अगस्त 24, 2018

POST : 882 रईस कितना गरीब गरीब कितना अमीर ( व्यंग्य )डॉ लोक सेतिया

   रईस कितना गरीब गरीब कितना अमीर ( व्यंग्य )डॉ लोक सेतिया

      सीधी सधी भाषा में समझ नहीं आता ये बड़ी टेढ़ी खीर है । अमीर बहुत गरीब है गरीब कितना अमीर है ।
 सच कोई नहीं जानता सच सभी जानते हैं । राज़ कुछ भी नहीं है राज़ हर बात में छुपा है । सवाल में जवाब है और हर जवाब खुद इक सवाल है । इक नेता ने कहा था राजधानी से एक रुपया जाता है चलते चलते घिस कर पंद्रह पैसे गांव तक पहुंचता है । तब सभी ने मान लिया सरकार है झूठ थोड़ा बोलती है , किसी को पंद्रह पैसे दिखाई नहीं दिए किसी को रुपया नज़र नहीं आया । इतने सालों बाद रूपये की कीमत कुछ भी नहीं है अब भिखारी भी दस पांच रूपये दे दो चाय पीनी है रोटी खानी है । दस रूपये में चाय मिल जाये इतना कम है , चाय वाला सत्ता में है क्या शान है क्या विदेशी सैर है क्या पोशाक है , फिर भी कहता है गरीब है उसका अपना कुछ भी नहीं है । अब उसी ने बताया है कि सौ पैसे पहुंचते हैं । असलियत कोई नहीं जानता जुमले दोनों खूब हैं अच्छे दिन की तरह । वास्तव में रुपया सौ पैसे नीचे पहुंचता तो बीच वालों की हालत खराब हो गई होती सब सरकारी लोग भुखमरी से मर जाते भला वेतन से जी सकता है कोई । इक अर्थ शास्त्री से सवाल किया आप तो बजट बनाते हैं आप ही बताओ गरीब कौन है । 
 
              हाथ उठाकर बोले रुको , आमदनी कम होना गरीबी की निशानी नहीं है । आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया मतलब घाटे में जो भी हो असली गरीब वही है । सरकार का बजट हमेशा घाटे का रहता है तो देश में सबसे गरीब सरकार खुद है । गरीबों में पहला नाम यही लिख लो । बजट का मतलब होता है सरकार को अपने ताम झाम पर शानोशौकत पर शाही ठाठबाठ पर कितना धन चाहिए और किस किस तरह से जनता से वसूल किया जा सकता है । ये वही है जो खुद कुछ भी नहीं कमाता है उसके अधीन जो जो भी है सब घाटे में होता है जबकि उसी काम को करते हुए लोग खूब आमदनी करते हैं । डाकू लोग कमाई नहीं करते औरों की कमाई पर अपना अधिकार समझते हैं मगर उनको कानून अपराधी मानता है ।  सरकार के पास यही लूटने का अधिकार है जिसे बजट बनाते समय उपयोग करती है । आपको सरकार को देने को कितना कमाना है सरकार बताती है कैसे कमाना है कभी नहीं बताती है । सरकारी सच यही है कि जितना लेती है उसका एक चौथाई भी जनता को वापस नहीं करती है । हर साल इक रेखा बना कर दिखलाते हैं रुपया आएगा किस किस तरह से और खर्च किस किस जगह किया जायेगा । 75 पैसे तो सरकारी कर्मचारी अधिकारी नेता पुलिस और देश की रक्षा पर खर्च होता है 25 पैसे जनता की खातिर होते हैं मगर अक्सर वो भी पूरे खर्च नहीं होते हैं । मार्च महीने में हर विभाग में इक लूट मची होती है बकाया बजट खत्म करना है और अगली बार बढ़वाना भी है । 
 
     सर्वेक्षण की बात मत पूछो , गरीब कौन है सरकार ने पहचान करने को कहा है । मामला उतना सरल नहीं है , हर रेखा छोटी लगती है अगर सामने उससे बड़ी रेखा बना दी जाये । बचपन से हम यही करते आये हैं कैसे बिना मिटाये किसी रेखा को छोटी कर सकते हैं , उसके सामने बड़ी रेखा बनाकर आसानी से किया जा सकता है ये काम जो असंभव लगता है । हर अमीर अपने से अमीर से गरीब है , पुराने लोग अपनी अमीरी को नज़र नहीं लगने देते थे और करोड़पति अपने बेटे का नाम गरीबदास रख लेते थे और जो फटीचर होते उनके बेटे का नाम अमीर चंद होता था । अमीर चंद गरीब और गरीब दास रईस क्या कमाल है । सरकारी फार्म भरना है ताकि साबित किया जा सके किसे अनुदान की ज़रूरत है । दौलतराम बही खाता दिखलाता है , कोठी कार बंगला दुकानें सब हैं मगर रोने लगे मंदे की मार ने बेहाल किया हुआ है । सरकारी कर और बैंकों का क़र्ज़ भरते भरते जान निकल जायेगी । काश हज़ारों करोड़ का क़र्ज़ होता तो विदेश भाग जाते । समय पर राजनीति में चले जाते तो कम से कम अपने जेब से तो इक पाई खर्च नहीं करना पड़ता । हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होता । कारोबार में रात दिन सब करने के बाद भी तिजोरी भरती ही नहीं सच बताएं तो बेहद गरीब हैं , सरकार कोई मदद करे तो बच सकते हैं । गरीबों में नाम लिख लो जी । 
 
              सरकारी कर्मचारी से हाल पूछा तो बिफर उठे । तबादला ऐसी सीट पर कर दिया है कि गुज़ारा ही नहीं होता , नाम भर को ऊपरी कमाई है और डर बना रहता है । दफ्तर की दराज से मिले पैसे किस के हैं कैसे बताएं और कहां रखते छुपाकर । मलाईदार सीट पर नेताओं के ख़ास लोग हैं और हर दिन उन्हीं को और पैसा मिलता है किसी तरह से खर्च करने को । विभाग पुलिस का और रोज़ मनोरंजन नाच गाना तमाशे करवाते हैं एनजीओ की आड़ में घर भरते हैं । सरकार खुद किसी अपराधी के चरण में सर झुकाती है और उसके अनुचित अवैध निर्माण को इक नियम बनाकर वैध कर देती है । मगर वो बाबा लोग कहते हैं उनके नाम कुछ भी नहीं है । गरीबी में ऐसी शान क्या बात है । पता होता तो सरकारी नौकरी नहीं उपदेश देने या योग सिखाने का काम करते नहीं तो चाय की दुकान ही खोल लेते । ज़माना बदल गया है सब खुद को गरीब साबित करना चाहते हैं । सबको भीख चाहिए , भिखारी सारी दुनिया दाता एक राम नहीं आजकल दाता सरकार है जो वास्तव में सबसे बड़ी भिखारी है । उसको भीख विश्व बैंक आई एम एफ और जाने किस किस से चाहिए , जबकि उनका गणित और भी उल्टा है उनकी शर्तों में देश आज़ाद होकर भी गुलाम है । कहने को बड़ों की बातों को याद करते हैं मगर जो शिक्षा बड़े बजुर्ग सिखाते मर गये उस पर अमल कोई नहीं करता है । जितनी चादर उतने पैर फैलाओ और इज़्ज़त से जीना है तो उधार लेकर मत शान दिखाओ । गरीबी की रेखा तुम ही समझाओ , नीचे हैं लोग कुछ तुम ही नीचे चली जाओ । 
 
 क्या कुछ लोगों को अमीर होने के लिए दूसरों को गरीब होना जरूरी है? - Quora

अगस्त 23, 2018

POST : 881 बड़े लोग छोटी बात ( अजब हालात ) डॉ लोक सेतिया

         बड़े लोग छोटी बात ( अजब हालात ) डॉ लोक सेतिया             

      आपने देखा इन सब को कैसे रुआब से डांटते हैं लताड़ लगाते हैं गरीबों को । आज से नहीं सदियों से ये चला आ रहा है बेबसी जुर्म है हादिसा जुर्म है ज़िंदगी तेरी इक इक अदा जुर्म है । कोई अभिनेता है जो विज्ञापन करता है खूब पैसा कमाता है मगर यमराज बनकर समझाता कम धमकाता अधिक है कि एक करोड़ का टर्म इंशोरेंस इतने में करवाते । भाई आपको उनके घर के लोगों से इतनी ही सहनुभूति है तो मत आते । कोई और था जो स्वच्छता की बात पर अपमानित करता था गांव वालों को सड़क पर चलने वालों को । इतनी चिंता है तो सरकार नहीं बनवाती तो आप तो दौलमंद देश भक्त और सत्य की बात करते हैं बनवाते हर जगह शौचालय अदि । अभी तक कितनों को करोड़पति बना चुके हैं तथाकथित महानायक जो इस बार दूसरे ढंग से बुलाते हैं , लोग आकर ले गये लूट कर आप कब तक सोचते रहोगे । आपको पैसे कमाने हैं कमाओ कौन रोकता है मगर ऐसी भाषा बोलने का अधिकार आपको नहीं है । इस देश में सब आपकी सोच वाले नहीं हैं कि पैसे कमाने को कुछ भी करो । झूठ बोलने से लेकर सत्ता की भाषा बोलने तक और बाज़ार की भाषा बोलने तक । ऐसी महानता आपको मुबारिक हो । इन सावन के अंधों को कुछ भी दिखाई नहीं देता सिवा सरकारी झूठ के । इसी सरकार ने पहले इक रूपये महीना में जनता का बीमा किया था , कोई बताये किसको बीमा राशि का भुगतान हुआ । जब खुद बीमा करवाने पर तमाम कागज़ पास होने पर भी बीमा कंपनियां भुगतान नहीं करतीं तो सरकारी बीमा का भुगतान कैसे करेंगे । कोई नाम पता नहीं बस लाखों लोगों की राशि सरकारी खज़ाने से मिल गई । किसान की फसल का भी बीमा करने की बात कही थी , किसान आत्महत्या करते हैं बदहाली में अगर बीमा राशि मिलती तो क्या ऐसा होता । अभी इक नई योजना स्वास्थ्य बीमा की शुरू की है पचास रूपये सालाना एक परिवार को अर्थात 10 से 15 रूपये में कौन सी कंपनी देगी भुगतान । तरीका बदल गया है लूट का । वास्तव में करना है तो सभी की शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार अपने कर्तव्य समझ उपलब्ध करवाती तो जनता की आधी परेशानियां हल हो जाती । लोगों को उनके अधिकार मिलने चाहिएं खैरात नहीं । 
 

        चलके तो गैर के कदमों से कहीं के न रहे , अपने पैरों पे अगर चलते तो चलते रहते। 

        नईम अख्तर बुरहानपुरी जी का शेर ऐसे तमाम लोगों के लिए है जो सत्ता के तलवे चाटकर राज्य सभा पहुंच कर खामोश हो जाते हैं या जो टीवी चैनल वाले सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियां लेकर दौड़ने की बात करते हैं । हम महनतकश लोग थोड़े में गुज़ारा करते हैं मगर मुफ्त में कुछ नहीं लेते हैं । ये जो खुद को धनवान कहते हैं उन्हीं की भूख बढ़ती जाती है जितनी दौलत जमा होती जाये । जिन से आपकी आमदनी की पाई पाई आती है उन्हीं को आप इस तरह अपमानित करते हैं , बिना सोचे समझे । दाता कौन है और भिखारी कौन । भीख केवल गरीब लोग नहीं मांगते मज़बूरी में , भिखारी तो बड़े बड़े अमीर लोग भी हैं और उन्हें भीख नहीं मिले तो उनका गुज़ारा ही नहीं होता ये जाँनिसार अख्तर जी ने कहा था इन्हीं लोगों के लिए ।  जनता को लताड़ने की आदत बहुत बुरी है धनवानों की नेताओं की सरकारों की और इन कलाकारों की तो और भी अनुचित है क्योंकि इनकी शानोशौकत इन्हीं आम लोगों के दम पर है । जिस दिन इन सबको जो खुद को आम नहीं ख़ास मानते हैं समझ आएगा उनकी औकात देश के करोड़ों आम नागरिकों के बिना कुछ भी नहीं है उस दिन अपने कहे हर शब्द पर शर्मिंदा होकर माफ़ी मांगेगे जनता से । जनता का दिल इनसे बड़ा है माफ़ कर देगी इनकी सभी खताओं को । 
 
                  टीवी शो पर देश भक्ति की बात करना और फिल्मों में किरदार निभाना आसान है , असली देश से प्यार देश की जनता से मुहब्बत करना है उसे डांटना फटकार लगाना तो गुनाह है । इक सच हर अर्थ शास्त्री जानता है कि कुछ लोगों के पास बहुत अधिक है इसी कारण अधिकतर के पास ज़रूरत लायक भी नहीं है । मगर जो नेता खुद अपने आप पर ही बेतहाशा खर्च कर देश पर बोझ बने हुए हैं वो कभी देश की जनता को समानता के हक नहीं देना चाहेंगे । उनको जिनसे चंदा या घूस मिलती है उन्हीं को लाभ पहुंचाने की योजनाएं बनानी होती हैं । वास्तविक आज़ादी अभी बहुत दूर है , अंधियारा घना है और सूरज के सिंहासन पर अंधेरों का डेरा है ।

अगस्त 22, 2018

POST : 880 इल्ज़ाम किसी और पे जाये तो अच्छा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  इल्ज़ाम किसी और पे जाये तो अच्छा  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार ने व्हाट्सएप्प वालों से कहा है पहला संदेश किसने भेजा इसको तलाश करने का उपाय करो । क्या पहला पत्थर किसने मारा वही गुनहगार है उसके बाद जो लोग आंखें बंद कर संदेश को आगे भेजते रहे वो बेचारे नासमझ भोले भाले लोग थे । कोई गाली बकता है तो आप उसकी गाली का विरोध नहीं करते और लोगों को गाली बकने लगते हैं । गाली देना गलत नहीं है गलती उसकी है जिसने उस गाली का अविष्कार किया था । अगर यही बात है तो शराबी को कोई सज़ा क्यों मिले सज़ा तो सरकार को मिलनी चाहिए जो अपनी कमाई की खातिर शराब बनाने और बेचने को ही नहीं शराबखाना खुलवाने को लाइसेंस देती है । सरकार की बातों से अक्सर लगता है अपने कर्तव्य को नहीं पालन करने का ठीकरा किसी और पर फोड़ना चाहती है । खुद नेता लोग क्या करते है । 

       इस दौरे सियासत का इतना सा फ़साना है , बस्ती भी जलानी है मातम भी मनाना है ।

 आप जब कहते हैं झूठ बोलते हैं जनाब तो पहले आपको बताना होगा मुझसे पहले सबसे पहला झूठ जिसने बोला था उसका पता लगाओ , असली गुनहगार वही है । भीड़ ने आगजनी की किसी को मारा पीटा या जान से मार दिया तो पुलिस को पहली तीली जलाने वाले को पकड़ोगे या माचिस बनाने वाले को । कोई पुल गिर गया तो पकड़ना उस नेता को होगा जिसने उसकी नींव रखी थी , यूं भी नेता नींव रखते हैं और भूल जाते हैं , हमारे मुख्यमंत्री जी बिना कोई विमान बिना कोई लाइसेंस मिले हवाई अड्डे का उदघाटन करते हैं । कल जो भी अंजाम होगा कसूरवार वही होगा जिसने शुरुआत की थी बगैर साधन उपलब्ध करवाए मुहूर्त करने का ।


   आप ये मत पूछो ये जो सोशल मीडिया को अपने राजनीतिक इस्तेमाल को दुरूपयोग करने की शुरुआत किस ने की थी , नाम आएगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही । दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने । राज़ की बात है राज़ ही रहने दो , सारे राज़ खुलने लगे तो अंजाम क्या होगा खुदा जाने । हमको किसके ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही । इक और गीत आपको पसंद आएगा । ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाये तो अच्छा , इस रात की तकदीर संवर जाये तो अच्छा । वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है , इल्ज़ाम किसी और के सर जाये तो अच्छा । आपको यूं भी हर बात का दोष पहले वाले शासकों को मढ़ना पसंद है । आपने भी देश की जनता के साथ कोई वफ़ा तो नहीं की है फिर भी बेवफाई की सज़ा कोई और पाए तो क्या बुरा है ।

     नफरत की शुरुआत किसने की थी , हिंसा की शुरुआत गांधी ने की थी या गोडसे ने इसकी बात मत पूछो , बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी । शायद उस राज्य को भी तलाश करना मुश्किल नहीं जहां से नफरत की तथाकथित प्रयोगशाला शुरू की गई थी । राख में दबी पड़ी हैं कितनी ही चिंगारियां , हवा मत दो वर्ना शोला बनकर कहीं अपने ही दामन को न जला बैठो । सरकार और पुलिस को अपराध को रोकना है केवल मुखबिर से सुराग देने की साज़िश नहीं करनी है ताकि जब ज़रूरत हो उसे भी उपयोग किया जा सके । अपनी हर नाकामी के लिए किसी दूसरे को दोष देना किसी काम का नहीं । काम करना ज़रूरी है जो सरकार काम करने में असफल रहती है उसे रहने का हक नहीं होता है । 
 
 Urdu Poetry : तेरा मिलना खुशी की बात सही, तुझसे मिल कर उदास रहता हूं- साहिर  लुधियानवी - Urdu poetry cigarrete song sahir ludhianvi shayari amrita  pritam lover love poerty urdu poet –

अगस्त 21, 2018

POST : 879 बेचा नहीं गिरवी रखा है ( व्यंग्य रचनाएं ) डॉ लोक सेतिया

बेचा नहीं गिरवी रखा है ( व्यंग्य रचनाएं ) डॉ लोक सेतिया 

     ज़मीर मरा भी नहीं ज़मीर ज़िंदा भी नहीं है । टीवी चैनल वालों ने अपना ज़मीर सुरक्षित रख छोड़ा है किसी न किसी दल के पास किसी न किसी सरकार के पास । अख़बार वालों ने भी किराये पर उठा रखा है ज़मीर अपना रोज़ किरायेदार बदलते हैं रोज़ किराया बढ़ता है । विज्ञापन छापते छापते खुद ही इश्तिहार बन गये हैं फिर भी आईना दिखाने की बात करते हैं खुद अपनी सूरत को नहीं देखते कभी भी । ये बात सोची तो रिश्तों को लेकर थी मगर इस पर भी सही साबित होती है । आशिक़ महबूबा में थोड़ा फासला रहना अच्छा है चेहरा सुंदर लगता है मगर पति पत्नी बनकर जब बहुत करीब से देखते हैं तो हर चेहरे पर छोटे से छोटा तिल भी नज़र आता है , किसी भी चेहरे को ज़ूम कर के बारीकी से देखोगे तो विश्व सुंदरी भी अजीब लगेगी । दूर के ढोल सुहावने होते हैं । आजकल लोग परेशान हैं देख कर कि समाचार वाले टीवी चैनल बेखबर हैं कि हम क्या से क्या हो गए हैं और क्या होते जा रहे हैं । पैसे की चाहत की अंधी दौड़ में अपना ईमान तक गवा बैठे हैं और समझते हैं कितना आगे बढ़ गये हैं । दोहा :-

          आगे कितना बढ़ गया अब देखो इंसान , दो पैसे में बेचता ये अपना ईमान

           1                 संपादक जी 

संपादक जी मेरे दिये समाचार को पढ़ रहे थे और मैं सोच रहा था कि ये सब क्या हो रहा है । समाज किस दिशा को जा रहा है , आखिर कहीं तो कोई सीमा होनी चाहिये । नैतिक मूल्यों का अभी और कितना ह्रास होना बाकी है । "शाबाश अरुण" संपादक जी उत्साह पूर्वक चीखे तो मेरी तन्द्रा भंग हो गई , "धन्यवाद श्रीमान जी " मैं इतना ही कह सका । उनहोंने चपरासी को चाय लाने को कहा व फिर मेरी तरफ देख कर बोले "तुम वास्तव में कमाल के आदमी हो , क्या खबर लाये हो खोजकर आज , कल फ्रंट पेज के शीर्षक से तहलका मचा देगी ये स्टोरी । " मुझे चुप देख कर पूछने लगे " क्या थक गये हो " मैंने कहा कि नहीं ऐसी बात नहीं है । तब उनहोंने जैसे आदेश दिया , अभी बहुत काम करना है तुम्हें , किसी दूसरे अख़बार को भनक लगे उससे पहले और जानकारी एकत्र करनी है । इधर उधर से जो भी जैसे भी हासिल हो पता लगाओ , ये टॉपिक बहुत गर्म है इसपर कई संपादकीय लिखने होंगे आने वाले दिनों में । एक तो कल के अंक में लगाना चाहता हूं , थोड़ा मसाला और ढूंढ लाओ तो मज़ा आ जाये । " सम्पादक जी को जोश आ गया था और मैं समझ नहीं पा रहा था कि जिस खबर से मेरा अंतर रोने को हो रहा है उस से वे ऐसे उत्साहित हैं जैसे कोई खज़ाना ही मिल गया है । कल अख़बार में इनका संपादकीय लेख पढ़ कर पाठक सोचेंगे कि ये बात सुनकर बहुत रोये होंगे संपादक जी । कितनी अजीब बात है जो आज ठहाके लगा रहा है वो कल अखबार में दर्द से बेहाल हुआ दिखाई देगा । चाय कब की आ गई थी और ठंडी हो चुकी थी , मैंने उसे पानी की तरह पिया और इजाज़त लेकर उनके केबिन से बाहर आ गया था । मुझे याद नहीं संपादक जी क्या क्या कहते रहे थे , लेकिन उनका इस दर्द भरी बात पर यूं चहकना मुझे बेहद खल रहा था । उनके लेखों को पढ़कर जो छवि मेरे मन में बन गई थी वो टूट चुकी थी ।
 
                  मैं भी इस बारे और जानकारी हासिल करना चाहता था , संपादक जी के आदेश से अधिक अपने मन कि उलझन को मिटाने के लिये । शाम को कई बातें मालूम करने के बाद जब दफ्तर पहुंचा तो संदेश मिला कि संपादक जी ने घर पर बुलाया है । जाना ही था पत्रकार होना भी क्या काम है । उनको भी मेरा बेसब्री से इंतज़ार था , पूरी जानकारी लेने के बाद कहने लगे अब यही कांड कई दिन तक ख़बरों में , चर्चा में छाया रहेगा । ये सुन उनकी श्रीमती जी बोली थी इससे क्या फर्क पड़ता है । उनका जवाब था , बहुत फर्क पड़ता है , हम अख़बार वालों को ही नहीं तमाम लिखने वालों को ऐसा विषय कहां रोज़ रोज़ मिलता है । देखना इसी पर कितने लोग लिख लिख कर बहुत नाम कमा लेंगे और कुछ पैसे भी । इस जैसी खबर से ही अख़बार की बिक्री बढ़ती है , जब अख़बार का प्रसार बढ़ेगा तभी तो विज्ञापन मिलेंगे ।  देखो ये अरुण जो आज इस खबर से उदास लग रहा है , जब कल इसके नाम से ये स्टोरी छपेगी तो एक अनजान लड़का नाम वाला बन जायेगा । अभी इसको ये भी नहीं समझ कि इसकी नौकरी इन ख़बरों के दम पर ही है , कल ये भी जान जायेगा अपने नाम की कीमत कैसे वसूल सकता है । मैं ये सब चुपचाप सुनता रहा था और वापस चला आया था ।

                अगली सुबह खबर के साथ ही मुखपृष्ठ पर संपादक जी का लेख छपा था :: " घटना ने सतब्ध कर दिया और कुछ भी कहना कठिन है ::::  :  " मुझे बेकार लगा इससे आगे कुछ भी पड़ना , और मैंने अख़बार को मेज़ पर पटक दिया था । मैं नहीं जानता था कि साथ की मेज़ पर बैठे सह संपादक शर्मा जी का ध्यान मेरी तरफ है । शर्मा जी पूछने लगे , अरुण क्या हुआ सब कुशल मंगल तो है , खोये खोये से लग रहे हो आज । मैंने कहा शर्मा जी कोई बात नहीं बस आज की इस खबर के बारे सोच रहा था । और नहीं चाहते हुए भी मैं कल के संपादक जी के व्यवहार की बात कह ही गया । शर्मा जी मुस्कुरा दिये और कहने लगे अरुण तुमने गीता पढ़ी हो या नहीं , आज मैं तुम्हें कुछ उसी तरह का ज्ञान देने जा रहा हूं , जैसा उसमें श्रीकृष्ण जी ने दिया है अर्जुन को । अपना खास अंदाज़ में मेज़ पर बैठ गये थे किसी महात्मा की तरह । बोले  " देखो अरुण किसी पुलिस वाले के पास जब क़त्ल का केस आता है तो वो ज़रा भी विचलित नहीं होता है , और जिसका क़त्ल हुआ उसी के परिवार के लोगों से हर तरह के सवाल करने के साथ , चाय पानी और कई साहूलियात मांगने से गुरेज़ नहीं करता । कोई इस पर ऐतराज़ करे तो कहता है आप कब हमें शादी ब्याह पर बुलाते हैं । इसी तरह वकील झगड़ा करके आये मुवकिल से सहानुभूती नहीं जतला सकता , क्योंकि उसको फीस लेनी है मुकदमा लड़ने की । जब किसी मरीज़ की हालत चिंताजनक हो और बचने की उम्मीद कम हो तब डॉक्टर की फीस और भी बढ़ जाती है । पुलिस वाले , वकील और डॉक्टर दुआ मांगते हैं कि ऐसे लोग रोज़ आयें बार बार आते रहें । पापी पेट का सवाल है । ख़बरों से अपना नाता भी इसी तरह का ही है , और हम उनका इंतज़ार नहीं करते बल्कि खोजते रहते हैं । देखा जाये तो हम संवेदनहीनता में इन सभी से आगे हैं । ये बात जिस दिन समझ जाओगे तुम मेरी जगह सह संपादक बन जाओगे , जिस दिन से तुम्हें इन बातों में मज़ा आने लगेगा और तुम्हें इनका इंतज़ार रहेगा उस दिन शायद तुम संपादक बन चुके होगे । कुछ लोग इससे और अधिक बढ़ जाते हैं और किसी न किसी पक्ष से लाभ उठा कर उनकी पसंद की बात लिखने लगते हैं अपना खुद का अख़बार शुरू करने के बाद । हमारी तरह नौकरी नहीं करते , हम जैसों को नौकरी पर रखते हैं । सब से बड़ा सत्य तुम्हें अब बताता हूं कि आजकल कोई अख़बार ख़बरों के लिये नहीं छपता है , सब का मकसद है विज्ञापन छापना । क्योंकि पैसा उनसे ही मिलता है इसलिये कोई ये कभी नहीं देखता कि इनमें कितना सच है कितना झूठ । सब नेताओं के घोटालों की बात ज़ोर शोर से करते हैं , सरकार के करोड़ों करोड़ के विज्ञापन रोज़ छपते हैं जिनका कोई हासिल नहीं होता , सरासर फज़ूल होते हैं , किसी ने कभी उन पर एक भी शब्द बोला आज तक । शर्मा जी की बातों का मुझ पर असर होने लगा था और मेरा मूड बदल गया था , मैंने कहा आपकी बात बिल्कुल सही है शर्मा जी । वे हंस कर बोले थे मतलब तुम्हारी तरक्की हो सकती है ।

              इन बातों से मेरे मन से बोझ उतर गया था और मैं और अधिक उत्साह से उस केस की जानकारी एकत्र करने में जी जान से जुट गया था । शाम को जब अपनी रिपोर्ट संपादक जी को देने गया तो उन्होंने मुझे कि उनकी बात हुई है अख़बार के मालिक से तुम्हारी पदोन्ति के बारे और जल्दी ही तुम सह संपादक बना दिये जाओगे । जी आपका बहुत शुक्रिया , जब मैंने संपादक जी का आभार व्यक्त किया तब शर्मा जी की बात मेरे भीतर गूंज रही थी । मैं शर्मा जी का धन्यवाद करने गया तब उन्होंने पूछा कि अरुण तुम्हें कर्म की बात समझ आई कि नहीं । मैंने जवाब दिया था शर्मा जी कर्म का फल भी शीघ्र मिलने वाला है । हम दोनों हंस रहे थे , अख़बार मेज़ से नीचे गिर कर हमारे पांवों में आ गया था , कब हमें पता ही नहीं चला ।


               2         सवाल विशेषाधिकार का 

    यमराज जब पत्रकार की आत्मा को ले जाने लगे तब पत्रकार की आत्मा ने यमराज से कहा कि मैं बाकी सभी कुछ यहां पर छोड़ कर आपके साथ यमलोक में चलने को तैयार हूं , आप मुझे एक ज़रूरी चीज़ ले लेने दो । यमराज ने जानना चाहा कि वो कौन सी वस्तु है जिसका मोह मृत्यु के बाद भी आपसे छूट नहीं रहा है । पत्रकार की आत्मा बोली कि मेरे मृत शारीर पर जो वस्त्र हैं उसकी जेब में मेरा पहचान पत्र है उसको लिये बिना मैं कभी कहीं नहीं जाता । यमराज बोले अब वो किस काम का है छोड़ दो ये झूठा मोह उसके साथ भी । पत्रकार की आत्मा बोली यमराज जी आपको मालूम नहीं वो कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है , जिस किसी दफ्तर में जाओ तुरंत काम हो जाता है , अधिकारी सम्मान से बिठा कर चाय काफी पिलाता है , अपने वाहन पर प्रैस शब्द लिखवा लो तो कोई पुलिस वाला रोकता नहीं । पत्रकार होने का सबूत पास हो तो आप शान से जी सकते हैं । यमराज ने समझाया कि अब आपको जिस दुनिया में ले जाना है मुझे , उस दुनिया में ऐसी किसी वस्तु का कोई महत्व नहीं है । पत्रकार की आत्मा ये बात मानने को कदापि तैयार नहीं कि कोई जगह ऐसी भी हो सकती है जहां पत्रकार होने का कोई महत्व ही नहीं हो । इसलिये पत्रकार की आत्मा ने तय कर लिया है कि यमराज उसको जिस दुनिया में भी ले जाये वो अपनी अहमियत साबित करके ही रहेगी ।

            धर्मराज की कचहरी पहुंचने पर जब चित्रगुप्त पत्रकार के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब देख कर बताने लगे तब उसकी आत्मा बोली मुझे आपके हिसाब किताब में गड़बड़ लगती है । आपने मुझसे तो पूछा ही नहीं कि आप सभी पर मेरी कोई देनदारी भी है या नहीं और अपना खुद का बही खाता खोल कर सब बताने लगे । आपको मेरी उन सभी सेवाओं का पारिश्रमिक मुझे देना है जो सब देवी देवताओं को मैंने दी थी । आपको नहीं जानकारी तो मुझे मिलवा दें उन सब से जिनके मंदिरों का मैं प्रचार करता रहा हूं । कितने देवी देवता तो ऐसे हैं जिनको पहले कोई जानता तक नहीं था , हम मीडिया वालों ने उनको इतना चर्चित कर दिया कि उनके लाखों भक्त बन गये और करोड़ों का चढ़ावा आने लगा । हमारा नियम तो प्रचार और विज्ञापन अग्रिम धनराशि लेकर करने का है , मगर आप देवी देवताओं पर भरोसा था कि जब भी मांगा मिल जायेगा , इसलिये करते रहे । अब अधिक नहीं तो चढ़ावे का दस प्रतिशत तो हमें मिलना ही चाहिये । धर्मराज ने समझाया कि वो केवल अच्छे बुरे कर्मों का ही हिसाब रखते हैं , और किसी भी कर्म को पैसे से तोलकर नहीं लिखते कि क्या बैलेंस बचता है । हमारी न्याय व्यवस्था में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अच्छे कर्म का ईनाम सौ रुपये है और किसी बुरे का पचास रुपये जुर्माना है । और जुर्माना काटकर बाक़ी पचास नकद किसी को दे दें । पत्रकार की आत्मा कहने लगी , ऐसा लगता है यहां लोकतंत्र कायम करने और उसकी सुरक्षा के लिये मीडिया रूपी चौथे सतंभ की स्थापना की बहुत ज़रूरत है । मैं चाहता हूं आपके प्रशासनिक तौर तरीके बदलने के लिये यहां पर पत्रकारिता का कार्य शुरू करना , मुझे सब बुनियादी सुविधायें उपलब्ध करवाने का प्रबंध करें । धर्मराज बोले कि उनके पास न तो इस प्रकार की कोई सुविधा है न ही उनका अधिकार अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का । मुझे तो सब को उनके कर्मों के अनुसार फल देना है केवल ।

                 पत्रकार की आत्मा कहने लगी हम पत्रकार हमेशा सर्वोच्च अधिकारी से ही बात करते हैं । आपके ऊपर कौन कौन है और सब से बड़ा अधिकारी कहां है , मुझे सीधा उसी से बात करनी होगी । ऐसा लगने लगा है जैसे पत्रकार की आत्मा धर्मराज को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है । जैसे धर्मराज यहां पत्रकार के कर्मों का लेखा जोखा नहीं देख रहे , बल्कि धर्मराज की जांच पड़ताल करने को पत्रकार की आत्मा पधारी है यहां । आज पहली बार धर्मराज ये सोचकर घबरा रहे हैं कि कहीं इंसाफ करने में उनसे कोई चूक न हो जाये । पत्रकार की आत्मा धर्मराज के हाव भाव देख कर समझ गई कि अब वो मेरी बातों के प्रभाव में आ गये हैं , इसलिये अवसर का लाभ उठाने के लिये वो धर्मराज से बोली , आपको मेरे कर्मों का हिसाब करने में किसी तरह की जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है । जब चाहें फैसला कर सकते हैं , लेकिन जब तक आप किसी सही निर्णय पर नहीं पहुंच जाते , तब तक मुझे अपनी इस दुनिया को दिखलाने की व्यवस्था करवा दें । मैं चाहता हूं यहां के देवी देवता ही नहीं स्वर्ग और नर्क के वासियों से मिलकर पूरी जानकारी एकत्रित कर लूं । पृथ्वी लोक पर भी हम पत्रकार पुलिस प्रशासन , सरकार जनता , सब के बीच तालमेल बनाने और आपसी विश्वास स्थापित करने का कार्य करते हैं । कुछ वही यहां भी मुमकिन है ।

              काफी गंभीरता से चिंतन मनन करने के बाद धर्मराज जी इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि अगर इस आत्मा से पत्रकारिता के भूत को नहीं उतारा गया तो ये यहां की पूरी व्यवस्था को ही छिन्न भिन्न कर सकती है । इस लोक में पत्रकारिता करके नया भूचाल प्रतिदिन खड़ा करती रहेगी ।  तमाम देवी देवताओं को प्रचार और उनके साक्षात्कार छापने - दिखाने का प्रलोभन दे कर प्रभावित करने का प्रयास कर सकती है । पृथ्वी लोक की तरह यहां भी खुद को हर नियम कायदे से ऊपर समझ सकती है । पहले कुछ नेताओं अफ्सरों की लाल बत्ती वाली वाहन की मांग भी जैसे उन्होंने स्वीकार नहीं की थी उसी तरह पत्रकारिता के परिचय पत्र की मांग को भी ठुकराना ही होगा । धर्मराज जी ने तुरंत निर्णय सुना दिया है कि जब भी अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किया जायेगा तब इसका कोई महत्व नहीं होगा कि किस की आत्मा है । नेता हो अफ्सर हो चाहे कोई पत्रकार , यहां किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं होगा ।

           3       जो बिक गये , वही खरीदार हैं 

कहानी एक वफादार कुत्ते की है । अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता । कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया । वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है । इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये । वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता । अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे । गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये । तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो । मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया । ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना । हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो । बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते । कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को । धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा । इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई । जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा । अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था ।

              आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है । अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं । मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है । हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं। इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं । कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं । जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं । जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते ।

                       चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये । मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है । अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी । संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है । हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत । आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है । आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं । नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता । संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा । आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी । अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते । सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था ।

               सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है । जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके । भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है । कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं । जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को । जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह । अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों । जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर । वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है । तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह ।

          4     जिन्हें अंधकार से प्यार हो गया है 

  घटना पुरानी है दस साल पहले की , लोग भूल भी गये होंगे , मुझे बार बार याद आती रहती है , क्योंकि उसी तरह की खबरें आये दिन पढ़ने को मिलती ही रहती हैं ।  घटना इतनी सी है कि एक आदमी अपने एक कमरे के किराये के घर में ज़िंदा जलकर मर गया । हम सभी ने कभी न कभी अपने हाथ को किसी गर्म बर्तन से छूने से या गलती से आग को छूने का एहसास किया होगा , वो जलन वो दर्द सिरहन पैदा करता है । जब भी सुनते हैं कोई आग में झुलस गया या ज़िंदा जल गया तन बदन में कंपकंपी सी होने लगती है । मगर उस दिन इक अख़बार ने वो खबर छापी थी तब के विधायक की तस्वीर के साथ ये बताने को कि उस गरीब की अस्वाभाविक मौत पर जब उन्होंने ये जानकारी नेता जी को दी तो वह खुद गये उस पिड़ित परिवार को पचीस हज़ार की सहायता राशि देने को । क्या ऐसी घटना के बाद  मात्र यही मान लेना काफी है कि आग बिजली के शार्ट सर्किट से लगी होगी , और क्योंकि घर के बाकी चार सदस्य बाहर गये हुए थे , और वह अकेला एक साल से तपेदिक से बीमार था चारपाई पर लाचार लेटा रहा , चल फिर नहीं सकता था खुद अपना बचाव नहीं कर सका और तड़प तड़प कर मर गया । सरकार आज भी यही करती है और दावा करती है उनकी योजनाएं लोकहितकारी हैं । कई बार समाचार से हमें जितनी बात मालूम होती है उस से अधिक महत्वपूर्ण वो होता है जो न कोई बताता है न शायद कभी हम भी सोचते ही हैं । उस खबर से मेरे मन में जो सवाल उठे और मैंने संबंधित लोगों से पूछे जिनको सुन वो खफा हुए मेरे साथ आज बताता हूं , अर्थात दोहराता हूं । जो आदमी इस कदर बीमार हो उसको तो हॉस्पिटल में भर्ती होना चाहिए था , मगर पता चला सरकारी हॉस्पिटल ने इनकार कर दिया था , जबकि स्वास्थ्य विभाग का प्रचार है टी बी की दवा "डॉट्स " घर घर पहुंचाने का । उस गरीब परिवार को सरकारी बी पी एल कार्ड भी नहीं मिला था न ही कोई मुफ्त प्लाट सौ गज़ का जैसा सरकारी विज्ञापन दावा करता है । आप प्रतिदिन कितने ऐसे विज्ञापन टीवी पर या अख़बार में देखते या पढ़ते हैं , असलियत कोई नहीं जानता ।

        क्या हर खबर आपके लिये इक तमाशा भर है । अब लगता है जैसे कुछ लोगों को अंधकार से प्यार हो गया है । पतन को उत्थान घोषित कर दो , पाप को पुण्य बताओ , झूठ पर सच का लेबल लगा दो , धृतराष्ट्र को दूरदर्शी बताकर उसका गुणगान करो । राजनीति रूपी नर्तकी सभी को लुभा रही है , उसे हासिल करने को किसी भी सीमा तक नीचे गिरने को तैयार हैं लोग । स्वार्थ की आंधी सभी को उड़ा कर ले जा रही है , सफल होना एकमात्र ध्येय है और सफलता का मतलब धनवान होना ही है । जानते हुए भी अंधविश्वास और छल कपट को बढ़ावा दे रहे हैं चंद सिक्कों में ईमान बिक रहा है । पैसे का मोह ऐसा बढ़ा है कि जो सच का चिराग लेकर चले थे आज रौशनी से बचने और अंधेरों का कारोबार करने लगे हैं । मकसद आम नहीं ख़ास कहलाना है , उसकी कीमत चुकाने को राज़ी हैं । जनता के ज़िंदा रहने या मरने से अधिक महत्व खुशहाल जीवन और सुख सुविधा धन दौलत बंगला गाड़ी जैसी चीज़ों का लगता है । हमारा किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं है , बस इक अवसर की तलाश है। जो हमें ऊपर ले जा सके उसी का गुणगान करने को तत्पर हैं । हमें इक दल मिल गया है जो अपने को कहता आम है मगर समझता सब से ख़ास है । उसका रंग उसका पहनावा यही हमारी पहचान है , कथनी और करनी का विरोधभास तक हमें मंज़ूर है । कल तक जिन आदर्शों जिन मूल्यों की बात किया करते थे हम आज वो फज़ूल लगती हैं । हमारा मकसद अपने कार्य को इक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना था , ऊपर आते ही उस सीढ़ी को नष्ट कर दिया है ताकि कोई दूसरा उसका उपयोग नहीं कर सके । अब हमें अपने नेता की जयजयकार करनी है , आडंबर करना है जनसेवा का और जनता ही नहीं खुद को भी धोखा देना है । हमारा दल लोकतंत्र के नाम पर व्यक्तिपूजा करने में आस्था रखता है , दल के भीतर असहमति के लिए कोई स्थान नहीं है । अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के अधिकार को हमने दल के नेता का पास गिरवी रख दिया है ।

             5         चरण पादुका को झुका सर 

     आप इस संपादकीय को सत्ता की आरती कह सकते हैं , किसी अधिकारी के नाम का चालीसा भी । फल दायक तो है ही , जो लोग अपराध रोकने नहीं बढ़ाने का कार्य करते रहे उनको बताया जा रहा संकल्प लिया है अपराध मिटाने का , उनको रखा किसलिए गया है । अपराध बढ़ने पर जिनको कटघरे में खड़ा करना चाहिए उनकी महिमा का बखान कर रहे हो ये क्या कर रहे हो । कभी कोई किसी के इशारे पर आलेख छापता है और खुद न्यायधीश बनकर सच झूठ की अपनी व्याख्या करता है । कोई वक़्त था जब कहते थे :-

       खींचों न कमानों को न तलवार निकालो , जब तोप मुकाबिल हो अख़बार निकालो ।

   अब ये हालत है कि अख़बार किसी उद्देश्य को लेकर नहीं स्वार्थ साधने को धन दौलत कमाने को और बिना किसी योग्यता के विशेषाधिकार हासिल करने को लोग इस धंधे में आते हैं और सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते संसद तक पहुंच जाते हैं । जितना नीचे गिरते हैं उतना ऊंचा आकाश पर पहुंचते हैं मगर जिस दिन पर नहीं साथ देते ज़मीन पर गिरते हैं घायल होकर । 
 
 HOW TO SALE A MORTGAGED PROPERTY

अगस्त 20, 2018

POST : 878 घोड़े की कहानी घास की ज़ुबानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    घोड़े की कहानी घास की ज़ुबानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     हम दोनों का साथ जन्म जन्म का है । मैं जनता की तरह हूं और तुम नेता की तरह । तुम मुझे चरते भी हो और पांव तले कुचलते भी हो मगर मैं खामोश रहती हूं । चुनावी मौसम के आने से पहले नेता खाली बादलों जैसे गरजने लगते हैं जनता को अपने होने का एहसास दिलवाने को और बारिश लाएंगे वादों की समझाने को । घोड़े की तरह अपने दल को मालिक समझ अपने पीठ पर बिठा सत्ता की मंज़िल तक पहुंचाने को तैयार रहते हैं और उसी के हाथ पकड़ी लगाम से दिशा और गति बदलते हैं । नेताओं के लिए जनता मौसमी घास की तरह है भूख लगी तभी खाने को काम आती है मौसम गुज़रते ही घास की तरफ देखते ही नहीं घर बैठे पेट भरने को जो चाहते हैं मिल जाता है । नेता खुद भरोसे के काबिल नहीं होते मगर हर समय यही सोचते हैं ये जनता है इसका कोई भरोसा नहीं कब किसे पटक दे किसे सर पर बिठा ले । भगवान कृष्ण भी इस बारे उपदेश देने से बचते हैं । घास की मज़बूरी है घोड़ा किसी दल के रंग का हो लगाम किसी के भी हाथ हो चुनना पड़ता है , कुछ घोड़े घोड़े नहीं गधे होते हैं जो बेकार शोर करते हैं और कब किसी को दुल्लती मार दें कोई नहीं जानता । इनकी गति धोबी के गधे की तरह की होती है घर के रहते हैं न ही घाट के । गधों की परेशानी है कि कुम्हार की बीवी गधे से गिरती है तो लड़ती कुम्हार के साथ है । हारने के बाद अपनी हार का ठीकरा किसी और पर डालना इसी को कहते हैं । घोड़ा घास खाते खाते घास से अपनी कहानी सुन रहा है । 
 
              जनता बेचारी जानती ही नहीं , कैसे परखना है किस रंग के घोड़े पर दांव लगाना है । घोड़ों की दौड़ में जुए पर देश की गरीब जनता दांव पर लगी होती है । जो भी जीते चीरहरण करना ही है । बेबस है कोई चारा नहीं है नागनाथ सांपनाथ दोनों एक से हैं । कुंवारी कन्या की तरह ख़ुशी से पहले वरमाला डालती है उसके बाद पछताती है किसे क्या समझ कर चुना और वो क्या निकला । पांच साल की बात है उसके बाद शायद कोई मसीहा आज़ाद करवाने आएगा सोचती है । मसीहा कभी नहीं आता है अपनी रस्सी अपनी जंजीर खुद तोड़नी पड़ती है खुद को घायल कर आज़ाद होने को । सब को अपनी सेज सजानी है और उसका उपयोग करना है अपनी मनमर्ज़ी से हर तरह की कामना पूरी करने को । जनता का सब कुछ लूट कर भी उनकी हवस मिटती नहीं है पांच साल में और तब फिर से छलने को नया जाल बुनते हैं मछली पकड़ने की तरह या पंछी को पिंजरे में कैद करने को दाना डालते हैं । सियासत चोले बदलती है और हर बार रूप बदलकर लुभाती है । घास सूखे में मर जाती है और वादों की बारिश आते ही लहलहाती है । ये जो तेरा सवार है वो भी गुनहगार है घास समझाती है मगर पेट भरा हो सच्ची बात कब समझ आती है । कौन सा वादा किया पूरा गिनवाती है । घोड़े की अकल भी घास चरने जाती है उस को गिनती भी दस तक की ही आती है । 
 
             क्या यही मधुमास है , खाली सफेद कैनवास है । न कोई घोड़ा है न कहीं  हरी हरी घास है ।  ये आज़ादी है या कभी खत्म नहीं होने वाला बनवास है । फिर भी लगाए हुए आस है , चाहे कितनी हताश है । सूखा मचा रही ये कैसी बरसात है । नेता की हर बार शह और जनता की मात है । हर बार दोहराया जाता फिर पुराना इतिहास है । अन्याय का नहीं होता अंत , न होती न्याय की पूरी आस है । गर्म हवाओं को कहते हैं नेता , जनता देखो आया मधुमास है । एक समान नहीं देशवासी कोई आम है कोई ख़ास है । जिस जिस पर विश्वास किया उसी ने तोडा विश्वास है । बन गए सत्ता के गलियारे चोरों और ठगों के दास हैं । उनकी सत्ता की पालकी सजी हुई है , भीतर क्या है लोकतंत्र रुपी दुल्हन की लाश है । 
 
 यह भारतीय लोकतंत्र की कठिन परीक्षा का दौर

अगस्त 18, 2018

POST : 877 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग 13 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग 13   

                                    डॉ लोक सेतिया 

        कल रात 17 अगस्त की कहानी से दो बातें समझ आईं मुझे । पहली ये कि ईमानदार इंसान हर हालात में ईमानदारी पर कायम रहता है और यही सच्ची ईमानदारी है , जो लोग मुश्किलों की आड़ में अपनी बेईमानी को ढकते हैं खुद को ईमानदार नहीं कह सकते । दूसरी बात कोई बुरे इंसान में अच्छाई को पहचानता है तो कोई अच्छे इंसान में भी बुराई तलाश करता है । कैसे इस को समझते हैं कल की कहानी से । 
 
    इक विदेशी महिला को सोशल मीडिया पर एक भारतीय से प्यार हो जाता है । फेसबुक पर चैट पर बातें करते हैं कोई विडिओ काल भी नहीं क्योंकि चाहते हैं जब मिलें तभी आमने सामने एक दूसरे को देखें  । वो अपनी दोस्त को बताती है कि मैं भारत जाकर अपने प्रेमी को अचंभित करना चाहती हूं । दोस्त समझाती है भारत में बिना पहचान अकेली लड़की का जाना सुरक्षित नहीं है । फेसबुक पर बहुत लोग झूठी पहचान से सम्पर्क बनाते हैं और कौन क्या चाहता है समझना कठिन है । भारत में कानून व्यवस्था की दशा बेहद खराब है और गरीबी भ्रष्टाचार है तुम वहां नहीं जाओ और मिलना है तो अपने प्रेमी को यहां बुला कर मिलकर पहचान लो । स्टुडिओ में अधिकतर दर्शक उस दोस्त की बात से सहमत हैं । इतनी कहानी देख कर ।

     मगर वो विदेशी महिला नहीं मानती और भारत चली आती है । हवाई अड्डे के बाहर ही टेक्सी वालों की बातों से बेचैन हो जाती है और एक टेक्सी चालक उसे अपनी टेक्सी में बिठा लेता है बाकी को ये कहकर कि ये मेरी पुरानी सवारी है । मगर सोच रहा होता है इसको पास की गली पहुंचाने के अधिक पैसे लेकर फायदा उठाऊंगा । उसको बताता है पांच हज़ार रूपये लूंगा मगर उसे अधिक लगते हैं तो कहता है मैडम जी डॉलर नहीं रूपये की बात है । उसका फोन चार्ज करने को ले लेता है और फिर इक गली में उतार कर कहता है ये अमुक नंबर है आस पास ही आपका वाला नंबर है आप ढूंढ लेना और सामान उतार कर जल्दी से चला जाता है । महिला को ध्यान आता है मेरा फोन टेक्सी में ही रह गया और वो आवाज़ देती पीछे भागती है मगर नहीं रोक पाती । इसी बीच उसका सामान कोई चोर उठाकर भाग जाता है । अब उसके पास कुछ भी बचा नहीं है खाली हाथ है और वीज़ा पासपोर्ट सब चोरी हो गए हैं , उस पर पता चलता है पता भी गलत है नाम मिलता जुलता होने से टेक्सी वाला गलत जगह छोड़ गया है ।

          ऐसे में पुलिस थाने जाती है तो जो वास्तव में हमारे देश में होता है वही उस विदेशी महिला के साथ भी घटता है । कोई बात सुनने को ही तैयार नहीं है क्योंकि कोई वीआईपी आने वाला है । इक सिपाही को कहते हैं इन मैडम जी की रिपोर्ट दर्ज करवा दो । और लिखने के बाद कहते हैं मैडम सफेद रंग की हज़ारों टेक्सी हैं और आधे चाक यादव नाम के होंगे फिर भी पता चला तो आपको सुचित कर देंगे । मगर बाहर निकलते हुए एक पुलिस वाला बताता है हम सब जानते हैं किस एरिया में कौन कौन चोर है । आपका सामान मिल जाएगा मगर पचास हज़ार रूपये देने पड़ेंगे । जब वो बताती है कि उसके पास कुछ है ही नहीं तो उसका उपाय भी बताया जाता है कि आप हामी भर दो जब सामान मिल जाये पैसे तब दे देना । मगर वो नहीं मानती और चली जाती है । शायद आपको भी पढ़कर लगा होगा जो स्टूडियो में बैठे दर्शक महसूस करते हैं कि हम कैसे देश में रहते हैं जहां महमान को भगवान समझते हैं मगर वास्तव में विदेश से आई महिला से कितना गलत व्यवहार किया जा रहा है । शर्मसार होते हैं दर्शक ।

        परेशान रोती हुई इक महिला बीच बाज़ार फुटपाथ पर बैठी है कि तभी पास के एटीएम से निकलते किसी का पर्स गिर गया देखती है और जब तक उठाती है वो आदमी अपनी कार में बैठ चल देता है । ये वास्तविक इम्तिहान की घड़ी है , उसका सब चोरी हो गया है और मज़बूरी की सीमा नहीं है तब भी वो जिसका पर्स है उसकी कार के पीछे दौड़ती है और काफी दूर भागने के बाद रोककर कहती है ये आपका पर्स वहां गिर गया था । कोई भी सोचेगा वो आदमी धन्यवाद तो करेगा ही , मगर नहीं वो कहता है तुमने इस में से पैसे निकाले तो नहीं हैं । शायद ये हमारी मानसिकता है हर किसी को शक की निगाह से देखना । इक इत्तेफ़ाक़ होता है ये सब यादव नाम का टेक्सी चालक सामने से देखकर पास आता है और उस कार वाले को कहता है आपको ऐसी बात बोलते शर्म नहीं आई कि जो भागकर खुद आपको आपका गिरा पर्स देने आई है आप उसी को ऐसे बोलकर क्या कर रहे हैं । और वो उस महिला को उसका फोन भी लौटाता है और जो पैसे लिए वो भी दे देता है और किसी होटल में ठहरने को सलाह देता है । अगली सुबह फिर आता है और उस विदेशी महिला को उनके देश के दूतावास पर लाता है जहां से उसको सहायता मिलती है वापस जाने को इक हवाई जहाज़ की टिकट मिल जाती है । टेक्सी चालक उसे सलाह देता है आप जिस बॉबी नाम की फेसबुक की बात करती है मैंने देखा है उसने इक मशहूर गायक की तस्वीर लगाई हुई है । और ऐसे बहुत लोग करते हैं , तभी उस महिला की चैट पर मैसेज आता है और वो टेक्सी चालक को उसके पते पर ले जाने को कहती है । टेक्सी चालक समझाता है कि फिर से आपको दूतावास मुफ्त टिकट नहीं देगा , मगर वो नहीं मानती और कहती है जो भी हो अपने प्यार की वास्तविकता देखे बिना वापस नहीं जाउंगी । जब उस पते पर पहुंचते हैं तब उसका प्रेमी बेहद खुश होता है गले लगाता है , और वो वास्तव में मशहूर गायक ही है मगर फेसबुक अपने घर के नाम से बनाई होती है । प्यार सच्चा है और दोनों प्रेमी मिल जाते हैं ।

                   तब वो विदेशी महिला टेक्सी चालक को कहती है कि तुम्हारे कारण मुझे अपना प्यार मिला है । जब सब चोरी हो गया था तो मैं निराश होकर लौट जाना चाहती थी मगर तुमने भले मुझे पहले मूर्ख बनाया और गलत किया मेरे साथ लेकिन जब मैं मुसीबत में थी तब तुम्हारे भीतर का अच्छा इंसान मेरी सहायता को आगे आया तो मुझे लगा सब में कोई न कोई अच्छा इंसान भी रहता है और सभी ख़राब नहीं होते हैं । अंत देख कर दर्शक समझते हैं कि कहानी का असली नायक वो टेक्सी चालक ही था । क्या हम कोई सबक लेंगे और हर किसी के साथ उचित आचरण करने की आदत डालेंगे । सरकार को और पुलिस और प्रशासन को भी समझना होगा कि हम किस सीमा तक नीचे गिर चुके हैं और अपनी प्रतिष्ठा को गवां चुके हैं । 
 

 

POST : 876 मौत का सोग भी होता है त्यौहार सा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मौत का सोग भी होता है त्यौहार सा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 

मैंने देखना भी उचित नहीं समझा मुझे मेरी धर्मपत्नी ने बताया जिनको आप बड़े चाव से सुनते हैं वाह वाह करते हैं वो अपने पिता के निधन का समाचार फेसबुक यूट्यूब पर प्रसारित करवा साबित कर रहे हैं उनको कितना लगाव था कितना शोक मना रहे हैं । नीचे इक पुरानी पोस्ट को दोबारा पब्लिश कर रहा हूं बिना कुछ भी और लिखे नया , शायर बशीर बद्र कहते हैं ' बात क्या है कि मशहूर लोगों के  घर , मौत का सोग भी होता है त्यौहार सा ।  

बहाने अश्क जब बिसमिल आये  ,
सभी कहने लगे पागल आये ।

सभी के दर्द को अपना समझो ,
तुम्हारी आंख में भर जल आये ।

किसी की मौत का पसरा मातम ,
वहां सब लोग खुद चल चल आये ।

भला होती यहां बारिश कैसे ,
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये ।

कहां सरकार के बहते आंसू ,
निभाने रस्म बस दो पल आये ।

संभल के पांव को रखना "तनहा" ,
कहीं सत्ता की जब दलदल आये । 

     कितना बदल गया इंसान । जिनको नहीं पता उनको बताना चाहता हूं किसी और युग में नहीं इसी दुनिया में कुछ ही साल पहले जब किसी की मौत होने पर शोक में होते थे तो घर में भी टीवी रेडिओ बंद हो जाता था और मौज मस्ती की बात करना ही अनुचित लगता था । जब देश के किसी महान नेता का निधन होता और कुछ दिन शोक मनाने की घोषणा की जाती थी तो टीवी रेडिओ पर फ़िल्मी गीत नाटक आदि बंद कर केवल शास्त्रीय संगीत सुनाई देता था । मनोरंजन की बात कोई नहीं करता था । शोक दिखाने को नहीं वास्तव में लोगों को लगता था कोई अपना नहीं रहा तो हम छुट्टी मनाने होटल पिकनिक जाने की बात कैसे कर सकते हैं । शोक सभा श्रद्धांजलि सभा में लोग खुद ही चले जाते थे बस खबर मिलनी चाहिए । मैं जनता हूं कुछ लोग शहर में जिस किसी के घर शोक की घड़ी हो संवेदना प्रकट करने जाया करते थे । अब तो बुलावे की बात की जाती है दिखावे की बात की जाती है । किसी देश के रत्न की निधन की बात पर भी दलगत दलदल की बात की जाती है । भगवान के घर जाकर भी मतलब की बात की जाती है । शोक सभा होना और बात है मन में शोक की भावना होना और बात । अधिकतर श्रद्धांजिसभाओं में आडंबर दिखावा होता है शोक नहीं होता है । जब लोग अफ़सोस करने तक में हिसाब लगाने लगें या फिर शोकसभा में दिवंगत आत्मा की नहीं अपनी बात करने लगें तो समझ लो अब हमारा समाज इतना नीचे गिर चुका है कि उसे दुःख की बात भी अवसर की बात लगती है । हमने इस शोकसभा में नहीं उस शोकसभा में जाना है एक ही व्यक्ति को लेकर भी दुविधा है भीड़ कहां होती है । भीड़ होना या अकेले होना कोई मतलब नहीं है इस बात का , मतलब आपके अंदर कौन है कोई है जिसे वास्तव में दर्द की अनुभूति है अन्यथा व्यर्थ है आपकी संवेदना । कुछ लोग बहाने बनाते हैं हम क्या करें ऊपर हाल में जाना मुश्किल है घुटनों में दर्द है , जब कोई लाभ नाम शोहरत की ज़रूरत थी तब कहां गया था आपके घुटनों का दर्द । विवाह समारोह में तीसरी मंज़िल पर सीढ़ियां चढ़कर जाने वाले किसी अपने का हाल पूछने नहीं जाने पर बहाना बनाते हैं घर उसका पहली मंज़िल पर है नहीं जा सकते ।

           मौत पर श्रद्धांजलि देने तो दुश्मन भी आते हैं और तब दुःख में दुश्मनी याद नहीं रहती है । हमने बचपन में देखा इक नवयुवक की अपनी ही बंदूक की गोली लगने से हादिसे में जान चली गई । बंदूक केवल एक खेत के पड़ोसी से दुश्मनी के डर से रखते थे । तब जो दुश्मन था उसे भी दुःख हुआ था और समझा था कि इस का कारण हमारी आपसी दुश्मनी है और उसने तभी सब के सामने दुश्मनी छोड़ने का एलान कर दिया था । आज वो लोग जो खुद कल किसी और दल में थे आज उनके दल में हैं विरोधी को शोक जताने की भी इजाज़त नहीं देते , अगर खुद यही विरोधी दल में होते तो क्या शोक अनुभव करते । रात को उसी दल के पदाधिकारी को अपने नेता के अंतिम संस्कार के दो घंटे बाद ही होटल में परिवार के साथ पार्टी करते देखा , दिल चाहता था उनसे जाकर कहूं शर्म नहीं आती आपको । मगर अंजाम जनता हूं मुझे ही ज़ख्म मिलते । नहीं ऐसा नहीं है कि उनको दुःख नहीं है , सोशल मीडिया पर उनके आंसू थम ही नहीं रहे । जब नाच गा रहे हैं उसी समय स्टेटस बता रहा है रो रहे हैं ज़ार ज़ार । फेसबुक व्हाट्सएप्प का चेहरा इतना विकृत भी हो सकता है अंदाज़ा नहीं था । नेताओं को जनता के दुःख दर्द से वास्ता नहीं होता ये तो सुना था इक शेर भी है ।

     कौम के ग़म में डिनर करते हैं हुक्काम के साथ , रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ ।

मगर अपने ही दल के पितामाह के निधन पर भी ऐसा होता है ये नहीं मालूम था । थोड़ी लाज दिखावे को रखी होती , सब लोग आपको देख रहे थे ये अपने नेता के निधन का शोक भी जश्न मनाकर करते हैं । मैंने इन दिनों अपनी शोकसभा पर कई बातें लिखी हैं , मगर करीब तीस साल पहले इक नज़्म वसीयत शीर्षक से लिखी थी आज फिर से सुनाता हूं । मेरी इच्छा यही है मगर पूरी नहीं होगी ये भी जानता हूं , क्योंकि हमारे समाज के ठेकेदार लठ लेकर परिवार के पीछे पड़ जाएंगे ऐसा किया तो । ऐसा केवल ख़ास लोगों को करने की इजाज़त है क्योंकि उनको इस की परवाह नहीं होती कि लोग क्या कहेंगे । हाज़िर है वो नज़्म :-


जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,

बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये ।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,

जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये ।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,

कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये ।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,

मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये ।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,

ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये ।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,

इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये । 


 रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर... - Priyanka Gandhi Vadra | Facebook


अगस्त 17, 2018

POST : 875 लाख चिराग़ जलाओगे रौशनी के लिये ( अटल बिहारी वाजपेयी की याद ) डॉ लोक सेतिया

            लाख चिराग़ जलाओगे रौशनी के लिये 

                  ( अटल बिहारी वाजपेयी की याद ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 


    
    मैं शायद इस काबिल भी नहीं कि उन पर लिख सकूं , उनका परिचय उनकी शख्सियत को बयान करना कोई आसान कार्य नहीं है। भारत की राजनीति मैं ही नहीं विश्व की राजनीति में भी उन जैसा दूसरा कोई है न हो सकेगा शायद। मुझे गर्व है ऐसे महान लोगों को जो राजनेता मात्र नहीं बल्कि जनता के दिलों में बसे हुए सच्चे नायक थे उन्हें देखने और सुनने का सौभाग्य मुझे मिला कभी । किसी को ये बात अजीब लग सकती है मगर मुझे लगता है आपको भगवान हज़ारों मिल सकते हैं तलाश करने से मगर राजनीति में ऐसे इंसान और इंसानियत को ढूंढते रहेंगे हम। गांधी जी के लिए कहते हैं आने वाली सदियां यकीन नहीं करेंगी कि हाड़ मांस का ऐसा आदमी कोई दुनिया में हुआ था , मगर मुझे लगता है गांधी होना आसान है अटल और जेपी होना बेहद कठिन। मैंने देखा है बहुत कवि जब शासक बने अधिकारी सत्ताधारी नेता बने तो उनके भीतर का कवि सब से पहले मर गया , सत्ता और राजनीति के शिखर पर कविता को ज़िंदा रखना सब के बस की बात नहीं है। नीरज जी भी ऐसे ही लोगों में थे जो सिनेमा जगत में रहकर भी नकलीपन से बचे रहे। ये कैसा इत्तेफ़ाक़ है कि इतने करीब अंतराल में अटल जी और नीरज जी साथ साथ दुनिया से चले गये अपनी दुनिया में। भगवान भी अगर है तो उनका स्वागत द्वार पर खड़े होकर कर रहा होगा। राजनीति में दलों की दलदल से बचे हुए कमल वही थे , ऐसा किसी और को आदर शायद ही मिला हो जैसा अटल जी को विपक्षी दल में होते हुए जवाहरलाल नेहरू जी ने इन शब्दों से संबोधित किया हो कि आप उधर क्यों हैं आपको तो इधर होना चाहिए। इक युवा नये राजनेता को भविष्य का बड़ा नेता बताना किसी और को नहीं मिली ऐसी पहचान और अटल जी अगर हीरा थे तो नेहरू जी उसे परखने वाले जोहरी थे। लोग सत्ताधारी नेता कलाकार धनवान लोग सब चाहते हैं शोहरत हासिल करना और जतन करते हैं महान कहलाने को मगर जो वास्तव में महान होते हैं उनको इसकी कोई चाहत नहीं होती है। भाषण देकर तालियां बटोरना बहुत लोग जानते हैं मगर कोई कोई विरला ही होता है जिसकी हर बात सब को जोड़ती है अपने साथ संवाद करते हुए। उनके भाषण को इक ग़ज़ल का शेर बयां करता है :-

             फूलों की तरह लब लब खोल कभी , खुशबू की ज़ुबां में बोल कभी । 

          उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है क्योंकि उन जैसा दूसरा कोई है भी नहीं हुआ भी नहीं। हज़ारों नहीं लाखों नहीं करोड़ों साल में कोई ऐसा इंसान पैदा होता है जो कहीं भी हो इंसान ही रहता है। हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहां , सामने जिनके वो सच मुच का खुदा कुछ भी नहीं। जीने को सब जीते हैं मगर जीने का सलीका शायद ही किसी को आता है। दुश्मन तो कोई था ही नहीं मगर दुश्मन देश भी जिसे देख कर सर आदर से झुकाते हों , विरोधी भी जिसे दिल से प्यार करते हों उस में कितनी विशेषताएं इक साथ होंगी। आपत्काल में कैद में रहने के बाद बाहर आते ही अपने भाषण में बारिश में ऊबे हुए लोगों को अपने शब्दों से ऊर्जा भर देना , ये कहकर , बहुत दिनों के बाद मिले हैं दीवाने , कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने , ज़रा खुली हवा में सांस तो ले लें , कब तक है आज़ादी कौन जाने। चार लाईनों में सब कह दिया क्या कमाल था। जिसे कोई प्रधानमंत्री विपक्षी दल में होते हुए भी जिनेवा में देश के प्रतिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजता हो वो कोई दूसरा है किसी देश के पास। विदेश में जाकर पहली बार अपनी भाषा हिंदी में बोलना इक इतिहास ही नहीं है इतिहास को बदलना है। शोर बहुत लोग करते हैं मगर जो वास्तव में कर दिखाते है वो कोई और ही होते हैं। आज जिन देश की खुली बड़ी बड़ी सड़कों पर हम सफर करते हैं , राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के कारण उन्हीं की सोच की देन है। आज भी स्वार्थ के गठबंधन सभी दल करते है जो सुविधा होने तक रहते हैं अवसर मिलते ही टूट जाते हैं। मगर 24 अलग अलग विचार वाले दलों को इक साथ इक धागे में पिरोना और माला की तरह जोड़े रखना जिस धागे का काम था वो थे अटल जी। 
 
         इक साहस और ईमानदारी चाहिए ये कहने के लिए जो उनके भाषणों में से चुने कुछ शब्द है , पढ़ना और सोचना समझना। विश्वास मत पर चर्चा अभी भी सुनी देखी है , मगर अटल जी की भावनात्मक स्पीच कोई भूल नहीं सकता है। आप कहते हैं अटल जी अच्छे हैं मगर गलत दल में हैं मगर आज उस अच्छे अटल से आप क्या करने जा रहे हैं। जोड़तोड़ से और अनैतिक ढंग से मिली सत्ता को चिमटे से भी नहीं छूना चाहूंगा। मैं जा रहा हूं त्यागपत्र देने , इक शान के साथ कहना कोई भूल सकता है। हार नहीं मानूंगा , वो हार अटल जी की हर नहीं थी , हारा कोई और था और देश सब देख रहा था। जनता देश है सरहदों की सीमा नहीं और हर धर्म हर वर्ग के लोग जिसे चाहते हों मानते हों भरोसा करते हों ऐसा कोई और नहीं है। आज सुनाई देता है मुझ से पहले कुछ भी नहीं हुआ , मगर अटल बिहारी वाजपेयी जी संसद में खुले आम कहते हैं कि जो भी ऐसा कहता है वो देश के लोगों किसानों मज़दूरों और तमाम बाकी लोगों के साथ अनुचित करता है। विपक्ष में रहकर सरकार की नीतियों की आलोचना की जा सकती है कठोर से कठोर शब्दों में मगर देश की वास्विकता को अनदेखा करना अनुचित है। अपने से पहले के नेताओं की देशभक्ति और काम पर सवाल नहीं उठाये थे कभी उन्होंने। बड़े होने की निशानी है बड़े बोल नहीं बोलते हैं।  बड़बोले लोग कभी बड़े नहीं होते हैं। 
 
            कहने को बहुत है मगर आखिर में सवाल इक है। अटल जी को श्रद्धासुमन भेंट करना चाहते हैं तो सभी दल वाले उनकी राजनीति से एक प्रतिशत भी सबक सीख लें तो बहुत कुछ बदल सकता है। काश कोई और अटल आज फिर देश के पास कहीं से मिल जाये।



अगस्त 16, 2018

POST : 874 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( किसान की बात ) भाग 12

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( किसान की बात ) भाग  12 

                                                डॉ लोक सेतिया 

       15 अगस्त की कहानी काफी हद तक सच भी है । और विडंबना भी है पिछली कुछ कहानियों की तरह जिस को सुखद अंत बताया जाता है क्या वो वास्तव में सुखद है । मुझे बहुत साल पहले इक दोस्त ने इक़बाल का शेर सुनाया था जो मैंने बाद में इक़बाल की शायरी में सही पढ़ा भी समझा भी । शुरुआत उस से ही । 

     जिस खेत से दहक़ां को मय्यसर नहीं रोटी , उस खेत के गोशा ए गंदुम को जला दो ।

 शायद इक़बाल ही ऐसा कह सकते थे , कि जिस खेत से किसान को पेट भरने को रोटी भी नसीब नहीं होती , ऐसे खेत की गेहूं की बालियों को जला दो । मगर शायद उनको पता नहीं था ऐसा मुमकिन नहीं है कोई किसान अपनी उगाई फसल को जला नहीं सकता है । अपनी जान जोखिम में डालकर भी फसल को बचाता है ये भी जानते हुए कि उस पर किसान का हक भी नहीं रहा कोई उसकी ज़मीन को बैंक से खरीद चुका है । बंजर ज़मीन को महनत से सींच कर फसल बोता है उगाता है तो बैंक वाला बताता है ये ज़मीन बैंक की है बोर्ड लगा दिया गया है । अब तुम्हारी महनत की फसल भी उसी की है जो इस खेत को खरीदेगा । इस से पहले बैंक वाले ज़मीन गिरवी रखकर लिया क़र्ज़ चुकाने को एक साल की मोहलत देते हैं इस शर्त के साथ कि सात दिन में 15 लाख क़र्ज़ का ब्याज चार लाख जमा करवा दे अगर । इक पहली कहानी में बेटी और बेटा घर से पिता का धन चुरा लेते हैं और जिस कंपनी के मालिक का पैसा था वो उसकी शिकायत पुलिस को करता है । इस कहानी में भी असूल और मूल्यों को दरकिनार कर पत्नी ही बेटे को वो पैसे जो किसान अपना घर भी गिरवी रखकर लाया था दे देती है । ईमानदारी को हर बार यही ईनाम आखिर क्यों मिलता है अपने ही घर से धोखा । किस मिट्टी का बना है जो कुदरत भी कभी साथ नहीं देती और कुदरत से लड़ते हुए खेत की सिंचाई करता है । जब फसल लहलहाती है और लगता है अच्छे दिन आने वाले हैं तभी बैंक वाला बताता है तुम किसान नहीं इक गुनहगार हो अपराधी हो जो कब्ज़ा करना चाहता है अपनी बिकी हुई ज़मीन पर खेती कर के । मगर वो रहम खाने की बात करता है और पुलिस को किसान को जेल नहीं डालने की बात कहता है मगर साफ करता है कि अब खेत ही नहीं उस पर खड़ी लहलहाती फसल भी उसकी हो चुकी है जिस ने ज़मीन खरीद ली है बैंक से । उसी रात सालों बाद बारिश होती है जब फसल पकी खड़ी है और उसे डूब कर बर्बाद करना है । उधर किसान बिमार है और डॉक्टर उसे आराम करने की हिदायत देता है । बेटा पैसे लेकर घर से भागकर अपनी बाकी फीस चुकाकर डिग्री लेकर छोटी सी नौकरी कर रहा है शहर में । अपना अंजाम अपना भविष्य देख लेता है अपने ही गांव के ताऊ जी को गॉर्ड की नौकरी करते और भीख लेते देख कर ईनाम के नाम पर । किसान रात को बिमारी की हालत में फसल बचाने को बारिश में खेत जाता है पत्नी और बेटी के रोकने के बाद भी । अब फसल उसकी नहीं है मगर अपनी उगाई फसल को तबाह होते नहीं देख सकता है । वहीं रात को फसल बचाते बचाते बेहोश हो जाता है और सुबह पत्नी आकर देखती है और शायद लगता है ज़िंदा नहीं है मगर आंखें खुलते ही बच गई खेती को देख जी उठता है । 
 
          यही वास्तविकता है कठोर धरातल की , कोई सरकार कोई फसल बीमा कोई योजना की कोई बात ही नहीं है । कहानी लिखने वाला जनता है मगर ये सच सामने नहीं लाता और कहानी का सुखद अंत दिखाने को ज़मीन खरीदने वाले साहुकार को दयावान दिखला कर किसान पर दया करता दिखाते हैं जो कहता है जैसे तुम अभी तक किसानी करते आये आगे भी करोगे और जो कर्ज़ा लिया अब बैंक की जगह मुझे चुकता करोगे । खुश हैं सभी दर्शक भी एंकर भी । किसान की ज़मीन मज़बूरी में बिक जाती है और धनवान उस पर खुद तो खेती नहीं कर सकता और किसान को बोने को देता है उपकार करता है । जो आप नहीं जानते मुझे वो भी बताना है , कारोबारी लोग एहसान नहीं करते अपने मुनाफे की बात करते हैं । मिल हो या खेत हो मज़दूर को मज़दूरी देना उनकी ज़रूरत है दया नहीं है । किसान की बदनसीबी अभी भी कोई नहीं समझा है , उसका सब कुछ लुट जाता है ऐसे ही हालात की मज़बूरी में और मिलते हैं झूठे दिलासे झूठी तस्सली और झूठी संवेदना । आज मौसम में घुटन थी बहुत और मेरे सीने में उससे भी बढ़कर है घुटन ।  लौट आया हूं आते आते इक ग़ज़ल भी याद आई उसे भी शामिल करता हूं ताकि जो अनकहा रह गया कहा जा सके ।



अगस्त 15, 2018

POST : 873 15 अगस्त पर संबोधन का सफर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया


   15 अगस्त पर संबोधन का सफर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

      आज उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है । आज घर दुकान बाज़ार तो क्या सार्वजनिक स्थानों पर भी टीवी पर समाचार दिखाई दे रहे होते हैं । मुसाफिर इंतज़ार करते हैं सामने टीवी चल रहा है , होटल में क्या बड़े बड़े अस्पतालों में रोगी गंभीर रोग का इलाज करवाने आये हुए हैं दर्द में भी टीवी सामने है । हर कोई स्मार्ट फोन पर भी टीवी देखता है । मगर कोई युग था जब हर किसी के पास रेडिओ भी नहीं होता था और कोई ख़ास अवसर होने पर लोग जमा होते थे किसी जगह रेडिओ पर आवाज़ सुनने को । 15 अगस्त को ऐसा ही होता था लालकिले से भाषण देते देश के नेता की हर बात ध्यान से सुनी जाती थी । पहला अंतर तब देश का प्रधानमंत्री देश का लगता भी था होता भी था मगर आज लगता है किसी दल का नेता है जो अपने दल के शासन की बात करता है देश की नहीं । मैं किसी दल का नहीं हूं मगर राजनीति को समझता भी नहीं था तब भी बहुत अच्छा लगता था जवाहर लाल नेहरू जी को सुनकर । कभी नहीं सुनाई दिया मैंने ये किया वो किया है और क्या घोषणा कर रहे हैं उस से कितने लोगों को लाभ होगा । ये साफ लगता है जनता को बहलाने को वोट बैंक की बात की जा रही है , कम से कम आज तो ऐसा मत करो । नेहरू जी की पहली स्पीच आधी रात को दी थी मगर बात मेरी कहीं नहीं सुनाई दी थी , आज की स्पीच सुनकर लगता है मैं मैं मैं । भावना और उद्देश्य दोनों अलग हैं । आज नज़र सत्ता पर है देश की दिशा पर नहीं । विकास न पहले किसी नेता की खुद की जेब की कमाई से हुआ न आज होता है न कभी होगा । जब सब जनता के धन से किया जाता है तो किसी का भी ये दिखलाना कि उसी की महनत से है अनुचित है और छल है । 
 
               कभी बताया जाता था क्या क्या किया जाना चाहिए था मगर नहीं किया जा सका इसका खेद भी जताते थे । आज है कोई जो अपनी पीठ थपथपाना छोड़ सच बोलने का साहस करता कि मैंने कहा तो था बहुत कुछ मगर कर नहीं सका मुझे खेद है । कम से कम इस सरकार से तो कुछ सवाल पूछने ज़रूरी हैं । ये याद करना होगा कि ये वही नेता है जिसने सत्ता पाने से पहले ही इसकी तैयारी की थी और किसी सपने की तरह से लालकिले का इक बहरूप खड़ा कर उस से भाषण भी दिया था । ठीक उसी तरह उनसे भी लालकिले से ही सवालों की झड़ी लगाई जा सकती है । सवाल देश की जनता के हैं ।

पहला सवाल :-

  अच्छे दिन क्या हुए , आये या आने वाले हैं या कब आएंगे या कभी नहीं लाओगे । होते क्या हैं अच्छे दिन इतना तो समझाओगे । सपनों से आखिर कब तक जनता को भरमाओगे कभी सोचोगे कभी पछताओगे ।

दूसरा सवाल :-

काला धन विदेश में है या देश में आकर सफ़ेद हो गया है । अब तो नोटबंदी का सच बताओ और सभी दलों की असलियत को नहीं छुपाओ । ये कैसा कानून है विदेशी चंदे को खुद छुपाने को कानून लाओ । धन बल की गंदी राजनीति को पर्दों में से बाहर सामने ला पाओगे ।

तीसरा सवाल :-

स्वच्छ भारत दिखाओ , मेक इन इंडिया की बात सब बाहर से मंगवाओ  , स्किल इंडिया के नाम पर अधिकतर आंकड़े हुआ कुछ नहीं , गंगा और मैली , थोड़ी तो शर्म चेहरे पर लाओ । 

चौथा सवाल :-

महंगाई खुद आपने दाम बढ़ाये पेट्रोल डीज़ल के अनुचित लूट को । रोज़गार की बात पर इतना धोखा । वंशवाद को खत्म करने की जगह इक संगठन की निष्ठा होना बड़े बड़े पदों की योग्यता । हद है । 

पांचवा सवाल ( आखिरी नहीं है ) :-

बेटियां सुरक्षित नहीं , सत्ताधारी नेता तक महिलाओं के साथ अनुचित आचरण करते बेख़ौफ़ हैं कोई नहीं कुछ कहने वाला । बलात्कारी बाबा को नतमस्तक सरकार मगर नहीं हुई शर्मसार । कोई पकोड़े तलने की बात करता है तो कोई हरियाणा का सीएम साफ कहता है नौकरी निजि कंपनी की पकड़ लो हमारी तरफ मत देखो । 

  आज ये सब कहकर जनता से वोट मांगना जनता जवाब दे देगी । आप तो केवल सवाल करते हैं जवाब देने की आदत ही नहीं है । 


 

POST : 872 मैं लालकिला बोल रहा हूं ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    मैं लालकिला बोल रहा हूं ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

       मुझे जानते हो क्या , मुझे पहचानते हो क्या । मेरी कहानी सुनोगे क्या मेरा दर्द समझोगे क्या । तुम सब हर साल लालिकले से झंडा फहराते हो , भाषण देने वाले बदलते रहते हैं , भाषण भी बदल गये हैं । कोई वक़्त था मुझसे , मेरी मीनार से बोला हुआ हर शब्द जोश भरता था नई उम्मीद जगाता था । आज वो बात ही नहीं है जानते हो क्यों । तब लोग लालकिले पर खड़े होकर भाषण देने को अपनी शान नहीं समझते थे , तब मेरे पास आने से पहले सोचा करते थे समझा करते थे खुद की नहीं जन गण मन की बात कहनी है करनी है समझनी है । केवल समारोह नहीं था जश्न मनाना नहीं था संकल्प लिया करते थे संविधान की राह पर चलने और सभी को वास्तविक आज़ादी जीने के अधिकार देने का । ये 78  साल की बात है मगर मैं 78  साल का नहीं हूं , 470 साल हो गये हैं मुझे बने और 1638 से बनाना शुरू किया था और 1648 में बना लिया था दस साल में । शाहजहां को तो जानते हो उसी ने मुझे बनवाया था और दिल्ली को राजधानी बनाया था आगरा को छोड़कर । मैं इक गवाह हूं  400 साल के गुज़रे इतिहास का । दो दरवाज़े दिल्ली गेट और लाहौर और दो सभागार दीवाने ए ख़ास और दीवाने ए आम दोनों के नाम और मकसद थे जानते हैं । ये किला कोई केवल शासक के रहने और सुरक्षा करने को नहीं था । 11 मार्च 1783 को सिखों ने लालकिले में प्रवेश कर दीवाने ए आम पर कब्ज़ा कर लिया था और 1857 के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मुझे अपना बंदी बना लिया था । उनकी सेना के बाद भी 2003 तक मैं सेना के आधीन रहा हूं । मेरा आम लोगों से 200 साल का रिश्ता रहा है मेरी धड़कन आज भी जनता की धड़कन ही है , मैं शासकों का नहीं हूं न था न होना चाहता हूं । 
 
                किसे फुर्सत है मेरी लंबी दास्तान को सुने समझे , जो बीत गया सो बीत गया , मगर ये जो पिछले 78  साल हैं उनको कोई भुला नहीं सकता न भूल सकता है और भूलना भी नहीं । आज उसी की बात कहना चाहता हूं । शायद आज कोई उस भावना को नहीं समझेगा जब देश के दूर दराज से लोग दिल्ली आते थे 15 अगस्त 26 जनवरी को वास्तविक भावना लेकर । ये लिखने वाला तब घर से बिना बताये ही रात भर रेलगाड़ी का सफर कर आया था 26 जनवरी की झांकियां देखने और लालकिला भी देखने आया था । साथ दो किताबें खरीद कर ले गया था पांच पांच रूपये की , बड़ी कीमत हुआ करती थी पांच रूपये की तब । किसी का वेतन हुआ करता था पांच रूपये महीना उस समय । खिलौना भी खरीद सकता है और पहनने को आधुनिक परिधान भी जो नहीं थे उस के पास पायजामा पहनता था धारीदार , आज देखोगे तो कोई गंवार किसी का नौकर जैसा लगेगा मगर वो बड़े किसान परिवार का बेटा था । समझा था किसी गाइड ने समझाया था इक इक कोने में दर्ज इतिहास की बात को । याद नहीं कितना पैदल चल कर क्या क्या देखा था , कोई मकसद लेकर नहीं आया है मगर ऐसी ही दो चार ऐतिहासिक जगहों पर जाना या उसका गवाह बन जाना उस मन में दिमाग़ में इक विचार बनकर रह गया है जो आज भी है । मगर तब और आज कितना अंतर हो गया है याद करना चाहता है , मेरे साथ दिल की बात बांटना चाहता है । 
 
               मैं भी उदास हूं और लालकिला भी उदास है । आपको जो सजावट दिखाई दे रही है वो किसी दुल्हन के शादी के सुंदर महंगे लिबास जैसी है मगर ये दुल्हन की शादी नहीं है , जो है उसे कहने को अभी शब्द बना ही नहीं है । आह भर रही है दर्द झेल रही है अभी तक जंजीरों में जकड़ी हुई है । भूखी है प्यासी है और बेबस ही नहीं बेघर बार भी है , बिमार भी इतनी है कि कोई ईलाज असर नहीं कर रहा है । कैंसर का भी ईलाज हो रहा है आजकल मगर उसकी पीड़ा का अंत कोई नहीं करता । करना चाहता ही नहीं कोई , सत्ता को जनता की पीड़ा देखकर अफ़सोस तक नहीं होता दुःख दर्द समझने और मिटाने की बात क्या की जाये । ऐसा नहीं है कि 78  साल में देश की हालत बदली नहीं जा सकती थी सुधारी नहीं जा सकती थी । बहुत कुछ किया जा सकता था करना संभव था और आज भी है मगर शासन करने और सत्ता पर रहने को ही उद्देश्य बनाने वालों को ये सोचने की फुर्सत ही नहीं थी । जिस देश की आधी आबादी भूखी हो शिक्षा स्वस्थ्य और सुख सुविधा से वंचित हो उस देश में ऐसे समारोह और जश्न मनाने पर और रोज़ कितने ही बेकार आयोजनों पर लाखों हज़ार करोड़ रूपये खर्च करना गुनाह है देश और संविधान के साथ । समाधियां स्मारक बनाकर कोई उद्देश्य नहीं पूरा किया जा सकता है , उन लोगों का सपना अपने लिए मकबरे और समाधियां बनाना तो नहीं था , आज़ादी के अर्थ ऐसे छोटे हर्गिज़ नहीं थे । आज़ादी नहीं है आम नागरिक को कोई फर्क नहीं पड़ा है , काले अंग्रेज़ और सफ़ेद अंग्रेज़ इतना ही है । लालकिले से कहा कोई शब्द आज कोई एहसास दिलों में नहीं करवाता है क्योंकि भाषण देने वाले की आवाज़ बेशक जितनी बुलंद हो खुद उसी को अपने शब्दों का कोई महत्व समझ नहीं आता है । ऐसा संदेश जो दो पल बाद ही भुलाया जा सकता हो कितना अर्थहीन है । मुझे दूर से देखने वालो कभी मुझे , लालकिले को छू कर देखना । मेरी दीवार का हर पत्थर तुम्हें बहुत कुछ बता सकता है । मैं नहीं जनता कि कैसे और किसको आज़ादी की शुभकामाएं दूं मैं इस भारी मन से । 
 

 

अगस्त 13, 2018

POST : 871 चौकीदारों का एक समान वेतन और रैंक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 चौकीदारों का एक समान वेतन और रैंक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

         आपको फिर से याद दिलवाता हूं देश में गधों के भी अधिकार हैं। कवि लोग तो कहते हैं गधों के ही अधिकार हैं , घोड़ों को मिलती नहीं है घास , गधे खा रहे हैं चववनप्राश। मगर नहीं गधों के लिए नियम हैं , गधों को रात अंधेरे में बरसात और उमस के मौसम में काम पर लगाना अपराध है। उनको दिन में भोजन अवकाश और आराम करने देने का भी हक है। जॉनी वॉकर जी तो दिल्ली जाने की भी बात करते थे अपने गधे की जो सब गधों का लीडर था। उस पर दो रचनाएं लिखी जा चुकी हैं मुझे खेद है अभी तक मुझे चौकीदारों की बात पर लिखने की बात कैसे ध्यान में नहीं आई जबकि चार साल से चौकीदार का युग ही जारी है। इस देश में सब से अच्छा काम केवल और केवल चौकीदारी है। अबकी बारी उनकी बारी है।

      देश के चौकीदारों का भी एक संगठन है मुझे पता नहीं था जब तक टीवी चैनल पर हाथ में लाठी और टोर्च लिये चौकीदार की फोटो वाले बैनर उठाये लोगों को अपनी उचित मांगे मनवाने दिल्ली जाने की खबर सुनी और देखी नहीं थी। आप क्या चाहते हैं पूछने पर जवाब देते हैं बराबरी का वेतन और अधिकार। हर चौकीदार को संविधान समानता का हक देता है। अब चौकीदार कोई भी कहीं का भी हो , गांव का हो चाहे शहर का या बेशक आधुनिक आवासीय सोसाइटी का हो , किसी दुकान का हो या कंपनी की मिल का। कुछ भी और नहीं चाहते केवल बराबरी की बात कहते हैं। एंकर नहीं समझा माजरा क्या है। कहने लगा आपको अपने अपने मालिक से बात करनी चाहिए। चौकीदार बोले बड़े नासमझ हो मालिक कौन होते हैं हमारा वेतन सुविधा और क्या करना क्या नहीं करना तय करने वाले। देश का चौकीदार जो है उसने कब जनता से इजाज़त ली किसी बात की। क्या शान से रहता है कितने देशों में घूमता फिरता है संसद या पीएमओ दफ्तर कितनी बार गया कोई पूछता है। क्या वादा किया था जब बना था देश का चौकीदार निभाया कब है। वही चौकिदार बताएगा उसका वेतन क्या हो हमारा भी उतना ही होना चाहिए। हम धन्यवाद करना चाहते हैं कि किसी ने तो हमारे काम को महान कार्य समझा , मगर इक ज़रा सी शिकायत भी है कि हमारे नाम को बदनाम भी किया और सागर की गहराई में डुबोया भी है जो हमें कदापि मंज़ूर नहीं। चौकीदार को झूठ नहीं बताना चाहिए और ये कैसा चौकीदार है जिसका संसद में दिया भाषण भी संसदीय करवाई से निकालने की नौबत आ गई।

         जैसे संगीत कला कारोबार वकील डॉक्टर अध्यापक अभिनेता तक खानदानी लोग होने का दम भरते हैं , उसी तरह से हमारा चौकीदारी का खानदान भी ऊंचा समझा जाता है। चुपके-चुपके फिल्म का नायक खुद शिक्षित है घास फूस का डॉक्टर भी है मगर नायिका को भाता है चौकीदार भेस का धर्मेंदर ही। नकली ही सही उसने चौकीदार बनकर चोरी करने वालों को भगाया तो नहीं। चौकीदार बनना है तो ईमानदारी पहली शर्त है , सच बोलना पड़ता है भले चोर कोई भी हो। अपने ही घर में चोरी करने वाले लोग बदनाम चौकीदार को किया करते हैं। कोई चौकीदार ही चौकीदार की कठिनाई समझ सकता है। ये कैसा चौकीदार है जो रात भर गहरी नींद में सोया रहता है और चार साल बाद जगता है तो घर का सभी सामान चोरी हो चुका है। ऐसे चौकीदार को कौन सज़ा दे जिसका थानेदार अपना हो वकील अपना हो अदालत खुद की और न्यायधीश भी वही हो।

        इस 15 अगस्त पर चौकीदार को युवा वर्ग को रोज़गार हासिल करने को अपना आज़माया नुस्खा बताना चाहिए। सब को पकोड़े बनाने नहीं आते चाय भी सब उन जैसी नहीं बनाते मगर उनकी डिगरियों से बेहतर शिक्षा बहुत युवकों ने पाई है उन्हें चौकीदार बनने से कोई परहेज़ नहीं है। दुनिया देख कर स्तब्ध है जिस देश में चौकीदार की ऐसी निराली शान है उसके मालिक कितने दौलमंद हैं। कोई नहीं यकीन करेगा भारत में गरीबी है भूख है या लोग बेइलाज मरते हैं और शिक्षा भी इतनी महंगी है कि पढ़ने जाना मुमकिन नहीं।

            तू इधर उधर की न बात कर , ये बता कि काफिला क्यों लुटा ,

                हमें रहजनों से गर्ज़ नहीं , तेरी रहबरी का सवाल है।

       दिल का खिलौना हाय टूट गया , कोई लुटेरा आके लूट गया।  चौकीदार जागते रहो कहने की जगह सोते रहो समझाता रहा ताकि चोर चोरी कर सकें। बात मौसेरे भाइयों तक आ ही गई है। ये राफेल विमान की खरीदारी है या चौकीदार की बटमारी है। चौकीदार रखवाली करने को होते हैं इधर खरीदारी करते करते बिकवाली करने लग गए हैं। चौकीदार मालिक बन बैठे मालिक को भिखारी बना दो किलो चावल एक किलो दाल की भीख देने का ऐलान करते हैं। 

अगस्त 12, 2018

POST : 870 क़व्वाली युग की सरकार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    क़व्वाली युग की सरकार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    कभी फिल्मों में क़व्वाली की धूम हुआ करती थी , अभी भी लोग झूमते हैं , पर्दा है पर्दा है । आजकल फिल्मों में नहीं क़व्वाली राजनीति में सुनाई देने लगी है ।  मुझे अभी अभी बोध हुआ है कि पिछले चार साल से देश में कव्वाली की धूम है । मुझे गाने का शौक रहा है और कॉलेज में मैंने वार्षिक समारोह में कव्वाली सुनाई है । एक बार कव्वाली में मेरा पहला ईनाम था क्योंकि अकेले मेरे ग्रुप की ही कव्वाली थी । थोड़ी थोड़ी याद है :-

           दिखला के झलक तुम छुप ही गए , जी भर के नज़ारा हो न सका । 

           इक बार तुम्हारी  दीद हुई  , दीदार  दोबारा हो न सका ।

           मुद्द्त से तम्मना थी दिल में , अल्लाह को देखूं बेपर्दा ।

           जब दिल ने मुझ को मौका दिया , तकदीर को गवारा हो न सका । 

     ये मिलती जुलती कव्वाली है ऊपर जो सुन कर समझ सकते हैं कि क़व्वाली कैसी होती है । कहने को ग्रुप की बात होती है मगर वास्तव में एक गायक ही क़व्वाली सुनाता है बाकी या तो उसको दोहराते हैं या तबला हारमोनियम पर संगीत देते हैं । चार साल से एक ही गायक की धूम है बाकी कोई है नहीं है कोई फर्क नहीं पड़ता है ।  क़व्वाली गायक का अंदाज़ ऐसा होता है कि लोग फ़िदा होकर झूमने लगते हैं । क़व्वाली में एक बात को बार बार गाया जाता है कभी ऊंची आवाज़ में कभी मध्यम तो कभी धीमी आवाज़ में । धुन एक ही रहती है और शोर ऐसा कि और कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती ।  यही तो हो रहा है देश विदेश में एक ही कव्वाली सब सुन रहे सुना रहे हैं । दिन आने वाले थे , दिन आ रहे हैं । गा गा कर बुला रहे हैं , दिन रूठे हुए हैं वो मना रहे हैं । उनकी समस्या है क़व्वाली को कव्वाली कहना मुश्किल है कहीं दूसरे धर्म या देश की बात बीच में न आ जाये । क़व्वाली दरगाहों में गाई जाती है मज़ारों पर सुनाई देती है उनको थोड़ा परहेज़ है ये इनको हज़्म नहीं होती । क़व्वाली का अंदाज़ पसंद है जो एक की आवाज़ वही सबकी आवाज़ , बाकी कोई स्वर सुनाई नहीं देना चाहिए । कव्वाल किसी और की खातिर गाया करते हैं उनका राग खुद अपने लिए है , अपने ही कसीदे पढ़ना , ये ज़रा मुश्किल है । इसी लिए क़व्वाली नहीं ग़ज़ल भी नहीं कविता भी नहीं ये आठवां सुर है । क्या करें गुणगान करने वाले मिलते हैं किराये पर लिख भी देंगे महिमा उनकी पसंद की मगर उनको खुद अपनी आवाज़ अपनी धुन में गाना भाता है और कोई भी गा ही नहीं सकता उन जैसा । सत्तर साल से देश में बेसुरों की आवाज़ गूंजती रही है अब ऐसा नहीं होने देंगे चाहे कुछ भी हो जाये । क़व्वाली मुहब्बत की होती है और उनको मुहब्बत से बैर है , उनकी मुहब्बत सत्ता है कुर्सी है । पत्नी को छोड़ा महबूबा को भी आखिरकार छोड़ ही दिया । अकेले में अपने बॉस खुद हो महबूबा के नखरे और पत्नी की ख्वाहिशें कोई आसान है निभाना । झोला उठाकर चल देने की बात कहते हैं , मेरी क़व्वाली सुनो वरना चला जाऊंगा । 
 
            क़व्वाली सुनने की भी सीमा होती है , घंटा दो घंटे तक , चौबीस घंटे क़व्वाली सुनते लोग तंग आ ही जाते हैं । मगर उनका आदेश है सब को क़व्वाली सुननी है और ताली भी बजानी है । जो नहीं सुनेगा या ताली नहीं बजाता उसकी देश भक्ति शक के दायरे में आ जाती है । संविधान में कोई निर्देश तो नहीं है कि सत्ता के स्वर में स्वर मिलाना होगा , उनके पीछे पीछे दोहराना होगा । गाना चाहो न चाहो , गाना आये न आये गाना होगा । किसे खबर थी ऐसा भी ज़माना होगा । सरकार आज़ादी के जश्न के अवसर पर हर साल कवि सम्मेलन आयोजित किया करती है । अधिकतर कवि साफ नहीं भी कहते मगर इशारों में सरकार की बखिया उधेड़ते ही हैं कविता में । मेरी सलाह है इस बार इक नई पहल नई शुरआत कर लाल किले पर क़व्वाली का आयोजन किया जाए । कव्वाली का सवभाव राजनेताओं को भा सकता है । कव्वाली हर अवसर पर गाई जा सकती है और इस में कोई रोने रुलाने दर्द तड़पने की बात ऐसे नहीं होती कि किसी की आंख भर आये । ऐ मेरे वतन के लोगो गीत की तरह । सरकार को हमेशा आनंद में रहना पसंद होता है और खासकर इस सरकार को आनंद ही आनंद पसंद है और इन्हें आनंद भी कब किस बात में मिले कोई नहीं जनता । औरों का उपहास उड़ाना इस सरकार के मुखिया की आदत है । मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया , हर फ़िक्र को धुवें में उड़ाता चला गया , चार साल से यही हुआ है । जनता की फ़िक्र में नींद हराम करना उनको नहीं पसंद । इक नशे में रहने का मज़ा लिया है जो पहले कोई नहीं ले पाया था । दुनिया भर की सैर की हर दिन हर नागरिक पर 25 लाख तो केवल किराये वाले जहाज़ के खर्च हुए बाकी का हिसाब फिर कभी । शबे फुरकत का जागा हूं लोगो अब तो सोने दो , कभी फुर्सत से कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता । फ़रिश्तो की जगह लोगो करना पड़ा । फरिश्ता खुद वही है ।

                कव्वाली की विशेषता यही है कि जब चाहो जिस जगह फिट कर सकते हैं और हमेशा हिट रहती है । मौज मस्ती भी और संगीत भी दोनों मिलते हैं । ड्रम बजा लिया नाच गा लिया हर तमाशा दिखला चुके तो ये हुनर भी हो जाये , लोग मर मिटेंगे अदाओं पर । इतिहास में अपनी अलग पहचान की चाह भी पूरी हो जाएगी क्योंकि अभी तक किसी भी सरकार ने राग क़व्वाली को आज़माया नहीं था । लाख दुखों की एक दवा है क्यों न आज़मा ले । तेल मालिश चंपी तेल मालिश । आपकी मर्ज़ी है जिस गीत को क़व्वाली बना लो । आप क्या नहीं कर सकते सब कर सकते हैं। झूठा इकरार ही सही , मतलब का यार ही सही । खुद खुद से बस खुदी से प्यार ही सही , अपने खास लोगों का वफादार ही सही । तुकबंदी करते जाओ क़व्वाली बनाते जाओ । सुझाव है आगे मर्ज़ी सरकार की । 
 
 
Shabaab Pe Main, Pardaa Hai Pardaa - शबाब पे मैं, पर्दा है पर्दा

 
 
 

अगस्त 11, 2018

POST : 869 मेरा सुंदर सपना टूट गया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      मेरा सुंदर सपना टूट गया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

         कुछ लोग समझते हैं हम जैसे लिखने वाले आलोचना करने के आदी हैं और हमें हर नेता हर सरकार की आलोचना कर कोई सुकून मिलता है। मगर वास्तविकता इस के विपरीत है। दुष्यंत कुमार की पीड़ा आप नहीं समझ सकते अगर आपको उस में केवल शायरी अच्छी लगती है और आप तालियां बजाते हैं भले उनके शेर बोलने वाला खुद कोई नेता अधिकारी या दूसरा कोई ऐसा हो जो देश की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार हो। हम इक ऐसे समाज का सपना देखते हैं जिस में कोई छोटा बड़ा न हो , अमीर गरीब न हो , किसी तरह का भेदभाव नहीं हो। सब लोग एक समान हों कब ऐसा समाज बनेगा। आज़ादी के बाद से देश की जनता कई नेताओं पर भरोसा करती आई है कि शायद ये कोई सार्थक बदलाव लाएगा। वादे तो बहुत लोगों ने किये मगर वादे निभाए नहीं किसी ने भी। कुछ लोग आये जो बदलना चाहते थे वास्तव में देश और जनता की हालत को मगर वो दुर्भाग्य से कम समय ही रह पाए। लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम सबसे पहले आता है , रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी समझ पद से हट जाना और जब प्रधानमंत्री बने तो देश के खोये स्वाभिमान को जगाना। ऐसे भी जननायक हुए जो किसी पद पर नहीं रहे मगर उनका योगदान कम नहीं था। पिछली बातों की नहीं आज की बात करते हैं। शायद राजनीति अब उस स्तर तक नैतिक रूप से नीचे गिर चुकी है कि लाज शर्म रही ही नहीं है। 
 
                पिछले चुनाव में देश की जनता को काफी समय बाद किसी की बातों से लगा कि अब कोई हमारा सपना सच कर दिखाना चाहता है और इसी कारण उसे उम्मीद से बढ़कर जनता का समर्थन मिला। ये वास्तव में एक ज़िम्मेदारी समझने और देश की जनता की उम्मीद पर खरे उतरने का इम्तिहान भी था। मगर बेहद खेद से कहना पड़ता है कि मोदी जी ने चार साल में कोई कोशिश ही नहीं की देश और जनता की भलाई पर ध्यान देने की। ये कहना अनुचित नहीं होगा कि अपार बहुमत मिलने से कर्तव्यबोध होने की जगह उनको अहंकार हो गया और समझने लगे कि उनसे अच्छा कोई पहले न था न आगे कोई हो सकता है। उनका सारा ध्यान अपनी छवि किसी मसीहा की बनाने और पहले जितने भी नेता सत्ता पर रहे उनको बुरा और खलनायक साबित करने पर रहा। ये नकारात्मकता कोई सार्थक कार्य कर सकती भी नहीं थी। जिस हद तक मोदी जी ने अपना रहन सहन पहनावा और तौर तरीके बनाये और राजा महाराजा की तरह से शानो शौकत दर्शाने का कार्य किया उसे भारत जैसे गरीब देश की जनता के साथ मज़ाक ही समझ सकते हैं। जिस भारतीय संस्कृति का दम भरते है आज के ये सत्ताधारी उस में सादगी से जीना और खुद पर नहीं देश के धन सुविधाओं को उन पर खर्च करना जो आज़ादी के बाद भी नर्क सा जीवन जीने को विवश हैं।

                       देश की जनता गरीबों की समस्याओं की अनदेखी कर अपने अघोषित अजेंडे पर चल कर राजनीति को और भी घटिया स्तर पर ले आये हैं। धार्मिक उन्माद फैला कर सत्ता की रोटियां सेकना लोगों को गुमराह करना विकास की बात छोड़ टकराव और विनाश की निति पर चलना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा की परवाह नहीं करना। सब से बढ़कर खुद को सर्वस्व समझना और टीवी चैनलों को लाखों करोड़ का फायदा बेकार के झूठे विज्ञापनों की आड़ में पहुंचाकर उनको अपने गुणगान को चाटुकार बनाना जैसे कार्य संविधान और लोकतंत्र के विपरीत हैं। अपने विरोध की आवाज़ को बंद करवाने को हर सीमा को लांघना किस बात को दर्शाता है। अगर सत्ता हासिल करना ही एक मात्र मकसद होता है तो देश सेवा की बात मत कहो और इसे देशभक्ति तो कदापि नहीं। सत्ता की खातिर क्या क्या नहीं किया अपने , क्या देश में किसी एक दल की ही सरकार होना महान कार्य है। सत्ता के मोह में इस कदर अंधा होना कोई अच्छी निशानी नहीं है। हर तरफ दंगे फसाद और भीड़ बनकर अराजकता पर सर्वोच्च न्यायालय भी चिंतित है। धर्मं की आड़ में जो फसाद करते हैं आपकी सरकार उनका अभिनंदन करती है फूल बरसाती है घर बुलाकर सम्मानित करते हैं। नहीं ये देश की बात नहीं है जनता को बांटने की बात है और लाशों पर राजनीत्ती करना है।

          कोई भी वादा नहीं पूरा किया आपने और आप को मिले जनमत की रत्ती भर भी लाज नहीं रखी है। फिर भी आपको एहसास ही नहीं है कि कैसे झूठी उम्मीदें जगाकर आपने भोली भाली जनता की भावनाओं से खिलवाड़ किया है। झूठ बोलने की कोई सीमा बची नहीं है। आपको पता ही नहीं है आपने जनता को किस हद तक निराश किया है , इतना कि अब लोग दूध के जले छाछ को भी फूंककर पिया करेंगे। अपने एक ही बात साबित की है कि दल कोई भी हो नेता कोई भी हो विश्वास किसी की बात का नहीं है। जनता को आपने दिया कुछ भी नहीं है उनकी उम्मीदों को भी छीन लिया है। क्या किया है आपने आप नहीं समझ सकते। हम भी चाहते थे कोई नेता वास्तविक रूप से ऐसा हो जो खुद अपनी शानो शौकत से बढ़कर देश की जनता की भलाई की बात सोचता हो।  शायद हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारी गुलामी की मानसिकता है जो किसी न किसी को अपना खुदा या मसीहा समझने लगती है। जब कोई खुद को खुदा समझने लगता है तो उसे लगता है वो जो चाहे कर सकता है और उस पर सही गलत का सवाल कोई नहीं उठा सकता है। हमारे देश का मीडिया हमेशा किसी न किसी को भगवान बनाकर अपना उल्लू सीधा करता आया है और खुद को खुद ही सच का झंडाबरदार घोषित कर सच को बेचता आया है। उनका सच सच बाकी सब झूठ और उनके विशेषाधिकार की बात , क्यों कैसे विशेषाधिकार आपको या किसी को। खबर क्या है कोई कसौटी नहीं कोई निष्पक्षता की बात नहीं और सच कहने का साहस तो है ही नहीं। अपने आप पर फ़िदा होना अच्छी बात नहीं है।

      ऐसे ही लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर या खुद को बेचकर लोगों की महानता की छवि घड़ने का काम किया है जो अपने आप में किसी अपराध की तरह है। धर्म और आस्था के नाम पर मनमर्ज़ी की छूट देने का अंजाम सामने है तथाकथित साधु सन्यासी जेल में बंद हैं। उनको भी लोग भगवान मानते थे और नहीं चाहते थे उन पर कोई शक या सवाल करे। इस सरकार ने भी अपने को किसी के प्रति जवाबदेह नहीं माना है। ये कैसी देश की सेवा है कि आप चयन नहीं मनोनयन से अपने ख़ास लोगों को पदों पर बिठाते चलें। जिस देश में लोग बदहाल हों उसकी सरकार जश्न मनाती रहे बात बात पर। आज विश्व भर की संस्थाओं की सूचि में हमारा देश भ्र्ष्टाचार भूख स्वास्थ्य शिक्षा और मानवाधिकार में निचले पायदानों पर है पहले से और खराब हालत है। सौ से अधिक योजनाएं घोषित की गई और सफल कोई भी नहीं , जिस गांव को गोद लिया जिस जिस नेता ने उस गांव की ही खबर नहीं ली तो देश की क्या लेंगे आप। लाखों करोड़ बर्बाद किये और स्वच्छ भारत अभियान की हक़ीक़त बताती है कोई बदलाव नहीं हुआ केवल सरकारी ऐप्स और झूठे विज्ञापनों से कुछ नहीं किया जा सकता है। स्किल इंडिया मेक इन इंडिया को इक धोखा बना दिया है जब हर चीज़ विदेश से बनवाते हैं। अपने हमेशा घोषणा की कि आपसे पहले किसी ने कुछ नहीं किया मगर आज आपके चार साल के काम को देखा जाये और 63 साल में देश में जितना काम हुआ उस से तुलना की जाये तो उस रफ्तार से उसका सोलहवां भाग काम तो दिखाई देता मगर उसका एक प्रतिशत भी नहीं हुआ देश और जनता का विकास का काम। जो हुआ या किया वो भी सामने है छुपा नहीं है सत्ताधारी दल के आलीशान भवन दफ्तर हर राज्य हर शहर में और सत्ताधारी नेताओं पर महिलाओं से बदसलूकी से गंदे आपराधिक कार्य तक सामने आये हैं। हरियाणा में तो सरकार ने बलात्कार के आरोपी को वोटों की खातिर बचाने का भरसक प्रयास किया और अदालत के आदेशों की धज्जियां उड़ाने का काम किया , यहां तक कि इसी सरकार ने उसके कितने साल से अवैध घोषित निर्माण को वैध करने को ही कानून बनाकर उसे इक शहर से गांव घोषित कर दिया। क्या यही स्मार्ट शहर बनाने का ढंग है , हर चुनाव में आपराधिक छवि के नेताओं को शामिल किया अपने दल में। आपने कहा कुछ किया कुछ और , आज अपने चार साल का हिसाब बताने की जगह देश को धर्म आदि के नाम पर उलझाने को लगे हैं। नहीं कोई भी इसे देश सेवा या देशभक्ति नहीं मान सकता है ।