Sunday, 19 April 2020

सोच-समझकर रणनीति बनाकर ( विपत्ति से जंग ) डॉ लोक सेतिया

 सोच-समझकर रणनीति बनाकर ( विपत्ति से जंग ) डॉ लोक सेतिया 

 नहीं मैं कोई जानकर नहीं शोधकर्ता नहीं वैज्ञानिक नहीं फिर भी सोचता रहता हूं हर सामाजिक धार्मिक राजनैतिक विषय को लेकर। कल इक फिल्म देखते देखते विचार आया जैसा फिल्म में आतंकवाद को खिलाफ जंग जीतने के लिए लड़ने की रणनीति दुश्मन के तरीके और ढंग को ध्यान पूर्वक समझ कर उसी तरह से सामना कर निडरता से लड़ी और जीती जाती है ही इस समय उचित नहीं होगा। कोरोना को लेकर अभी कयास ही लगाए जा रहे हैं ठीक से कुछ भी नहीं मालूम तो क्या केवल बंद कमरे में अथवा किसी भी शहर देश को बंद किले में रहकर हमेशा सुरक्षित रखा जा सकता है। ये सोच लिया सामाजिक दूरी बनाकर घर में कैद होकर खुद को बचा सकते हैं मगर कोई नहीं जानता कि कब बाहर ऐसा दुश्मन जिसे हम देख भी नहीं सकते वास्तव में पूर्णतया खत्म हो जाएगा और हम घर से बाहर निकल कर भी उसके शिकार नहीं होंगे। जब तक उसका उपचार या बचाव का कोई तरीका नहीं ढूंढा जाता हम ये नहीं समझ सकते न ही अनंतकाल तक देश को डर और घबराहट में जीने की बात करना सही होगा। ये तो मौत से घबराकर जीना छोड़ केवल ज़िंदा होने का अभिनय होगा। आधुनिक युग में जब शायद ये भी समझ आ जाना चाहिए कि कोई भगवान किसी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे में से आपको बचाने को नहीं आने वाला है। और समय के अनुसार हर समस्या की जड़ तक पहुंचकर उसका समाधान करना ही समझदारी है न कि काल्पनिक अथवा ऐतहासिक कथा कहानियों में खोकर सामने खड़ी वास्तविकता से भागना नज़र चुराकर। 

बहुत कारण हैं कुदरत से मनमानी खिलवाड़ करने से तमाम तरह की अंधी दौड़ में हमने इंसान इंसानियत को लेकर विचार करना ही छोड़ दिया है। जब जिस किसी ने जो भी बताया अपने मकसद से अपनी राजनीति के लिए या धर्म के नाम पर अथवा अलग अलग तरह के लोगों ने अपने हितों को ध्यान में रखकर कोई व्यौपार कारोबार उद्योग स्थापित करने से टीवी सिनेमा अभिनय यहां तक खेल को लेकर आर्थिक लाभ की खातिर देश की जनता की भलाई या जागरूकता के लिए नहीं सिर्फ अपनी खुदगर्ज़ी के लिए। हमने काठ के उल्लू बनकर अपने मस्तिष्क से काम लिए बिना स्वीकार कर लिया कि ये बड़े लोग हैं जाने माने लोग हैं जो कहते हैं सही होगा। मगर हम नहीं जानते कि ये तमाम लोग जो संदेश उपदेश हम सभी को देते हैं खुद उस का पालन नहीं करते। सामने सब कुछ साफ है धर्म वाले संचय करते रहे हमें थोड़े में सुख से रहने की बात कहते हुए , राजनेता जनसेवा  का दम भरते हुए देश के खज़ाने पर कुंडली मारे बैठे उसका उपयोग अपनी अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करने में बर्बाद करते रहे। उन्होंने शासक  बनकर खैरात भी छीनकर ली और देश के नागरिकों को अधिकार भी भीख की तरह मांगने की नौबत आ गई। और हम उनको दोष देते हैं जबकि दोषी हम खुद हैं जो ऐसा झूठे मक्कार और मतलबी लोगों को क्या क्या बना दिया और इतना ही नहीं उनको भगवान होने का अहंकार होने लगा। जिस देश समाज में काबलित और ईमानदारी की कीमत नहीं होती और झूठ एवं चालबाज़ी सिर्फ चिकनी चुपड़ी बातें सुनकर हाथ जोड़ने ताली बजाने का काम लोग करेंगे उसको बबूल बोकर कांटे ही मिलने हैं। 

हमको मूर्ख बनाया जाता है क्योंकि हम मूर्ख बनने और कहलाने में शर्म नहीं महसूस करते हैं। किसी की भी हर बात को आकाशवाणी की तरह विचारे बगैर स्वीकार करना हमारी समझदारी का सबूत तो नहीं हो सकता है। पिता से भाई से दोस्त से असहमत होकर शंका करते हैं पूछते हैं क्या कैसे है तो फिर जिनको शासन के अधिकार देकर बनाया है उनसे कोई सवाल कैसे नहीं किया जा सकता। ऐसे तमाम लोग आपको उपदेश देते हैं भाषण देते हैं कभी आपकी बात नहीं सुनते न ही समझना चाहते हैं। हमने बार बार कुल्हाड़ी को अपने पांव पर मारने की मूर्खता की है। सच्चे और काबिल लोगों को हमने कभी उचित आदर नहीं दिया है खुद हम भी महनत और काबलियत से नहीं भाग्य भरोसे या जोड़ तोड़ किसी भी उचित अनुचित ढंग से सफलता हासिल करने में यकीन रखते हैं। बातें बहुत होती हैं पिछली गलतियों को लेकर मगर आज भी उसी किसी अंधी सुरंग में और आगे चलते जा रहे हैं हम रौशनी की बातें करते हैं मगर पुजारी अंधियारे के हैं। अभी देश के हालात पर बहुत कुछ और समझना विचार करना बाकी है मगर इक शेर किसी शायर का विराम देने से पहले। 

    क्या बतलाएं हमने कैसे सांझ सवेरे देखे हैं , सूरज के आसन पर बैठे घने अंधेरे देखे हैं। 

संकट के समय शासक और सरकार की परीक्षा होती है कि जिनको देश चलाने का अधिकार मिला अथवा जनता ने दिया वो किस सीमा तक सफल रहे हैं नागरिक को अच्छा जीवन और निर्भय होकर सुरक्षित रहने के लिए। मगर अभी जब कोरोना से वास्तविक लड़ाई देश की जनता लड़ रही है और सरकार के पास कोई योजना ही नहीं है कि कैसे करोड़ों लोगों को सुरक्षित अपने घर या राज्य में किस तरह इक विश्वास से और कब तक रहना है किसी नेता का ये कहना कि ये उनके सही समय पर निर्णय करने और कदम उठाने से संभव हुआ है कि कई देशों से हमारे देश में कम संख्या है कोरोना से रोगी लोगों की। अभी तो वास्तव में लड़ाई लड़नी बाकी है और कितनी लंबी लड़ाई होगी ये भी नहीं जानते और उसके बाद विवेचना की जा सकेगी कि क्या जैसा किया गया वही सही था अथवा कुछ और था जो किया जाना चाहिए था मगर समय पर नहीं किया गया। और ये निर्णय कोई शासक अपने बारे खुद नहीं कर सकता है बाद में इतिहास तय करता है कि किस शासक ने कब कोई निर्णय अनुचित लिया था जैसे आपात्काल का निर्णय जैसे इसी सरकार के बहुत सरे निर्णय देश की अर्थव्यवस्था को लेकर संवैधानिक संस्थाओं को नैतिक मूल्यों को लेकर जनता की भलाई के लिए थे या किसी व्यक्ति की आंकाक्षा और किसी विचारधारा को लादने के मकसद से। 

ये खेदजनक बात है कि कोई भी शासक कभी अपनी भूल या गलती को स्वीकार करने का साहस नहीं करता है। मगर हमारे समाज में कुछ बहुत अच्छी बातें हैं जो पुरातन मूल्यों संस्कारों से सीखी हुई हैं जैसे जब संकट की घड़ी आई है तो तमाम लोग औरों की सहायता को आगे बढ़कर वास्तविक इंसानियत के धर्म का पालन करते नज़र आये हैं आते रहे हैं। मगर काश यही भावना हर दिन बनी रहे और हम सभी जिस किसी को भी भूखा बेबस या बेआसरा देखें उसके लिए हाथ बढ़ाएं। इक और बात अगर संभव हो तो बहुत अच्छा होगा। हमको आस्तिक होना धर्म की राह चलना है तो इसके लिए हम अपने अपने आराध्य की वंदना कर सकते हैं अपने घर पर अपने निजि स्थान पर और इसके लिए किसी और नये धर्म स्थल की आवश्यकता नहीं है बल्कि जितना धन सभी ऐसे स्थलों पर चढ़ाते हैं उसे अपने ही आस पास असहाय गरीब भूखे नंगे लोगों की भलाई के लिए खर्च कर देश समाज से इक बड़ी समस्या को दूर कर सकते हैं। अथवा अगर कुछ नया बनाना भी है तो निःशुल्क उपचार के अस्पताल या शिक्षा के मंदिर बनाने और बेआसरा लोगों के लिए घर बनाने का कार्य किया जाए। किसी भी देश का वास्तविक विकास तभी सार्थक होता है जब हर नागरिक को जीवन की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाना पहला उदेश्य हो। 

देश की बेहद गंदी स्वार्थ की राजनीति जी अनीति बन गई है जिस में अपराधी और भेदभाव बढ़ाने वाले बाहुबली जो जनता को भयभीत करते हैं उनका अंत हो और स्वच्छ देशसेवा की भावना की राजनीति शुरू हो जिस में शिक्षित और काबिल लोग सत्ता को उचित मार्गदर्शन देकर अपना कर्तव्य पालन ईमानदारी से करें। न्यायपालिका सामाजिक संस्थाओं संवैधानिक संस्थाओं को फिर से अपने आदर्शों पर खरे उतरने को अपनी निष्ठा देश के संविधान के लिए रख कर किसी व्यक्ति या सरकार के लिए अपने मूल्यों को नहीं भुलाना चाहिए।  


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