फ़रवरी 17, 2014

POST : 417 नकाब देवताओं की , पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     नकाब  देवताओं की  पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास )

                                डॉ लोक सेतिया

कलयुग में होने लगी जब सत्य युग की बात
बस तभी बरसी बहुत नोटों की यहां बरसात
लगने लगे संतों के आश्रमों में सोने के भंडार
गली गली जो घूमते उनको मिलती नहीं खैरात ।

प्रवचन दिये सदकर्म के खुद रहे करते कुकर्म
लेकिन नहीं आती है अब तलक किसी को शर्म
सब दिया उपदेश छोड़ो लोभ माया मोह , खुद
अंबार धन के जमा करना रहा है उनका धर्म ।

जाने किधर से आ गये सच के नये अवतार
कहने लगे जनता तेरा करना हमें उद्धार
होने लगी सब तरफ जब उनकी जयजयकार
आम आदमी से बन गये सत्ता के दावेदार ।

सब को बताया आपने सब के सब है शूल
इस जहां में इक हमीं हैं खुशबू वाले  फूल
बिना किसी नींव के लो कर दिया खड़ा महल
बिखर गया इक झौंके से अब उड़ रही है धूल ।

दो दिन में आपके देखे हैं सबने अजब अंदाज़
अंजाम जाने क्या होगा अच्छा नहीं आगाज़
कल तक जिस जनता को मालिक थे बताते
अब छीन कर लेने लगे उसी के सर से ताज़ ।

देखलो बंदो में ही बंदे कुछ खुदा बन गये
हमने समझा आदमी हैं वो ये क्या बन गये
रात देखा इक डरावना सा हमने कोई ख्वाब
चेहरे बदल कर दानव सब देवता बन गये । 
 

 

फ़रवरी 16, 2014

POST : 416 खबर खबर वालों की ( मीडिया की बात ) डा लोक सेतिया

    खबर खबर वालों की ( मीडिया की बात ) डा लोक सेतिया

वो सच की बात कहने का दावा करते हैं। मगर सच क्या है ये वो भी जानते हैं। हर सच पूरा सच नहीं होता , उसके पीछे कोई और कहानी भी होती है जिसको सामने नहीं आने दिया जाता। कभी पत्रकारिता में बड़े ज़ोर शोर से चर्चा होती थी पीत पत्रकारिता की। अब ये विषय कभी सुनाई ही नहीं देता। देखा जाये तो आज की सारी की सारी पत्रकारिता ही पीलिया रोग से पीड़ित है। सावन के अंधों जैसे बन चुके हैं , सब ने किसी न किसी रंग का चश्मा लगाया हुआ है। इनकी वास्विकता को उजागर करने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि इनकी खुद की परिभाषा क्या है। आज इनको याद दिलाना ज़रूरी है कि पत्रकारिता का पहला सबक क्या कहता है। खबर किसको कहते हैं ? " खबर वो सूचना है जिसको कोई छिपाना चाहता है , लोगों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहता , पत्रकार का काम है उसको खोजना उसको तलाश करना उसको ढूंढना और पता लगा कर लोगों तक पहुंचाना "। मगर आज के अखबार वाले और समाचार टीवी चैनल वाले तो वही बता रहे जिसको कोई खुद बताना चाहता है। कोई प्रैस नोट भेजता है कोई पत्रकार वार्ता करता है। बात ये भी नहीं कि इनको धृतराष्ट्र की तरह कुछ दिखाई नहीं देता हो , अफसोस तो इस बात का है कि इन्होंने खुद गंधारी की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। इनको अपना स्वार्थ ही नज़र आता है , कर्त्तव्य नहीं। टी आर पी , प्रसार संख्या और विज्ञापनों का मोह , ये सब के सब फंस चुके हैं इसी जाल में। सिनेमा वालों ने जिस तरह खलनायक को नायक बना प्रस्तुत किया और ऐसा संदेश समाज को देने लगे कि ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिये और बुराई का अंत करना है तो खुद भी बुरे बन जाने में कोई हर्ज़ नहीं। कोई आपके प्रेम को स्वीकार नहीं करे तो उसको डराना , भयभीत करना प्यार है। आज जिनको आप नायक महानायक बता रहे हैं उन्होंने अपनी फिल्मों में यही उल्टी परिभाषा गड़ी है। क्या ये यही बताना चाहते हैं कि जो सच की राह पर चलते रहे तमाम मुश्किलों के बावजूद वो नासमझ थे। जो प्यार में त्याग किया करते थे वो मूर्ख थे। सच कहा जाये तो सिनेमा भी कब का सही मार्ग से भटक गया है। लेकिन हम बात पत्रकारिता की कर रहे थे , ये तो बीच में मिसाल याद आ गई।

                           अब देखा जाये पत्रकारिता का दावा करने वालों का असली चेहरा। चलो सब से पहले उस बात का ज़िक्र करते हैं जिसका शोर आये दिन किया करते है ये सभी। घोटालों की बात। आपको मालूम है कि आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है।  ज़रा सोचो क्या हो सकता है। ख़ास बात ये कि वो हमेशा से हो रहा है , हर दिन होता है , हमारे सामने होता है और शायद सदा होता ही रहेगा। क्योंकि उसकी बात कोई नहीं करता , करेगा भी नहीं। भला जिस के दम पर आपका वजूद टिका हो आप उसको समाप्त होने दोगे। ये सब दावा करते हैं सब से तेज़ दौड़ने का लेकिन इन सब को ज़रूरत है उन सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियों की। यही है देश का आज तक का सब से बड़ा घोटाला। सरकार का धन किसी ऐसे कार्य पर खर्च करना जिस से जनता का कोई भला न हो केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाया जा सके , उसको भ्रष्टाचार ही कहते हैं।अभी एक नया विज्ञापन दिखाया जा रहा है बेघर लोगों को घर देने का , जिसमें विज्ञापन देख कर ही बस्ती में रहने वाले खुश को निकल पड़ते हैं झूमते गाते। गरीबी हटाओ खाने को अधिकार शिक्षा का अधिकार ईलाज का अधिकार सभी कुछ है सरकार के विज्ञापनों में। क्या ये सच है , पैसे लेकर हर झूठ का प्रचार करवा लो इन सच के झंडाबरदारों से। ये प्रयोजित कार्यकर्म दिखाते हैं अमीर बनने के यंत्र वाले , लोगों को अंधविश्वास के जाल में फसाते हैं चंद पैसों की खातिर। भूत प्रेत की डरावनी कहानियां , सनसनी फैलाने वाले किस्से , क्या बीमार मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे। अब तो इनका काम समाचार देना नहीं रह गया , ये खबर बनाने लगे हैं। बिना मतलब की चर्चा होती है पूरा दिन भर किसी भी विषय पर। नतीजा कुछ नहीं , पानी में मधानी मारना कहा जाता है इसे। कभी माखन नहीं निकलता इस काम से , मगर ये मलाई खा रहे इसी दम पर , दस मिंट की चर्चा में बीस मिंट का ब्रेक विज्ञापनों का। कभी कोई जानता नहीं था जिस राखी सावंत को , इनकी कृपा से बिग बॉस में और भी चर्चित होकर वो शख्सियत बन जाती है।

                                   इनको यही चाहिये कि कुछ चटपटा मसाला मिलता रहे लोगों को बांधे रखने को। क्या यही मकसद होना चाहिये मीडिया का। मनोरंजन का साधन नहीं है पत्रकारिता। ये नहीं जानते कि इन्होंने अपने निजि स्वार्थ के लिये देश और समाज का कितना नुकसान किया है। जिस तरह पिछले कुछ दिनों में एक व्यक्ति टीवी अखबार और सोशल मीडिया का उपयोग करके मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुंचा और खुद को हर कायदे कानून और संविधान से परे समझने लगा वो इनकी अपरिपक्वता की निशानी है। अगर आपका मकसद उचित है तो आपका रास्ता भी ईमानदारी का होना चाहिये। अन्यथा झूठे नारों से देश की जनता हमेशा ही छली जाती रही है। जो व्यक्ति सरकारी अधिकारी रहते राजनीतिक उदेश्यों के कार्य करता रहा , वेतन लेकर विदेश शिक्षा पाता रहा और वापस आने के बाद दो वर्ष नौकरी करना ज़रूरी है के नियम को ताक पर रख घर बैठा रहा छुट्टी लेकर , जो कर्ज़ लिया विभाग से उसको लौटने में आनाकानी करता रहा , हर बार कोई बात करने के बाद मुकरता रहा , सब के लिये सभ्यता को ताक पर रख अपशब्दों का प्रयोग करता रहा , अपने साथ वालों का गल्त आचरण देख कर भी चुप रहा और बाकी सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता रहा , क्या वही है आपकी नज़र में नायक। लोकतंत्र में कोई तो मर्यादा हो जिसका पालन अपने विरोधी का विरोध करते भी किया जाना चाहिये। ये पहली बार देखा कोई शीशे के घर में रहने वाला भी पत्थर मारता हो दूसरों को। क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे अन्य दल वाले किसी मुद्दे को सत्ता पाने का बहाना बनाते रहे हैं , ये भी भ्रष्टाचार को अपनी नैया बना चुनाव की गंगा पार करना चाहते हैं। क्या मीडिया वालों को अभी तक इतनी सी बात नहीं समझ आई , क्या ये आम आदमी का नाम लेकर कुछ खास लोगों की महत्वांक्षा पूरी करने की बात नहीं। कितने ख़ास लोग इनके दल में शामिल हो रहे हैं आजकल , क्या ये सांसद और विधायक बनने की चाह में नहीं आये। क्या ये भी आम आदमी को पीछे नहीं छोड़ देंगे।

                              ये सब इसलिये बताना पड़ा है क्योंकि पहले भी पत्रकारिता को दुरूपयोग कर लोग सत्ता की गली में प्रवेश पाते रहे हैं।  आज कोई अखबार जब कई कई बार पूरे पन्ने पर इनका साक्षात्कार छापता है तो पूछना पड़ता है कि क्या ये खबरों का अकाल है या फिर आपकी सोच ठहर गई है। बहुत हैरानी की बात है , इन के पास एक सौ बीस करोड़ लोगों की खबर नहीं है कोई भी दिखाने को न ही छापने को। एक और बेहद ज़रूरी बात है इनकी , ये हर दिन दावे किया करते हैं लोगों की राय जानने के। कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय भला पूरे देश का मानसिकता का पता दे सकती है। क्या ये जनता को गुमराह करने अथवा भ्रमित करने का काम नहीं है। मगर इनके लिये भी कोई सीमा निर्धारित नहीं उचित की अनुचित की। शायद यही चलन बन गया है आज का , सब दूसरों को आईना दिखाते हैं , खुद को कोई आईने में नहीं देखना चाहता। कभी अपने को आईने के सामने खड़े हो कर देखना चाहिये जो सब को सच का आईना दिखाने की बात करते हैं , जब कि वो आइनों का बाज़ार सजा उसका कारोबार करने लगे हैं। हां भाई भतीजावाद यहां भी छूटा नहीं है।  अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम भी खूब होता है इनके घर में जिसको ये अपना विशेषाधिकार मानते हैं। 

 

फ़रवरी 12, 2014

POST : 415 देवी देवताओं का बाज़ार ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       देवी देवताओं का बाज़ार ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     बहुत ही विकट समस्या खड़ी हो गई है। चित्रगुप्त जी ने धर्मराज जी से साफ कह दिया है कि वे अब सेवा निवृत होना चाहते हैं। अब उनसे पाप पुण्य का हिसाब संभाला नहीं जा रहा , धर्मराज कोई अन्य व्यवस्था के लें जितना जल्द हो सके। धर्मराज जी को आज तक वी आर एस जैसी किसी स्कीम की कोई जानकारी नहीं थी , जिसको आधार बना चित्रगुप्त जी ने अपनी अर्ज़ी दी है। धर्मराज चित्रगुप्त को समझा रहे हैं कि अगर आप सब के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब नहीं देखोगे तो उनको बहुत परेशानी होगी। ऐसे में वो न्याय नहीं कर पायेंगे। अब तक आप ये कार्य पूरी निष्ठा पूर्वक करते रहे हैं , ये अचानक आपको क्या सूझी है। चित्रगुप्त बता रहे हैं कि अब उनका काम करना बेहद कठिन हो गया है , क्योंकि सभी देवी देवता उनके कार्य में अनावश्यक रूप से दखलंदाज़ी करने लगे हैं। आये दिन कोई न कोई देवी देवता उनको सूचित किया करते हैं कि उन्होंने किसी के सब पाप और अपराध माफ कर दिये हैं , अपराधी उनके दर पर क्षमा मांगने आये थे चढ़ावा लेकर। ये तो सरासर रिश्वतखोरी है। भ्रष्टाचारी घोटालेबाज़ तक जब पकड़ में आते हैं तब इनकी शरण में पहुंच जाते हैं। इन बड़े लोगों को न कोई अदालत सज़ा दे पाती है न हम ही दे सकते हैं। क्या यहां भी छोटे छोटे चोर सज़ा पायेंगे और बड़े बड़े माफी पाते रहेंगे। धर्मराज भी ये जानकर चिंतित हो गये , सोचने लगे तभी धरती पर अपकर्म बढ़ता ही जा रहा है। ये तो देवी देवता अराजकता फैला रहे हैं दिल्ली की सरकार की तरह। आप अभी सब देवी देवताओं को सूचित कर कि वो ऐसा कोई काम नहीं करें जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। ये बात सपष्ट की जाती है कि किसी भी देवी देवता को अधिकार नहीं है अपने भक्तों के पाप और अपराध क्षमा करने का। किसी की शरण में जाने मात्र से कोई बच नहीं सकता अपने कर्मों का फल भोगने से। कोई धर्म गुरु कोई देवता अगर अपने अनुयायियों को गुमराह करता है ये कह कर कि वो उनके अपकर्मों को क्षमा करवा सकता है तो वो न केवल सृष्टि के नियमों का अनादर करता है बल्कि खुद भी उनके पापों का सहभागी है। भविष्य में ऐसा करने वाले लोगों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।

                   अब चित्रगुप्त कार्य करने को राज़ी हो गये हैं। सब देवी देवताओं को चित्रगुप्त जी का खुला पत्र मिला है एक चेतावनी के रूप में। निर्देश दिया गया है कि अब कोई अगर किसी के पाप और अपराध क्षमा करने का प्रस्ताव उनके पास भेजेगा तो उस पर कड़ी करवाई की जायेगी। ईश्वर तब निर्णय करेगा कि उनका देव पद पर रहना उचित है अथवा अनुचित। पत्र को पढ़ते ही खलबली मच गई है देवी देवताओं में , चिंता होने लगी है कि कहीं ये बात उनके भक्तों तक न पहुंच जाये कि उनके पास वरदान देने या किसी के कर्मों का फल नहीं मिलने देने का अधिकार ही नहीं है। ऐसे में तो उनके धर्मस्थलों के सामने लगने वाली कतारें ही नहीं रह जायेंगी। फिर तो हम केवल नाम को ही देव रह जायेंगे। सभी देवी देवता एक साथ मिल कर ईश्वर के पास गये हैं मांग पत्र लिये कि उनको ऐसा अधिकार होना चाहिये।

                  ईश्वर उन सब को समझा रहे हैं कि आप सभी व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। क्या जो आपके भक्त हैं वो केवल आप पर भरोसा करते हैं , क्या वो कभी इस कभी उस तरफ डांवाडोल नहीं हुए रहते। आज के आपके भक्त तो बाज़ार के ग्राहक कि तरह हैं , किसी भी एक दुकानदार पर इनको भरोसा नहीं है। हर दुकानदार भी मुनाफा ही कमाता है , मगर मुफ्त उपहार और छूट का प्रलोभन देकर ग्राहकों को आकर्षित करता है। आपको भी ये बात समझनी होगी , आखिर ये भक्त आप में से ही किसी न किसी के दर पर ही तो आयेंगे। जैसे दुकानदार उपहार और छूट की बात कहते हैं लेकिन साधते खुद अपना आर्थिक हित ही हैं , उसी तरह आप भी क्षमा और वरदान का झूठा भ्रम बनाये चुपचाप सब देखते रहो। आपकी असलियत कोई भक्त कभी नहीं जान पायेगा। ये बात आपको भी जान लेनी ज़रूरी है कि कर्मों का फल तो आपको भी भोगना होगा , अगर आप पाप और अपराध को बढ़ावा देंगे तो देवी देवता नहीं रह जायेंगे। ईश्वर की बात सब समझ गये हैं , लेकिन ये भी जान गये हैं कि ये अंदर की बात है , किसी को कानोकान खबर न हो।

फ़रवरी 11, 2014

POST : 414 नया मदारी , नया तमाशा ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    नया  मदारी , नया तमाशा ( तरकश )  डा लोक सेतिया

          राजनीती के खेल में इक नया मदारी आया है। उसने आकर बातों से सब को बहलाया है , भरमाया है। कोई नई छड़ी दिखाने को लाया है , राजधानी में जादू चलाकर दिखाया है। हर तरफ धूप में आता नज़र साया है। क्या बतायें हमने क्या खोया है और क्या पाया है। खाली हाथ आया है , कहता है सब ले आया है। अब नई कानून की इक छड़ी बनानी है , बस उसी से सब को सज़ा दिलानी है। उसके पास अलादीन की कोई निशानी है , चालीस चोरों वाली नई कहानी है। खुल जा सिम सिम नहीं होगा इस ज़माने में , काम आयेगी छड़ी कोई लोकपाल लाने में। उस छड़ी से गायब सब बलायें कर देगा , और झोली सबकी मोतियों से भर देगा। बस ज़रा सी मुश्किल पेश आई है , उसने सभा बस उस जगह बुलाई है। इक तरफ कुआं है सामने और पीछे भी खाई है। मान जाओ बात उसकी इस में ही अब भलाई है। भूख नहीं लगेगी , प्यास नहीं लगेगी , उसके मंत्र से पूरी ज़िंदगी चलेगी। खेल है मदारी का नया तमाशा है , बस सभी के मुंह में दे दिया बताशा है। बिजली मिलेगी पानी मिलेगा , अब किसी का कोई भी न मीटर चलेगा। इक छड़ी बनाने दो उसे ये कहता है , कुछ कोई न सोचो क्या क्या बना जो ढहता है। हर किसी टोपी अपनी जब पहनाता है , कल का शैतान भी भगवान कहलाता है। खुद को बताया नया इक अवतार है , जय जो उसकी बोले उसकी नैया पार है। गर ना मानी तुमने सामने मझधार है। नित  कोई बिसात वो शतरंज की बिछाता है , या कोई चौसर के खेल में बुलाता है। चाहे नज़र आता कोई भी पासा है , जीत वही जाता है , ताली बजाता है। अब सभी जगह बस उसी का राज होगा , इक मदारी के सर पर ही सजा ताज होगा। पर सभी को इस बात की खबर है , पल भर को रहता हर जादू का असर है। जब भी उसका खेल देख कर बाहर सब आते हैं , फिर वही पुरानी दुनिया सामने पाते हैं। खेल हर खिलाड़ी का इक सुहाना सपना है , सब उसी के पास रहता कुछ भी न हुआ अपना है। सोचते थे लोग सब थाली मिलेगी , कौन जानता था जेब खाली मिलेगी।

फ़रवरी 09, 2014

POST : 413 सपने देख कर खुश हो जाओ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    सपने देख कर खुश हो जाओ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सर्वेक्षण करना कोई कठिन कार्य नहीं है। आप किसी भी विषय पर कर सकते हैं सर्वेक्षण। कोई बंधन नहीं है। कोई सवाल नहीं कर सकता कि कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय देश की जनता की राय कैसे हो सकती है। ये कारोबार बहुत लोग सालों साल से सफलता पूर्वक कर रहे हैं। उन को पैसा शौहरत ही नहीं मिली बल्कि अब तो वो भी नेता कहलाने लगे हैं। कल तक जो बाकी लोगों को कहा करते थे कि नेता किसी बात पर कभी कुछ कभी कुछ बोलते हुए शर्मसार नहीं होते आज खुद वही करते हैं निसंकोच। इक नया शोध सामने आया है कि जागते हुए अच्छे अच्छे सपने देखना लाभकर होता है। अगर आपको भूख लगी है और घर में खाने को कुछ भी नहीं है तो आप रूखी सूखी रोटी खाने के नहीं हलवा पूरी के सपने देखो। जब सपनों से ही पेट भरना है तो जो मन को पसंद हो वही खाने का सपना देखें। रस मलाई खाओ रस गुल्ले खाओ। कोई बिल नहीं मांग सकता। बेरोज़गारी में किसी बड़े ओहदे के अफ्सर होने की कल्पना कीजिये , हो सके तो ये ख़्वाब देखो कि आप कंपनी के मालिक बन औरों को नौकरी दे रहे हैं। बेशक आपके पास साईकिल खरीदने को भी पैसे नहीं हों , आप मर्सिडीज़ कार खरीदने से कम के सपने क्यों देखें। देश के एक पूर्व राष्ट्रपति भी बड़े बड़े सपने देखने की बात कहते थे , उनका सपना था सन दो हज़ार बीस में भारत को महान शक्ति बनने का , छह साल बाद देखते हैं उसका क्या हुआ। अभी तो सब वो बात भूल चुके हैं। सपने बेचना ख़ास कर झूठे सपने बेचना राजनीति का काम रहा है। कुछ नये लोग नये सपने दिखला कर थोड़े ही दिन में सत्ता पर आसीन हो गये हैं।

           अगर आप भी देश की बदहाली देख देख कर परेशान रहते हैं तो आप भी कुछ ऐसे सुनहरे सपने देखा करें जैसे मैं देखता रहता हूं। मैं हर दिन कल्पना करता हूं कि सब कुछ बदल गया है , कहीं भी किसी बुराई का नाम तक बाकी नहीं रह गया है। सब देशवासी अपने बारे नहीं देश व समाज के बारे पहले सोचते हैं। सभी नेता पूरी तरह ईमानदारी से देश और जनता की सेवा करने लगे हैं , वे सादगी पूर्वक रहते हैं , जनता का एक पैसा भी व्यर्थ बर्बाद करना उनको घोर अपराध लगता है। प्रशासन खुद को शासक नहीं जनता का सेवक मानने लगा है और किसी भी काम में कोई बाधा नहीं है। अपना कर्त्तव्य निभाना ही हर अधिकारी को कर्मचारी को सच्चा धर्म लगता है। परिवारवाद और पूंजीवाद का अंत हो चुका है , अब वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो चुका है। देश में कोई भी गरीब नहीं है न ही किसी की तिजोरी में अरबों रुपये सड़ रहे हैं। राजनीति में अपराधियों को पवेश नहीं मिलता है , सांसद और विधायक जनता और देश पर बोझ नहीं हैं। अब उनके वेतन पर सुविधाओं पर सैर सपाटों पर धन बर्बाद नहीं किया जाता है। उन्होंने अपना सर्वस्व देश को अर्पित कर दिया है ताकि जनता की समस्याओं का अंत हो सके। अब कोई सफेद हाथी नहीं कहलाता है। किसी भी नेता के पास उसके परिवार के किसी भी सदस्य के नाम पर कोई फार्म हाउस या पैट्रोल पंप नहीं है। न ही कोई किसी सरकारी भूमि पर कब्ज़ा ही किये हुए है।
                       धर्म के नाम पर कोई कारोबार नहीं होता है अब। कोई भी आपसी भेदभाव की या नफरत फैलाने की बात नहीं करता है। किसी के पास भी धर्म के नाम पर अरबों की संपति जमा नहीं है , सब ने सारा का सारा धन दीन दुखियों की सहायता करने पर खर्च कर दिया है। साधू सन्यासी कोई कारोबार नहीं करते हैं। हर धर्म के अनुयाई सदाचार का पालन करते हैं , धार्मिक होने का झूठा आडंबर नहीं करता कोई भी। संत बन कर कोई अधर्म और पाप नहीं करता है। धर्म के नाम पर अंधविश्वास को कोई बढ़ावा नहीं  दे रहा है। उनके पास कोई कोठी कार बंगला नहीं है केवल एक गठड़ी है जिसमें दो जोड़ी वस्त्र हैं जिसको लिये कहीं भी गुज़र कर लेते हैं , कल की चिंता नहीं करते सब कुछ त्यागने वाले। पुलिस सभ्य बन चुकी है और चरित्रवान भी , रिश्वत का नाम तक नहीं लेता कोई पुलिस वाला। जनता को पुलिस से भय नहीं लगता है , लूट मार , चोरी बलात्कार ,का कोई अपराधी बच नहीं पाता है। कोई महिलाओं को बुरी नज़र से नहीं देख सकता , औरत पर अन्याय करने वाले को समाज स्वीकार नहीं करता है। लोग भी सचाई की राह पर चलते हैं और निडर हो कर रहते हैं। कोई भी किसी को धोखा नहीं देता , कोई हेराफेरी ठगी नहीं करता किसी से। भाई भाई का दुश्मन नहीं है। मीडिया वाले भी सही राह पर आ गये हैं , झूठ को सच साबित नहीं करते , न ही खुद को सब से बड़ा ही समझते हैं। सब तरफ अमन है चैन है सुख है शांति है। फूल ही फूल हैं सब तरफ बहार का मौसम है।

                       शोध करने वालों का निष्कर्ष है कि सुनहरे सपने देखना लंबी आयु प्रदान करता है , तंदरुस्त रखता है। मुंगेरी लाल बनना बुरा नहीं है। हसीन सपने देखने में कोई बुराई नहीं है। एक बार इन सर्वेक्षण वालों की बात पर अमल कर के अवश्य देखना। खराब से खराब हालात में भी आप खुश रह सकते हैं। अब शायद यही किया जा सकता है , कितनी बार दूसरों के दिखलाये सपने देख कर छले गये। अब खुद अपने सपने से अपने को छलना सीख लें।

फ़रवरी 05, 2014

POST : 412 खेलने में भी समझदारी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    खेलने में भी समझदारी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कभी खेल खेल में बात बन जाती है और कभी बिना बात खेल बिगड़ भी जाता है। हुस्न वाले तो दिलों से भी खेला करते हैं , उनका ये शौक बहुत ही अजीब है। राजनीति तो है ही खेल सत्ता का लेकिन कई बार खेलों में भी राजनीति होने लगती है। कभी खिलाड़ी राजनेता बन जाते है , कभी राजनेता खेल खिलाने लगते हैं। बात अगर धनवानों की करें तो उनके लिये हर बात पैसे का खेल है। शादी से लेकर रिश्ते नाते दोस्ती तक सब में कारोबार होता है। अध्यापकों के लिये शिक्षा भी किसी कारोबार से कम नहीं है , जो खूब फल फूल रहा है। मगर खेलों जैसा कारोबार दूसरा कोई नहीं है। खेलने वाले खिलाड़ी तक इक खिलौना हैं , असली खेल तो टीवी चैनल वालों , और अपना सामान बेचने वालों का है जो विज्ञापन देकर अपना धंधा करते हैं। उन्हें जीत या हार से नहीं , रोमांच से मतलब होता है ताकि दर्शक देखते रहें। ये खेलते हैं खिलाते हैं और हर हाल में जीतते हैं मुनाफा कमा कर। इनके लिये क्रिकेट हाकी फुटबाल टैनिस सब बराबर हैं , किसी में कम किसी में अधिक कमाई है।

                बात अब समझ आई है , वर्ना लोग हैरान होते थे कि क्रिकेट के खेल में एक खिलाड़ी के आऊट होते ही बाकी सब भी पीछे पीछे लाईन लगा चल देते हैं। देखने वाले निराश होकर पानी की खाली बोतलें मैदान में फैंकने लगते और कमेंटेटर उनके आचरण पर अफसोस जताते। ऐसे समय उन खिलाडियों को कोई अफसोस है ये नज़र नहीं आता था। तब हम से अनाड़ी भी कहते कि इस से बेहतर तो हमी खेल सकते थे , भला शून्य से कम में हमें कोई कैसे आऊट कर सकता था। हम भी उनकी तरह शान से अपना सर उठा कर चलते , हम भी अपनी पत्नी के साथ विदेश की सैर करते शॉपिंग करते। हमें श्रीमती के ताने नहीं सुनने पड़ते कि कभी विदेश भ्रमण पर नहीं ले जा सकते। अब जाकर पता चला है कि खिलाड़ी दोषी नहीं थे अच्छा नहीं खेलने के लिये , सारा का सारा दोष उन सट्टेबाज़ों का था जिन्होंने पहले ही तय कर दिया था कि किस किस को किस किस गेंद पर कैसे आऊट होना है। माया महाठगिनी सब जानी , माया का खेल है , खेल की माया है। बहुत साल बाद मालूम हुआ कि कभी दक्षिण अफ्रीका से श्रंखला हमने ऐसे ही जीती थी। ये तरीका अगर समझ लेते तो हम कभी कोई मैच नहीं हारते। कहा जाता है इस दुनिया में सब बिकता है अगर सही खरीदार मिल जाये। आदमी का ईमान तक बिकाऊ है तो टीम क्यों नहीं हो सकती। दक्षिण अफ्रीका की टीम अगर चार करोड़ थी तो दूसरों की कुछ कम या अधिक होगी। बड़ी मज़ेदार बातें होती होंगी खिलाड़ियों के बीच। कोई कहता होगा यार हारने के बाद वहां चलोगे , दूसरा जवाब देता होगा शाम चार बजे तक मैच निपटा दें तब मज़ा आयेगा। कभी एक पूर्व खिलाड़ी पर चुटकुला बना हुआ था , पत्नी को फोन पर कहते थे कि अब ज़रा बैटिंग करने जा रहा हूं , तुम चाय बना लो तब तक घर आता हूं। मुमकिन है कोई बैटिंग को जाने से पहले आधी बची शीतल पेय की बोतल साथी को देते हुए बोले के पकड़े रखना अभी वापस आकर पीता हूं। सच पूछो तो मज़बूरी है इनके लिये खेलना , नहीं खेलें तो नाम नहीं मिलता विज्ञापन नहीं मिलते , न फिल्मों का आफर मिलता है न टीवी पर साक्षात्कार। जब ये सब मिलता है तब खेलना एक गले पड़ा ढोल होता है जिसको बजाना ही पड़ता है। हर कोई वही रोज़ रोज़ करते उकता जाता है , नेता समाज सेवा से , अफसर फाइलों से , वकील मुव्वकिल से , डॉक्टर मरीज़ से। लेकिन पैसे का मोह विवश करता है काम करने को। खिलाड़ी लोग समझते हैं सेंचरी बनाने के रनों के ही रेकॉर्ड बनाते हैं , मगर वो सोचते हैं इस साल एक होटल एक बंगला एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बना लिया है। एक शीतल पेय कंपनी का विज्ञापन है जिसमें एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी का मुखौटा पहन खेलने चला जाता है। ये सच में भी हो सकता है कभी जब मामला फिक्स हो। जीत हार तो खेल का हिस्सा हैं। अच्छा खेलने के लिये जितने मिलते हैं उससे अधिक पैसे खराब खेलने के लिये मिलते हों तो अच्छा खेलना बेवकूफी होगी। खराब खेलना भी समझदारी हो सकती है। केवल डिटरजेंट खरीदना ही समझदारी का काम नहीं है। 

फ़रवरी 04, 2014

POST : 411 गिरती हुई दीवार है , ठोकर मत लगाना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

 गिरती हुई दीवार है , ठोकर मत लगाना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

        सुना था समझदार लोग बहुत ही खतरनाक होते हैं। अपनी साहूलियत के लिए सच को झूठ साबित कर सकते हैं और झूठ को सच भी। इतिहास भरा पड़ा है , जिन पढ़े लिखे लोगों ने ग्रंथ लिखे , उन्होंने खुद को सुरक्षित रखने को हर बात के दोहरे मापदंड भी निसंकोच घोषित कर डाले। साथ में ये भी लिख डाला कि इस सब पर सवाल उठाना पाप है नास्तिकता है। हम धर्म भीरू लोग सोचना तक नहीं चाहते कि क्या जो जो हमें पढ़ाया और समझाया जाता है जा रहा है वो सही भी है या नहीं। आज का बुद्धिजीवी समाज भी वही सब दोहरा रहा है। ये सब शायद मुझे ध्यान नहीं आता अगर मैं आज की एक नई नई चली राजनीति की बातों को गौर से नहीं देखता। अभी तक देखते रहे हैं कि जो नेता चुनाव में सत्ता धारी लोगों की कमियां बता कर सत्ता पाते थे उनको लगता था कि अब हमें वो सब नहीं दोहराना है बल्कि अपना ध्यान जनता की समस्याएं दूर करने और अपनी नीतियां लागू करने पर देना चाहिये। जो लोग बदले की भावना से राजनीति करते रहे हैं वो कभी सफल नहीं हुए। दिल्ली में जब से आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है तब से उनका पूरा ध्यान ही नकारात्मक कार्यों पर ही रहता है। नई बात इस सरकार के दो ऐसे नये कदम हैं जिनको उसके नेता बड़े ही गर्व से महान घोषित कर रहे हैं। पहला काम पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का अवैध कालोनियों को अस्थाई प्रमाणपत्र देना। यहां एक बात को जान लेना ज़रूरी है कि चुनाव में प्रलोभन देना भले अनुचित हो फिर भी सरकार को काम बंद करने को नहीं कहा जा सकता है। महीनों तक सरकार और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती। हां अगर कोई सत्ता का दुरूपयोग करके चुनाव जीतता है तो आप अदालत जा सकते हैं। शायद यहां ये याद करना भी ज़रूरी है कि देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक इसके लिए कटघरे में खड़ी हो चुकी है किसी समय। आम आदमी पार्टी के नेताओं से पूछा जाना चाहिये कि जिन अवैध कालोनियों को अस्थाई प्रमाणपत्र दिये गये क्या उनका अस्तित्व नहीं था , अगर वे वहां थी और ये प्रमाणपत्र उनको इसलिये दिया गया ताकि कल उनके होने पर ही कोई सवाल नहीं खड़ा करे। कोई उस जगह को अधिकृत नहीं कर सके , गरीबों का घर छीना न जा सके। अब चाहे तब सरकार ने ऐसा लोगों को खुश कर वोट पाने को ही किया हो तब भी ये जन विरोधी काम तो कदापि नहीं था। और क्या आप उन अवैध कालोनियों का अस्तित्व नकार सकते हैं। सच तो ये है कि ये खुद जानते हैं कि जो वो करने जा रहे हैं वो फज़ूल की अदालती जंग है जिसका हासिल कुछ भी नहीं होना। बस ये कर आम आदमी पार्टी दिखाना चाहती है कि वो पिछली सरकार के गलत कामों का हिसाब कर रही है , जबकि जहां खुद उसने भ्रष्टाचार की जाँच करनी है उससे बच रही है। क्योंकि जिसकी बैसाखी थाम कर आप चल रहे हो उसको ठोकर लगायेंगे तो उससे पहले खुद गिर जायेंगे। और वास्तव में यही तो कर रहे है ये तथाकथित आम आदमी पार्टी के लोग , नैतिक तौर पर ये रसातल में जाते जा रहे हैं। दूसरी बात जो वो कर रहे हैं वो है दिल्ली में लोकपाल कानून विधानसभा में लाने की। आम आदमी पार्टी न किसी नियम को मानती है न प्रक्रिया का ही पालन करती है , बार बार मनमानी कर कोई सत्ता धारी सरकार खुद अराजकता को बड़ा रही है। लेकिन इतना तो उनको भी मालूम है कि संविधानिक प्रक्रिया का पालन किये बिना अगर वे कोई विधेयक पारित भी करते हैं और कोई उसको अदालत में चुनौती नहीं भी देता और वो लागू भी हो जाता है तब भी अगर किसी पर भी ऐसा लोकपाल करवाई करेगा तब पहला सवाल उसके खुद के औचित्य पर खड़ा होगा। अवैध कालोनियों की तरह का एक प्रमाणपत्र आपके लोकपाल को हासिल हो सकता है। सच तो ये है कि ये सचाई भी जानते हैं आम आदमी पार्टी वाले , मगर ये सोचते हैं कि इस सब की नौबत आने से पहले उनको लोकसभा चुनाव में इन कदमों का लाभ मिल चुका होगा। दूसरे शब्दों में जिस बात का दोषी पूर्व मुख्यमंत्री को मानते है वही बात खुद भी कर रहे हैं। इन आम आदमी के पैरोकारों से कोई तो पूछेगा कि आपको अब खास लोग क्यों प्रिय लगने लगे हैं , जाने माने लोग , कल तक के सरकारी अधिकारी क्या यही आम आदमी की पहचान बनेंगे कल। कोई अपने वजूद को ऐसे ही मिटाता हो तो किसी अन्य को ज़रूरत ही क्यों होगी कुछ भी करने की। गिरती हुई दीवार की तरह है , इसको कोई ठोकर न लगाना।

फ़रवरी 02, 2014

POST : 410 सबक ईमानदारी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       सबक ईमानदारी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने को खुद अमल करके नहीं दिखाना होता। स्कूलों में तो ऐसा भी होता है कि अध्यापक वो विषय भी पढ़ा रहे होते हैं जिसके बारे वे कुछ भी नहीं जानते। अध्यापकों को इसमें कोई परेशानी नहीं होती , कम ही होता है कि कोई छात्र समझ सके कि जो पढ़ाया जा रहा है वो सही है अथवा गलत। आजकल राजनीति में भी धर्म की तरह उपदेशक नज़र आने लगे हैं , सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं। कोई नहीं पूछता आपने कब पढ़ा है , आप खुद हर बात पर मुकर जाते हैं। उनका झूठ झूठ नहीं होता उनके पास तर्क होते हैं , कोई नहीं मानता अगर तो कुतर्क भी देने में रत्ती भर संकोच नहीं किया जाता। उनके अनुसार उन्हें छोड़ सब के सब भ्रष्ट हैं , उन्हें कोई कारण नहीं बताना होता , जब कह दिया तो मानना ही पड़ेगा आपको। अपने सर पर ईमानदारी का ताज और सीने पर तमगा लगाये घूमते हैं रात दिन। शायद आपको यकीन नहीं आये कि मैंने सरकारी असप्ताल में डेंटिस्ट को इमरजेंसी में ड्यूटी करते देखा है , कारण ये नहीं कि डॉक्टर नहीं होता , बल्कि इसलिये कि उसने खुद कमाई करने को सिफारिश से ये करवाया था।

           सरकार का हर मंत्री भाषण देता है जनता को कायदे कानून का पालन करने के , लेकिन खुद पर कभी कोई नियम लागू नहीं करते। सरकार जो भी करती है उसी में जनता की भलाई है , ये सबक जनता क्यों भूल जाती है। सरकार टैक्स लगाये , दाम बढ़ाये तो समझना चाहिये कि ऐसा करना ज़रूरी होता है। चुपचाप मान जाना चाहिये , विरोध नहीं करना चाहिये। मान लेना चाहिये कि जब हमने ही चुना है तो अपनी गल्ती की सज़ा भी कबूल करनी ही होगी। सरकार आपको किफायत करने का पाठ पढ़ाने के साथ साथ खुद जनता का धन बर्बाद कर सकती है। जनता को रोटी पानी नहीं मिले पैसे की कमी के कारण तो कोई बात नहीं , सरकार की हर दिन की मीटिंग में सजावट पर , जलपान पर पैसा पानी की तरह बहाया जाना अनुचित नहीं होता। जनता को बताया जाता है रोज़ इतने रुपये कमाते हो तो गरीब नहीं हो , खुद उतने में रहने की बात भला सरकार कैसे सोच सकती है। जनता जनता है सरकार सरकार है। सरकार बनते ही हर दल को चंदा जमा करना ज़रूरी लगता है आने वाले कई सालों तक का चुनाव खर्च का प्रबंध करने के लिये। और ऐसा होते देर नहीं लगती , पर जब जनता की सुविधाओं के खर्च का सवाल आता है तब वे नहीं जानते कि धन आये तो कहां से आये।

                     सरकार चाहती है कि पुलिस और प्रशासन उसकी मर्ज़ी से काम करे न कि उचित अनुचित को देख कर निर्णय ले। जो किसी सत्ताधारी नेता की राह में अड़चन डाले उसको पद से हटाना सरकार का अधिकार है चाहे नियम ऐसा करने की इजाज़त देता हो चाहे न देता हो। जनता ने इनको जनसेवा के लिये थोड़ा वोट डाला था , इनसे संविधान और न्यायपालिका का सम्मान करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। ये सब तो बने ही नेताओं द्वारा खिलवाड़ करने के लिये हैं। पहले एक दल के नेता कर रहे थे अब दूसरे दल के , बस यही बदलाव बहुत है। हम लोग अब तक किसी पुराने युग में जी रहे हैं जो सत्ता के दुरूपयोग को कुर्सी के मोह को , शासन के अंधे अहंकार को एक रोग मानते हैं। नेता लोग ईमानदारी को सब से बड़ा रोग समझते हैं , वे खुद को इससे जितना भी मुमकिन हो दूर ही रखते हैं। जनता को ईमानदारी की राह पर चलने का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि खुद सरकार जो चाहे कर सके। अर्थशास्त्र का सूत्र है एक देगा तभी दूसरे को मिलेगा , ये तभी तक सब कुछ कर सकते जब तक लोग इनके बराबर नहीं बन सकते। जनता को जनता का धन भी खैरात की तरह देने का नाम है लोकतंत्र में सरकार चलाना। लोगों का , इनको छोड़ बाकी सब का ईमानदार बनना आवश्यक है , इनके शासन करने के लिये। जैसे साधू लोग अपने अनुयायिओं को त्याग का उपदेश देते हैं , लेकिन चाहते हैं उनका चढ़ावा बढ़ता ही रहे। ये दोनों बातें एक दूसरे की पूरक हैं , इसको विरोधाभास नहीं समझना चाहिये। बस इतनी सी बात है।

POST : 409 नौ सौ चूहे खाकर बिळी हज को चली ( तरकश ) डा लोक सेतिया

  नौ सौ चूहे खाकर बिळी हज को चली ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       आज अपने प्रिय अख़बार में एक साक्षात्कार पढ़ा किसी दल के नेता का। सोचा इनकी बात पढ़कर जाने कितने लोग इनके समर्थक बन जाएंगे बिना जाने कि इनकी कथनी और करनी में कितना भेद है। चलो बात शुरू करता हूं अन्ना जी के अंदोलन से। मोबाईल पर संदेश मिला पत्रकार मित्र का शामिल होने के लिये लाल बत्ती चौक पर आने का। भ्रष्टाचार का विरोध करते उम्र बीती है तो चला गया था। वहां जो देखा हैरान करने वाला था। कोई बेहद असभ्य भाषा का उपयोग कर रहा था किसी महिला नेता के बारे में उसकी निजि ज़िंदगी को लेकर। मुझे लगा यहां बैठना उचित नहीं। उठ कर जाने लगा तो एक व्यक्ति ने रुकने और कुछ बोलने को कहा , मैंने निवेदन किया कि शायद जो मुझे लगा और कहना चाहता हूं वो आपको पसंद नहीं आये। वो जानते थे मैं निडर हो अपनी बात कहता हूं। जब उन्होंने कहा कि आप ज़रूर बोलें , शहर के जाने माने साहित्यकार हैं , तब बोलना ही पड़ा और मैंने पूछा वहाँ बैठे लोगों से कि अभी जो सज्जन बोल रहे थे क्या वो उचित था। तब सब बोले कि नहीं वो गलत था , मैंने पूछा तब आपने एतराज़ क्यों नहीं किया। खैर मैं अपनी बात कह कर चला आया था , दुःख हुआ कि गांधी जी की तस्वीर लगा कर क्या क्या हो रहा है। जो बात वहां नहीं कह सका तब वो और भी ज़रूरी है , जो लोग मंच पर विराजमान थे वे वही थे जो खुद रिश्वतखोर थे और अधिकारियों के दलाल थे। समझ गया कि जैसे जे पी के अंदोलन में शामिल लोग बाद में सत्ता पाकर अपना घर भरते रहे और समाजवाद की नई परिभाषा घड़ते रहे अपने परिवार को भी राज परिवार बनाने का काम करते रहे , शायद वही फिर दोहराया जा सकता है। वास्तव में कुछ लोग नाम शोहरत और राजनीति में प्रवेश के लिये अवसर तलाशते रहते हैं , उनको किसी मकसद से किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं होता है। देश भर में अन्ना की लहर थी जिसे मैं भी देख रहा था , पर सोचता था काश इस बार कुछ अच्छा हो। उसके बाद की बात सभी जानते हैं , वो सब पीछे रह गया है और इक नया दल सत्ता में आया एक राज्य में और अब उसको पूरे देश में दोहराना चाहता है। क्या सत्ता पाना मात्र ही सब का मकसद होना चाहिए या सत्ता पाकर उसको बदलना चाहिए जिस से तंग आकर जनता ने आपको चुना है। एक दौड़ शुरू हो गई सदस्य बनाने की , क्या जानते हैं जो आपके सदस्य बन रहे उनका ध्येय क्या है , अभी तक कहां थे क्या कर रहे थे। आपके दल के महत्वपूर्ण सदस्य ऐसे हैं जो सरकारी नौकरी करते थे , वेतन लेते थे लेकिन कभी काम नहीं करते थे , अपना कोई कारोबार चलाते थे। आज ये सब ईमानदार हो गये , दूध के धुले और आप सूचि जारी करते हैं बाकी दलों में भ्रष्ट लोगों की। विडंबना यही है कि सब को दूसरों के चेहरे के दाग़ नज़र आते हैं , अपने आप को कोई नहीं देखता आईने में। एक बात और बताना चाहता हूं , मेरे घर के पास एक दुकानदार कुछ दिन पहले इनकी टोपी पहन कर बैठता था , औरों को सदस्य बनाने का काम करता था। जब देखा उसको बिना टोपी के और पूछा तो उसने बताया कि इनकी वास्विकता समझ चुका है और अब किसी दल से कोई मतलब नहीं है उसका। मालूम नहीं इनकी जो संख्या है दस रुपये में सदस्य बने लोगों की उनमें कितने अपना मन बदल चुके हैं और कितने इनके आचरण को देख बदल सकते हैं। आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते हैं , सब को हमेशा के लिये नहीं , ये सब जानते हैं। और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है , भीतर क्या है बाहर क्या है ये सब को पहचानती है।

जनवरी 31, 2014

POST : 408 नाखुदा खुद को बताने वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      नाखुदा खुद को बताने वाले  ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       एक जाने माने शायर का शेर याद आ रहा है। कौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ , रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। नेता चाहे किसी भी दल का हो होता नेता ही है , सब का मकसद वही है हर मुद्दे को उपयोग करना अपने सत्ता पाने के लिये। हर बात में वोटों का गणित ही इनकी प्राथमिकता होता है , किसी की भावना से इनमें से किसी को भी कोई सरोकार नहीं होता है। किसी ने एक बयान क्या दिया बाक़ी लोगों को भी अवसर मिल गया अपनी अपनी राजनीति करने का। सब फिर से चले आये दंगों के ज़ख्मों को फिर से कुरेदने , ये क्या दवा लगायेंगे , इनको मालूम ही नहीं किसी का दर्द क्या होता है। इनकी संवेदना झूठी है , दिखावे की है , चार दिन की है। बस वोट पाने तक , उसके बाद सब भूल जायेंगे। कितनी बार कितने लोगों ने यही किया है इंसाफ दिलाने का वादा , मगर कभी नहीं मिला इंसाफ किसी को। किस किस की बात की जाये , क्यों सब के ज़ख्मों को फिर से हरा करने का काम करें। और शिकायत भी जाकर करें तो किस से , पता नहीं इनमें ही कौन कौन कब कब ऐसा ही करता रहा है। मुझे अपनी ही इक ग़ज़ल का एक शेर याद आता है। "तूं कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले"। ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है। 
 
                  "हमको ले डूबे ज़माने वाले , नाखुदा खुद को बताने वाले"। 

                                            जब बात हो रही थी दिल्ली और गुजरात और उत्तरप्रदेश महाराष्ट्र के दंगों की , तब याद आया हर शहर में चली थी तब वही गर्म हवा। हमारे शहर में भी थे कुछ सभ्य कहलाये जाने वाले लोग जो बहती गंगा में हाथ धो रहे थे। तब उस दल में शामिल थे जो दंगे करवा रहा था और आज इस दल में शामिल हैं जो तब के अपराधियों को सज़ा दिलाने की बात कर रहा है। यहां फिर किसी शायर का शेर याद आ रहा है। "मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है , क्या मेरे हक में फैसला देगा"। ये जो लोग आज आंसू बहा रहे हैं क्या कल तक नहीं जानते थे कि जिनके साथ उनका हर दिन का मेल जोल है , मधुर संबंध हैं वो वही हैं जो दंगइयों की भीड़ को लेकर चले थे किसी को सबक सिखाने। दो दिन बाद जब यही भरी सभा में भाईचारे की बात करेंगे तब मुझे फिर अपना इक शेर याद आयेगा। "भाईचारे का मिला ईनाम उनको , बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे। बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे , जो दयानतदार थे वो डर रहे थे"।

                  यादों की खिड़की फिर खुल गई है। कुछ साल पहले की बात है इश्तिहार पढ़ा कि कुछ लोग जय प्रकाश नारायण जी की संपूर्ण क्रांति पर चर्चा करेंगे। सब को बुलाया गया था , मैं भी कभी रहा था शामिल उस अंदोलन में इसलिये वहां जाना ज़रूरी लगा था। मगर वहां जो देखा उसकी कल्पना नहीं की थी , जश्न का सा माहौल था , अच्छा खाने पीने का प्रबंध , सब हाथ मिला रहे थे , गप शप कर रहे थे। सभा शुरू हुई , दो लोग मंच पर बैठे थे , एक महिला गीत सुना रही थी पुरानी फिल्मों के मनोरंजन के लिये। फिर बात होने लगी थी कई प्रकार की समितियां बनाने की , चंदा जमा करने की। जिस बात का शोर था इश्तिहार में उस विषय पर किसी ने एक भी शब्द नहीं बोला था। मुझसे नहीं रहा गया , मैं खड़ा हुआ इक पर्ची पर लिखा मुझे सवाल करना है और जाकर पकड़ा आया उनको जो मंच पर विराजमान थे। वो तब मुझे नहीं जानते थे और उन्होंने वो पर्ची दे दी उनको जो संचालन कर रहे थे सभा का। मुझे कहा गया सभा के बाद रुक कर मिल सकता हूं अगर उन नेता जी से मिलना चाहता हूं। मैंने तब अपनी जगह खड़े होकर यही पूछा था कि आपने जिस विषय पर चर्चा का इश्तिहार बांटा था , उस पर तो कोई बात ही नहीं हुई। तब इस आयोजन का क्या मतलब रह जाता है। ये सुन कर वो मुख्य अतिथि भी हैरान हो कर बोले कि उनको भी इस बात का पता नहीं था , वो तो यहां आये हैं अपने दल की शाखायें बनाने , सदस्य बनाने और समितियों का गठन करने।

                        बार बार यही होता है , लोग किसी विषय को उपयोग कर अपना राजनीतिक मकसद हल करते हैं और मतलब पूरा होने के उसपर फिर कोई बात ही नहीं करते। अपने साथ भीड़ जमा करने के लिये , वोट बटोरने के लिये , नेता बन जनता की भावनाओं को उपयोग किया जाता है।

जनवरी 26, 2014

POST : 407 दर्शन दो लोकतंत्र ( तरकश ) डा लोक सेतिया

         दर्शन दो लोकतंत्र ( तरकश ) डा लोक सेतिया

            यही मंत्र है जिसका जाप सभी करते हैं। कोंग्रेस भा ज पा वामपंथी समाजवादी जनता दल वाले सालों से करते आये हैं और आप वाले भी जपने लगे हैं। किस किस की गिनती की जाये , राष्ट्रीय क्षेत्रीय बहुत हैं। हर राजनैतिक दल के अखिल भारतीय प्रधान से आम कार्यकर्त्ता तक सुबह शाम सोते जागते यही मंत्र जपते हैं। ज्ञानीजन समझाते हैं कि लोकतंत्र मंत्र जपने से राजसुख की प्राप्ति होती है। जिसे ये मंत्र सिद्ध करना आ गया वो विधायक सांसद मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री कुछ भी बन सकता है। जैसे क्रिकेट के खिलाड़ी क्रिकेट को खाते हैं पीते हैं ओढ़ते हैं , ऐसे दावे किया करते हैं विज्ञापनों में , कुछ उसी तरह नेता लोग भी सच में करते हैं। लोकतंत्र को खाते हैं , लोकतंत्र को पी जाते हैं , लोकतंत्र को सेज बना कर उस पर सो जाते हैं लोकतंत्र को ओढ़कर। कभी कभी लगता है कि सारा का सारा लोकतंत्र इन नेताओं के हिस्से में आ गया जिसको जाने ये खा गये या पी गये या उसको किसी जगह सुला दिया है गहरी नींद में। देश की जनता भटक रही है सच्चे लोकतंत्र की खोज में आज़ादी के बाद से आजतक। दिखाई ही नहीं दे रहा लोकतंत्र। कांग्रेस में भा ज पा में क्षेत्रीय दलों में वामपंथी दलों में नहीं मिला तो इक नये दल में ढूंढना चाहा मगर उसमें भी नहीं नज़र आया। बार बार कोई वादा करता है लोकतंत्र का मगर सत्ता मिलते ही मनमानी करने लगता है। हर नेता खुद को लोकतंत्र का रखवाला बताता है और हर नेता लोकतंत्र से खिलवाड़ करता है शासक बनते ही। अब तो लगता है लोकतंत्र भी हमारे लिये मृगतृष्णा के समान है। अपने दल में लोकतंत्र न होने की बात पर कुछ लोग दल को छोड़ कर अपना खुद का एक दल बना लेते हैं। ऐसा भी मुमकिन है कि अपने दल के वही अकेले सदस्य ही हों। ये एक सुविधाजनक दशा है असहमति की कोई गुंजाईश ही नहीं रहती। यकीन मानें ऐसे लोग मंत्री तक बनते रहे हैं। इस देश में कोई चालीस सदस्यों का दल सरकार बना सकता है और एक सौ चालीस सदस्यों वाला उसको बाहर से समर्थन दे सकता है। वैसे भी शासन करने के लिये सरकार में शामिल होना ज़रूरी नहीं होता है। ये प्रयोग भी सफलता पूर्वक किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री कोई था और सरकार कोई और ही चलाता रहा। हर दल वाले को अपने दल में लोकतंत्र की चिंता नहीं होती लेकिन बाकी दलों में लोकतंत्र नहीं है ये चिंता सताती है। कांग्रेस को लगता है भाजपा हिंदुत्व की समर्थक ताकतों के ईशारे पर चलती है , भाजपा को लगता है कांग्रेस परिवारवाद की राह पर चलती है। बाकी दल भी दूसरे सब दलों पर आरोप लगाते हैं कि वो लोकतंत्रिक नहीं। किसी का लोकतंत्र बिहार चला जाता है किसी का उत्तरप्रदेश , हरियाणा वालों को शिकायत है दिल्ली ने उनके लोकतंत्र को हमेशा बंधक बना कर रखा है। दिल्ली कहती है कि वो इधर कभी आया ही नहीं , शायद छुट्टी मनाने हिमाचल चला गया होगा। लोग कश्मीर से पंजाब तक तलाश कर आये , पश्चिम बंगाल से गुजरात तक खोज लिया , नहीं मिला कहीं भी लोकतंत्र। हर प्रदेश के लोकतंत्र का अलग सवभाव है लोग बताते हैं। महाराष्ट्र में सुना है शिवसेना के यहां कभी तो कभी एन सी पी के यहां लोकतंत्र दुहाई दे रहा होता है। कमाल की बात है कि पूरे देश में लोकतंत्र के होने का शोर है , लेकिन जो देखना चाहते हैं अपनी नज़रों से उनको कहीं भी दिखाई नहीं देता। जैसे भगवान है सब जगह ये आस्था है विश्वास है हमें लेकिन हम उसको देख नहीं पाते कभी। लेकिन अब लोग शंका करने लगे हैं कि अगर भगवान है तो धरती पर पाप और पापी क्यों बढ़ रहे हैं। ग्रंथ बताते हैं कि जब अन्याय और अत्याचार सीमा पार कर जाते हैं तब भगवान प्रकट होते हैं। शायद लोकतंत्र भी ऐसा ही करता हो , जब घोटाले , गुंडाराज और सत्ता का अहंकार हर सीमा को लांग जाये तब लोकतंत्र भी प्रकट हो जाये , क्या अभी कुछ कसर बाकी है इनमें। जैसे धर्म स्थलों पर भगवान पण्डे पुजारियों की मर्ज़ी पर भक्तों को दर्शन देते हैं , वो जब चाहें कपाट बंद कर सकते हैं , भगवान के नाम का सारा चढ़ावा चट कर जाते हैं। उसी तरह लोकतंत्र के मंदिर कहलाने वाले स्थलों पर उन लोगों ने कब्ज़ा कर लिया है जो लोकतंत्र को कत्ल कर खुद उसपर माला डाल उसके पुजारी बन बैठे हैं। हे लोकतंत्र इस देश को विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। सब गुणगान करते हैं तुम्हारी महिमा का , कहते हैं तुम सब के दुःख दूर कर सकते हो। हम करोड़ों देशवासी कब से तेरे नाम की माला जप रहे हैं , हर बार वोट डालते हैं तुझे पाने की उम्मीद लगाये। हर बार धोका खा जाते हैं हम और कुछ नये नेता तेरा अपहरण कर सत्ता सुख का मोक्ष पा शासक बन लोकतंत्र का उपहास करते हैं। कब इस जनता की पुकार सुनाई देगी तुम्हें , कब दर्शन दोगे लोकतंत्र। 

जनवरी 20, 2014

POST : 406 अब तो सारा जहां हमारा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 अब तो सारा जहां हमारा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

अब तो सारा जहां हमारा है 
आपने  हमसफ़र पुकारा है । 
 
तुम ही पतवार तुम ही हो माझी     
हो जहां तुम वही किनारा है । 
 
कौन आवाज़ दे रहा मुझ को    
आ भी जाओ नहीं गुज़ारा है । 
 
रोक सकते नहीं मुहब्बत को  
इक नदी तेज़ जिसकी धारा है । 
 
अब नहीं ज़िंदगी अधूरी जब 
आपके प्यार का सहारा है । 
 
हर तरफ आप हैं जिधर देखें 
खूबसूरत ,  बहुत नज़ारा है ।   
 
दूर थे पास पास अब ' तनहा '
प्यार का जब मिला इशारा है । 




 

 

जनवरी 16, 2014

POST : 405 सवाल विशेषाधिकार का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

   सवाल विशेषाधिकार का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      यमराज जब पत्रकार की आत्मा को ले जाने लगे तब पत्रकार की आत्मा ने यमराज से कहा कि मैं बाकी सभी कुछ यहां पर छोड़ कर आपके साथ यमलोक में चलने को तैयार हूं , आप मुझे एक ज़रूरी चीज़ ले लेने दो। यमराज ने जानना चाहा कि वो कौन सी वस्तु है जिसका मोह मृत्यु के बाद भी आपसे छूट नहीं रहा है। पत्रकार की आत्मा बोली कि मेरे मृत शारीर पर जो वस्त्र हैं उसकी जेब में मेरा पहचान पत्र है उसको लिये बिना मैं कभी कहीं नहीं जाता। यमराज बोले अब वो किस काम का है छोड़ दो ये झूठा मोह उसके साथ भी। पत्रकार की आत्मा बोली यमराज जी आपको मालूम नहीं वो कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है , जिस किसी दफ्तर में जाओ तुरंत काम हो जाता है , अधिकारी सम्मान से बिठा कर चाय काफी पिलाता है , अपने वाहन पर प्रैस शब्द लिखवा लो तो कोई पुलिस वाला रोकता नहीं। पत्रकार होने का सबूत पास हो तो आप शान से जी सकते हैं। यमराज ने समझाया कि अब आपको जिस दुनिया में ले जाना है मुझे , उस दुनिया में ऐसी किसी वस्तु का कोई महत्व नहीं है। पत्रकार की आत्मा ये बात मानने को कदापि तैयार नहीं कि कोई जगह ऐसी भी हो सकती है जहां पत्रकार होने का कोई महत्व ही नहीं हो। इसलिये पत्रकार की आत्मा ने तय कर लिया है कि यमराज उसको जिस दुनिया में भी ले जाये वो अपनी अहमियत साबित करके ही रहेगी।

                       धर्मराज की कचहरी पहुंचने पर जब चित्रगुप्त पत्रकार के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब देख कर बताने लगे तब उसकी आत्मा बोली मुझे आपके हिसाब किताब में गड़बड़ लगती है। आपने मुझसे तो पूछा ही नहीं कि आप सभी पर मेरी कोई देनदारी भी है या नहीं और अपना खुद का बही खाता खोल कर सब बताने लगे। आपको मेरी उन सभी सेवाओं का पारिश्रमिक मुझे देना है जो सब देवी देवताओं को मैंने दी थी। आपको नहीं जानकारी तो मुझे मिलवा दें उन सब से जिनके मंदिरों का मैं प्रचार करता रहा हूं। कितने देवी देवता तो ऐसे हैं जिनको पहले कोई जानता तक नहीं था , हम मीडिया वालों ने उनको इतना चर्चित कर दिया कि उनके लाखों भक्त बन गये और करोड़ों का चढ़ावा आने लगा। हमारा नियम तो प्रचार और विज्ञापन अग्रिम धनराशि लेकर करने का है , मगर आप देवी देवताओं पर भरोसा था कि जब भी मांगा मिल जायेगा , इसलिये करते रहे। अब अधिक नहीं तो चढ़ावे का दस प्रतिशत तो हमें मिलना ही चाहिये। धर्मराज ने समझाया कि वो केवल अच्छे बुरे कर्मों का ही हिसाब रखते हैं , और किसी भी कर्म को पैसे से तोलकर नहीं लिखते कि क्या बैलेंस बचता है। हमारी न्याय व्यवस्था में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अच्छे कर्म का ईनाम सौ रुपये है और किसी बुरे का पचास रुपये जुर्माना है। और जुर्माना काटकर बाक़ी पचास नकद किसी को दे दें। पत्रकार की आत्मा कहने लगी , ऐसा लगता है यहां लोकतंत्र कायम करने और उसकी सुरक्षा के लिये मीडिया रूपी चौथे सतंभ की स्थापना की बहुत ज़रूरत है। मैं चाहता हूं आपके प्रशासनिक तौर तरीके बदलने के लिये यहां पर पत्रकारिता का कार्य शुरू करना , मुझे सब बुनियादी सुविधायें उपलब्ध करवाने का प्रबंध करें। धर्मराज बोले कि उनके पास न तो इस प्रकार की कोई सुविधा है न ही उनका अधिकार अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का। मुझे तो सब को उनके कर्मों के अनुसार फल देना है केवल।

                        पत्रकार की आत्मा कहने लगी हम पत्रकार हमेशा सर्वोच्च अधिकारी से ही बात करते हैं। आपके ऊपर कौन कौन है और सब से बड़ा अधिकारी कहां है , मुझे सीधा उसी से बात करनी होगी। ऐसा लगने लगा है जैसे पत्रकार की आत्मा धर्मराज को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। जैसे धर्मराज यहां पत्रकार के कर्मों का लेखा जोखा नहीं देख रहे , बल्कि धर्मराज की जांच पड़ताल करने को पत्रकार की आत्मा पधारी है यहां। आज पहली बार धर्मराज ये सोचकर घबरा रहे हैं कि कहीं इंसाफ करने में उनसे कोई चूक न हो जाये। पत्रकार की आत्मा धर्मराज के हाव भाव देख कर समझ गई कि अब वो मेरी बातों के प्रभाव में आ गये हैं , इसलिये अवसर का लाभ उठाने के लिये वो धर्मराज से बोली , आपको मेरे कर्मों का हिसाब करने में किसी तरह की जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है। जब चाहें फैसला कर सकते हैं , लेकिन जब तक आप किसी सही निर्णय पर नहीं पहुंच जाते , तब तक मुझे अपनी इस दुनिया को दिखलाने की व्यवस्था करवा दें। मैं चाहता हूं यहां के देवी देवता ही नहीं स्वर्ग और नर्क के वासियों से मिलकर पूरी जानकारी एकत्रित कर लूं। पृथ्वी लोक पर भी हम पत्रकार पुलिस प्रशासन , सरकार जनता , सब के बीच तालमेल बनाने और आपसी विश्वास स्थापित करने का कार्य करते हैं। कुछ वही यहां भी मुमकिन है।

                          काफी गंभीरता से चिंतन मनन करने के बाद धर्मराज जी इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि अगर इस आत्मा से पत्रकारिता के भूत को नहीं उतारा गया तो ये यहां की पूरी व्यवस्था को ही छिन्न भिन्न कर सकती है। इस लोक में पत्रकारिता करके नया भूचाल प्रतिदिन खड़ा करती रहेगी। तमाम देवी देवताओं को प्रचार और उनके साक्षात्कार छापने - दिखाने का प्रलोभन दे कर प्रभावित करने का प्रयास कर सकती है। पृथ्वी लोक की तरह यहां भी खुद को हर नियम कायदे से ऊपर समझ सकती है। पहले कुछ नेताओं अफ्सरों की लाल बत्ती वाली वाहन की मांग भी जैसे उन्होंने स्वीकार नहीं की थी उसी तरह पत्रकारिता के परिचय पत्र की मांग को भी ठुकराना ही होगा। धर्मराज जी ने तुरंत निर्णय सुना दिया है कि जब भी अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किया जायेगा तब इसका कोई महत्व नहीं होगा कि किस की आत्मा है। नेता हो अफ्सर हो चाहे कोई पत्रकार , यहां किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं होगा।

जनवरी 15, 2014

POST : 404 नेता पति हैं , पत्नी है जनता ( तरकश ) डा लोक सेतिया

  नेता पति हैं , पत्नी है जनता ( तरकश ) डा लोक सेतिया

ये सबक पढ़ाना बहुत ज़रूरी है। तुम औरत हो जनता हो , मैं पुरुष हूं राजनेता हूं। तुमने विवाह किया है , अब तुम पति के बराबर नहीं हो सकती हो , पति तुम्हारा भगवान है , वो देवता है तुम्हारा और तुम उसकी दासी हो पुजारन हो। जनता तुमने हमें सांसद चुना है , विधायक चुना है , ये करके तुमने अपने आप को हमें समर्पित कर दिया है। अब हम शासक हैं और हमने तुम पर शासन करना है। यही लोकतंत्र है। मगर तुम्हें हमेशा मर्यादा में रह कर ही बात करनी है। तुम घर की मालकिन हो मैं जब ऐसा कहूं तो तुम खुश भले होना मगर ये मत भूलना कि तुम्हें ये अधिकार तब तक ही हासिल रहेगा जब तक मेरी इच्छा हो। अब तुमने पत्नी धर्म निभाना है और मैं तुमको जिस हाल में भी रखूं , उसी में खुश रहना है। मेरी लंबी उम्र की कामना करना कर्तव्य है तुम्हारा ,मेरे लिये व्रत रखना और मुझे खिला कर बाकी बचा हुआ खाना ही सदा से भाग्य रहा है तुम्हारा। जनता रूपी पत्नी को बोलने का कोई अधिकार नहीं होता , जो उसके चुने प्रतिनिधि कहें वही उसकी आवाज़ है। हर पत्नी का धर्म है पति की आज्ञा का पालन करना , पति का विरोध घोर अपराध है। जनता को सांसदों और विधायकों का भूल कर भी विरोध नहीं करना चाहिये। पति का विरोध कर के कोई पत्नी घर में क्या रह सकती है। बेघर होकर दर दर की ठोकरें खाती है उम्र भर , नेताओं का विरोध करना भी लोकतंत्र का विरोध माना जायेगा। पति बिन पत्नी का कल्याण नहीं हो सकता न ही नेताओं के बिना लोकतंत्र का भला हो सकता है।
 
                हम नेता इतने भी तानाशाह नहीं हैं कि जनता को कुछ बोलने का हक ही नहीं दें। जनता नेताओं को भ्रष्ट कहे मगर उसी तरह जैसे पत्नी अपने पति को जुआरी और शराबी कहती है। मगर न किसी पत्नी को शराब बंदी लागू करने का अधिकार मिल सकता है न ही जनता को भ्रष्टाचार को रोकने का कोई उपाय करने का ही हक दिया जा सकता है। जब कोई पत्नी पति को शराब पीने से रोकती है तब उसको मारने पीटने पर विवश हो जाता है पति भी। ये दमन नहीं न ही अत्याचार ही है , ये पति का अपने विशेषाधिकार कायम रखना है। जब जनता सरकार को चुनौती देती है तब विरोध करने वालों पर लाठियां भांजना , गोली चलाना सरकार की मज़बूरी हो जाती है। सत्ता को चुनौती मत दो , अपने पति को विवश मत करो ताकत का उपयोग करने के लिये। अपनी भड़ास निकालनी है तो गली मोहल्ले में , आस पड़ोस में यूं ही कभी चर्चा करती रहो , मगर जब कोई उकसाये कुछ भी करने को तब ये भी बताती रहो कि भले जैसा भी हैं मेरा पति मेरा देवता है। वोट डालने और वरमाला पहनाने के बाद फिर कुछ नहीं हो सकता , जिसको चुना उसकी जय बोलनी ही होगी। जनता जैसे लोगों को चुनती है उसको वैसी ही सरकार मिलती है , जो बीजा था वही मिलना ही था। हर औरत को अपना नारी धर्म और जनता को लोकतंत्र की मर्यादा हमेशा याद रखनी चाहिये। जब भूल जाते हैं तब वही होता है जो आजकल हर तरफ हो रहा है। नेताओं की जय में जनता का और पति सेवा में पत्नी का वास्तविक सुख है। इतिहास गवाह है इस बात का।

                                राम को जब बनवास मिलता है तब सीता जी को पत्नी धर्म निभाना पढ़ता है पति के सुख़ दुख़ में उसका साथ निभा कर हर दशा में। लेकिन जब राम जी की बारी आती है तब उनकी मर्यादा राज्य का शासक होने का फ़र्ज़ निभाना ही याद रखती है और ये भूल जाती है कि उनको भी अपनी पत्नी का साथ हर सुख़ में हर दुख़ में निभाना भी उतना ही महत्व रखता है। राम राजा हैं , शासक हैं उनको राज करना है इसलिये वे अपनी पत्नी सीता को चुपचाप वन में छोड़ आने का आदेश दे सकते हैं। यही सबक हर शासक को याद रहता है , कुर्सी के लिये सत्ता के लिये सभी का त्याग करने का। क्या सीता जी ने कोई प्रश्न खड़ा किया था अपने प्रिय राम जी के निर्णय को लेकर। नहीं , क्योंकि पति भगवान है , परमात्मा है जिसकी पूजा की जाती है , उसपर संदेह नहीं किया जा सकता। राम राजा हैं , उनको जब यज्ञ करने को पत्नी की ज़रूरत हो तब वो सोने से सीता जी की प्रतिमा बनवा काम चला सकते हैं। क्या कोई पत्नी कर सकती है ऐसा कि पति की जगह उसकी मूर्ति रख कर कोई अनुष्ठान संपन्न कर ले। जनता भी नेताओं के बुत उनके जीते जी नहीं बना सकती है , उसे जैसे भी हो उनकी प्रतीक्षा करनी होती है , जो भी आदेश हो उनका उसे पालन करना ही पड़ता है। औरतों को मर्दों के बराबर अधिकार की बातें करते सदियां गुज़र गई हैं , कितने और युग गुज़र जायेंगे तब भी कुछ भी नहीं बदलेगा। पति पति ही रहेगा और पत्नी पत्नी। जनता हमेशा जनता ही रहेगी , उसको झूठा ख्वाब नहीं देखना चाहिये स्वयं को देश का मालिक समझने का। भ्रम में जी रही हैं वो महिलायें जो मान बैठी हैं कि उनको बराबरी के सभी अधिकार मिल गये हैं। औरत के अपने पैरों पर खड़ा हो जाने और मर्दों की तरह हर काम करने के बावजूद भी उनकी दशा वही है। आज भी परिवार की मुखिया वो नहीं है , उसको पति के घर में रहना होता है और सब पुरुषवादी नियमों का पालन करना ही होता है। जनता को भी शासक की बराबरी का सपना कभी नहीं देखना चाहिये , वर्ना अंजाम बुरा होता है। नेता कहते रहते हैं जनता ही देश की मालिक है , पति भी कहते रहते हैं पत्नी को कि तुम्हीं घर की मालिक हो , लेकिन समझते दोनों ही खुद को ही मालिक हैं। जनता को झूठे वादों से तो पत्नी को दिखावे की मुहब्बत से छला जाता रहा है और छलते ही रहेंगे दोनों दोनों को। ये घर चलने के लिये और देश पर शासन करने के लिये एक मृगतृष्णा की तरह लुभाती रहती है। देश की जनता का भाग्य भी औरत के समान ही है , जो भी जैसा भी मिला हो उसी से निबाह करना पड़ता है। कब तक अच्छे पति की तलाश में कुंवारी बैठी रहे , अच्छे नेताओं की तलाश में जनता को अभी कई जन्म और तपस्या करनी होगी। इस कलयुग में नायक जन्म नहीं ले सकते , खलनायक ही आज के युग के नायक हैं।

जनवरी 14, 2014

POST : 403 चिराग़ अलादीन का ( हास-परिहास ) - डॉ लोक सेतिया

   चिराग़ अलादीन का ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

हो सकता है कि वास्तव में अलादीन नाम का कोई शख्स इस दुनिया में कभी हुआ ही नहीं हो न ही कोई अलादीन का चिराग ही रहा हो। ये दोनों मुमकिन है किसी लेखक की कल्पना ही हों। लेकिन किसी कहानी का ये फलसफा इस कदर लोकप्रिय हो गया कि सब ने यकीन कर लिया कि कहीं न कहीं ऐसा कोई चिराग़ ज़रूर है। और सब यही चाहने लगे कि उनको ही मिल जाये ये चिराग़ अलादीन का। अलादीन का चिराग़ सब कुछ कर सकता है , और जिसके भी पास हो उसकी हर आज्ञा का पालन भी करता है , कोई वेतन भी नहीं मांगता। नेता चुनाव से पहले बड़े बड़े वादे करते हैं , मगर जब सत्ता मिल जाती है तब सरकार का हर मंत्री यही बात कहता है कि हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है न ही अलादीन का चिराग़ है कोई जो पलक झपकते ही सब कर सके। सरकार जनता को सब्र रखने का पाठ पढ़ा रही है कितने सालों से , अनपढ़ जनता है कि मानती ही नहीं। अलादीन का चिराग़ जिसे मिल जाये वो बिना पंख उड़ सकता है , पल झपकते जहां जाना चाहे जा सकता है , जो पाना चाहे पा सकता है। मैंने ऐसे चिराग़ को लेकर गहरा चिंतन किया है तब मुझे पता चला है इसका एक दूसरा विकल्प भी है। जो शायद उस चिराग़ से बेहतर ढंग से काम करता है। इससे भी अच्छी बात ये है कि बड़ी इराफात में उपलब्ध भी है , इतना कि विश्व की आधी आबादी को मिल सकता ही नहीं बल्कि मिल ही जाता है। अपने इस देश में तो सुनते हैं कि इसका अनुपात और भी अधिक है , अर्थात अलादीन के चिराग़ अधिक हैं और जिनको इसकी ज़रूरत है उनकी संख्या कम है।

                                  अगर ये सरल सी बात आपकी समझ में नहीं आई तो शायद आप खुद एक चिराग़ अलादीन का हो सकते हैं। अगर आप शादीशुदा पुरुष हैं तो समझ लो आप अपनी पत्नी को मिल चुके ऐसे ही एक चिराग़ ही हैं। महिलाओं की सब से बड़ी , बल्कि प्रमुख समस्या ही पति नाम का अलादीन का चिराग़ तलाश करना होता है। उनको सदा से यही समझाया जाता है कि शादी हो गई तो समझ लो जन्नत का रास्ता खुल गया है। अब जिस किसी ने भी आपसे विवाह रचाया है वो बना ही आपके इशारों पर नृत्य करने के लिये है। उसका फ़र्ज़ है आपकी हर मांग को पूरा करना। शादी में पत्नी की मांग भरने का निहितार्थ कुछ ऐसा ही होता है। सुहागन होने का भी यही प्रमाण है कि उसकी मांग हमेशा भरी होनी चाहिये। हर पत्नी को ये अधिकार सात फेरों के साथ ही ऐसे मिलता है कि जल्द ही वो इसे छीन लेने का हक बन लेती है। पति हो या चिराग़ हो अलादीन का , उससे कुछ भी मांगते समय ये नहीं सोचना पड़ता कि कोई काम संभव है अथवा असंभव। ये दोनों होते ही " जो हुक्म मेरे आका " कहने के लिये हैं। अंग्रेजी का एक लेखक तो यहां तक कहता है कि पत्नी को खुश करने को जो भी करना पड़े करना चाहिये। उसकी इच्छा पूरी करने के लिये उधार लो चाहे क़र्ज़ या फिर चोरी ही करो सब किया जाना उचित है। जीवन का कल्याण तभी संभव है।

               एक अन्य दार्शनिक कहते है कि दुनिया में लूट , चोरी , ठगी , भ्रष्टाचार इन सब कि जड़ अलादीन के चिराग़ रूपी पति को मज़बूरी ही होती है। महनत और ईमानदारी से हर पति रोटी कपड़ा तो कमा सकता है , मगर गाड़ी बंगला सोना चांदी नहीं ला सकता। इसलिये अपने आका रूपी पत्नी का हुक्म बजा लाने की मज़बूरी उसे ये सब करने को विवश कर देती है। जब भी ये कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है , तब इसका मतलब यही होता है कि क्योंकि उसकी पत्नी पल पल उसे ये एहसास करवाती रही कि तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया तभी उसको तरक्की करने को सब करना पड़ा। इतिहास गवाही देता है कि पत्नी के ताने से कवि तुलसीदास पैदा हो जाते हैं। हर इक पत्नी को मौलिक अधिकार है अपने पति को बुद्धू समझने का। घर से बाहर भले पूरी दुनिया उसे काबिल या समझदार कहे पत्नी के लिये पति निरा मूर्ख ही होता है जो बदकिस्मती से उसके पल्ले पड़ गया है। लाख प्रयास करने के बावजूद भी किसी महिला को समझदार पति नहीं मिलता और ये बात हर पत्नी हमेशा अपने पति को कहती रहती है शिकायत के रूप में। ऐसे में पति इतना ही कह सकते हैं कि अगर समझदार होते तो क्या तुम्हीं से शादी करते। कुछ लोग जो शादी के जाल में नहीं फंसते , नहीं जानते कि वो कितने खुशनसीब हैं जो उम्र भर आज़ाद रहे। कई बार उनके मन में भी शादी का लड्डू खाने की बात आ ही जाती है। ज्ञानीजन तभी शादी को ऐसा लड्डू बताते हैं जिसको खा कर भी पछताते हैं और बिना खाये भी। बहुत सारे लोग खुद बेशक शादी करके पछताते हों , दूसरों को करने को प्रेरित किया करते हैं। शायद उनको मज़ा आता है अपने जैसे सितम औरों पर भी होता देख कर। हर कहानी में हर इक अलादीन के चिराग़ को आखिर में आज़ादी मिल ही जाया करती है , लेकिन पत्नी को शादी में मिला चिराग़ का ये जिन्न उम्र भर का कैदी होता है। इसलिये अक्सर शादी को उम्र कैद भी कह दिया जाता है।

जनवरी 12, 2014

POST : 402 मुक्ति ( कहानी ) डा लोक सेतिया

              मुक्ति ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

                    पता नहीं किसे ये दुनिया जीने के काबिल लगती होगी , कौन ज़िंदगी को जीता है यहां पर । मैं तो कभी ज़िंदा थी ही नहीं । हां मरती ज़रूर रही हूं हर दिन। मैं तो ये भी नहीं जानती कि इसकी शिकायत किस से करूं। किसे कहूं कि मुझे क्यों जीवन दिया अगर ज़िंदगी ही नहीं दे सकते थे। मां-बाप का भी क्या कसूर था , उन्हें कहां यह मालूम था कि जिस अपनी दुनिया को वो हसीन समझते हैं वो कितनी बुरी है। अब लगता है कि वो कुछ साल जो मां-बाप के साथ बिताये थे , जिनमें कभी दो वक्त पेट भरने को रोटी भी नहीं मिलती थी , तन ढकने को कपड़े भी नहीं होते थे , न कोई रहने का ठिकाना ही था , कभी इधर कभी उधर भटकते रहते थे , जहां मां-बाप को जो काम मिला कर लिया , जब रोटी मिली तो खा ली नहीं मिली तो पानी पी कर ही पेट भर लिया , तब न बचपन का पता था न ही बड़े होने का , तब शायद मैं किसी न किसी तरह ज़िंदा ज़रूर थी। मगर अब तो उन दिनों की यादें भी याद नहीं हैं , मालूम नहीं कब और कैसे मैं बड़ी हो गई और मेरी शादी हो गई। उस बाली उम्र में शादी जैसे गुड्डे-गुड़ियों का खेल ही था कोई। मैंने तो कभी न बचपन देखा न किसी सहेली के साथ कोई खेल ही खेला। बचपन की उम्र बीती भी नहीं थी कि मैं खुद बच्चों की मां बन गई। मां-बाप भूल गये या जाने कहीं खो गये और मैं भी अपने बच्चों में ही खो गई। मुझे जब अपने बच्चे दुनिया में सब से सुंदर , सब से अच्छे और सब से प्यारे लगने लगे तभी समझी कि मुझे भी मेरे मां-बाप इतना ही प्यार करते होंगे। मैंने बहुत कोशिश की कि खुद भूखी रह कर भी किसी भी तरह अपने बच्चों का पेट भरती रहूं। इसके लिये रात दिन काम किया , हर तरह का काम किया मगर फिर आज तक दोनों वक्त बच्चों का पेट नहीं भर सकी। अब तो मैं हर दिन बीमार रहने लगी हूं , अब सोचती हूं मैंने अपने बच्चों को जन्म क्यों दिया। मेरी तरह ये भी नादान हैं , बेबस और मज़बूर हैं। न खाने को रोटी न रहने को ठिकाना , न कोई उम्मीद। पढ़ना लिखना तो सोच भी नहीं सकते , अभी तो ये जानते ही नहीं कि उनकी दुनिया कितनी बेरहम है। यहां आदमी आदमी को खा जाना चाहता है। दूसरे की मज़बूरी का फायदा उठाना चाहता है हर कोई। एक अपना और अपने बच्चों का पेट भरने को क्या क्या नहीं करना पड़ता। मज़दूरी , घरों का काम ,बोझा ढोना ही नहीं जब कोई काम नहीं मिलता तब भीख मांगना क्या मज़बूरी में चोरी तक करने की नौबत आ जाती है।

                      सब लोग नफरत से देखते हैं हमें , उनको लगता ही नहीं कि हम भी इंसान ही हैं। क्या उसी भगवान ने बनाया है हमें भी जिसने इनको बनाया है , जिनके पास खाने को सब कुछ है , रहने को घर है , पढ़ने को स्कूल , नौकरी - कारोबार सब है। शायद ये जानते होंगे ज़िंदगी किसे कहते हैं और  उसे कैसे जिया जाता है। मुझे तो चक्कर सा आ गया था , शायद दो दिन से भूखी थी , मगर जब आंख खुली तो इस सरकारी अस्पताल में थी। बच्चों ने बताया कि मैं बेहोश हो गई थी और किसी के कहने पर वो मुझे रिक्शा में डाल कर यहां ले आये थे। रिक्शा वाला कोई भला आदमी था जो बिना पैसे लिये मुझे यहां पंहुचा गया था। होश आने पर डॉक्टर साहब ने बताया कि तुम्हारी जांच से पता चला है कि कोई बड़ा रोग है तुमको। बड़े अस्पताल जाना होगा आप्रेशन करवाना होगा जिसके लिये बहुत पैसे चाहिये होंगे ईलाज और दवा के लिये। अभी चार दिन पहले ही बच्चों का बाप काम की तलाश में दूर किसी बड़े शहर गया है , क्या पता अब कहां होगा। जब काम मिलेगा तब चाय वाली दुकान वाले के पते पर पोस्टकार्ड भेजेगा। अगर कहीं रास्ते में रेलगाड़ी में ही पकड़ा गया बिना टिकट तो मज़े से कुछ दिन जेल में पेट भर रोटी खाकर वापस आ जायेगा पिछली बार कि तरह। आदमी का क्या है , कैसे भी रह लेगा। मगर मैं औरत जात , इन छोटे छोटे बच्चों के साथ इस दुनिया में मर मर के जी रही हूं। डॉक्टर साहब बता गये हैं कि तुरंत आप्रेशन नहीं करवाया तो किसी भी समय जान जा सकती है। दिल में तो आता है यही अच्छा है , मौत आ जाये तो मुझे चैन आ जायेगा। लेकिन मैं चैन से मर भी नहीं सकती , मेरे बाद मेरे बच्चों के साथ ये दुनिया क्या क्या नहीं कर सकती। मैं जानती हूं इनको आज तक इन भेड़ियों से किस तरह बचा कर रखा है।

                      क्या मैं डायन बन गई हूं जो अपने ही बच्चों को मार डालूं। जिन बच्चों को ठोकर भी लगती थी तो मुझे रोना आ जाता था , जब ये बीमार होते तो रात रात भर गोद में लिये जगती रहती थी। जिन बच्चों से हसीन मुझे दुनिया की कोई भी चीज़ नहीं लगती है , उन अपने बच्चों को मैं खुद ही ज़हर दे कर मार डालूं , इसलिये कि मैं मर गई वह कैसे जियेंगे। मेरी तरह उम्र भर रोज़ मरते रहेंगे।  हां जब तक मां बाप ज़िंदा थे मैं भी ज़िंदा थी और जब तक जीती इनके लिये ज़िंदगी तलाश करती रहती। मगर मेरे मरने के बाद ये जिस तरह मरेंगे , मेरे जीने की ही तरह , उससे तो यही अच्छा होगा कि मेरे साथ ही इनको भी मौत आ जाये। यही अच्छा है कि ज़हर रोटी से सस्ता है और एक बार खाने से सभी ज़रूरतों ,सब मुश्किलों से निजात मिल जाती है। ज़िंदगी तो मेरे बस में नहीं रही कभी भी , लेकिन मौत तो हो सकती है। इसलिये मैंने आज अपने साथ अपने बच्चों को भी खिला दिया है। शायद ये ग़म हमारा आखिरी ग़म हो और सब ग़मों से मुक्ति।

जनवरी 11, 2014

POST : 401 जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश ) डा लोक सेतिया

   जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

कहानी एक वफादार कुत्ते की है। अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता। कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया। वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है। इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये। वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता। अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे। गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये। तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो। मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना। हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो। बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते। कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को। धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा। इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई। जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा। अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था।

                              आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है। अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं। मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है। हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं। इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं। कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं। जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं। जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते।

                                     चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये। मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है। अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी। संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है। हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत। आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है। आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं। नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता। संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा। आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी। अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते। सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था।

                     सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है। जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके। भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है। कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं। जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को। जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह। अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों। जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर। वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है। तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह।

जनवरी 10, 2014

POST : 400 भ्र्ष्टाचार के अंत के बाद क्या होगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     भ्र्ष्टाचार के अंत के बाद क्या होगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

             आखिर देश से भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट ही गया । अब सब जगह हर काम बाकायदा नियम कायदा और जन हित को महत्व देकर पूरी ईमानदारी से होता है । अब आप जब चाहें अपनी मर्ज़ी से प्लाट खरीद कर मकान नहीं बना सकते हैं । आपको सबसे पहले आवास मंत्रालय से अनुमति लेनी होगी , बताना होगा किस सरकारी विभाग से प्लाट आबंटन चाहते हैं अथवा किस बिल्डर से खरीदना चाहते हैं । इसके लिये आपको जानकारी देनी होगी मंत्रालय को कि आपके पास पहले कोई मकान या प्लाट या कोई फ्लैट है अथवा नहीं । अगर है तो कहां कहां कैसे कैसे कितनी जायदाद बना रखी है , कब और किस तरह का पूरा विवरण साथ देना होगा । मंत्रालय विभाग से जांच करवायेगा कि क्या वास्तव में आपको मकान या ज़मीन की आवश्यकता है । कहीं ऐसा तो नहीं कि इससे उन बेघर लोगों का घर बनाना कठिन हो जायेगा , आप जैसे लोगों को कई कई जगह मकान बनाने देने से घर बनाना महंगा हो जाने से , जो देश में सब को मूलभूत सुविधा देने का वादा संविधान करता है । अफ्सरों , सांसदों , विधायकों , मंत्रियों को भी सरकारी आवास तभी उपलब्ध करवाया जायेगा जब वो अपना निजि मकान अगर किसी अन्य जगह है तो उसको सरकार के हवाले कर देंगे ताकि उसको किसी दूसरे सरकारी आदमी को दिया जा सके । वे जब तक मुफ्त के सरकारी आवास में रहेंगे तब तक उनका निजि मकान बिना किसी किराये के सरकार के पास रहेगा । ये सब देश की आवास समस्या को हल करने के लिये लागू की गई निति के अनूरूप ही होगा । अब जब से भ्रष्टाचार मिटा है और सरकार व प्रशासन ईमानदारी से काम करने लगा है ताकि जनता की समस्याओं का शीघ्र अंत हो , तब से जिनके पास ज़रूरत से अधिक धन है उनके लिये नई समस्या खड़ी हो गई है कि इन पैसों का करें क्या ।
 
 अस्पताल  सरकारी हो चाहे निजि , केवल पैसे वालों का ही ईलाज नहीं किया जा रहा है , जिनकी जेब खाली है उनको भी कायदे से उचित स्वास्थ्य सेवा मिलती है । दूसरी तरफ कुछ धनवान मरीज़ों को बताया जा रहा है कि क्योंकि आपका रोग अधिक गंभीर नहीं है इसलिये आपको अभी दाखिल नहीं किया जा रहा है । बिना दाखिल किये भी आपका ईलाज किया जा सकता है , दाखिल होने के लिये अभी आपको इंतज़ार करना होगा । अब किसी को भी सिर्फ पैसा देने से अच्छा इलाज नहीं मिलता है , जिसको ज़रूरत हो केवल उसी को मिलता है । अब नेता अफ्सर या पत्रकार होने से आप को वी आई पी नहीं माना जायेगा , किसी को भी किसी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं मिलेगा । हर नागरिक को समान समझा जाता है अब । पहले जैसे बाकी लोगों को अनदेखा कर आपको प्राथमिकता दी जाती थी अब नहीं मिल रही है ।अब चाहे राशनकार्ड बनवाना हो या फिर अपने ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण करवाना हो इनको भी खुद जाना होगा सरकारी कार्यालय और इंतज़ार करना होगा अपनी बारी का । अब कोई नहीं सुनेगा कि आपका समय कितना कीमती है और न ही ये कि आम जनता की तरह इंतज़ार करना आपको अपना अपमान लगता है । आप कोई वाहन चला रहे हों अथवा कोई उद्योग चलाते हों , कोठी - कारखाना जो भी बनाना चाहते हों , सभी नियमों का पूरी तरह पालन करना ही होगा । मनमर्ज़ी करके जुर्माना भरने से अब छूट नहीं सकते हैं । किसी को भी अपनी सुविधा से ऐसा कुछ भी नहीं करने दिया जाता है जिससे बाकी लोगों को परेशानी हो सकती हो । जब चाहे गली या सड़क को रोक नहीं सकते हैं न धार्मिक आयोजन करने के लिये न ही सभा आयोजित करने के लिये और विरोध करने के लिये भी कोई किसी तरह आम जनता को ढाल नहीं बना सकता है । कानून ऐसा होते देख चुपचाप नहीं रहता अब । अब किसी को शोर मचाने और गंदगी फैलाने का भी कोई अधिकार नहीं रह गया , ऐसे हर कदम पर सज़ा मिलती है । अब कभी किसी को कुछ भी विरासत में नहीं मिलेगा न ही सिफारिश से ही । स्कूल कॉलेज में दाखिले से नौकरी तक सब काबलियत से ही मिलेगा , बाप दादा का नाम और पैसा सब आसानी से नहीं दिलवा सकता है ।
          
    कहना कठिन है कि राजनैतिक दलों को आसानी होगी या उनकी मुश्किलें अधिक बढ़ जायेंगी । अब उनके लिये सीमा से एक रुपया अधिक भी चुनाव पर खर्च करना मुसीबत बन जायेगा । दोषी पाये जाने पर उनका चुनाव ही रद्द नहीं होगा , उनको सज़ा भी मिलेगी और भविष्य में चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध भी । सब से बड़ी मुश्किल होगी सांसदों विधायकों को मिलने वाली हर वर्ष की कल्याण राशि को खर्च करने की । बिना भ्रष्टाचार किये ये कर पाना जब कठिन लगेगा तब वो खुद ही इस संविधान विरोधी अधिकार को छोड़ना चाहेंगे । जिस दिन से भ्रष्टाचार का अंत हुआ है , मीडिया वालों के दिन खराब आ गये हैं , न उनको ख़बरें मिल रही हैं न काम करने में कोई लुत्फ़ ही आ रहा है । अब कोई नेता कोई अफ्सर उनसे डरता नहीं है , कोई भी सर पर नहीं बिठाता है । वो पहले सी धाक नहीं रही कि प्रैस शब्द लिखवा लिया वाहन पर तो कोई रोक टोक नहीं हो , न ही पत्रकार हैं का परिचय देने से ही सब हाथ जोड़ काम कर देते हैं । अब जब कोई बताता है कि मैं पत्रकार हूं तो जवाब मिलता है तो हम क्या करें , यहां सभी एक समान हैं । आम और खास का रत्ती भर भी अंतर नहीं रह गया है जब से भ्रष्टाचार समाप्त हुआ है । सब लोग जो आसमान पर उड़ते रहते थे आजकल ज़मीन को तलाश करते नज़र आते हैं । ये सब जिस दवा से हुआ है वो है लोकपाल नाम की भ्रष्टाचार के कीटाणु को जड़ से मिटाने वाली रामबाण दवा , शायद कई देश चाहेंगे इसे हमसे खरीदना अपने देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिये ।  ये कथा का पहला भाग है जो 2014 में लिखा गया था जब लोकपाल नाम की भ्र्ष्टाचार मिटाने की रामबाण दवा बनाने की बात की गई थी । बाद में हुआ क्या कुछ साल बाद देखना याद रखना भूल जाओगे तो पछताओगे । ईमानदारी खरीदोगे तो समझोगे लोकपाल बनाकर कैसे रहोगे किस दुनिया में जाओगे । 
 
 
 Press Release:Press Information Bureau

जनवरी 09, 2014

POST : 399 बड़ा जूता , ज़्यादा पालिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    बड़ा जूता , ज़्यादा पालिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

हमने बड़े अधिकारी से कहा " विभाग आपका बहुत ही बदनाम है। भ्रष्टाचार खुलेआम है , बिना रिश्वत होता नहीं किसी का भी काम है। " अधिकारी बोले साफ साफ कहो आपका कैसा काम है , हर काम का फिक्स दाम है। सच पूछो तो इसमें ही आराम है , जो भी है सरेआम है। हमको तो काम ही काम है , क्या बतायें सुबह है कि शाम है। पैसे का ही खेल सारा है। कर्मचारियों में कायम भाईचारा है। हर दिन का यही किस्सा है। बराबर सभी का हिस्सा है। लेने और देने वाले जब राज़ी हैं। आप किस बात के क़ाज़ी हैं। बेबुनियाद आपके इल्ज़ाम हैं। मुफ्त में कर रहे बदनाम हैं। नासमझ बीस पचास ले लेते हैं। ईमान को सस्ते में बेच देते हैं। हम कभी न ऐसा करते हैं। जब बिकते हैं अपना घर भरते हैं। वे ईमानदार कहलाते हैं , जो खुद भी खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं। हर दिन सब के काम आते हैं। जो भी देता है उसका ही हुक्म बजाते हैं। कुछ नोट मिल जाते हैं , सब चेहरे खिल जाते हैं। और नहीं दुनिया में कोई नाता है। सब जगह झूठा बही खाता है। चंद सिक्कों में बेड़ा पार है। नौ नकद न तेरह उधार है। तेल है तेल की धार है , आजकल का ये सच्चा प्यार है। आप तो बेवजह घबराते हैं , न खुद खाते हैं न हमें खिलाते हैं। खाली बातें ही बनाते हैं। बातों से कभी पेट भरता है , तुम क्या जानो पापी पेट क्या करता है। भ्रष्टाचार भी इक तपस्या है , ये नहीं कोई समस्या है। यह हर रोग की दवा है। तुम भी उधर चलो जिधर की हवा है। समझदारी से राह आसान हो जाती है , कुछ नोटों से गहरी पहचान हो जाती है। वरना यहां किसे कौन जानता है , जब भाई की भाई तक नहीं मानता है। सौ दो सौ लेने वाले रंगे हाथ पकड़े जाते है। वही रिश्वतखोर कहलाते हैं। लाखों खाने वाले नहीं हाथ आते हैं। करोड़ों खाने वाले सब छूट जाते हैं। "
    " रुपया दो रुपया भीख मांगना शर्म की बात होती है। चंदा मांगने वालों की और ही बात होती है। तब बस देने वालों की औकात होती है। कमीशन और दलाली बाज़ार के बड़े शो रूम वाला खेल है। भीख सड़क किनारे लगी सेल है। नेताओं को एंटीसिपेटरी बेल है , रहने को रेस्ट हाउस कहने को जेल है। भ्रष्टाचार तो दिलों का मेल है। इसकी बनी न कोई नकेल है। आप भी प्यार मुहब्बत को चलने दीजिये , जलने वालों को जलने दीजिये। चाहने वाले कहां घबराते हैं , राह नई रोज़ बनाते हैं। देश में कितने घोटाले हुए , कितने चेहरे काले हुए। कभी दलाली कभी हवाले हुए। सब के सब बरी होते रहे , आप तब चैन से सोते रहे। जाने कब सीधी राह पे आओगे , बहती गंगा में नहाओगे। अब भी नहीं समझे तो पछताओगे , प्यासे आये थे प्यासे ही जाओगे। "
                  सुनकर उनका प्रवचन हम तो घबरा गये , जाने कहां हैं हम लोग आ गये। दिन में भी लग रही रात है। हां ये इक्कीसवीं सदी की बात है। अधिकारी से बचकर जो बाहर को आये। बड़े बाबू से थे जा टकराये। वो मुस्कुरा कर बोले तो उनसे मिल आये , होंठ लगता है सिल आये। कहना जो हमारा मान जाते , सस्ते में ही छूट जाते। मामला जितना ऊपर जाता है , रिश्वत का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा जूता अधिक पालिश खाता है। अब आपका काम करने से सब कर्मचारी डर गये हैं। समझो रिश्वत के दाम चढ़ गये हैं। ईमानदारी की बात करना छोड़ दीजिये , भ्रष्टाचार से नाता जोड़ लीजिये। काम आपका हो जायेगा। वहीं कोई सरकारी साधु भजन गा रहा था " जो खोयेगा वही पायेगा।  "

जनवरी 08, 2014

POST : 398 मृत्युलोक का सीधा प्रसारण ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    मृत्युलोक का सीधा प्रसारण ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      यमराज उस परेशान आत्मा को लेकर सीधे धर्मराज जी की कचहरी में आये। चित्रगुप्त ने बही खाता खोल कर उनके कर्मों का विवरण प्रस्तुत किया। और धर्मराज को बताया कि इस आत्मा ने सदा सदकर्म ही किये हैं जीवन भर , मगर हमेशा ही परेशान होते रहे हैं धरती पर लोगों को अपकर्म करते देख कर। लेकिन इनके मन में ईश्वर के न्याय के प्रति हमेशा सवाल उठते रहे हैं। यहां तक कि मरने के बाद जब यमराज इनकी आत्मा को ला रहे थे तब भी इनकी आत्मा यही सोचती आ रही थी कि अगर ईश्वर से सामना हुआ तो पूछेंगे कि अपनी बनाई हुई सृष्टि की व्यवस्था को सुधारने का कोई कारगर उपाय क्यों नहीं करते आप हे ईश्वर। परेशान आत्मा की बात समझ धर्मराज जी को भी उचित  लगा उसे उसके सवालों के जवाब स्वयं भगवान से दिलवाना। ईश्वर के निजि कक्ष में धर्मराज जा पहुंचे उस आत्मा को साथ लेकर , ईश्वर ने जानना चाहा ऐसी क्या परेशानी है जो आपको मेरे पास आना पड़ा। धर्मराज बोले कि इस आत्मा के कुछ सवाल हैं जो सुन कर मुझे भी चिंता करने वाले ही लगे और उनका जवाब आप ही दे सकते हैं। ये आत्मा आपकी बनाई सृष्टि की खराब व्यवस्था से बेहद चिंतित है और चाहती है आप उसको सुधारने को कोई कारगर उपाय शीघ्र करें। ईश्वर कहने लगे हे परेशान आत्मा आपकी परेशानी सही है और मैं भी बहुत ही बेचैन रहता हूं इस बात को सोच सोच कर। मगर कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा है। जिनको सत्य का धर्म का मार्ग दिखलाना था सभी को वही खुद भटक गये हैं , लोग उनको धर्मगुरु मान सर झुकाते हैं जबकि वो लोभ मोह अहंकार में डूबे रहते हैं। बात एक कंस या एक रावण की होती तो मैं खुद अवतार लेकर उसका अंत कर देता , मगर वहां तो तमाम कपटी लोग खुद को मेरा ही अवतार घोषित करने लगे हैं और करोड़ों लोग उनके झांसे में आ उनकी जयजयकार करते हैं। अब इतने लोगों के इस अंधविश्वास का अंत कैसे करूं और कैसे सच और झूठ उनको समझाऊं ये मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है। परेशान आत्मा बोली ईश्वर मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं , हमारे देश में जब किसी समस्या का कोई हल नज़र नहीं आता है तब सरकार एक प्रतिनिधिमंडल अपने नेताओं एवं अफ्सरों का विदेश भेजती है कि वे देख कर आएं कि उस देश में ये सब क्यों नहीं है। क्या उपाय किया हुआ है उन देश वालों ने। वो अलग बात है वो नेता अफ्सर वहां ये जानने का प्रयास नहीं करते , बस सैर सपाटा कर लौट आते हैं। आने के बाद कोई एक नई समस्या खड़ी कर देते हैं , पहले चल रही कितनी ही असफल योजनाओं जैसी एक और योजना प्रस्तुत कर , जिसका कार्यभार उनको सौंप दिया जाये। नतीजा वही ढाक के तीन पात , लेकिन आप ऐसा नहीं हो इसलिये अपने ऐसे ईमानदार देवी देवताओं को पृथ्वी का भ्रमण करने को भेजें जिनको अपनी पूजा , अपने नाम पर बनाये मंदिरों के चढ़ावे और वहां आये भक्तों की भीड़ को देख प्रसन्न होने की बुरी आदत नहीं हो। जो किसी पापी या अधर्मी को क्षमा नहीं करते हों प्रार्थना सुनकर।

                   ईश्वर बोले परेशान आत्मा आपने मेरे सामने उस लोक से लेकर इस लोक तक की सही तस्वीर प्रस्तुत कर दी है। मैं आपको अपना विशेष सलाहकार नियुक्त करना चाहता हूं इस समस्या को समाप्त करने के उपाय खोजने के काम में योगदान दें आप भी। परेशान आत्मा बोली कहीं आप वही जल्दबाज़ी तो नहीं करने जा रहे जो हमारे प्रदेश में मुख्यमंत्री किया करते हैं। जिसको अपना विश्वासपात्र समझ ओ एस डी नियुक्त करते हैं वही उनके नाम पर सत्ता के जमकर दुरूपयोग करता है। सब से अधिक भ्रष्टाचार , घोटाले ऐसे ही लोग करते हैं , आप ऐसे आंख मूंद किसी का भी ऐतबार नहीं कर सकते। अधिकार मिलते ही सब बदल जाया करते हैं , मुझे खुद अपने आप पर भरोसा नहीं कि आपने मुझे इतनी शक्ति दे दी तो मैं क्या करूंगा , हो सकता है आपको भी धोखा देने लग जाऊं , इस कलयुग में कुछ भी संभव है हे ईश्वर। ये सुन ईश्वर की चिंता और अधिक बढ़ गई , उन्होंने पूछा परेशान आत्मा आपने तो मुझे दुविधा से निकालने की जगह मेरी दुविधा को और बढ़ा दिया है। आप क्या ये कहना चाहते हैं कि मैं अपने ही घर के सदस्य सभी देवी देवताओं पर भी भरोसा नहीं किया करूं। भला मैं ऐसा किस तरह कर सकता हूं , इस कदर अविश्वास करके हम एक साथ कैसे रह सकते हैं। परेशान आत्मा ने कहा कि अगर मेरी बात का बुरा नहीं मानें तो मैं आपको सुझाव दे सकता हूं। ईश्वर बोले अवश्य बताओ और अगर उचित लगा तो हम उस पर अमल भी करेंगे। परेशान आत्मा ने कहा हे ईश्वर आप सब कि पल पल की निगरानी की व्यवस्था करें। ईश्वर बोले ये सच है कि ऐसा माना जाता है कि मुझे सब की हर बात की खबर है , मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं , मुझे एक सीमा से अधिक किसी की निज्जता में झांकना अनुचित प्रतीत होता है। पल पल की बात पूछना या जानना तो मुमकिन नहीं है किसी भी तरह , आखिर मुझे भी कुछ समय चाहिये खुद के लिये। परेशान आत्मा कहने लगी मैं उपाय बताता हूं जिससे आपको कोई परेशानी नहीं होगी न किसी को कुछ मालूम होगा कि उनकी निज्जता में कोई दखल है , सब गोपनीय तरीके से होगा , आपको छोड़ किसी को भी कोई भनक नहीं लगेगी। बस आपको ये पुराने ढंग छोड़ नई तकनीक का सहारा लेना होगा। ईश्वर हैरान हो कर बोले बताओ ऐसी क्या तकनीक हो सकती है।

      तब परेशान आत्मा ने बताया बिग बॉस नामक टीवी शो में यही होता है , बिग बॉस किसी को दिखाई नहीं देता मगर उसको सब नज़र आता रहता है। वह आदेश देता है , निर्देश देता है , कैमरे और माईक से पल पल की खबर रखता है। घर में रहने वाले अगर चाहें भी झूठ नहीं बोल सकते , ज़रूरत होने पर उनको उनकी असलियत दिखाई जा सकती है। आप मृत्युलोक से अपने पास सीधा प्रसारण करवाने की व्यवस्था करें , और खुद देखते रहें सब कुछ। आपको नज़र आएगा किस तरह नेता , अफ्सर देश को लूट रहे हैं , सरकार और प्रशासन कितना अमानवीय कर्म कर रहे हैं। जब सभी के अपकर्मों को आप खुद देख सकेंगे तब अपने सभी देवी देवताओं को भी निर्देश दे सकेंगे कि वे अपने अपने भक्तों को अपकर्मों की कड़ी सज़ा दें न कि अपनी स्तुति से प्रसन्न हो उनके अपराध क्षमा करते रहें। जब ईश्वर ने अपने लोक में नये टीवी चैनेल स्थापित करने की योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी तब परेशान आत्मा ने कहा हे ईश्वर एक अंतिम बात और बतानी ज़रूरी है। सावधान रहना , अपना चैनेल किसी मुनाफाखोर को ठेके पर कभी मत देना वर्ना कोई हमारे देश के टीवी चैनेलों की तरह झूठे विज्ञापनों द्वारा पैसा कमाने के लालच में अपने ध्येय से भटक सकता है। ईश्वर ने इस कार्य के लिये महाभारत वाले संजय की सेवायें लेने का निर्णय लिया है। नेता , अपराधी , पाप - अधर्म करने वालों के साथ साथ धर्मोपदेशक भी संभल जायें , क्योंकि ईश्वर न केवल खुद सब देखेगा बल्कि इनके अपकर्मों को सभी को दिखाया भी करेगा , बिग बॉस की तरह। अब पता चलेगा असली बिग बॉस कौन है ।  

जनवरी 07, 2014

POST : 397 कविता की बात ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      कविता की बात ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

हमने पहले से ही तय कर लिया था कि अगर कभी भी हम प्यार करेंगे तो सिर्फ कविता से करेंगे। जब हम कवि हैं तो हमारी कविता भी होनी चाहिये कोई , जिसे दिलोजान से प्यार करें उम्र भर हम। मगर हमारे नसीब में लिखा ही नहीं था किसी कविता नाम की लड़की से कभी मुलाकात करना। फिर भी ये शब्द हमें अपना सा लगता था और हम हमेशा यही सोचा करते थे कि अगर हमें कोई कविता नहीं मिलेगी तब हम जो भी मिलेगी विवाह के बाद उसका नाम कविता रख लेंगे। अफसोस न कोई कविता नाम वाली मिली न हमने कभी इश्क़ किया। समझा जाता है कि इश्क़ में आशिक को अच्छी कविता लिखना खुद ब खुद आ जाता है। लेकिन जब हमारे विवाह की बात चली तो और हमें बताया गया कि कन्या का नाम कविता है तो हमने देखे बिना ही हामी भर दी। अब जिसका नाम कविता है उसे देखने की क्या ज़रूरत , सोच लिया उम्र भर कविता को ही देखेंगे , कविता ही पढ़ा करेंगे , लिखते तो पहले से ही हैं। शादी का शुभ महूर्त निकालते समय पंडित जी कहने लगे कि कविता नाम तुम पर बहुत भारी पड़ सकता है इसे बदलना ही उचित है , हमने कहा कि ऐसा है तो ग़ज़ल नाम रख देते हैं , मगर ये भी उनको नहीं जचा तो हमने कह दिया कि फिर हमारा नाम बदल कर कविता के हिसाब से रख दो। ये सुन कर हंस दिये सभी कि भला ऐसा कहीं होता है , लेकिन हमने कविता को कविता ही रहने देने की ज़िद ठान ली और नाम को नहीं बदलने दिया। इस तरह हमने अपनी ख़ुशी से शादी कर ली कविता नाम की लड़की के साथ। और बहुत जल्द हमें कविता कविता में ज़मीन आसमान का अंतर नज़र आने लगा , साथ ही इस बात का अर्थ भी समझ आने लगा कि एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं समा सकती। पर अब हमें तो तमाम उम्र दोनों कविताओं को साथ रखना ही था।

                                    इधर जब से हमें बुलावा आया है कवि सम्मलेन में कविता सुनाने का तब फिर से खुद के कवि होने का यकीन होने लगा है , अन्यथा श्रीमती जी की बातों को मान हमने भी सोच लिया था कि हम जो लिखते हैं वो बेकार की तुकबंदी के सिवा कुछ भी नहीं है। यूं भी पत्नी होने के नाते हमारी कविताओं को बिना पढ़े , बिना सुने ही रद्द करने का उनका विशेषाधिकार है। जब सुहागरात को ही हमने उनको अपनी कविता सुनाई थी जो उनके नाम लिखी थी हमने तभी उन्होंने तय कर लिया था कि कैसा बर्ताव अपनी सौतन से करना है। बस वही पहली और आखिरी बार हमारी कविता सुनी थी श्रीमती जी ने। बहुत कोशिश की मगर कविता जी को कविता कभी पसंद नहीं आ सकी। हमने उनकी तारीफ में भी लिखी कविता , मगर उनको वो तारीफ भी फीकी ही लगी , हम हार गये इस प्रयास में आखिर। एक बार यूं ही भूले से कह बैठे कि आग लगा सकती है ये कविता तो वे बोलीं देखेंगी किसी दिन चूल्हे में डालकर। तब से हमने उनको अपनी कविताओं से और अपनी कविताओं को उनसे फासले पर रखना लाज़मी समझा है। अब उनको भी तसल्ली है कि बच गई हैं मेरी कवितायें सुनने से। हमें इस बात का अफ़सोस रहता था कि हमारे फन की कद्र नहीं जानती हैं। जब कभी घर आ कर बताते कि दोस्तों ने कविता सुन बड़ी दाद दी , तब उनका कहना होता कि ज़रूर उनको कुछ मतलब होगा , तभी खुश करना चाहते हैं आपको।श्रीमती जी को यकीन ही नहीं बल्कि उनका दावा है कि जो वो मानती हैं या कहती हैं वही सब से बड़ा सत्य है और बाकी सब कुछ मिथ्या है। एक दिन जब बाहर से घर आये तो देखा कि जिन कागज़ों पर हमारी कवितायें लिखी हुई हैं वो नीचे फर्श पर बिखरी पड़ी हैं। पूछने पर जवाब मिला कि तुमने ही बोला था घर की साफ सफाई के लिये , इसलिये कबाड़ी को बुलाया था फालतू का सामान बेचने के लिये। सब खरीद कर ले गया लेकिन इन स्याही से लिखे कागज़ों को उसने अखबार की रद्दी के भाव भी लेने से इनकार कर दिया। देख लो इन कविताओं को ढाई रुपये किलो भी नहीं खरीदा उसने। हमने शुक्र मनाया कि बाल बाल बच गये और अपनी कविताओं को समेट कर अलमारी में रख ताला लगा दिया। लेकिन जब से हमने अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया और वो छपने लगी तब से श्रीमती जी के तेवर थोड़ा नर्म होने लगे थे। जब पहली बार किसी कवि सम्मेलन का बुलावा आया तो श्रीमती जी कहने लगी वहां सफेद कुर्ता पायजामा पहन कर मत जाओ , लोग सुना है अंडे टमाटर साथ लाते हैं फैंकने को। मगर हम नहीं माने थे , और जब सही सलामत घर वापस आये तो अपना कुर्ता उतार कर उनके हाथ में पकड़ा कर कहा कि देख लो कोई दाग़ नहीं लगने दिया इसपर हमने। श्रीमती जी आदत से मज़बूर कुर्ते की जेब को टटोलने लगी , और उसमें से एक लिफाफा निकाल बोली ये क्या है। हमने कहा , याद आया ये कवि सम्मेलन के आयोजकों ने दिया था ये कह कर कि सम्मान पूर्वक दे रहे हैं। श्रीमती बोली कि इसमें है क्या , हमने कहा कि हमने देखा नहीं आप ही देख लो क्या डाला हुआ है। उन्होंने देखा तो ढाई सौ रुपये निकले , मगर श्रीमती जी ये मानने को हर्गिज़ तैयार नहीं कि जिस रद्दी को कबाड़ी ढाई रुपये किलो भी लेने को नहीं माना था उसके दो पन्नों को पढ़ कर सुनाने पर कोई ढाई सौ रुपये दे देगा। हमने कहा ये आपके लिये हैं तो खुश होकर पैसे रखने के बाद भी उनका मानना है कि ये खुद हमने अपनी जेब में रखे होंगे उनको खुश करने के लिये। और जैसा सदा वे समझती हैं जो वो मानती हैं वही सच है। हम तो बस मन ही मन सोचते रह जाते हैं कि काश कविता जी कभी कविता का मोल समझ पाती। ये इक कविता की बात है और दूजी कविता का दर्द भी। 

जनवरी 06, 2014

POST : 396 फ्रैंडली क्रिकेट मैच ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       फ्रैंडली  क्रिकेट मैच ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       इस देश में हर किसी को एक काम करना बहुत अच्छी तरह आता है। क्रिकेट खेलना। नेता अभिनेता अफ्सर शिक्षक डॉक्टर वकील छात्र चाहे जो भी कुछ हों हम , अपना वास्तविक काम भले करना जानते हों या नहीं , क्रिकेट खेलना ही नहीं इस खेल की हर बात जानते हैं सभी। इसमें पुरुष या स्त्री का भी कोई अंतर नहीं , सब इक दूजे से बढ़कर हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि टीम इंडिया के खिलाड़ियों को छोड़ कर बाक़ी सब बेहतरीन क्रिकेट खेलने वाले हैं। लगता है हमारे देश के लोगों के पास ये खेल खेलने को फुर्सत ही फुर्सत है , उसके इलावा और कुछ भी करना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। सब के पास वक़्त है क्रिकेट खेलने के लिये , तभी यहां फ्रैंडली क्रिकेट मैच आयोजित होते रहते हैं। कभी नेताओं कभी कलाकारों कभी प्रशासन कभी पुलिस कभी पत्रकारों का ,तो कभी इनमें से किसी का किसी के साथ फ्रैंडली क्रिकेट मैच होता ही रहता है। खेल भले कोई भी रहा हो , जनता ताली बजाने को रहती है हर बार। भारत देश में जिसे क्रिकेट खेलना नहीं आता उसका देश प्रेम अधूरा समझा जाता है। क्रिकेट का खेल ही अब पैमाना है देशप्रेम को परखने का , हम देशप्रेम प्रकट करने के लिये अन्य किसी बात किसी खेल को महत्व नहीं देते , बस यही एक साधन है देश के प्रति अपनी भावना व्यक्त करने के लिये। क्रिकेट में हारना जीतना हमारे लिये राष्ट्रिय चिंता का विषय होता है। अब तो हम ये भी मानते हैं कि क्रिकेट को खाया जा सकता है , बिछौना बना कर सोया जा सकता है , ओढ़ना पड़े तो ओड़ा जा सकता है , और ज़रूरत हो तो शीतल पेय की तरह पिया जा सकता है। ऐसे जनता को जो भी चाहिये , रोटी , पानी , छत या वस्त्र सब मिल सकते है केवल इसी से। बड़े ही काम की चीज़ है क्रिकेट। दोस्त को दुश्मन बना सकता है ये खेल और दुश्मन को दोस्त भी यही बना सकता है। यहां तक कि किसी को भगवान बना सकता है क्रिकेट। क्रिकेट ने एक नया भगवान दिया है हमें , देने को सिनेमा ने भी दिया है दूसरा एक भगवान लेकिन जो बात क्रिकेट वाले भगवान की है वो और किसी की भला हो सकती है। क्रिकेट माया है और इक मायाजाल है क्रिकेट का। क्रिकेट जैसा और कुछ भी नहीं है। इसकी महिमा का बखान करना इस तुच्छ लेखक के बस की बात नहीं है। क्रिकेट तो क्रिकेट ही है।

                                     चोरियों के सुहाने मौसम में चौकीदार इलैवन का थानेदार इलैवन के साथ फ्रैंडली क्रिकेट मैच रखा गया है। ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि प्रयोजक चोर सभा ही है और मामला चोरी के माल में बंदरबांट का भी है। दोनों ही टीमों में चोरों को शामिल किया गया है जीत की संभावना बढ़ाने के लिये। कौन सी टीम कितने रन बनाती है और कितने विकेट बचा पाती है इसी को आधार बनाया जायेगा ये तय करने का कि चोरी के माल में उसका कितना हिस्सा होगा। इसलिये बात खेल भावना से अधिक पापी पेट की बन गई है। कुछ पुराने समझदार चोरों ने चौकीदार इलैवन के कप्तान को समझाने का प्रयास किया कि थानेदार इलैवन को जीतने देने में ही सबकी भलाई है। लेकिन वो ज़िद पर अड़ गया है कि उनको हरा कर ही रहेगा ताकि अधिक हिस्सा हासिल कर सके। वो थानेदार इलैवन को कड़ी टक्कर देने की बात करने लगा है। अब वो ये नहीं होने देना चाहता कि सारा माल बंदर हड़प जायें और हम बिल्लियों की तरह आपस में झगड़ते रह जायें। थानेदार को भी आसार अच्छे नहीं नज़र आ रहे , उसे भी लग रहा है कि अब उसका रौब पहले जैसा नहीं चल रहा है। चोरों की बातों का असर चौकीदारों पर भी होने लगा है , उनको भी लगता है कि मेहनत हम करते हैं और फल कोई और खाता रहता है। मुकाबला शुरू होने से पहले दोनों टीमें अभ्यास में जुटी हुई हैं। जब थानेदार और चौकीदार टॉस करने लगे तब चोरों को एक सुनहरी अवसर मिल गया है।

                            अचानक चोरों ने ये घोषणा करके सनसनी पैदा कर दी है कि वे थानेदार या चौकीदार इलैवन में शामिल होकर नहीं खेलेंगे , बल्कि अपनी अलग टीम बना खेल में भाग लेंगे। उन्होंने मांग की है कि एक मैच न रख कर त्रिकोणीय मुकाबला करने को तीन मैच होने चाहियें ताकि सब को समान अवसर मिले अपनी प्रतिभा दिखाने का। खेल खेल न रह कर जंग बनता जा रहा है। मामला बिगड़ नहीं जाये इसलिये एक सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई जिसमें कुछ वरिष्ठ लोगों की समिति का गठन किया गया खेल के नियम और रूपरेखा तय करने के लिये ताकि खेल को मित्रता की भावना से खेला जा सके। समिति ने विचार विमर्श करने के सब सुलझा दिया है। सब को ये बात समझा दी गई है कि हम सभी का हित जीत हार में नहीं बल्कि आपसी भाईचारा कायम रखने में है। एक प्रकार से मैच को पहले से फिक्स कर दिया गया है। सभी की भलाई इसी में है ये सब मान गये हैं। समिति का कहना है कि जब टीम इंडिया के खिलाड़ी खेल से अधिक ध्यान विज्ञापनों की आय पर रख सकते हैं तो चोरों , चौकीदारों को ही क्रिकेट की चिंता करने की क्या ज़रूरत है। सब को अपना अपना हिस्सा मिलता है और मिलता रहेगा। हमारा ध्येय आपसी प्यार को विश्वास को बढ़ाना है। थानेदार इलैवन की जीत ही चोरों और चौकीदारों की जीत है।

जनवरी 05, 2014

POST : 395 कब और कैसे बदलेगी तस्वीर देश की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  कब और कैसे बदलेगी तस्वीर देश की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हक़ नहीं खैरात देने लगे , इक नई सौगात देने लगे। मेरी ये ग़ज़ल तब भी सच थी जब खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया था और आज भी सच है। बहुत खेद की बात है कि हर सत्ताधारी खुद को दाता और जनता को भिखारी समझता है। जनता को उसके अधिकार कब मिलेंगे और कैसे असली सवाल यही है। बहुत सारी बातें हैं चर्चा को , बारी बारी से कुछ खास पर आज चिंतन किया जाये। सब से पहले उसकी बात जो सब बातों का आधार है , लोकतंत्र के बारे में सोचा जाये। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि कोई सरकार जनता के पचास प्रतिशत से अधिक वोटों को हासिल कर बनी हो , इसके बावजूद नेता दावे करते हैं कि उनको जनादेश मिला है। वास्तव में कभी किसी भी दल ने ये ज़रूरी ही नहीं समझा कि सच में देश की जनता का बहुमत उसको मिले। सभी का ध्येय निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हासिल करना रहा है। और उसको जुटाने के लिये हर किसी से समझौता किया जाता है , विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं। मतलब सब की विचारधारा एक समान है कि जैसे भी हो कुर्सी पर आसीन होना। जनता जब एक दल को हराती है और दूसरे को चुनती है तब उसको केवल नाम और चेहरे नहीं बदलने होते , व्यवस्था में परिवर्तन करना होता है। मगर बार बार धोखा मिलता है देश की जनता को , लोग , नाम , दल , चेहरे ही बदलते हैं बाकी कुछ भी नहीं बदलता है। एक बात हैरानी की है कि हम लोग धर्म और राजनीति दोनों के बारे सोचते हैं सब जानते हैं जबकि जानते बहुत ही कम हैं। हम जिन ग्रंथों को पूजते हैं उनमें जो लिखा है उस पर शायद ही विचार करते हैं। अगर करते होते तो इतने धर्मों , मंदिर , मस्जिद , गिरिजाघर और गुरुद्वारों के होने और इतने धार्मिक आयोजन होने के बाद इतना पाप इतना अधर्म हर तरफ दिखाई नहीं देता। कुछ ऐसा ही हम लोकतंत्र को और जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है उस संविधान को ही जानते हैं। क्या आप जानते हैं कि संविधान में किसी दलीय लोकतंत्र की कोई बात नहीं कही गई है। केवल जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनने की बात है , और ये भी कि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनेंगे देश की सरकार चलाने को पधानमंत्री अथवा राज्यों का मुख्यमंत्री। आज क्या हो रहा है , कब से होता आया है कि कोई दल पहले से तय करता है कि कौन अगली सरकार का मुखिया होगा। क्या ये अधिकार उनका नहीं होना चाहिये जिनको जनता अपना प्रतिनिधि चुनेगी। एक और बेहद महत्वपूर्ण बात है कि हम सब बातें करते हैं आज़ादी की जबकि हमारे विधायक और सांसद तक आज़ाद नहीं हैं , उनको अपने दल की हर बात माननी होती है। क्या राजनीतिक दल बड़े हैं , हमारी निजि आज़ादी उनके हितों से छोटी है। दिल्ली में एक नई सरकार बनी है अभी अभी , बहुत बदलाव की बातें की इन लोगों ने।  मगर चार दिन भी नहीं टिक पाये अपनी बातों पर। ये भी नहीं सोचा कि उनको कोई पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिसको सही मायने में जनादेश समझा जाता और अभी से इतराने लगे हैं। अब वे भी अन्य दलों की तरह सोचते हैं कि यहां सत्ता मिल गई अब देश की सत्ता को हासिल करना है। काश कोई सोचता कि केवल सत्ता ही हासिल नहीं करनी बल्कि व्यवस्था को बदलना है जिससे तंग आकर जनता ने पिछली सरकार को हराया है। सिर्फ बिजली पानी में छूट देने से कुछ नहीं बदल सकता , साफ कहें तो ये एक छल है क्योंकि जो सबसिडी सरकार किसी भी रूप में देती है वो भार जनता पर ही पड़ता है घूम फिर कर। इनसे महत्वपूर्ण काम हैं , अस्प्तालों में सही इलाज , स्कूलों में सही शिक्षा सभी को एक समान मिले , कानून व्यवस्था को सही किया जाये , अन्याय और शोषण बंद हो। सब से पहला काम होना चाहिये कि कुछ मुट्ठी भर लोग ही सब फैसले करने के हकदार नहीं हों। विधानसभा हो या संसद या फिर कोई संगठन हो चाहे मंत्री परिषद , हर जगह सभी की राय ली जानी चाहिये। लोकतंत्र के नाम पर अभी तक कुछ लोग , कुछ परिवार ही शासन करते रहे हैं , अब इसका अंत होना ही चाहिये।जिस देश की दो तिहाई आबादी गरीबी की रेखा से नीचे नर्क से बदतर जीवन जीती हो उसके नेता अगर विलासिता पूर्वक जीवन जनता के पैसे से जियें तो ये किसी जघन्य अपराध से कम नहीं। कहने को लोकतंत्र में जनता देश की मालिक है और प्रशासन व सांसद , विधायक उसके सेवक।  मगर क्या ये उचित है कि जो मालिक हो वो भूखा रहे और जो उसके सेवक हों वो ऐश से रहें। बहुत बातें की जाती हैं सब को बराबर सब कुछ मिलने की , मगर कैसे हो ऐसा ये कोई नहीं बताता। देश का धन , संपति , हर सुविधा का एक बहुत बड़ा हिस्सा कुछ एक लोगों के कब्ज़े में है , अगर गरीबों का कल्याण करना है तो अमीरों से लेना ही होगा जो उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है। अभी तक सरकारें इसका उल्टा ही करती आई हैं। आम जनता को जब भी कुछ देने की बात होती है तो ढोल बजाकर प्रचार किया जाता है , लेकिन उससे कहीं अधिक बड़े बड़े उद्योग घरानों को चुपचाप दे दिया जाता है। आपने देखा होगा वित्तमंत्री प्रधानमंत्री को इन सभी से मिलते , इनकी बात सुनते। कभी देखा है गरीबों से मिलते उसकी बात सुनते , नहीं उसको केवल भाषण सुनाये जाते हैं या अपने दरबार में बुलाया जाता है हाथ जोड़ भीख मांगने को। संविधान की रक्षा की शपथ लेने वालों ने आज तक उसकी भावना का अनादर ही किया है। आज तक किसी अदालत ने ये सवाल नहीं किया कि संविधान में विधायिका को खुद कोई धन खर्च करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है उसे योजना बनाने और कार्यपालिका से लागू करवाना चाहिये और उसकी निगरानी करनी चाहिये। ये जो सांसदों और विधायकों को कल्याण राशि मिलने का प्रावधान किया गया है और जिसमें भ्रष्टाचार बहुत आम है वो संविधान की अवधारणा के विपरीत है। जनता के धन को नेताओं ने चोरी का माल समझ कर हमेशा बेदर्दी से बर्बाद किया है। चुनाव जीतते ही इनको कोठी कार ही नहीं जाने कितना ताम झाम चाहिये। हर दिन करोड़ों रुपये इनकी रैलियों पर खर्च होते हैं , जो किसी इमानदार की जेब से नहीं आते , ये सारा पैसा आता है उन लोगों से चंदा या उगाही करके जिनको अनुचित लाभ मिलते हैं। कभी सोचा है कि जब कोई मुख्यमंत्री बनता है तब उसका परिवार , बेटा बेटी , पत्नी दामाद , सब के सब इस तरह आचरण करते हैं जैसे उनकी रियासत हो। ये मीडिया वाले भी ऐसे में उनके बच्चों तक का साक्षात्कार लेने लगते हैं। इस देश में कितने लोग बेघर हैं , मगर शायद ही कोई नेता हो जिसके पास अपना घर नहीं हो। फिर भी विधायक सांसद , मंत्री बनते ही इनको सरकारी आवास चाहिये। चलो माना इनको जहां इनका अपना घर है वहां रह कर काम करने में असुविधा हो तो दूसरी जगह घर मिल जाये , लेकिन तब क्या इनका पहले का घर तब तक सरकारी उपयोग में नहीं रहना चाहिये जब तक इनको मुफ्त आवास सरकार से मिला रहे। वास्तव में किसी भी अफ्सर को जब सरकारी घर मिले तब उसके खुद के घर को जो जिस किसी भी नगर में हो सरकार अथवा जनता के काम के लिये उपयोग किया जाये तो इनकी खुद की आवास समस्या हल हो सकती है। बाकी सब बातों से पहले प्रमुख बात ये है कि क्या कभी इन तथाकथित जनसेवकों को महसूस होगा कि इनसे पहले सभी कुछ उस जनता को मिले जिसकी सेवा करने का ये दम भरते हैं। चलो आज इतना ही , बाकी फिर कभी ।