क्या पशु पक्षी पेड़ पौधे भी बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया है और जो आदमी आदमी में अंतर करते हैं झगड़ा करवाते हैं उन्हें क्या समझ अच्छाई और सच्चाई किसे कहते हैं। रटते हैं ईश्वर सत्य है मगर सच बोलने का साहस नहीं और झूठ को सच साबित करते हैं। 

           अदालत में मुकदमा चल रहा था मंदिर मस्जिद के झगड़े को लेकर। हर कोई किसी को अपराधी मानता है अपने अपने खुदा ईश्वर का घर तबाह करने का और गर्व करते हैं खुद किसी की इबादतग़ाह को तोड़ने का। अदालत जाने किस किस को पक्ष बनाती है असली पक्षकार का कोई नाम तक नहीं जानता। मुझ ऊपरवाले से नहीं पूछते सच क्या है मुझे क्या चाहिए। भला मुझे इन सभी इमारतों की क्या ज़रूरत है और कब किस को मैंने अपना हितेषी या वकील घोषित किया है। मुझे कोई चढ़ावा कोई इबादत कोई दान कोई वस्तु इन से क्यों चाहिए जिनको सभी को खुद मैंने बनाया है और दिया है जो भी जिस के पास है। क्या मुझे नासमझ समझते हैं जो खुद हज़ार देकर एक मांगता हो उसी से जिसे दे दिया। ये तो विश्व की जनता है जो अपने अपने देश की सरकार से अपने दिए धन का छोटा सा हिस्सा भीख की तरह मांगती रहती है। इन धर्म वालों ने मुझे भी राजनेताओं की तरह ठग बनाने का काम किया है ये कहकर कि धार्मिक स्थल बनाने को या कोई आडंबर अनुष्ठान करने को पैसे सामन देकर मुझे खुश कर सकते हैं। अदालत किसी को नियम तोड़ने का दोषी घोषित करती है किसी को अपराधी या क़ातिल। मगर क्या किसी ने विचार किया कि मैं अपनी मर्ज़ी से जिसे भी जब चाहूं अपने पास बुला लेता अथवा उसका जीवन का अंत कर देता हूं। भगवान की मर्ज़ी है कहने के इलावा कोई कुछ नहीं कर सकता। किसी भी देश की किसी भी अदालत में कोई केस दायर नहीं हो सकता है। आंधी तूफ़ान भूकंप बाढ़ कितनी आपदाओं को मेरे नाम करते हैं फिर कोई तो मेरे ख़िलाफ़ एफआईआर लिखवाता कहीं। मगर ये सब होता इंसान की अपनी गलती से है। 

    विधाता एक ही है और एक ही हो सकता है फिर किसने नाम बदल कर अपने अपने भगवान देवी देवता घोषित कर लिए हैं। वास्तव में उनको ईश्वर को समझने जानने की चाहत नहीं थी उनको मेरे नाम का दुरूपयोग करना था अपने मकसद हासिल करने को। उनको लगता है कोई ऐसा नहीं है और होगा भी तो ऊपर बैठा आराम करता होगा उसे क्या करना कोई क्या कर रहा है। मगर कहते हैं ऊपरवाला जानता है सब देखता है अगर ये भरोसा करते तो फिर मुझे लेकर नफरत का धंधा नहीं करते। उपदेश देते हैं औरों को जिन बातों को लेकर खुद उन्हीं पर नहीं चलते हैं। धरती पर आये हैं कुछ लोग जिन्होंने चिंतन और मनन और अध्यन से समझना चाहा समझाना चाहा जैसे नानक जैसे विवेकानंद जैसे लोग या किसी भी धर्म की शुरुआत करने वाले गुरु मगर बाद में उन्हीं के अनुयाई चेले खुद को भगवान बताने लगे और सत्य की खोज ईश्वर की तलाश छोड़ मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा बनाने लगे। कोई बुत कोई मूर्ति कोई शब्द लिख उसको पूजा ईबादत का साधन बना लिया बिना समझे कि जिसने दुनिया बनाई कोई भी उसको नहीं बना सकता है। ये दुनिया बनाने वाले को बनाने वाले बन बैठे हैं मगर मुझ दुनिया बनाने वाले का कोई अंत नहीं है कोई ओर छोर नहीं शुरुआत नहीं जानते पर इनका जन्म इनका अंत मेरी इच्छा से है। 

अब आप समझना चाहते हैं आपको क्या करना है पूजा आरती ईबादत और कैसे मुझे खुश करना है। नहीं मुझे कोई अपना गुणगान नहीं करवाना है कोई चढ़ावा कोई उपहार कोई घर रहने को नहीं चाहिए। मैंने आप सभी को इंसान बनाया है आपको अच्छे कर्म करने हैं अच्छे इंसान बनकर जीना है। कोई आपसी भेदभाव बड़े छोटे का धर्म जाति का रंग का देश का नहीं रखना है। नफरत की जंग की  अहंकार की सब बातें छोड़कर प्यार से मिलजुलकर रहना और अपने पास अधिक जमा नहीं कर बांटकर खाना इक दूजे के सुःख दुःख को समझना इंसानियत का पालन करना यही आदेश है उपदेश है और मुझे पाने को खुश करने को यही रास्ता भी है। 
 

 

दिसंबर 29, 2019

POST : 1232 दान का चर्चा है कमाई पर पर्दा है ( कड़वी बात ) डॉ लोक सेतिया

  दान का चर्चा है कमाई पर पर्दा है ( कड़वी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   कल की बात कोई सुनी सुनाई नहीं सामने देखी और खुलकर समझी समझाई बात है। इक बड़ा सा विज्ञापन लगा था किसी आयोजन का सत्ताधारी नेता का नाम फोटो मुख्य अतिथि के रूप में दे रखा था। जो लोग आयोजन कर रहे थे उनसे जाकर पहचान की अपना परिचय दिया। आप लेखक हैं पचास हिंदी अख़बार मैगज़ीन में चालीस साल से रचनाएं छपती हैं हमारे साथ जुड़ें आपका स्वागत है। मैंने कहा पहले आप मुझे समझ लें मैं भी आपको जान लेता हूं और तमाम वास्तविक घटनाओं की बात हुई। उनकी जानकारी पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता मगर फिर भी जब विषय आया सत्ताधारी नेताओं अधिकारियों के गुणगान का तो कहना पड़ा मुझे नहीं आता ये काम। उनको शायद इस की उम्मीद नहीं थी कि कोई ऐसा भी बेबाक सच कह सकता है , मैंने कहा आपने जिनको मुख्य अतिथि बनाया है उनको जो उपहार देने वाले हैं उनकी किस विशेषता को देखकर। समाज को देश को उन्होंने क्या दिया है बल्कि सत्ता पर रहते खूब ऐशो आराम से देश सेवा के नाम पर शान से रहते हैं। अपने उनके सचिव से जो मोलभाव किया है सांसद निधि से आपको धन मिलने का बाकायदा इक हिस्सा उनके दल को देने का वो भी बिना किसी रसीद या चेक द्वारा न देकर नकद दो नंबर से ही वास्तव में देश भर में चलते भ्र्ष्टाचार का ही उद्दाहरण है। मैंने उनको बताया कि कभी हमारे शहर के उपायुक्त ने तबादला होने पर खुद मुझे फोन किया घर बुलाया था और जाने पर कुछ हज़ार का इक चेक थमाया था सरकारी खाते से और ऐसा अन्य सौ लोगों को सहायता के नाम पर दे रहे थे बदले में उनको विदाई करते हुए सम्मानित और पुरुस्कृत करने की बात थी। मैंने उनको चेक लौटा दिया था और हमने विदाई में उनको स्मृति चिन्ह दिया था सदस्यों ने अपने पास से राशि खर्च कर के क्योंकि वो हमारे लेखक सदस्य थे संस्था के। 

      यहां कल की इक और बात याद आई है मोदी जी के इक अंध समर्थक ने लिखा मुझे भेजा व्हाट्सएप्प पर कि मोदी जी ने पिछले पांच साल में उनको मिले उपहार और इनाम की राशि दान कर दी है। साथ ये भी था पिछले सत्ताधारी दल वालों ने कितना दान किया था बताओ। उनकी जानकारी सोशल मीडिया से हासिल की हुई है न उन्होंने देश के पिछले इतिहास को पढ़ा न कभी समझने की कोशिश की है। पहली बात उनको धर्म की जानकारी बहुत होने का दावा है तो समझ लेना चाहिए दान देकर इश्तिहार देना दान नहीं नाम पाने को कारोबार कहलाता है जो तमाम लोग करते हैं। वास्तविक दान कहते हैं एक हाथ से दो और दूसरे को भी
पता नहीं चले ऐसा होना चाहिए। मगर इस परिभाषा को भी छोड़ देते हैं हालांकि आखिर में रहीम और गंगभाट का वार्तालाप फिर दोहराना होगा। मोदी जी को देश विदेश से जो भी उपहार मिले हैं कोई खैरात में नहीं मिले अगर उनकी काबलियत से मिलने होते तो राजनेता बनने से पहले ही मिल जाते। उनके हर ऐसे उपहार की कीमत देश ने चुकाई है उनको जिन्होंने भी उपहार दिए बहुत कीमत वसूली है जो हम आप नहीं जानते हैं। उनकी सारी शोहरत देश के ख़ज़ाने को खर्च नहीं बर्बाद कर के हासिल की गई है। इक बात आपको कोई नहीं बताएगा कि जब नेहरू जी देश के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने अपनी सब जायदाद देश को दे दी थी जिसकी कीमत का आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं क्योंकि जैसा सब जानते हैं उनके पिता और दादा इतने बड़े अमीर थे जो नेहरू को विदेश भेजा था शिक्षा पाने को। उनकी काबलियत और देश को आधुनिक बनाने ही नहीं देश में लोकतंत्र स्थापित करने में उनका योगदान ऐसा महान कार्य है जो आजकल के तथाकथित महान नेता करना तो क्या उसको सुरक्षित तक रखने को सक्षम नहीं हैं। मोदी जी ने खुद पर अपने नाम का शोर का डंका पीटने पर देश का पैसा बर्बाद किया है जिस का कोई हिसाब नहीं है। कोई नहीं बताएगा उनके खुद के रहन सहन सैर सपाटे पर कितना खर्च किया गया 375 करोड़ केवल विदेशी दौरों में किराए के विमान पर खर्च हुए ये साल पहले जानकारी मिली थी। देश में 75 शहरों में भाजपा के दफ़्तर बनाये गए हैं जिन पर कितना खर्च हुआ और वो पैसा किस ने कैसे दिया कोई नहीं जान सकता क्योंकि उन्होंने अपने लिए नियम कानून बदल दिए थे दल को विदेशी दान की बात गोपनीय रखने से। 

आप उसको देश सेवा नहीं कह सकते जिस में आप करते क्या हैं नहीं पता मगर आपको सरकारी खज़ाने से अपने धार्मिक दान देने की अनुमति है। गुजरात से दिल्ली आते हुए भी दावा किया गया था कुछ लाख जो बचत थी मोदी जी दान कर आये थे। और आने के महीने बाद नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर जाकर 2500 किलो चंदन की लकड़ी करोड़ रूपये की दान दे आये थे। आपको मालूम है धर्म आपको दान अपनी ईमानदारी की कमाई से करने की हिदायत देता है जो पैसा भारत सरकार के खज़ाने से खर्च हुआ मोदी जी उस दान को अपने नाम से संकल्प लेकर नहीं दे सकते थे और संकल्प कोई संस्था संगठन नहीं व्यक्ति करता है। आप को पता है मोदी जी के चुनाव आयोग को दिए ब्यौरे में कितना धन दौलत है उनके पास देख लेना। जिस ने 35 साल भीख मांग कर पेट भरा ऐसा बताया गया और वेतन भी दान दे देते हैं उनके पास पैसा कैसे जमा है कोई जादू की छड़ी या अलादीन का चिराग़ है तो उस से देश के करोड़ों लोगों की गरीबी मिटाते। आपको सच नहीं बताया जाता है फिर भी जिस पर रोज़ लाखों रूपये राजसी शान से जीने पर खर्च होते हैं उस जैसी देश सेवा और गरीबी कौन नहीं चाहता करना। ये सब माफ़ होता अगर देश की जनता को अच्छे दिन न भी मिलते ऐसे बदलाल खराब दिन तो नहीं भोगने पड़ते। कहने को बहुत है मगर जिनको नहीं समझना कितना विवरण दे कर भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है। 

   रहीम इक नवाब से कवि थे मगर रईस थे और दान दिया करते थे दरबार में जो भी ज़रूरतमंद मांगने आता। उनकी दरबार के इक सदस्य कवि गंगभाट थे , उनहोंने ध्यान दिया कि दान देते समय रहीम अपनी नज़रें ऊपर नहीं रखते झुकाये रहते हैं। विचार किया और इक दोहा पढ़कर सवाल किया था। 

सिखिओ कहां नवाब जू ऐसी देनी देन , ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचे नैन। 

रहीम ने उनके दोहे का जवाब दोहा पढ़ कर दिया था। 

देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन , लोग भरम मोपे करें या ते नीचे नैन। 

बात मोदी की हो या किसी भी सत्ताधारी शासक की उनके इश्तिहार उनकी जिस बढ़ाई की चर्चा करते हैं कि मनोहर उपहार या मोदी योजना अदि बेहद अनुचित और धर्म नैतिकता के विरुद्ध है क्योंकि जो भी खर्च किया जाता है उनकी खुद की कमाई नहीं देश राज्य की आमदनी से किया जाता है। 
 

 

दिसंबर 28, 2019

POST : 1231 प्यास नहीं पीने को बहुत है ( आजकल का समाज ) डॉ लोक सेतिया

 प्यास नहीं पीने को बहुत है ( आजकल का समाज ) डॉ लोक सेतिया 

    हर साल की तरह इस साल भी विचार करने लगा बीत रहे साल क्या पाया क्या खो दिया और भले निभा नहीं सकूंगा अगले वर्ष का संकल्प क्या होना चाहिए। पहली बात समझ आई सोशल मीडिया फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर समाज की देश की गंभीर जागरूकता की बात करना। बचपन की सुनी बात याद आई कि आप हम या कोई भी बैल को तालाब पर ले जा सकता है मगर छी-छी कहने से पानी नहीं पिला सकते हैं। जिनको नहीं मालूम उनको बता देता हूं गांव में जानवरों को पानी के पास ले जाकर छी-छी बोलते हैं ताकि जानवर को इशारे से समझाया जा सके कि पानी पिओ। बात आजकल की है तो आजकल की तरह समझनी होगी , बाहर अंट शंट चाट पकोड़े जिसको गंद शंद कहते हैं चाव से खाते हैं पेट भरने से भी दिल नहीं भरता है और फिर कहते हैं थोड़ा ज़्यादा भर गया पेट आज अब कोई हज़्म करने को पाचक भी लेना होगा। यही हालत आजकल सभी लोगों की है अनाप-शनाप बोलते पढ़ते लिखते हैं व्यर्थ की बहस और अपने को जानकर साबित करने अन्य को मूर्ख अज्ञानी समझने की मानसिकता बन गई इसलिए भौंकते हैं सुनाई कुछ नहीं देता। ऐसे शोर में सार्थक संवाद संभव नहीं तभी सोचा है जिनको प्यास नहीं उनको पीने की बात कहना बंद यही अगले साल का संकल्प है। 

    मुझे सबसे अधिक प्यार जिन से है और जिनसे सच्चा प्यार मिला और जिनसे बहुत सीखा समझा जाना वो हैं मेरे दादाजी झंडारामजी और मां माया देवी जी। विशेष बात है दोनों को हमेशा अपने पर भरोसा रखते हुए देखा और जीवन की विषम समस्याओं में भी घबराते नहीं पाया। क्या लोग थे आज उनकी याद भी मुझे इक आशावादी एहसास देती है। जबकि उन दोनों का जीवन बेहद कठिन हालात में रहा होगा। दादजी दस साल के थे जब पिता का साया सर से उठ गया और मां को बचपन में कोई रोग माता का जैसा कहते हैं लगने से उनकी आवाज़ और सुनाई देने की शक्ति कम हो गई थी। उनकी शादी करने के बाद मायके के नाते रिश्ते नाम को साथ थे इक मामाजी और मामीजी को छोड़कर। हमारे घर अर्थात ससुराल में दादाजी की छोटी बहु का रुतबा किसी असहाय और खामोश गाय की तरह था। पिता जी अवश्व उनका ख्याल रखते थे मगर उन्होंने कभी नहीं समझना चाहा उनकी पत्नी को घर में समानता बराबरी का अधिकार नहीं मिलता है। शायद उनकी काबलियत जानकर भी काबिल समझना नहीं चाहते थे लोग। फिर भी मां को शायद ही कभी किसी से तकरार करते देखा उदास नहीं देखा हमेशा इक सहज मुस्कान उनके चेहरे पर रहती थी। मैंने इक बार उनकी आंखों में आंसू देखे थे मगर तब भी उन्होंने मुझे कारण नहीं बताया था। किसी की बुराई करते नहीं देखा उनको अपने बच्चों से शिकायत भी हंसते हुए लहज़े में करती थी , तुम्हें नहीं मिलती फुर्सत कि बहु ने मिलने आने नहीं दिया और हंस देती। अपनी दो बहुओं से कभी कोई तीखी बात जीवन भर नहीं की आज भी दोनों याद करती हैं उनके सासु मां बड़ी मधुर सवभाव की महिला थी। 

  मां 80 साल से अधिक जीवन जिया और बड़ी शान से रही हमेशा। सभी बच्चे दिल से चाहते थे और उनकी हर बात आदेश समझ प्यार से मानते थे। अपने व्यवहार से अपने घर को बिना आदेश देने की आदत घर की महारानी जैसा रुतबा पा लिया था। जबकि विवाह कर आई थी जैसे कोई वजूद ही नहीं था। मां चिट्ठी लिखती थी अर्थात पढ़ी लिखी थी और गाया करती थी इक भजन जो अपने आप में इक मिसाल था। मैंने याद कर उस भजन को लिखा हुआ है ब्लॉग पर , उस भजन जैसा कोई और भजन मैंने नहीं सुना आज तक। भगवन बनकर अभिमान न कर तेरा मान बढ़ाया भक्तों ने। तुझे भगवान बनाया है भक्तों ने। कोई ऐसे कह सकता है ईश्वर है इस बात पर अकड़ना मत तुझे मानते हैं हम तभी है ये ध्यान रखना। शायद सच्चा आस्तिक और भक्त जिसे पूर्ण विश्वास हो वही कह सकता है। कोई डर नहीं घबराहट नहीं जैसे अपने करीबी दोस्त बेहद अपने से प्यार से बात करते हैं। उनको धागे से कुरेशिये से कितनी तरह के रुमाल बनाने की बड़ी खूबसूरत कला आती थी जो कम महिलाओं को आती थी और इतने लाजवाब ढंग डिज़ाईन कि हर कोई कहता था चाची जी मुझे भी बना दो और सबकी चाची उनको बना देती थी महीने लगते थे। भोली थी और लोग भोलेपन को नासमझी समझने की भूल करते हैं मगर हम हैरान हो जाते थे जब जो पुरानी बात किसी को याद नहीं होती वो बताती थी ये उस दिन उस जगह उस तारीख़ की बात है। मिला जुला संयुक्त परिवार था और बारह भाई बहन की सबकी जन्म की तिथि बताती थी और बचपन की बातें भी। मेरा भरोसा है और दावा भी कि दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं हो सकता जो ये कह सके कि मेरी मां ने कभी उसके या किसी के साथ कोई अनुचित व्यवहार किया हो। इस से बढ़कर तपस्या नहीं हो सकती कि भले आपके साथ किसी ने कैसा भी अच्छा बुरा किया हो अपने कभी मन में कोई भेदभाव की भावना नहीं रखी हो। 

दादाजी भी 90 साल से अधिक जीवन जिया और बड़ी शान से रहे किसी शहंशाह की तरह। उनकी विशेषता थी बच्चों को भी नाम के साथ जी कहकर बुलाते थे। आवाज़ ऊंची शायद ही कभी होती मगर बात का असर कमाल का हुआ करता था। घर की बैठक या गांव की डयोढ़ी में बैठे होते तो हर कोई पांव छूकर आदर से दादजी नमस्कार कहते हुए भीतर जाता , कोई महमान आये जो रोज़ की बात थी तो बिना खाना नहीं जाने देते थे। अपने दम पर और अपने उसूलों पर चलकर बहुत बनाया मगर हर किसी को बांटते रहते थे। जाने कितने करीबी क्या दूर दराज के नाते रिश्ते वाले आये और बोला दादाजी कोई कमाई का साधन नहीं और उनको नौकर चाकर नहीं भागीदार बनाते गए। बहुत बार लोग धोखा देकर भाग जाते तब भी कोई शिकन नहीं आती थी माथे पर बस कहते उसका नसीब था जो ले गया। तायाजी और पिताजी को आदेश था जो बेईमानी कर चले गए कभी मिलें तो कोई बात नहीं कहना न वापस मांगना। और दोनों भाईओं ने ये बात हमेशा याद रखी निभाई भी। दादजी स्कूल नहीं गए थे मगर उनको इक भाषा जिसको लंडे कहते हैं लिखनी आती थी और हिसाब चुटकिओं में गिन लेते थे। मगर उनको धार्मिक किताबों को सुनने का बेहद शौक था और सभी भाई बहनों में ये मुझे ही करना होता था जब बाकी खेल कूद में लगे होते मैं दादजी की इच्छा पूरी करने को बैठा रहता और उनको शायद सबसे अधिक प्यारा भी लगता था। 

  बात हुई थी प्यास की और आजकल किसी को भी अच्छी मुहब्बत की बातों की चाहत नहीं है। इक दौड़ है आपसी खुद को सबसे अच्छा साबित करने की। ये बात कोई नहीं जानता कि वास्तव में सम्पूर्ण कोई भी नहीं है और अपने आप को ऐसा समझना नासमझी की हद है। मुझे बहुत सीखना है समझना है और करना भी है। अभी तक कुछ भी नहीं कर पाया , अब सार्थक करने को समय भी कम ही है। बात खत्म नहीं हुई विराम देता हूं बाकी अगली पोस्ट पर।