Wednesday, 19 June 2019

सरकार है मदारी का तमाशा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      सरकार है मदारी का तमाशा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  सुबह दस बजे सरकारी अधिकारी दफ्तर आते हैं। सभी विभाग के अफ़्सर साथ इक हॉल में बैठे राज्य की राजधानी के दफ्तर में बैठे बड़े अधिकारियों से दुआ सलाम करने के बाद चाय की चुस्कियां लेते हुए ऊपर से जारी आदेश का फरमान जारी करते हैं सुन कर अमल करने की बात करते हैं। कोई नहीं जानता कोई गंभीर समस्या थी जिस पर चर्चा करना लाज़मी था पल भर की देरी भी नहीं होनी चाहिए थी या ऐसा कुछ भी नहीं था और मकसद इक मदारी को अपना नया खेल तमाशा दिखलाना भर था। यकीन करें शायद ही ऐसी कोई ज़रूरत होती है मगर सरकार ने विडिओ कंफ़ेरन्सिंग का कीर्तिमान स्थापित करना है सरकारी ऐप्प्स हैं देश की जनता को किसी अधिकारी से मिलने की ज़रूरत नहीं कोई शिकायत लिखित नहीं करनी। आपकी समस्या है तो आपके पास स्मार्ट फोन होना चाहिए उस पर अनपढ़ लोग भी शिकायत दर्ज करवा फोटो सबूत लगा सकते हैं। मुमकिन बहुत कुछ है मगर होता ये है कि कई बार शाम को पांच बजते ही किसी गड्डे वाली सड़क को ठीक किया जा चुका है बताकर निपटाई जाती है शिकायत तो कोई सी एम विंडो पर शिकायत दो साल तक इस उस अधिकारी को भेजी जाती रहती है और दो साल बाद सी एम दफ्तर घोषित करता है ये तो जनहित की बात इक सुझाव था शिकायत नहीं समझी जा सकती है। दो साल कितने खत कितने लोगों को चेतावनी उचित करवाई नहीं करने पर ज़िम्मेदार समझे जाने की , क्या सब बेकार था अनावश्यक था। 

    सारकार दावा करती है अधिकारी को कॉल व्हाट्सएप्प कर समस्या बता सकते हैं ऑनलाइन शिकायत दर्ज की जा सकती है। मगर फोन बंद मिलते हैं या दफ्तर के नंबर पर कोई बताता है अधिकारी अभी आये नहीं हैं , अभी मीटिंग में हैं अभी किसी सामाजिक समारोह में भाग लेने गए है , अभी कोई सरकारी आयोजन किया जा रहा है उस में व्यस्त हैं। सौ बहाने हैं समय नहीं है मगर किसी नेता की सत्ताधारी दल की राजनैतिक सभा की तैयारी करने को सरकारी काम को छोड़ कर कितने दिन तक उपलब्ध रहते हैं जिस काम से उनका कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। आधुनिक सुविधाओं से जनता को सुविधा मिलनी चाहिए थी मगर होता उल्टा है। सरकारी लोग उनको खिलौने की तरह उपयोग करते हैं। योग दिवस या कोई और दिन किसी मकसद को कोई इसका फायदा अपने फायदे और हित साधने को करता है तो किसी नेता को लगता है ये राजनैतिक लाभ उठाने का अवसर हो सकता है और करोड़ों का बजट सरकार खर्च करती है जब उचित ईलाज की व्यवस्था की कमी और नाकामी से बच्चे मरने की खबर पुरानी नहीं हुई है। सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए कोई सवाल नहीं करता क्योंकि अख़बार टीवी सब को हिस्सा मिलता है मलाई खाने को विज्ञापन भी और रुतबा भी। 

चोरी डाका नहीं कह सकते लेकिन है देश की जनता के धन की लूट जो बादस्तूर जारी रहती है। मिल बांट कर खाने का लुत्फ़ लेते हैं सरकारी आयोजन का ठेका एनजीओ के नाम पर और हर शहर में राजनेता अपने खास लोगों को किसी काम का दयित्व सौंप कर कमीशन खाते हैं बिचौलिया बनकर। हर शाख पे उल्लू बैठा है और कितने इंसान हैं जो गिद्ध की तरह मुर्दे को नौचने की राह तकते हैं। कोई नेता मदारी बनकर खेल दिखलाता है कुछ लोग उनके कहने पर जमूरा बनकर नाचते है कोई बंदर बनकर कोई बंदरिया का घूंघट ओढ़े हुए। देश सेवा की आड़ में खेल मनोरंजक चलता है और कमाल की बात है सब की कमाई भी होती है और सभी को शोहरत भी मिलती है सम्मानित किया जाता है ईनाम देते हैं। खेल खत्म पैसा हज़्म की बात है नतीजा वही ढाक के तीन पात रहता है।

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