Thursday, 17 November 2016

लाख ब्लॉग व्यूवर्स का मतलब ( आज की बात ) डॉ लोक सेतिया

          कभी कभी लगता है किसी संख्या का विशेष महत्व है।  कुछ दिन से मैं जैसे इंतज़ार कर रहा था कि कब मेरे ब्लॉग पर पेज वीवर्स की ये संख्या हो एक लाख की जो अभी अभी हुई मालूम हुआ। फिर सोचता हूं इसका मतलब क्या है , मैंने जब लिखना शुरू किया था , ब्लॉग पर नहीं बहुत साल पहले डायरी पर , तब क्या सोच कर लिखना शुरू किया था , उस उद्देश्य का क्या हुआ। लिखना शुरू किया था इक अजीब सी सोच को लेकर कि कोई इक दोस्त कभी मुझे मिलेगा जो मुझे मेरी हर बात को समझेगा , उसको बताऊंगा अपनी जीवन की हर बात। हमेशा लगता था ये दुनिया और समाज जैसा होना चाहिए वैसा क्यों नहीं है। समाज और देश की दुर्दशा मुझे परेशान करती और राजनीति और पत्रकारिता को लेकर हैरान होता रहता। मौज मस्ती की बातें कभी ज़रूरी लगी ही नहीं और गंभीर बातें करना आदत बन गया जवानी की उम्र में ही। इक आक्रोश सा छाया रहता इक आग सी दिल में जलती रहती कुछ बदलाव करने की , और बगैर लिखे रहना कठिन लगता जैसे दम घुटता हो। नहीं मालूम कहां से इतना विद्रोह मेरे भीतर जमा होता रहा जिस से हर दिन मैं बेचैन रहता तड़पता रहता। कभी समझना ही नहीं चाहा कि जो भी बदलाव मैं लाना चाहता हूं वो अकेला मैं या कोई भी दूसरा अकेले नहीं ला सकता। फिल्मों का शौक बेहद रहा है और कई फ़िल्मी कहानियां मुझे प्रभावित करती रही हैं , कभी कभी लगता जैसे मैं कुछ पुराने युग का बंदा हूं।
                            पता नहीं कैसे इक सपना सा बुनता रहता हमेशा , कहीं इक खूबसूरत दुनिया बसाने का। जिस जहां में सभी अपने हों , इक दूजे से प्यार करते हों , कोई किसी से नफरत नहीं करता हो , किसी को कोई अपमानित नहीं करे उस दुनिया में। कोई मतभेद कोई टकराव कोई धोखा कोई छल कपट नहीं हो। यूं समझो धरती पर इक स्वर्ग की कल्पना किया करता था। अपनी दुनिया से हर दिन पूरी उम्र इक जंग लड़ता रहा हूं मैं , मेरे प्रयास कभी सफल नहीं हुए , हर बार हारता रहा हर किसी से। पर हार ही से ऊर्जा भी मिलती रही दोबारा खड़े होने की। आज जब तमाम लोग मुझे पढ़ते हैं ब्लॉग से कहीं अधिक अन्य पत्र पत्रिकाओं में , कितने कोई अंदाज़ा नहीं संख्या का , तब सोचना चाहता हूं फिर से अपने मकसद के बारे में। ये भी जानना चाहता हूं कि जो मेरा लेखन पढ़ते रहे हैं वो मुझे कितना जान पाये या समझते हैं। क्या अभी भी मुझे तलाश है किसी दोस्त की। मंज़िल क्या है नहीं मालूम , रास्ता कितना लंबा है नहीं पता , कोई कारवां साथ नहीं तब भी , यही चाहता हूं चलते जाना है , ठहरना नहीं है। जीवन का सफर जैसा भी है मुसाफिर हूं चलना ही मेरा काम है।
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   प्रिय पाठको ,
                     आपका आभारी हूं नियमित स्नेह देने के लिये। अपना संबंध ऐसे ही बना रहे यही कामना है।
   धन्यवाद ,
    डॉ लोक सेतिया

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