Monday, 23 July 2018

अदब वालों की बातें ( लिखने वालों की बात ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

      अदब वालों की बातें ( लिखने वालों की बात )  आलेख 

                                      डॉ लोक सेतिया 

     पिछले सप्ताह इक लिखने वाले दोस्त का फोन आया , अमुक दिन उस समय पर आपके शहर में आना है , आप जो भी लिखने वाले हैं उनको बुला लेना। मैंने कहा कुछ कारण है , कारण क्या है उनको बता भी दिया , इसलिए मैं और लोगों को नहीं बुला सकता मगर आप ने कहा है मुझे मिलना है तो मुझे बता दो किस जगह आपका आयोजन है मैं मिलने ज़रूर आऊंगा। उस शाम तक उनके फोन की इंतज़ार रही , उसके बाद निगाहें घर की चौखट पर लगी रहीं मगर नहीं आने वाले नहीं आये। समझ गया मगर अभी भी नासमझ ही रहना चाहता हूं। यही होता है बार बार , हर किसी को अपना रुतबा बढ़ाना होता है मिलने की चाहत नहीं होती है। जो उनको चाहिए मिलता नहीं तो बात खत्म , मगर अदब की बात करते हैं बेअदबी कहना उचित नहीं होगा। आज फिर बीस पच्चीस साल पहले की बात याद आई , इक देश भर में प्रख्यात लिखने वाले से उनके घर जो कि किताबों के प्रकाशन का पता भी था , अपनी किताब छपवाने को गया। जाने कैसे तब मेरे पास पैसे थे जेब में पांच दस हज़ार जो तब काफी थे किताब छपवाने को। उनका पहला सवाल था आप कार से आये होंगे तो कार पार्किंग की जगह लगाई है या नहीं। मैंने बताया मेरे पास कार नहीं है मैं 225 किलोमीटर दूर बस से आया और बस स्टॉप से रिक्शा लेकर आया हूं। गर्मी के दिन दोपहर की बात थी मगर उन्होंने मुझे प्यास लगी थी मगर पानी भी नहीं पूछा। तब मैंने लिखा था मैं बे-कार नहीं हूं जब खुद कार खरीद ली थी उनकी बात से नहीं। मगर मैंने उनसे निवेदन किया था आप मेरा लिखा पढ़ कर राय दो मुझे किताब छपवानी चाहिए अथवा नहीं। वो बोले भाई हिंदी की किताब पढ़ता कौन है , ये तो आपको खुद पैसे खर्च कर छपवा कर दोस्तों में बांटनी है अपने लेखक होने का प्रमाण हासिल करने को। समझा कि नहीं छपवानी चाहिए और लौट आया था , उन्होंने किताब छापने का दाम बता दिया था। सलाह मांगी थी इसलिए उन्होंने एक ही राय दी थी कि किसी एक विधा में लिखा करो। आप व्यंग्य भी लिखते हो , ग़ज़ल भी , कविता - नज़्म भी , कहानी भी लिखते हो , साथ में आलेख भी सम सामयिक विषयों पर , ऐसा उचित नहीं। मगर उनकी सलाह मानना मेरे लिए कठिन ही नहीं असंभव भी था। शायद नहीं करना चाहिए था जो किया , इक नज़्म लिखी थी और उनके भेज भी दी थी। 

बैठे थे उनके घर में उनसे मगर अनजान थे , उठ गये महफ़िल से वो ऐसे कद्रदान थे। 

सालों बाद उनसे बात हुई किसी विषय पर उनको पता चला मैं भी उन दिनों गुड़गांव में हूं तो घर आने को कहा। कहा आपके घर आया था जब दिल्ली में रहते थे आप मगर उनको भूल गई मुलाकात मुझे याद रही। उसके बाद समझ लिया था बड़े नाम वालों से मिलने से बचना ही अच्छा होगा। उसके बाद इसी तरह के कड़वे अनुभव मिलते ही रहे हैं। लोग मुझे उपयोग करते रहे अपनी ज़रूरत पूरी कर भूल जाते रहे। कितनी बार किसी शहर से मेरे शहर आने पर मुझे बताया कि आपके शहर में किसी सभा में कविता पाठ करने आना है आप भी आ जाना बिना आयोजकों के बुलावे भी। मेरे घर अधिकार समझ आने वाले घर की तरह रह कर अपना कार्य करवाने वाले जब भी उनके शहर गया तो घर पर चलने की बात नहीं की। आपको मूर्खता लग सकती है कि उनके काम में लेखन में सहयोग देने का काम भी महमाननवाज़ी भी और जाते जाते उनकी पसंद की कोई चीज़ अपनी जेब से खरीद कर देने का काम बार बार करता रहा ख़ुशी ख़ुशी। बीस साल के रिश्ते का हासिल उन्होंने खुद ही अपने कार्यक्रम में बुलाकर अपमानित करने का काम किया ये कहकर कि आज केवल उन्हीं को बोलना है जो हिंदी दिवस पर कोई रचना लिखकर लाये हैं , आप ग़ज़ल नहीं पढ़ सकते। मगर फिर किसी के समझाने पर कहा चलो आप बाहर से आये हैं सुना सकते हैं मगर समय सीमा है। लोग घंटा घंटा आलेख पढ़ रहे थे मगर सीमा की बात मेरे लिए कही गई। अदब इसी को कहते हैं। 
            इक सरकारी अधिकारी शहर से तबादला होने पर जाने लगे तो मुझे घर बुलाया और इक चेक दिया ताकि उनके जाने के बाद उनको महमान की तरह बुलाने को आयोजन किया जाये उनको सम्मानित किया जाये। नहीं लिया था चेक उनको वापस कर दिया था क्योंकि वो रेड क्रॉस का पैसे का गलत उपयोग हो रहा था। अगर आप मूल्यों की बात सच की नैतिकता की बात लिखते हैं मगर खुद जीवन में पालन नहीं करते तो लिखने का मकसद क्या है। एक संस्था ने मुझे कवि सम्मेलन आयोजित करने में सहयोग मांगा तो एक लेखक को बता दिया सब की तरह कि एक हज़ार की राशि हर कवि को संस्था देगी। मगर वो कहने लगे मैं टेक्सी या कार से आने जाने का किराया और दिलवा सकता हूं कोशिश कर के। मगर मुझ से ये होता नहीं और मना किया तो कहने लगे आप उनसे ठेका तय कर लो या मुझसे बात करवा दो मुझे आता है ये करना।  क्षमा मांग ली थी क्योंकि मुझे ऐसा करने में सभी लिखने वालों का अपमान लगा था। बुलाने वाला जो देना चाहता है वो सम्मान है और आपको राशि थोड़ी लगती है आप इनकार करें आपका हक है , मगर सदबाज़ी नहीं। मैं इक ठेकेदार दादा जी का पोता और ठेकेदार पिता जी का बेटा होने के बावजूद भी ठेकेदारी के गुण नहीं सीख सका। अब लेखक बनकर वापस जाना संभव नहीं है। घटनाएं बहुत हैं मगर निष्कर्ष वही है हर कोई खुद को दूसरे से बड़ा समझता है या दिखाना चाहता है। आखिर में इक शेर मेरी ग़ज़ल का मतला भी है :-

पूछा उन्हें जाना किधर चाहते हैं ,

कहने लगे बनना खबर चाहते हैं।


1 comment:

sanjay said...

सही बात है लोग रुतबा बढाने के लिए मिलते हैं...वैसे नहीं मिलना चाहते