ये दुनिया दोस्ती का बाज़ार नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ये दुनिया दोस्ती का बाज़ार नहीं है
यहां कोई किसी का दिलदार नहीं है ।
नहीं महफ़िल कहीं कोई भीड़ बहुत है
पड़े हैं साज़ लेकिन झंकार नहीं है ।
गई खो रौनकें है सुनसान नज़ारा
महकता था कभी वो गुलज़ार नहीं है ।
वो रातें चांदनी हम तुम साथ कभी थे
समझ ले बात दिल की ग़मख़्वार नहीं है ।
न जीते हम न मरते ये हाल हुआ है
हमारा कुल जहां में इक यार नहीं है ।
तुम्हारे शहर में कितने शीशमहल हैं
ठहरने को वहां पर घर बार नहीं है ।
बड़ी ' तनहा ' यहां की हर शामो सहर है
यहां दिल लग सकेगा आसार नहीं है ।

2 टिप्पणियां:
Waah...ठहरने का वहां घरबार👌👍
👍👌
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