Wednesday, 20 February 2013

ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ज़रा सोचना सोचकर फिर बताना
हुआ है किसी का कभी भी ज़माना।

इसी को तो कहते सभी लोग फैशन
यही कल नया था हुआ अब पुराना।

उसी को पता है किया इश्क़ जिसने
कि होता है कैसा ये मौसम सुहाना।

मेरी कब्र इक दिन बनेगी वहीं पर
मुझे घर जहां पर कभी था बनाना।

सभी दोस्त आए बचाने हमें थे
लगाते रहे पर हमीं पर निशाना।

उठा दर्द सीने में फिर से वही है
वही धुन हमें आज फिर तुम सुनाना।

रहा सोचता रात भर आज "तनहा"
है रूठा हुआ कौन  किसने मनाना।

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