Sunday, 13 November 2016

जिन्हें अंधकार से प्यार हो गया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      घटना पुरानी है दस साल पहले की , लोग भूल भी गये होंगे , मुझे बार बार याद आती रहती है , क्योंकि उसी तरह की खबरें आये दिन पढ़ने को मिलती ही रहती हैं।  घटना इतनी सी है कि एक आदमी अपने एक कमरे के किराये के घर में ज़िंदा जलकर मर गया। हम सभी ने कभी न कभी अपने हाथ को किसी गर्म बर्तन से छूने से या गलती से आग को छूने का एहसास किया होगा , वो जलन वो दर्द सिरहन पैदा करता है। जब भी सुनते हैं कोई आग में झुलस गया या ज़िंदा जल गया तन बदन में कंपकंपी सी होने लगती है। मगर उस दिन इक अख़बार ने वो खबर छापी थी तब के विधायक की तस्वीर के साथ ये बताने को कि उस गरीब की अस्वाभाविक मौत पर जब उन्होंने ये जानकारी नेता जी को दी तो वह खुद गये उस पिड़ित परिवार को पचीस हज़ार की सहायता राशि देने को। क्या ऐसी घटना के बाद  मात्र यही मान लेना काफी है कि आग बिजली के शार्ट सर्किट से लगी होगी , और क्योंकि घर के बाकी चार सदस्य बाहर गये हुए थे , और वह अकेला एक साल से तपेदिक से बीमार था चारपाई पर लाचार लेटा रहा , चल फिर नहीं सकता था खुद अपना बचाव नहीं कर सका और तड़प तड़प कर मर गया। सरकार आज भी यही करती है और दावा करती है उनकी योजनाएं लोकहितकारी हैं। कई बार समाचार से हमें जितनी बात मालूम होती है उस से अधिक महत्वपूर्ण वो होता है जो न कोई बताता है न शायद कभी हम भी सोचते ही हैं। उस खबर से मेरे मन में जो सवाल उठे और मैंने संबंधित लोगों से पूछे जिनको सुन वो खफा हुए मेरे साथ आज बताता हूं , अर्थात दोहराता हूं। जो आदमी इस कदर बीमार हो उसको तो हॉस्पिटल में भर्ती होना चाहिए था , मगर पता चला सरकारी हॉस्पिटल ने इनकार कर दिया था , जबकि स्वास्थ्य विभाग का प्रचार है टी बी की दवा "डॉट्स " घर घर पहुंचाने का। उस गरीब परिवार को सरकारी बी पी एल कार्ड भी नहीं मिला था न ही कोई मुफ्त प्लाट सौ गज़ का जैसा सरकारी विज्ञापन दावा करता है। आप प्रतिदिन कितने ऐसे विज्ञापन टीवी पर या अख़बार में देखते या पढ़ते हैं , असलियत कोई नहीं जानता।
                               क्या हर खबर आपके लिये इक तमाशा भर है। अब लगता है जैसे कुछ लोगों को अंधकार से प्यार हो गया है। पतन को उत्थान घोषित कर दो , पाप को पुण्य बताओ , झूठ पर सच का लेबल लगा दो , धृतराष्ट्र को दूरदर्शी बताकर उसका गुणगान करो। राजनीति रूपी नर्तकी सभी को लुभा रही है , उसे हासिल करने को किसी भी सीमा तक नीचे गिरने को तैयार हैं लोग। स्वार्थ की आंधी सभी को उड़ा कर ले जा रही है , सफल होना एकमात्र ध्येय है और सफलता का मतलब धनवान होना ही है। जानते हुए भी अंधविश्वास और छल कपट को बढ़ावा दे रहे हैं चंद सिक्कों में ईमान बिक रहा है। पैसे का मोह ऐसा बढ़ा है कि जो सच का चिराग लेकर चले थे आज रौशनी से बचने और अंधेरों का कारोबार करने लगे हैं। मकसद आम नहीं ख़ास कहलाना है , उसकी कीमत चुकाने को राज़ी हैं। जनता के ज़िंदा रहने या मरने से अधिक महत्व खुशहाल जीवन और सुख सुविधा धन दौलत बंगला गाड़ी जैसी चीज़ों का लगता है। हमारा किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं है , बस इक अवसर की तलाश है। जो हमें ऊपर ले जा सके उसी का गुणगान करने को तत्पर हैं। हमें इक दल मिल गया है जो अपने को कहता आम है मगर समझता सब से ख़ास है। उसका रंग उसका पहनावा यही हमारी पहचान है , कथनी और करनी का विरोधभास तक हमें मंज़ूर है। कल तक जिन आदर्शों जिन मूल्यों की बात किया करते थे हम आज वो फज़ूल लगती हैं। हमारा मकसद अपने कार्य को इक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना था , ऊपर आते ही उस सीढ़ी को नष्ट कर दिया है ताकि कोई दूसरा उसका उपयोग नहीं कर सके। अब हमें अपने नेता की जयजयकार करनी है , आडंबर करना है जनसेवा का और जनता ही नहीं खुद को भी धोखा देना है। हमारा दल लोकतंत्र के नाम पर व्यक्तिपूजा करने में आस्था रखता है , दल के भीतर असहमति के लिए कोई स्थान नहीं है। अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के अधिकार को हमने दल के नेता का पास गिरवी रख दिया है।

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