Sunday, 23 June 2019

योग का रोग लगा है सखी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   योग का रोग लगा है सखी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     किसी बात की रट लगाना कहते थे सनक सवार हो गई है। कोई डर दिल दिमाग़ पर छाया रहे तो ऐसा समझते थे उसे फोबिया हो गया है। आजकल सब को लगता है योग से लोग प्यार करने लगे हैं जबकि असल में लोग घबरा गए हैं खासकर दिल के रोग को लेकर या अन्य रोग होने पर उपचार पर होने वाले खर्च के डर से। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि लोगों को ऐसी गलतफ़हमी का शिकार बनाया गया है कि योग करने से ही आप स्वस्थ्य रहेंगे और रोग नहीं लगेगा बल्कि जिनको कोई रोग है वो भी ठीक हो जाएगा। जबकि सब जानते हैं कि किस तरह से कोई रोग होता है और कैसे किस दवा या उपचार से निरोग होते हैं ये सालों की जांच और शोध कर्म के बाद मालूम होता है। पहली बात ये समझना है कि सेहतमंद होना क्या है। जिस तरह से हर कोई महिला है तो तथाकथित जीरो फिगर और पुरुष है तो सिक्स ऐप सीने पेट और बाजुओं का मांसल होना चाहते हैं किसी तरह दिखने को आकर्षित लगना उसको स्वस्थ्य नहीं शायद मानसिक रोग कहना ज़्यादा उपयुक्त होगा। भेड़चाल की आदत भी अच्छी नहीं और किसी की इश्तिहारबाजी से कायल होकर कुछ भी बिना विचारे अपनाना भी उचित नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम लोग शारीरिक स्वास्थ्य की खातिर कोई मानसिक रोग पालने का काम कर रहे हैं। हमने अपनी गलतियों से सबक नहीं सीखा अन्यथा कुछ साल पहले जैसे डॉक्टर्स भी रिफाइंड घी खाने की सलाह कुछ कंपनियों की इश्तिहारबाज़ी से कायल हो कर देते रहे मगर जब घुटने बदलने की नौबत आई तब समझ आया दिल बचा या नहीं बचा मालूम नहीं चलना फिरना मुहाल हो गया। अब कहते हैं देसी घी खाओ या सरसों का तेल मगर रिफाईन्ड आयल नहीं। योग तो पहले भी था मगर जो जानते थे उन्होंने इसका बाजार नहीं लगाया क्योंकि ये कारोबार करने की नहीं सभी की भलाई की बात थी। जो खुद को योग गुरु कहने लगे हैं मुमकिन है उनको इसकी अधकचरी जानकारी ही हो क्योंकि जिस तरह उन्होंने इसको सामान बनाकर बेचा है ये उस बात की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता है। जैसा लोग समझते हैं उस जैसा संभव ही नहीं योग से न किसी और बात से। नासमझी नहीं मूर्खता की बात है आधुनिक युग में बिना किसी शोध या सबूत को जाने समझे उसके पीछे भागना।

        शायद लोगों को ये सस्ता और आसान रास्ता लगता है मगर कहते हैं सस्ता और आसान बाद में महंगा पड़ता है अक्सर और जो कीमत देनी पड़ती है उसका हिसाब नहीं होता है। पढ़ा नहीं और समझना चाहा नहीं बस किसी की नकल करते जाते हैं मगर कभी विचार किया है आपकी जान की कोई कीमत लगाई जा सकती है। जिस से आपकी ज़िंदगी जुड़ी हो उसको बिना परखे सुनी सुनाई बातों से कैसे स्वीकार कर सकते हैं। अगर योग करने से बीमार नहीं होते तो इतने साल से योग बढ़ने के बाद रोगी कम क्यों नहीं हो रहे बढ़ते जाते हैं। कोई वैज्ञानिक तथ्य सामने नहीं आया कि किसी का गंभीर रोग योग से ही ठीक हो गया हो। अपने कारोबार की खातिर पैसे देकर अपने अनुसार ब्यानबाज़ी का काम कई लोग किया करते हैं और लोग भोलेपन या नासमझी में धोखे में आ जाते हैं। रोग उपचार या निदान स्वास्थ्य इक शिक्षा है विज्ञान है कोई टोटकेबाज़ी नहीं है। और  बात फिर से दोहराना चाहता हूं एलोपैथी होमियो आयुर्वेद सिद्ध कोई भी हो शिक्षित डॉक्टर से मिल का दिखाकर सही उपचार हो सकता है ऐसे किसी के नाम पर हर शहर दुकानदारी खतरनाक है लोगों के स्वस्थ्य से खिलवाड़ भी है। शायद लोग नहीं जानते हमारे देश में इसको लेकर सरकार कभी गंभीर नहीं रही है तभी कोई नीमहकीम मनमानी करता है तो कोई शिक्षित डॉक्टर भी पैसे बनाने को अनावश्यक जांच दवाएं और ऑप्रेशन तक करने से संकोच नहीं करते हैं। जिस पेशे को भगवान समझा जाता है उस से जुड़े लोग पैसे के पुजारी बन जाएं तो शायद इससे अधिक पतन नहीं हो सकता है।

    सरकार इस को लेकर क्यों संवेदनशील नहीं है क्यों उसको देश की जनता की भलाई से अधिक चिंता कुछ और बातों की है। वास्तव में हमने जिनको चुना है और जो भी राजनेता सत्ता पर आसीन रहते हैं उनकी पहल ही कुर्सी और अधिकार पाने तक सिमित रहती है। खराब व्यवस्था जंगलराज या अपराध को मिटाना उनकी सोच में शामिल ही नहीं और अनुचित ढंग से कमाई करने वाले धनपशु नेताओं को चंदा देने वालों में होते ही हैं। सरकार तमाम नियम कानून स्वस्थ्य को लेकर लचीले रखती है उनका पालन करवाने की कोशिश ही नहीं करती है। क्या किसी ने सवाल किया है अस्पपतालों नर्सिंग होम को लेकर कानून कड़ाई से क्यों नहीं लागू किये जाते और जब भी घोषणा की जाती है विरोध के सामने झुक जाती है सरकार कोई सौदेबाज़ी होती होगी पर्दे के पीछे। स्वास्थ्य को लेकर ये रवैया आपराधिक है। अंत में किसी शायर का इक शेर।

                    वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता 

                      तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं।


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