सितंबर 06, 2018

POST : 897 हम कमाल करते हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         हम कमाल करते हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    लोग सारे सवाल करते हैं , सरकार कितना बेहाल करते हैं । कौन समझाए करते क्या हैं जनाब , कुछ नहीं करते यही कमाल करते हैं । ऐसा भी नहीं कि उनको करना नहीं कुछ भी , ये भी नहीं कि कर दिखाना नहीं चाहते कुछ । समस्या है अभी तक उसी समस्या में उलझे हैं कि हमने वो करना है जो 67 सालों में पिछली सरकारों ने किया नहीं है । पहले देखना है जो जो पिछली सरकारों ने किया , हमारे अनुसार वो कुछ भी नहीं किया , उसको छोड़ बाकी कोई काम है जिसे सिर्फ हमीं करंगे ।  हमने कहा और समझा यही है कि हमसे पहले किसी ने कुछ भी नहीं किया और देश हमारी राह देख रहा था हम आएंगे और अच्छे दिन लाएंगे । आज आपको अच्छे दिन की कथा सुनाएंगे । सारे बहरे सुनेंगे जब सारे गूंगे गाएंगे । गूंगे निकल पड़े हैं ज़ुबां की तलाश में , सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिये । सोशल मीडिया पर वही रहते हैं जो खाली होते हैं , ये बात कोई पुराने उद्योगपति कहते हैं । हम आधुनिक युग में रहते हैं मन की बात दुनिया से कहते हैं । हमने ये भी कमाल किया है धोती को रुमाल किया है , रेडिओ को सीधा टीवी पर लेकर जाने किसका क्या हाल किया है । पहले किसी ने किया ऐसा बोले रेडिओ पर सुनाई टीवी पर दे , पहले टीवी पर भाषण या खेल का प्रसारण किया जाता तो रेडिओ पर आवाज़ सुनाई जाती थी , ताकि जिनके पास टीवी नहीं वो भी जान सकें । 

            चार साल पहले की बात है सिंघासन पर बैठते ही ऐलान किया था , हम शोले फिल्म के जेलर की तरह पहले के सभी जेलरों से अलग हैं । हमारी जेल में कैद सभी को समझ लेना चाहिए कि हमारे होते परिंदा भी पर नहीं मार सकता है चप्पे चप्पे पर हमारी नज़र है । अभी तक देश में कुछ भी नहीं हुआ है और हमने वही कर दिखाना है जो अभी तक किसी ने किया नहीं है । सभी अधिकारियों को बुलाया और कहा बताओ जो अभी तक नहीं हुआ है हम कर दिखाएंगे । किसी ने कहा अभी शिक्षा के लिए विद्यालयों की कमी है , अस्पतालों की बहुत कमी है , सुरक्षा और न्याय जनता को मिलने की बेहद कमी है । मतलब अभी तक स्कूल कॉलेज अस्पताल बनवाये ही नहीं गए । जी नहीं बहुत बनाये गए हैं मगर अभी बहुत और ज़रूरत है बनवाने चाहिएं । नहीं नहीं जो पहले बने हम भी वही और नहीं बनाएंगे , संख्या की बात होगी तो हम टिक नहीं पाएंगे । हमने सोच लिया है हम बहुत ऊंचा बुत बनवाएंगे , उनको उनकी उलझनों में उलझायेंगे । मगर इसके लिए महान नेता किधर से लाएंगे , हमारे पास कोई नहीं है तो उनके गांधी पटेल को चुरायेंगे अपनाएंगे । गोडसे को भी नहीं भुलाएंगे अब अपनी सरकार है तो गांधी का नाम भी लेंगे और उनके कातिल का मंदिर भी बनवाएंगे । जो पहले नहीं हुआ हम कर दिखलाएंगे । पहले कोई कोई अख़बार टीवी वाला सरकारी तोता हुआ करता था , बाकी सरकार को आईना दिखाते थे और जनता की वास्तविकता सामने लाते थे । अब कौन है जो अबनिका है हर तरफ इसकी चर्चा है । हमने सबको मालामाल किया है इतना बढ़िया कमाल किया है । जिनके गले में रस्सी कोई नहीं बांध सका उनका हमने शिकार किया है । आज किसी को उनका भरोसा नहीं रहा , जिन पर पहले सभी ने ऐतबार किया है । हमने हर दिन हर किसी के ऐतबार का शिकार किया है । किसी ने जो नहीं किया हमने पहली बार किया है । देश में निष्पक्ष पत्रकारिता का निशान तक मिटाया है सच को झूठ साबित कर सब बंटाधार किया है , सिर्फ इश्तिहार का व्यौपार किया है विज्ञापनों की लूट का कीर्तिमान स्थापित कर हर चोर को साहूकार किया है । स्वास्थ्य विभाग को ज़िंदा रहने दिया बस लाईलाज रोग का उसे बीमार किया है । 

              महिला उद्धार की बातों को देखो कैसे बेकार किया है । बिना तलाक दिये छोड़कर भी दावा भी है उपकार किया है । गंगा मां के बुलावे का कितना हमने प्रचार किया है , गंगा को पूछना किस तरह सफाई की बात कर उसको और बेकार किया है । दाग़ी नेताओं की खातिर नया अविष्कार किया है , खुद नहला धुला पद देकर चमकदार किया है । हमने हर जगह अपनी पसंद के लोगों को बड़े बड़े पदों पर बिठाया है , चयन को नहीं मनोनयन को आधार बनाया है । संविधान किसने पढ़ा है किसने पढ़ाया है । हमने चलन अपना देश भर में चलाया है । जो हमारी बात नहीं समझता मानता अपना नहीं पराया है , हमारे अपनों से पूछो क्या क्या सितम नहीं ढाया है । हमने धूप में सभी को खूब जलाया है , यही हमारा साया है ये भी कहलवाया है । यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है , दुष्यंत कुमार की बात सच कर दिखाया है । 

             बांध पुल सड़कें बिजली परमाणु बंब और विज्ञान की उन्नति की है पहले की सरकारों ने , हम मंदिर मस्जिद गाएंगे और अपनी सत्ता को बढ़ाएंगे । गरीबी भूख को नहीं मिटा सकते तो जनता की उलझनों को और बढ़ाएंगे , महंगाई और असमानता को शिखर पर ले जाएंगे । पेट्रोलियम के दाम कभी नहीं घटाएंगे और रूपये को निचली पायदान पर खड़ा कर दिखाएंगे । किसान ख़ुदकुशी करें मज़दूर महनत के दाम की बात करें लोग चाहे जैसे जिएं मरें हम बांसुरी बजाएंगे । विदेशों की सैर पर देश की दौलत उड़ाएंगे , अपनी छवि को इतना चमकाएंगे , सारे टीवी चैनल अख़बार अपना फ़र्ज़ भूल कर हमारे तलवे चाटेंगे हमारे गुण गाएंगे । हमको देख कर मॉडलिंग करने वाले भी शर्मायेंगे , हम दिन में इतनी बार पोशाक बदल कर सामने आएंगे । हम संसद नहीं जाने वाले सांसदों में अपना नाम लिखवाएंगे और अपनी सोभा बढ़ाएंगे , कहने को ही मज़बूरी में संसद या पीएमओ जाएंगे , हम अठारह घंटे काम करने की अफवाह उड़ाएंगे , मगर अठारह घंटे किया क्या नहीं लोग समझ पाएंगे । हम सबको बुरा साबित करने को खुद अपनी महिमा गाएंगे मियां मिठू बन जाएंगे ।

         विकास की अपनी परिभाषा समझाएंगे और झूठ बोलने में स्वर्ण रजत ताम्र पदक सभी खुद पाएंगे । झूठ नहीं कहा था अच्छे दिन लाएंगे , लोग बदहाल हम आनंद मनाएंगे । मन की बात कहेंगे मगर मन में क्या है नहीं बताएंगे । पांच साल जब बीत जाएंगे तब सोचेंगे देश को क्या दिखलाएंगे । राज़ की बात तब समझायेंगे , जो जो पहले हुआ उसे नहीं करना और जो हुआ नहीं उसे तलाश करने में पांच साल गुज़र जाएंगे । अब तक नहीं मालूम करना क्या है जो हुआ नहीं पहले जल्दी उसका पता लगवाएंगे । अगली बार जीत गए तो ज़रूर कुछ कर दिखलाएंगे । कमाल करने वाले कमाल करते जाएंगे । सच तो ये है कि पिछली सरकारों ने देश में बहुत कुछ किया है अच्छा भी बुरा भी , हमने ठानी है उनकी नहीं मानी है । सबको ठेंगा दिखाया है बिना कुछ किये काम किया है बदनाम भी हुए तो नाम कमाया है । चौकीदार बनकर चोरों का साथ निभाया है । आपकी खातिर बनाया क्या नहीं मालूम , मगर हर दिन बहुत कुछ ढाया है । डरता मुझसे खुद मेरा भी साया है , किसी ने ये रुतबा अभी तलक नहीं पाया है । मनघड़ंत इतिहास सबको समझाया है नहीं खुद को इतिहास समझ आया है । कौन है अपना कौन पराया है ये हमारा राज़ कभी कोई नहीं जान पाया है जनता ने जितना खोया है हमने सरकार बनकर उतना पाकर अपना गौरव बढ़ाया है । बहुत लंबा शाम ढलते हुआ साया है । 

Best Sher On Evening - Amar Ujala Kavya - सुहानी सांझ और ये 20 बड़े शेर...

सितंबर 05, 2018

POST : 896 मुजरिम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

                मुजरिम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

मैं इक ऐसा गुनहगार हूं ,
खुद अपने से शर्मसार हूं ।

अपने ही घर में चोर हूं ,
मैं हूं मैं कि कोई और हूं ।

कैसा अजब किरदार हूं ,
हर सज़ा का हकदार हूं ।

झूठ है मैं भी अमीर हूं ,
सच तो है इक फकीर हूं ।

जाने कौन क्या पहचान हूं ,
अपने से भी अनजान हूं ।

किसलिए अभी ज़िंदा हूं ,
इस बात पे शर्मिन्दा हूं ।

अब हो चुका चूर-चूर हूं ,
हां हां मैं वही मगरूर हूं ।

आशिक़ हूं पर अजीब हूं ,
आप अपना ही रकीब हूं ।

शहर नहीं न कोई गांव है ,
नहीं धूप भी न ही छांव है ।

हर कारवां से बिछुड़ गया ,
हर आशियां बिखर गया ।

हंसता नहीं रोता भी नहीं ,
बेजान कुछ होता ही नहीं ।

ख़ामोशी की आवाज़ हूं ,
बिना पर की परवाज़ हूं ।
 

 

POST : 895 दलित कहना मना है , पामाल लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 दलित कहना मना है , पामाल लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

बोलने जब लगे पामाल लोग - लोक सेतिया "तनहा"

बोलने जब लगे पामाल लोग ,
कुछ नहीं कह सके वाचाल लोग ।

हम भला किस तरह करते यकीन ,
खा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग ।

खा रहे ठोकरें हम बार बार ,
खेलते आप सब फुटबाल लोग ।

देख नेता हुए हैरान आज ,
क्यों समझने लगे हर चाल लोग ।

ज़ुल्म सह भर रहे चुप चाप आह ,
और करते भी क्या बदहाल लोग ।

मछलियों को लुभाने लग गया है ,
बुन रहे इस तरह कुछ जाल लोग ।

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और ,
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग ।

            अदालत ने सरकार को फरमान जारी करने को कहा। सोशल मीडिया वालों को निर्देश जारी करो दलित शब्द नहीं उपयोग करें बोलते हुए , उसकी जगह एस सी , बी सी कह सकते हैं। भाषा विशेषज्ञ हैं क्या दलित उसे कहते हैं जिसका उत्पीड़न होता है और एस सी , बी सी जन्म से होते हैं। आपका मतलब क्या है या तो आप समझते हैं जिनका जन्म जैसे हुआ उनका नसीब वही है उनको दलित ही रहना है भले कभी सत्ता पर आसीन होकर वो स्वर्णों पर भी ज़ुल्म करते हों। या फिर बाकी लोगों पर किया दमन आपको अत्याचार ही नहीं लगता। अदालतों की व्याख्या भी कमाल की बात है। मगर असली विषय यहां कोई और है चलो उसकी चर्चा करते हैं।

                            दलित सम्मेलन , दलित लेखक , दलित साहित्य ?

  मैं कब से समझना चाहता था ये सब क्या है। साहित्य में भी बटवारा मुमकिन है। दमन शोषण गरीब मज़दूर महिला बच्चे बूढ़े सभी का होता है। यहां तक कि बड़ी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों का शोषण खुलकर करते हैं। वेतन सुविधाएं कम देना ही ज़रूरी नहीं है , गधों की तरह जितना चाहे बोझ लादना भी अनुचित है , मगर शायद आप नहीं जानते देश में गधों की भी अहमियत है और उनके लिए कानून बना हुआ है। नियम जानना चाहोगे , काम के घंटे , तीन बार भोजन अवकाश , पानी पीने को भी अवकाश तो है ही शाम ढलने के बाद काम नहीं लिया जा सकता है , इतना ही नहीं उनको बांधने से पहले रस्सी के नीचे मुलायम रेशमी कपड़ा भी होना चाहिए। बारिश में और उमस में काम से छुट्टी भी लाज़मी है। गधों को बता देना आप। 
 
        पामाल शब्द का अर्थ है पांव के तले कुचला हुआ , दलित से भी बढ़कर कह सकते हैं। ऐसे में दलितों का साहित्य उसके लेखक ही नहीं ईनाम और सम्मेलन भी होना कुछ लोगों की अपनी दुकानदारी है। कोई लिखने वाला कविता कहानी ग़ज़ल व्यंग्य आलेख कोई भी विधा अपना कर लिख सकता है मगर ऐसा सोचना ही अपराध जैसा है कि कोई केवल कुछ लोगों की ही बात लिखेगा। साहित्य इक समंदर की तरह है और अपना अलग तालाब बना कर उसी की मछलियों की बात करना चाहते हैं , मगर मगर की बात नहीं क्योंकि मगरमच्छ तालाब में कहां मिलते हैं। मगरमच्छ से बचना चाहते हैं। मुझे लगा आज टीवी वालों को सरकार सलाह देती है कल लिखने वालों को भी दे सकती है ऐसे में बेचारे दलित लेखकों को बड़ी कठिनाई होगी। सरकारी फरमान का क्या भरोसा आपको  अपनी किताबों में से दलित शब्द मिटाने को कहें अगर या कोई और आकर उन किताबों पर रोक ही लगवा दे जिन में दलित शब्द उपयोग किया गया हो। अभी इसिहास को दोबारा लिखना बाकी है और सारा साहित्य फिर से लिखवाना पड़ा इक शब्द को बाहर करने को तो क्या होगा। 
 
              जावेद अख्तर जी को अपनी ग़ज़ल दोबारा लिखनी होगी जो कुछ इस तरह है। 

सभी जाते जिधर जाना उधर अच्छा नहीं लगता , मुझे पामाल रस्तों का सफर अच्छा नहीं लगता। 

मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है , किसी का भी हो , कदमों में सर अच्छा नहीं लगता। 

        दलित राजनीति करने वालों से लिखने वालों और सामाजिक संस्थाओं के लिए बड़े काम की चीज़ है। ये कागज़ की ऐसी तलवार है जो घायल करती है निशान नहीं छोड़ती। अब कोई इसी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय चला जाएगा दलित का पैरोकार बनकर। दलित शोर भी करते हैं हमारा दमन किया जा रहा है , जो बोल सकता है आवाज़ उठाता है वो अन्याय से लड़ता क्यों नहीं अत्याचार सहन किसलिए करता है। ये मामला टेड़ा लगता है। वास्तविक दलित चुप चाप सहते हैं कुछ भी नहीं कहते हैं। आपको कुछ ऐसे लोगों से मिलवाते हैं जो शोषित हैं जिनके अधिकारों का दमन किया जाता है। शुरुआत घर से करना भी बुरा तो नहीं। लिखने वालो आप लिख लिख भेजते हो और अख़बार पत्रिका वाले छापते हैं पब्लिशर्स किताब छापते हैं और ये लोग खूब मालामाल हैं लेकिन कितने लिखने वाले हैं जो लेखन से पेट भर सके इतना भी मिलता है जिनको। वास्तविक शोषण करने वालों पर खामोश हैं क्योंकि बोले तो छपास की बीमारी बढ़ जाएगी। ये आधा सच आधा झूठ वाला लिखना किस काम का है। महिलाओं के शोषण की बात करने वाले खुद घर में अपनी पत्नी से उत्पीड़न का शिकार हैं , किसी लेखक की पत्नी है जो लिखने वाले पति को निकम्मा नहीं  समझती है। बस यही समस्या है खुद सितम सहते हैं और बाकी दुनिया को अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने को कहते हैं। पुरुष के अन्याय की कहानी कविता दर्द भरी ग़ज़ल और औरत के अत्याचार के केवल चुटकुले , ये कैसा न्याय है। होता होगा किसी युग में अत्याचार नारी पर आजकल की नारी पुरुष पर पड़ती है भारी। आज उसकी है तो कल आपकी भी आएगी बारी। कोई नहीं समझता व्यथा कथा हमारी । 
 

 

सितंबर 04, 2018

POST : 894 गिद्ध की नज़र वाले लोग ( बेरहम समाज ) डॉ लोक सेतिया

  गिद्ध की नज़र वाले लोग  ( बेरहम समाज  ) डॉ लोक सेतिया 

      आज इस तस्वीर को देखकर दिल दहल गया है । बताया गया है ये सूडान में 1993 में आए सूखे और भुखमरी की तस्वीर है । मगर मुझे लगा ये किसी भी देश की सरकार और उस देश की जनता की असलियत को बयां करने को बनाई गई है । गरीब जनता भूख से बेबसी से इक जिस्म नहीं बिना मांस का हड्डियों का ढांचा भर है और सत्ता का गिद्ध उस पर निगाहें लगाए है । शायद इस गिद्ध में भी इतना इंतज़ार करने की समझ है जो सत्ता रुपी गिद्ध में कभी नहीं दिखाई देती है । गिद्ध कौन कहता है कम हो रहे हैं , बढ़ रहे हैं जिधर देखो गिद्ध टकटकी लगाए नौच खाने को व्याकुल हैं । और गिद्ध केवल सरकारी दफ्तरों में ही कुर्सियों पर बैठे हों ऐसा भी नहीं है । समाज में हर तरफ गिद्ध ही गिद्ध हैं जो ज़िंदा इंसानों को ही चबा जाना चाहते हैं उनके मरने तक का इंतज़ार नहीं करते । जिस देश में करोड़ों लोग हर दिन भूखे सोते हैं और बिना किसी छत के आसमान के नीचे सर्द रातें , गर्मी में तपती लू और आंधी तूफान झेलते हैं उस देश की सरकारों को जनता को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाना भी अपना कर्तव्य नहीं लगता , और हर बार झूठा दावा करते हैं कितने साल बाद ये सब नहीं होगा । मगर वही लोग खुद अपने पर बेतहाशा धन बर्बाद करते हैं उसी जनता का जिसे नोच खाने के सिवा और क्या कह सकते हैं । एक आदमी को रहने को महल और उस की देखभाल पर लाखों रूपये खर्च का मतलब कितने हज़ारों की कितने दिन की भूख मिट सकती इतना धन केवल शानो शौकत दिखाने को । नहीं गरीबों से इनको रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं है । देश सेवा के नाम पर इक अमानवीय अपराध है जनता के सेवक बनकर उसकी दौलत को यूं उड़ाना । 
 
                 अभी केरल में आई बाढ़ में कहा गया किसी अरब देश की सहायता स्वीकार नहीं की गई , ये सच है या झूठ या आधा सच मुझे कुछ नहीं कहना । मगर मुझे पूछना है उन सभी धर्म वालों से जिनके पास अंबार लगे हुए हैं वो किस दिन किस के लिए हैं । अगर धर्म के लिए हैं तो देश में इतने लोग गरीब हैं भूखे हैं और शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं क्यों इन सभी को दौलत जमा करनी धर्म लगती है जबकि हर धर्म संचय नहीं करने की शिक्षा देता है और ज़रूरत से अधिक जमा करने को दरिद्रता बताता है । और भी लोग हैं जो दया और समाजसेवा का दम भरते हैं मगर अपने पास हज़ारों करोड़ होने पर भी उनकी हवस कम नहीं होती है और पैसा कमाने में सब कुछ करना उचित समझते हैं । गांधी जी ने ही नहीं पहले भी सभी महान लोगों ने ऐसा कहा है कि दुनिया में सबकी ज़रूरत को बहुत है सब कुछ , मगर किसी की भी हवस पूरी करने को काफी नहीं है । अर्थशास्त्री भी बताते हैं कुछ लोगों के पास बहुत अधिक है इसी कारण बाकी लोगों के पास ज़रूरत को भी नहीं है । वो चाहे जो भी लोग हों जिन लोगों ने भी जिस किसी भी तरह देश की संपदा का बड़ा हिस्सा अपनी तिजोरी में बंद किया हुआ है वास्तव में बाकी लोगों के हिस्से का लूट का ही है । 
 
       ये कैसी व्यवस्था है जो गरीब को और गरीब बनाती जाती है और मुट्ठी भर अमीरों को और भी रईस । उस पर जनता को कोई करोड़पति बनने के सपने दिखला कर दौलतमंद बनता जाता है तो कोई किसी और तरीके से अपने स्वार्थ सिद्ध करने को भी महानता साबित करता है । सत्ता और दौलत का गठबंधन हो चुका है और अपराध इनको जोड़ने वाली कड़ी का काम कर रहा है । पुलिस सरकारी अधिकारी सभी विभाग और बड़े बड़े उद्योगपति मिलकर वही कर रहे हैं जो अधमरे बच्चे को देखकर गिद्ध की नज़र से दिखाई देता है । हम कहते हैं बहुत धर्म को मानने वाले हैं मगर वो धर्म धरातल पर तो नदारद है । कोई किसी पर दया नहीं करता बल्कि गरीबी का उपहास करते हैं और धनवान होने का अहंकार करते हैं चाहे हमने वो दौलत कैसे भी जमा की हो । आज फिर अगर गुरु नानक आये तो इन तमाम धनवान लोगों , नेताओं , अधिकारियों  की रोटियों को निचोड़ इक लहू की नदी बहती दिखला सकता है । कितने लोग हैं जिनकी दौलत वास्तव में महनत और हक सच की कमाई से जमा हुई है । अधिकतर की कमाई गरीबों के लहू से ही हासिल की हुई है । 
 
चुनाव आने से पहले कुछ लोग विधायक सांसद बनने को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते हैं तो उनको जनता का गरीबों का कल्याण नहीं करना होता उनको खुद अपना ही कल्याण करना होता है ज़र्रा से आफताब बन कर समाज को गुमराह करना होता है । वास्तविक जीवन में उनको किसी से कोई सहानुभूति संवेदना कदापि नहीं होती है । शोक सभाओं में भी जाते हैं तो मकसद चुनावी गणित रहता है भला इस से बढ़कर सत्ता की चाहत का प्रमाण क्या हो सकता है । मानवीय संवेदना भावनाओं का ऐसा उपयोग कितना अनुचित कार्य है ।  


 The Haunting Legacy of Kevin Carter's 1993 Sudan Famine Photograph — about  photography


 
 

सितंबर 03, 2018

POST : 893 पंछी पिंजरा तोड़ के आया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          पंछी पिंजरा तोड़ के आया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    शायद अभी भी शायद बाकी है । शायद पिंजरा छोड़ कर उड़ जाता तो मैं भी आज कुछ बन गया होता । पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय , बाहर से खामोश रहे तू भीतर भीतर रोय । गीत गुनगुनाने से क्या मिला जब साहस ही नहीं किया पिंजरे को तोड़ने का , हरी मिर्च खाता रहा कड़वी जो पसंद भी नहीं थी , 
मिट्ठू तोता बनकर हासिल क्या हुआ । मोदी जी की दाद देता हूं इस बात पर कि कोई चिंता नहीं की अंजाम क्या होगा । शादी के पिंजरे की कैद से निकल भागे , आज देश की सत्ता के पति हैं । पति शब्द का अर्थ भी अब पता चला , लखपति लाखों का मालिक , करोड़पति करोड़ का मालिक , लंकापति लंका का मालिक , मगर कितने पति हैं जो वास्तव में मालिक की हैसियत से रहते हैं नौकर से बदतर हालत होती है और कहलाते हैं हम पति हैं । जोरू के गुलाम । सफल वही लोग होते हैं जो खुद अपनी मर्ज़ी से उड़ान भरते हैं , हम पतंग की तरह आसमान में भी उड़ रहे हों तब भी मांझा पत्नी के हाथ रहता है । जिधर चाहे डोर से इशारा करती है और हम उधर जाने को विवश होते हैं । ऐसी ऊंचाइयों पर नाज़ करना सिर्फ मूर्खता ही है । मोदी जी ने कोई विद्यालय इस पढ़ाई का खोला होता तो जाने कितने लोगों को समझ आ गया होता अच्छे दिनों का मतलब होता क्या है । सच मोदी जी आपने कभी बुरे दिन देखे ही नहीं , आपकी खुशनसीबी से रश्क होता है । जब चाहा खुद को कुंवारा समझा जब मर्ज़ी शादीशुदा हो गये । इतना बढ़िया नुस्खा आपको मिला कहां से , औरों को भी बताते तो दुनिया भर के लोग आपको दुआएं देते । 
 
         मालूम नहीं हमारे पंख किधर गये , कट गये या उड़ना भूल गये और पिंजरे में दाना चुगते रहे । दाना डालने वाले को लगता है मेरा पाला हुआ है , शासन करना चाहते हैं । पिंजरे के मालिक पंछी से प्यार नहीं करते हैं पिंजरे की कदर करते हैं । पिंजरा चाहे सोने का बना हो या चांदी का बनाया हुआ हो रहता पिंजरा ही है । आशियां नहीं होता कोई भी पिंजरा किसी भी पंछी का , कैद में है बुलबुल सय्याद मुस्कुराए कहा भी न जाए चुप रहा भी न जाये , बुलबुल और गुल की कहानी चमन में हो तभी मुहब्बत की कहानी होती है । गमले में गुल खिले और पिंजरे में बुलबुल हो तो उनको इजाज़त नहीं होती बात भी करने की । पिंजरा बरामदे में टंगा रहता है और गमला अंगने में पड़ा रहता है । मोदी जी खुद तलाक के पचड़े में बिना पड़े आज़ाद हैं मगर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाना चाहते हैं इस से बड़ा खेल कोई खेल सकता है । पहले अपनी वाली को मुक्त ही कर देते , बीच मझधार लटकी हुई है इक अबला नारी । आजकल की सबला नारी होती तो आपको पंचायत पुलिस थाने और अदालत में ऐसा बेहाल कर देती कि आपको नानी याद दिलवा देती और अच्छे दिन की आस में जैसे जनता के चार साल बीते हैं आपकी तमाम ज़िंदगी बीत जाती । आज आप जो भी हैं उनका उपकार समझना । कुछ लोग आज़ादी को लेकर झूठे ब्यान देते हैं कि आज़ादी मिली जब से मोदी जी का शासन आया जबकि मोदी जी हमेशा से आज़ाद थे कभी किसी बंधन में रहना उनको मंज़ूर नहीं था । सभी को ऐसी स्वतंत्रता मिले ऐसा संभव नहीं है , हर कोई मुकद्दर का बादशाह नहीं होता है ।
 
       शादी का मतलब किसी को पहले नहीं पता होता है । खुद ही अपने कत्ल का सामान करते हैं । बस इक बार जाल में आये तो छटपटाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते । पिंजरे से लगाव हो जाता है और उसके बाद खुद अपने पिंजरे को सजाने को लगे रहते हैं । घर क्या कभी पिंजरे को कहते हैं । बेगुनाह होकर भी सितम सहते हैं उनके रहमोकरम पर रहते हैं । मोदी जी इस बात पर खामोश क्यों रहते हैं , सच को सच कहें काहे चुप रहते हैं । मेरे दिल में इक ख्याल आया है , जीने मरने का सवाल आया है । थोड़े महीने बाकी है चुनाव का अगला साल आया है । वोट क्या महिलाओं के ही होते हैं , हम भी बराबर वोट देते हैं , पुरुषों पर निर्दयता की भी सीमा होती है । कोई सरकार पतियों के पक्षधर भी बनाई जा सकती है । जाति पाति धर्म की नहीं असली जंग महिला और पुरुष की लड़ाई है , इधर है कुंवा तो उधर खाई है । महिला संगठनों की तरह पुरुष संगठन बनाओ मिलकर , बोझ सब अपना हटाओ मिलकर । इक जुर्म किया मुहब्बत करने और शादी करने का , कितनी कठोर मिलती है सज़ा । और नहीं तो सेवानिवृत होने का अधिकार ही सही , स्वेच्छा से पति पद से मुक्ति का कोई उपाय ही हो । आरक्षण की नहीं मांग करते , न कोई क्षतिपूर्ति ही मांगते हैं , ज़रा सी सांस आज़ादी से लेने की राहत चाहते हैं । ऐसे अनुपम विचार नहीं बार बार आते हैं , हौसलों वाले लोग हौंसलों को आज़माते हैं । मोदी जी का क्या है जब मन चाहा पिंजरा तोड़ कर आज़ाद मनमौजी बन अपनी मस्ती में जिधर चाहा चल पड़े । कैफ़ी आज़मी कहते हैं , इतना तो ज़िंदगी में किसी के खलल पड़े , हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े । 11 साल की उम्र में ये लिखना कैसे हुआ वही जानते होंगे लेकिन कुछ लोग दुनिया को कम उम्र में समझने लगते हैं मोदी जी शायद समझदार हैं शुरुआत से ही समझे आप क्या ।









सितंबर 02, 2018

POST : 892 मौत महबूबा है मेरी ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

     मौत महबूबा है मेरी ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

         दिल कह रहा है यहीं कहीं आस पास ही हो , जानती हो कब से राह तक रहा हूं । फिर भी तड़पा रही हो इस कदर बेचैन हूं मैं तुम्हारे लिये कि इक इक लम्हा मुश्किल से गुज़रता है । आज फिर चाहता है दिल चुपके से आओ और मेरी आज की रात की सुबह को रोक लो । हर सुबह जागता हूं तो उदास हो जाता है दिल मेरा कि रात भर इंतज़ार किया सपने देखे अपनी खूबसूरत महबूबा से मिलन की घड़ी के और टूट गए रोज़ । बस दबे पांव आना किसी को ज़रा भी आहत नहीं होने देना , कहीं कोई रोकने की नाकाम कोशिश नहीं करे । तुम जानती हो मैं कितनी बार खुद चलकर आना चाहता था तुमसे मिलने मगर बिना किसी के रोके भी रुक गया यही समझ कर कि मुझे नहीं जाने देगा कोई । ये ज़िंदगी कितनी ज़ालिम है जीने नहीं देती और साथ भी नहीं छोड़ती । ज़िंदगी नहीं चाहती कोई उस पर इल्ज़ाम लगाए मुझसे बेवफ़ाई का और मैं अपने पर तोहमत नहीं लगने देना चाहता कि उसे बीच राह छोड़ दिया । मगर इतना मुझे पता है ज़िंदगी को नहीं है मुझसे मुहब्बत तो क्या तुम तो मुझे चाहती हो और बहुत प्यार से साथ अपने ले जाओगी । लोग कविता ग़ज़ल कहानी लिखते हैं अपनी माशूका के नाम , मैंने तो सब तुम्हारे नाम किया है जो भी लिखा अभी तलक । इतनी शिद्दत से किसी ने किसी को नहीं चाहा दुनिया में । मांगने से ज़िंदगी नहीं मिलती न ही मौत ही आती है । मैंने दोनों की भीख नहीं मांगी है , ज़िंदगी ने कभी नहीं चाहा और कदम कदम ठोकर लगाई है फिर भी कोई गिला शिकवा शिकायत लब पर नहीं लाया मैं । तुम तो सबको अपनाती हो मुझे भी बना लो अपना अब तो । और नहीं होता इंतज़ार मुझसे । 
 
                  मैंने हमेशा तुम्हारी बड़ी सुंदर सी छवि मन में बनाई हुई है । अपने कोमल हाथों से बड़े आराम से छू कर मुझे प्यार से बुलाओगी कहकर कि आ गई मैं तुम बुला रहे थे कितने सालों से । माना आने में देरी हुई है मगर जब आई हूं तो तुम्हारे दिल की चाहत तुम्हारे अरमानों को सुकून तो मिला है अब । बस जितने दर्द थे जितनी परेशानियां थीं जो जो कठिनाइयां थी सब मुझे दे दो और तुम मेरी आगोश में आकर चैन की नींद सो जाओ । मौत तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना हो , कितनी दयालु हो कितनी नर्मदिल हो । ज़िंदगी तो केवल इक रास्ता है तुम तक जाने का तुम से मिलकर एकाकार हो जाने का , ज़िंदगी का हासिल और कुछ भी तो नहीं । ज़िंदगी होती ही है तुम से मिलने की खातिर । कोई भी नहीं है जो जीने से तंग आकर कभी न कभी तुम्हीं को नहीं पुकारता हो । जाने क्यों कुछ लोग जीना चाहते हैं और तुमसे बचना चाहते हैं , दूर भागते हैं मगर कितनी दूर तक भाग सकते हैं । नहीं जब भी तुम आओगी मुझे अपनी तरफ बाहें फैलाए पाओगी । शायद वही इक पल मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल होगा । जन्म जन्म का मिलन झूठ है वास्तविक मिलना तो वही होगा तुम्हारा और मेरा अटूट मिलन । 
 
            मुझे लग रहा है जैसे मेरे बदन को जितने कांटे चुभ रहे हैं छलनी छलनी हुआ है मेरा बदन दुनिया के ज़हर भरे नफरत के तीरों से , ज़ख्म बेहिसाब जो नासूर बन चुके हैं इक तुम्हारे स्पर्श से सब गायब हो जाएंगे और मेरा बदन नाज़ुक फूलों की सेज पर रेशमी एहसास लिए आराम से सो रहा होगा । मेरा इक ख्वाब है जो मुमकिन नहीं पूरा हो मगर अगर ऐसा हो तो शायद मेरी हर आरज़ू दिल की हर तमन्ना पूरी हो जाएगी और मुझे फिर ज़िंदगी से दुनिया वालों से कोई गिला नहीं रहेगा । मेरे जीने का कोई हासिल मुझे नहीं हुआ शायद मारकर ही कुछ हासिल कर सकूंगा । तुम मुझे अपने सीने से लगा लेना उसी तरह जैसे कोई मां अपने बच्चे को लगाती है । जिनको ज़िंदगी से मुहब्बत है उन्हें ज़िंदगी मुबारक हो , हम तो आशिक़ हैं मौत तुम्हारे । मौत का दिन कितनी इंतज़ार के बाद आता है तभी तो और हसीं लगती है कयामत । 
 
 
 Deepak Chauhan

POST : 891 तुम्हीं ने बर्बाद किया है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       तुम्हीं ने बर्बाद किया है   ( तरकश  ) डॉ लोक सेतिया 

   हसीनों की दिलकश अदाएं मदहोश करने वाली शोखियां ऐसा जादू करती हैं कि दुनिया दीवानी हो जाती है । कुछ ऐसे  उनका करिश्मा चल गया और हर कोई उन्हीं पर फ़िदा है जान उनकी अमानत है , उनका है हर सितम मुहब्बत की इनायत है ।  हसीनों पर दिल आ जाता है तो आशिक़ को कुछ भी समझ नहीं आता है । उसको आता है प्यार पर गुस्सा हमें गुस्से पे प्यार आता है । सौ बार नहीं हर बार हज़ारों बार आता है दिल को उनको देख कर करार आता है । दुनिया में भला कब कहीं उन जैसा कोई सरकार आता है कभी कभी ऐसा मज़ेदार अचार आता है चटपटा मसालेदार आता है । चारागर ( इलाज करने वाला ) ज़हर भी पिलाता है , फिर भी सबको ऐतबार आता है , इश्क़े बीमार वही दिलदार आता है । चाहत में यही होता है झूठ समझ कर भी दिल को करार आता है जो कभी सच नहीं हुआ उसी वादे पर बार बार ऐतबार आता है । किसी ने ज़िंदगी बर्बाद कर दी तो क्या हुआ इश्क़ इक बार होता है सब कुछ हज़ार बार आता जाता है । वैसे तो उसी ने सभी को बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और पे जाए यही अच्छा है । 

      रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया , इस बहकती हुई दनिया को संभालो यारो ।

दुष्यंत कुमार जानते थे समझाने से लोग समझते नहीं हैं । जिस राह जाना मना है उसी पर चलते हैं । चलो आज तीखी नहीं सीधी बात करते हैं । जवाब देंगे नहीं फिर भी सवाल करते हैं । आपने कहा हमने मान लिया आप चौकीदारी खूब करते हैं , मगर माफ़ करें लोग अब चौकीदार शब्द से बहुत डरते हैं । चौकीदार आओ आज आपका हिसाब करते हैं । संसद के सदस्य बनते हैं तभी सत्ता सुख चखते हैं , संसद भवन उदास है आप कहां रहते हैं । चार साल में एक महीना भी नहीं आये जिस चौखट पर सर झुकाया था , अब लगता है सबको उल्लू बनाया था । पीएमओ नहीं जाते फिर भी 18 घंटे काम की बात करते हो । सच ये आपकी हर बात झूठी हर योजना नाकाम रही है , आगे दौड़ पीछे चौड़ की कहावत है । पिछले लोगों का बनाया बर्बाद किया खुद किया क्या ।  गिलास तोड़ा बारहा आना ।  आपकी बात आप पर लागू करते हैं , सत्तर साल की बात नहीं बाकी 67 साल की आपके 4 साल से तुलना करते हैं । अपने खुद पर अपने ऐशो आराम पर अपने शोहरत के झूठे गुणगान पर विदेशी सैरों जिन से देश को मिला कुछ नहीं ठगा जाता रहा उन पर अपने रहन सहन पर अनावश्यक सभाओं पर और मंदिरों आदि के दर्शनों पर जितना पैसा बर्बाद किया है कोई पहले का सत्ताधारी कर ही नहीं सकता था । इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं अर्थात बिना किसी माप तोल लुटाते हैं । चौकीदार नहीं चोर किया करते हैं । लूट लूट होती है कानूनी भी और कानून में छेद कर के भी जो भी होती है जिसे घोटाले कहते हैं , मगर आपके घोटाले भी देश हित में राज़ की बात है कीमत ही नहीं बताते और आप कुछ भी नहीं छिपाते । 
 
         कल कोई साहित्यकार बता रहा था इश्क़ अंधा होता है और राजनेता भी कुर्सी से इश्क़ ही करते हैं । आपको भी अपनी महबूबा कुर्सी के किसी और की होना मंज़ूर नहीं है । इश्क़ वतन से भी लोग करते हैं और वतन की खातिर मरते हैं । आप तो मरने से कितना डरते हैं झूठ कहते हैं देश से इश्क़ करते हैं । अपने गुनाह 
स्वीकार नहीं करते हैं जनता की नहीं अपनी शोहरत की फ़िक्र करते हैं । अच्छे दिन लाने नहीं आते खुद अपने बुरे दिन आने से डरते हैं । बदहाल देश की जनता है और शोर आप करते हैं शून्यकाल बंद किया हुआ है पल पल आलाप सिर्फ आप करते है । चार साल में देश को मिला क्या है सोचोगे तो घबराओगे , जिनकी बुराई करते रहे उनसे नज़र मिलाओगे तो घबराओगे । ऊंठ की तरह जिस दिन पहाड़ के नीचे आओगे अपनी असलियत तभी जान पाओगे । हर दिन गरीब देश के खज़ाने से अपने पर करोड़ रूपये बर्बाद करने को उचित ठहराओगे तो किधर जाओगे । अभी भी चाहते हो दोबारा सत्ता पाना कितना अंधियारा बढ़ाओगे । सब अकेले अकेले खाओगे और किसी को रोटी क्या पानी भी नहीं पिलाओगे , बुलेट ट्रैन कोई खिलौना है जिससे देश की जनता को बहलाओगे । भूख गरीबी और किसान मज़दूर को क्या झूठे सपनों से भरमाओगे । अतिथि तुम कब जाओगे बताओगे इस देश में भला कैसे रह पाओगे , हर दिन विदेश में ही नज़र आओगे ।  अबके बताओ क्या जुमला बनाओगे , चौकीदार से आगे कौन सा पद चाहोगे । 
 
        सब विकसित देश वाले हैरान हैं इस गरीब देश के चौकीदार की निराली शान देखकर । काश हम भी ऐसे चौकीदार बन सकते , रखवाली जिसकी करनी उसी को चर जाते । जो लोग अपनी सूरत पर फ़िदा होते हैं वो कभी किसी और से प्यार इश्क़ मुहब्बत नहीं कर सकते हैं । आपको यही रोग है अपने से बेहतर कोई नहीं लगता है , हर पल आईना देखते रहते होंगे और कपड़े बदलते रहे होंगे देश को बदलना आसान नहीं है । नीरज जी की कविता है :-

जितना कम सामान रहेगा , 

उतना सफर आसान रहेगा। 

उस से मिलना नामुमकिन है , 

जब तक खुद पर ध्यान रहेगा। 

हाथ मिले और दिल न मिले , 

ऐसे में नुकसान रहेगा। 

जब तक होंगे मंदिर मस्जिद , 

आदमी परेशान रहेगा। 

जितनी भारी गठड़ी होगी , 

उतना तू हैरान रहेगा। 

नीरज कल यहां नहीं होगा , 

उसका गीत विधान रहेगा। 

          काश कोई आपको इसका सही मतलब समझा सकता तो समझते आपने किसी और तथा देशवासियों को ही नहीं खुद अपने को भी छला है । जिस दिन सूरत नहीं सीरत को मन के आईने में झांककर देखोगे , समझ जाओगे मन की बात में मन कहीं था ही नहीं ।  बात ही बात थी , बिना बात की बात । भगवान अगर है कहीं तो आपको विवेक और वास्तविक सोच दे । आबाद हुए आप बर्बाद हुए सभी लोग की ऐसी ख़ता तुमको अपना समझ कर हर दिन सज़ा रहे हैं भोग । शायद तेरे जाल से निकलना नहीं मुमकिन आज़ादी का शायद अभी नहीं कोई संयोग ।  प्यार होता ही मानसिक गुलामी जैसा है कोई आज़ाद होना ही नहीं चाहता उस से ।


बहुत अधिक प्यार भी बर्बाद कर सकता है आपका रिश्ता - too much love can spoil  your relationship - AajTak

सितंबर 01, 2018

POST : 890 नसीब बांचने लगा मैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      नसीब बांचने लगा मैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     किसी ने लिखा था मैं ऐसा बदनसीब हूं कि अगर मैं कफ़न बेचने लगूं तो लोग मरना ही छोड़ देंगे । कुछ ऐसा ही अपने साथ होता रहा है जिस धंधे में हाथ आज़माया उसी में मंदी छा जाती है । और अधिक मत पूछो हाल मेरा बहुत सीधा है सवाल मेरा । पंडित जी को समझ नहीं आया कि आज क्या राय दें फिर भी बहलाने को बोल दिया तुम विश्वास ही नहीं करते ज्योतिष विज्ञान पर इसी कारण सही भविष्यफल मिलता ही नहीं तुम्हारा । ये मारा , मामला समझ गया और चुप चाप चला आया । अपनी दुकान पर नसीब बांचने वाले का बोर्ड तुरंत लगवाया , सही वक़्त पर याद आया । आजकल क्या इस धंधे का मौसम हमेशा सदाबहार रहता है । अभी तक मुझे भी ख्याल नहीं आया था कि मैंने जब जब जिस भी दल की जीत की बात कही वही सच साबित हुई है हमेशा । पंडित जी भी एक दिन बता रहे थे जो सबका नसीब बांचते हैं उनको भी खुद अपना नसीब पता नहीं चलता है ये अटल सत्य है । डॉक्टर अपना उपचार खुद नहीं करते , वकील को भी बचाव को कोई दूसरा वकील ढूंढना पड़ता है , शिक्षक भी किसी और से शिक्षा हासिल करते हैं । यहां तक कि मिठाई बनाने वाले अपनी मिठाई छोड़ किसी और की मंगवा कर खाते हैं । 
 
          इश्तिहार छपवा कर बांट दिये और अपनी घोषित पिछली भविष्यवाणियों का सबूत भी दिया कि फलां फलां से तसदीक़ कर लो , पहले आज़माओ फिर मेरे पास आओ । झूठी निकले भविष्यवाणी तो दुगना वापस ले जाओ । पता नहीं कैसे बात दिल्ली तक जा पहुंची और मुझे दरबार से बुलावा आ गया , सुरक्षा कारणों से खुद नहीं आ सकते थे मज़बूरी ज़ाहिर की । बोहनी की बात थी जाना था चला गया । आप किस तरह भविष्यफल बताते हैं जन्मपत्री देख कर या हाथ और माथे की रेखाओं को देखकर मुझसे पूछा गया । मैंने बताया मैं बिना जन्म समय पत्री देखे ही बता देता हूं और मेरा बताया उपाय भी सौ फीसदी सफल रहता है । आप समझ लो खुदा की दी हुई शफ़ा है । मुझे अपने भविष्यफल का भरोसा है । उन्होंने सवाल किया अगले चुनाव में जीतने का बताओ कोई नुस्खा है । तकदीर रूठी हुई लगती है जनता लगती खफा खफा है । मैंने कहा करोगे तो बहुत आसान सा उपाय लिखा है और उनको वादे के अनुसार लिखित दे दिया क्या मुमकिन है और कैसे मुमकिन होगा । 
 
                 सब को बाहर भेज दिया फिर पूछा क्या आपको भरोसा है जसोदा जी को मनाना कारगर नुस्खा है । मैंने कहा यकीनन मगर आपको इतना आसान लग रहा है जबकि है बेहद कठिन काम । हंसे जनाब कहने लगे रूठे हैं सनम तो फिर क्या है हमको भी मनाना आता है । मैंने कहा मेरा अनुभव थोड़ा अलग है मुझसे बस यही काम नहीं होता है , रूठे रब को मनाना आसान है रूठे यार को मनाना मुश्किल है । वो कहने लगे आपको पता ही नहीं कैसे मनाते हैं पत्नी को , ये बात वो कह रहा है जो कभी पत्नी के साथ रहा ही नहीं । नातजुर्बेकारी के वायस की ये बातें हैं , इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है , मेरा गुनगुनाना सुन कहने लगे आप किधर की बात किधर ले जा रहे हो । शायद मेरे हौसले को आज़मा रहे हो । मैंने कहा ठीक है हाथ कंगन को आरसी क्या चलकर देखते हैं और विशेष विमान से हम पहुंच गए ठिकाने पर । 
 
          जसोदा जी बोलीं आखिर तो वापस लौट ही आये हो , जानती थी इक दिन राजनीति की बेवफ़ाई ही आपको लाएगी इधर । कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे , तब तुम मेरे पास आना महोदय , मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए । नहीं मैं आपके पास आया नहीं हूं लाया गया हूं , जैसे पिछले चुनाव में गंगा मैया ने बुलाया था इस बार आपकी तपस्या का फल देने का वक़्त आया है । मैं आपको लिवाने आया हूं आप रूठी हुई हो मैं मनाने आया हूं । सोच कर बताओ दिल से भी दिमाग़ से भी काम लोगी तो निर्णय सही होगा । ठीक है आप जलपान करें मैं आपकी बात पर विचार करती हूं । खुश हो गये जनाब इनकार का सवाल ही नहीं है , दिल्ली की गलियां गलियां गलियां मेरी गलियां दिल झूम उठा था । 
 
             घंटा भर बाद फैसले की घड़ी आई जसोदा जी मुस्कराई । मुझे बोली आप कौन हो भाई । मैंने उनको अपनी भविष्यवाणी बताई , डोलती नैया है आप किनारा हैं इसलिए मान जाओ दुहाई है । अपने पति से मुखातिब होकर बोलीं आपको जब पिछले चुनाव में जीतने का विश्वास था तब ये बात क्यों नहीं याद आई । मेरे आंगन में बजती उस दिन भी फिर से शहनाई । आज आये हैं जब हारने की घबराहट मन में है छाई , मन की बात नहीं आपको समझ आई । मगर मैं भारतीय नारी हूं लाख मतभेद हो तब भी छोड़ती नहीं हाथ , निभा सकती हूं आज भी आपका साथ । मानोगे मेरी इक छोटी सी बात । रिश्तों में मत लाओ गंदी राजनीति को , दिन भी बना देती है राजनीति अंधेरी रात । अभी मतलब से आये हो लौट जाओ , आना फिर मन की बात कहने चाहत से । नहीं जाने नहीं दूंगी आपको तब वापस , अभी नहीं रोकती क्योंकि अभी पति नहीं आया है , नेता आया है ।  चुनाव हो जाने दो तब सोचना किसे किधर आना है जाना है । ये कोई शर्त नहीं है न ही कोई बहाना है , देखो कितना सुंदर ये छोटा सा आशियाना है । आपको क्या करना है सरकार बनानी है या घर बसाना है । मैं उठकर चला आया दोनों की आपस की बात में रहना उचित नहीं लगा मुझे । लेकिन उनको अपनी पत्नी को घर नहीं लाना था बस गिले शिकवे दूर कर रिश्ता जन्म जन्म का इतना समझाना था । मना लिया आखिर चुनाव में सब आज़माना था । उनको खुद मीठा खिलाकर उनके हाथ से मीठा खाना था , नाराज़ नहीं आपसे दिल से इतना कहलाना था । जब  मेरा बताया भविष्यफल सच साबित हुआ तो आप भी लाईन में लगे खड़े होंगे मुझसे नसीब पूछने । और मैं सबको उनका नसीब बताऊंगा भले खुद अपना नहीं समझ पाया आज तलक । माफ़ करना टीवी पर आज का भविष्यफल आने वाला है जो कभी सही नहीं होता फिर भी देखना मेरी आदत है । मेरी धर्मपत्नी की सख्त हिदायत है इस बात पर शक कभी नहीं करते हैं । मिलते हैं बाद में । 

Horoscope tomorrow aaj ka rashifal 18 may 2024 daily bhavishyafal lucky and  unlucky zodiac signs today Rashifal : 18 मई को इन राशियों पर शनिदेव रहेंगे  मेहरबान , पढ़ें मेष से लेकर

अगस्त 31, 2018

POST : 889 शोध महिअलों द्वारा पुरुषों पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  शोध महिअलों द्वारा पुरुषों  पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


       इस कहानी का किसी व्यक्ति अथवा घटना से कोई सरोकार नहीं है ऐसा संयोगवश होने पर हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं होगा ।  अधिकतर टीवी सीरियल में ये शब्द इतने बारीक लिखे होते हैं कि कोई पढ़ नहीं सकता है । और आजकल के टीवी सीरियल और फ़िल्में वास्तविकता से मीलों दूर होते भी हैं । मगर यहां सच और कल्पना का मेल टूथपेस्ट के विज्ञापन की तरह बेस्ट है । महिला को ये बताने को पीएचडी नहीं करनी पड़ी , कह दिया तो कह दिया , मुफ्त में नहीं पैसे लेकर कहा है । पैसे का महत्व समझना हो तो उस तथाकथित महानायक से पूछना जो बताता है स्वाद सबकी मां के बने खाने का एक ही है और पांव लागूं मांजी कहता है मसाले की डिब्बी को । इसी को कहते हैं जिसकी खाओ बाजरी उसकी लगाओ हाज़िरी । जो भी पैसा से उसी के गुण गाओ । आजकल बादाम बेच रहे हैं , बादाम खाओ करोड़पति बन जाओ । जनाब जो बादाम आपने खाये सब नहीं खा सकते , चिंता हो भी तो आपके हाथ से मालिश नहीं करा सकते । आपको लगता है शोध की बात तो भूल ही गई , भला इसका उससे क्या संबंध हो सकता है । ये जो हैं वो नहीं होते अगर इक महिला ने इनको कई फिल्मों में असफल होने के बाद वापस नहीं जाने देने को नायिका की भूमिका नहीं की होती । उस भलाई का बदला चुकाने को उनसे विवाह किया था बाद में उसकी कहानी फिर सही । आज महिलाओं की सभा में विषय यही है कौन कौन पुरुष किस किस महिला की वजह से कहां पहुंचा है । इक मीना कुमारी अदाकारा भी थी जिस को इस्तेमाल कर कितने लोग नायक बन गए और फिर छोड़ दिया । रेखा की भी कहानी सब जानते हैं , मगर समस्या बीच वालों की है , मध्यमवर्ग की महिला को बोलने तक की मनाही है । 
 
            इक आधुनिक नारी कह रही है कि जो राजनेता आज सत्ता के शिखर पर है उस में भी एक महिला का हाथ है । जब उसे विवाह कर के छोड़ गया था और कोई कारण भी नहीं बताया था न तलाक ही दिया था , तब उस महिला को अपने अधिकार की लड़ाई लड़नी चाहिए थी । मेरा दावा है अगर आजकल की तरह वो या उसके परिवार वाले पुलिस थाने शिकायत दर्ज कराते तो झक मार कर वो घर वापस आया होता । मगर क्योंकि उस महिला को वो बात समझ आ गई थी जो बाकी महिलाओं को आधी ज़िंदगी बिताने के बाद समझ आती है कि इससे शादी कर मिला क्या । झूठे सपने अच्छे दिन वाले जो कब आएंगे खुद भी नहीं जानते । अब अगर खुद नौकरी कर अपने पैरों पर खड़े होकर कमाना है तो ऐसे आदमी का साथ काहे रखना जो विवाह करता है और छोड़ देता है । आज उस महिला ने नहीं इन्होंने खुद स्वीकार किया है कि वो मेरी पत्नी है , महिला को मालूम है ऐसे आदमी को अपना पति बताना कोई ज़रूरी नहीं है । ये किसी को कुछ नहीं दे सकता है झूठे वादों को छोड़कर । अब कोई पुरुष सीना ठोककर ये तो नहीं कह सकता कि मुझे मेरी बीवी से बचाओ । लड़ती है झगड़ती है ये करना तो हमारा युगों से चला आ रहा अधिकार है । बीवी के बेलन से डरकर भागने वाले को क्या कहते हैं । चाहे जो भी हो आज वो जो भी है अपनी पत्नी की मेहरबानी से ही तो है । उसको घर से भागना रास आया तो इधर उधर मौज मस्ती करने के बाद राजनीती में चला आया और इतना बड़ा नेता बन गया है । अभी भी पत्नी दुनिया की नज़र में छोड़ी हुई औरत है । घर से निकालने में और छोड़ने में भी अंतर होता है । घर से निकालता कोई तो लोग उस पति को बुरा भला कहते हैं , खुद भाग जाता पति घर से तो ससुराल वालों से दुनिया वालों तक तोहमत महिला पर लगाते हैं । 
 
 क्या हर बात पर अदालत जाने वाले महिला आयोग मानवाधिकार आयोग या महिलाओं के संगठन को ये सब दिखाई नहीं देता है । समरथ को नहीं दोष गुसाईं , मध्यम वर्ग को ही सब सहना पड़ता है । गरीब महिला को पति कुछ कहे तो गली में बवाल कर देती है । अमीर महिला आधी जायदाद छीन लेती है और दूसरी शादी कर लेती है । कितनी फ़िल्मी अदाकारा कितनी शादी कर चुकी कोई नहीं जानता है । किसी किसी ने तो शादीशुदा पुरुष से भी शादी कर ली मगर समाज की जुबां पर ताला लगा रहा दौलत का । खुद तुलसीदास घर से बीवी के ताने से तंग आकर भागे तो रामायण रच डाली । रॉयल्टी बीवी को मिलती तो ठीक था । इक शब्द नहीं लिखा कि मुझे प्रेरणा मिली अपनी पत्नी से । 
 
                इक दूसरी महिला ने कहा कि अभी भी महिला को इक मिसाल कायम करनी चाहिए और अदालत में गुज़ारे भत्ते की मांग करनी चाहिए । अगर सही समय पर मुकदमा दर्ज करवाती तो कब की उस आदमी की समझ काम करने लगती । पुलिस अदालत के फेरे सात फेरों से कहीं ज़्यादा कठिन होते हैं । हो सकता है उस महिला को यही लगा हो ऐसे पति की पत्नी बनकर रहने से अच्छा है अपने दम पर रहना । मगर ऐसे से ही पुरुषों को मनमानी की आदत पड़ जाती है और जब चाहा छोड़ जाते हैं सभी को । हम हैरान हैं एक महिला के अधिकारों की रक्षा सुरक्षा नहीं करने वाले को महिलाएं ही वोट कैसे दे सकती हैं । महिला विरोधी से महिला आरक्षण की उम्मीद नहीं की जा सकती है । अपनी पत्नी को जो अच्छे दिन नहीं दिखला सका उससे देश को अच्छे दिन लाने की बात सुन भरोसा करना बहुत भारी भूल है । कोई भी अगर किसी महिला से शादी करने के बाद छोड़ता है बिना कारण और तलाक दिये बगैर तो उसको ऐसा करने की सज़ा मिलनी ही चाहिए । औरत अगर किसी की उन्नति का कारण बन सकती है तो किसी को उसकी असलियत भी बता सकती है । ऐसी महिलाएं सारे महिला समाज का अहित करती हैं एक अपना ही नुकसान नहीं करवाती हैं । ये बात क्या तीन तलाक से कम खराब है । हम महिलाओं को उस छोड़ दी गई औरत को अधिकार दिलवाने ही चाहिएं । सभी महिला संगठन साथ मिलकर मांग करें कि हमारी उस बहन को इतने सालों बाद ही सही इंसाफ मिलना चाहिए और हमारी मांग नहीं मांगी जाती और आदर सहित अपनी पत्नी को लाकर अपने साथ सिंघासन पर नहीं बिठाया गया तो एक भी महिला उस दल को वोट देकर महिला जगत से धोखा नहीं करेगी । अगले चुनाव का मुद्दा हम ने ही तय करना है । अब एक तिहाई आरक्षण महिलाओं को मिले न मिले बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए । उनकी सहानुभूति मुस्लिम महिलाओं के साथ है तो क्या हम महिला नहीं हैं । फैसला उनका है घर बसाना है चुनाव जीतना है या फिर तलाक ही सही । जंग आर पार की है । बहस जारी थी कि तभी कोई अचानक उस महिला का संदेश लेकर आया मंच से पढ़कर सुनाया । विवाहित जीवन कभी किसी को रास है आया मैंने ये राज़ समझा उनको भी समझ था आया , हमको घुट घुट कर नहीं जीना साथ साथ खुश हैं अलग अलग आपको हमारी चिंता की ज़रूरत क्यों है खुद अपनी ज़िंदगी को संवार लो इतना बहुत है । सबकी बोलती बंद हो गई जब खुद महिला को शिकायत नहीं तो कौन दख़ल दे सकता है ।  
 
 

     ( ये इक काल्पनिक हास्य - व्यंग्य रचना है , और इसका किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है )


Chalo Ek Baar Phir Se Ajnabi Ban Jayen Hum Dono- Mahendra Kapoor 👇👌 | By  चित्रहारFacebook

POST : 888 मौत की शायरी ज़िंदगी की कविता ( तिरछी चाल ) डॉ लोक सेतिया

मौत की शायरी ज़िंदगी की कविता ( तिरछी चाल ) डॉ लोक सेतिया 

       उन्होंने तय कर दिया है विषय अब सबको इस पर बात करनी होगी । हम अपनी मौत का सामान ले चले । की उसने मेरे कत्ल के बाद कत्ल से तौबा । ज़िंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है जाहपनाह , कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता । हम सब तो रंगमच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है । हाहाहाहाहा बाबू मोशाय । ये फ़िल्मी डायलॉग लिखने पड़े शुरुआत करने को भूमिका बनानी है । मौत तू इक कविता है , मुझसे वादा है इक कविता का मिलेगी मुझको । ग़ालिब को कैसे भूल सकते हैं । मौत का एक दिन मुआयन है नींद क्यों रात भर नहीं आती । तेरे वादे पे सितमगर अभी और सब्र करते अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ऐतबार होता । असली मुकदमा किसी और के कत्ल होने का है , कितने साल हो गए फैसला अटका पड़ा है । कत्ल हुआ या किया गया कैसे साबित हो जब अभी लाश भी बरामद नहीं हुई है लोकतंत्र की । वो कब ज़िंदा था कोई गवाह भी नहीं मिलता गवाही देने को कि हां मैंने देखा था उसे भला चंगा था । अधमरा तो बहुत लोगों ने बताया कि देखा था मगर लगता था मरने को है । कोई कहता है ख़ुदकुशी की होगी सब तो आशिक़ हैं भला कौन कत्ल करेगा लोकतंत्र को । हम पुजारी हैं सभी नेता सब दल वाले , उसी की रोटी खाते हैं वही रोज़गार है हम उसे कैसे मरने देंगे । जीने भी नहीं देते मरने भी नहीं देते । दुश्मन ए जां हैं । चलो बीच में मैं अपनी कुछ रचनाएं भी शामिल कर लेता हूं , मौका है दस्तूर भी है । 

उन्हें कैसे जीना , हमें कैसे मरना। 

उन्हें कैसे जीना   ,  हमें कैसे मरना ,
ये मर्ज़ी है उनकी , हमें क्या है करना।
 
सियासत हमेशा यही चाहती है ,
ज़रूरी सभी हुक्मरानों से डरना। 
 
उन्हें झूठ कहना , तुम्हें सच समझना ,
कहो सच अगर तो है उनको अखरना। 
 
किनारे भी उनके है पतवार उनकी ,
हमें डूबने को भंवर में उतरना। 
 
भला प्यास सत्ता की बुझती कहीं है ,
लहू है हमारा उन्हें जाम भरना। 
 
कहीं दोस्त दुश्मन खड़े साथ हों , तुम ,
नहीं भूलकर भी उधर से गुज़रना। 
 
सभी लोग हैरान ये देख " तनहा "
हसीनों से बढ़कर है उनका संवरना। 

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे। 

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ,
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे।

उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं ,
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे।

जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी ,
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे।

आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं ,
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे।

दामन अपना तू कांटों से बचा के चल ,
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे।

किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म ,
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे।

ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा ,
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे।  

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई। 

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई।

तेज़ झोंकों में रेत के घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई।

ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है ,
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई।

और गहराई शाम ए तन्हाई ,
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई।   

जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये। 

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।   
 
         लोग क्या क्या नहीं कहते हैं । कोई कहता है देश की वास्तविकता से ध्यान भटकाना है । रोज़ कोई नया विषय देते हैं आज इस पर बात होगी , बेखबर आज की बड़ी खबर है क्या आपको इसकी खबर है । नोटबंदी को आप असफल बताओ उनकी सफलता है असफलता में भी । कालिख धुल गई सब काला धन सफ़ेद हो गया कमाल है कि नहीं । दाग़दार सब गंगा स्नान करते रहे गंगा और मैली हुई तो क्या दाग़ साफ़ हो गए हैं । चेहरे पर एक भी दाग़ नहीं है कोई काला तिल भी नहीं जाकर टीका लगाओ कहीं बुरी नज़र नहीं लगे । सच इस से पहले किसी पीएम को देखा ऐसे सजा संवरा देश ने सत्तर साल में , क्या ये नया इतिहास नहीं रचा गया है । बुलंदी पर जाकर गिरने का डर फिसलने का डर होता ही है । मैं आज तक इस राज़ को नहीं समझ पाया कि जो मौत मांगते हैं उनको मौत नहीं मिलती और जो जीना चाहते हैं मौत उनको धर दबोचती है । झूठ नहीं कहता मुझे वास्तव में लगता है मौत तो बहुत खूबसूरत होगी जो ज़िंदगी की सभी परेशानियों से मुक्ति दिलवा देगी । जब आएगी तो स्वागत करना है , बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते । कल इक खबर थी झूठी या सच्ची नहीं मालूम , कोई 182 साल का है वाराणसी में मौत जिसके घर का पता भूल गई है । 
 
      जब हम यकीन करते हैं कि कौन कब कैसे मरेगा ऊपर वाले की मर्ज़ी है तो बेकार घबराते हैं । गीता की बात समझें तो मौत है ही नहीं आत्मा अमर है और जन्म लेती रहती है । किसी शायर के कुछ लाजवाब शेर अर्ज़ हैं । 

ज़िंदगी की तल्खियां बढ़ गईं इसी से समझ लो , ज़हर बाज़ार में और महंगा हो गया। 

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं , और क्या जुर्म है पता ही नहीं। 

ज़िंदगी अब बता कहां जायें , ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं। 

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है , दूसरा कोई रास्ता ही नहीं। 

जिस के कारण फसाद होते हैं , उसका कुछ अता पता ही नहीं। 

झूठ को सच करे हुए हैं लोग।  

   (  लोक सेतिया "तनहा"  )

झूठ को सच करे हुए हैं लोग ,
बेज़ुबां कुछ डरे हुए हैं लोग।

नज़र आते हैं चलते फिरते से ,
मन से लेकिन मरे हुए हैं लोग।

उनके चेहरे हसीन हैं लेकिन ,
ज़हर अंदर भरे हुए हैं लोग।

गोलियां दागते हैं सीनों पर ,
बैर सबसे करे हुए हैं लोग।

शिकवा उनको है क्यों ज़माने से ,
खुद ही बिक कर धरे हुए हैं लोग।

जितना उनके करीब जाते हैं ,
उतना हमसे परे हुए हैं लोग। 
 
   इक लघुकथा है ज़िंदगी जिसका शीर्षक है ।  कोई हर बात पर मरने की बात करता था ।  जब भी उसकी नाकामी पर बात होती जान देने की बात करता था । लोग घबराते किसी बात से निराश होकर अपनी जान ही नहीं गंवा दे । ख़ुदकुशी करना कोई कायरता नहीं है बड़े साहस की बात है , कायरता तो उसे कहते हैं जो ताकत से कमज़ोर को कत्ल किया करते हैं आंतकवादी हों डाकू लुटेरे या फिर लाशों पर वोटों की राजनीति करने वाले । गुनाह की दुनिया की असलियत यही है कि हर पल मौत का साया रहता है सर पर । मगर सब से बड़े कायर वो हैं जो कानून की आड़ में अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर किसी को मारते हैं झूठे एनकउंटर के नाम पर । इतिहास में दबी पड़ी हैं ऐसी बहुत कहानियां अगर राज़ खुल जाएं तो धरती पर भगवान कहलाने वालों का क्या होगा । बात निकली तो कहां तलक आई है , खुल गया राज़ तो रुसवाई ही रुसवाई है । आप चुप चाप पी जाओ हलाहल है ये बस यही आखिरी दवाई है । 
 
 दुष्यंत कुमार की कलम से प्रस्तुत है- सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं  मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे ...

अगस्त 30, 2018

POST : 887 जीने का हक हमारा भी तो है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

     जीने का हक हमारा भी तो है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं नहीं नहीं  हम इंसान हैं 
इंसानियत की बात करते हैं
किसी की जान की कीमत 
नहीं लगाते हैं सिक्कों से हम
आपकी जान भी जान ही है 
हम भी जान की कीमत जानते हैं
आदमी आदमी को दुश्मन समझे 
इसको हमेशा से गलत मानते हैं ।

आप सौ साल जियें खुश रहें 
हम दिल से दुआ करते हैं ,
मगर हम भी जीने के हकदार हैं 
इतनी आपसे  इल्तिज़ा करते हैं ,
आपकी सियासत ये क्या सियासत है 
आपने सोचा कभी , शराफ़त क्या है
किस तरह देश के लोग बेबात लड़ते
हर दिन बेमौत भी मरा करते हैं । 

आप की हिफाज़त कितनी ज़रूरी है 
बस इसी का ध्यान है ,
हम आम लोगों की खातिर 
श्मशान और कबरिस्तान है ,
लाखों की मौत की कोई 
बात नहीं होती है क्यों भला ,
आपको डर है अगर तो हर तरफ 
आपकी सुरक्षा पे मचा कोहराम है । 

जो कहते हैं हम सब की 
पल पल की खबर रखते हैं ,
क्या कभी गरीबों पर भी  
इनायत की नज़र रखते है ,
खेलते हैं भावनाओं से 
जनता की इशारों पर किसके ,
काश खुद को देखते क्या 
जताते हैं और क्या करते हैं ।

मौत को किसने बाज़ार बनाया
सबको  ये राज़ ज़रा बतलाओ ,
बस करो ज़हर नफरतों का अब 
और ना फैलाओ , कुछ शरमाओ
सुरक्षा आपकी हम करें या आपने 
आपको हमारी करनी चाहिए हमेशा
आग को आग से नहीं बढ़ाओ मत
है ज़रा पानी बचा तो फिर बुझाओ ।

हम कभी ज़िंदा थे खुश थे सब
शायद खबर आपको भी होगी ,
कत्ल हुआ ख़ुदकुशी पिलाया
ज़हर कि बेमौत मर गये हम ,
आपकी जान के सदके लाख बार 
करते हैं लोग सब हमेशा हमेशा 
हमसे जीने का अधिकार छीना 
किस ने  खबर आपको भी होगी । 

Jiyo aur Jeene do

अगस्त 28, 2018

POST : 886 डराता हुआ बेरहम समाज ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     डराता हुआ बेरहम समाज ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     इक टीस इक दर्द जो सहन नहीं होता अनुभव कर रहा हूं लिखते हुए। सच कहूं समझ नहीं आता बात की शुरुआत कैसे करूं। हम बड़ी बड़ी बातें करते हैं आदर्श नैतिकता और धर्म की। मगर जो दिखाई देता है वो कुछ और ही साबित करता है। शिक्षा के मंदिर अब केवल पैसा बनाने का साधन बन गये हों इतना नहीं है अब तो विद्यालयों में व्यभिचारी अपराध कर रहे हैं। धर्म की आड़ में हर अपराध परवान चढ़ रहा है। सरकार को समाज के पतन की चिंता क्या हो जब खुद नेता सरकार और अधिकारी मनमानी करते हों और हर डरावनी खबर केवल जांच और रपट दर्ज करवाने तक रह जाती है। किसी को फुर्सत ही नहीं जो सोचे ये समाज किस तरफ जा रहा है , कानून का नहीं जंगलराज है। किसी अपराधी को खौफ है ही नहीं कनून का , हो भी कैसे जब नेता अधिकारी खुद उचित अनुचित की बात छोड़ अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हों। और हम तथाकथित सभ्य और आधुनिक शिक्षित लोग हर बात को औपचारिक विरोध जताने या किसी बलात्कार पीड़ित की हत्या होने पर मोमबत्तियां जला जुलूस निकालने और बहरे गूंगे लोगों से इंसाफ की भीख मांगने तक की बात कर घर बैठ अपनी बारी की राह देखते हैं। हर सुबह एक नहीं कितनी डरावनी खबरें सामने आती हैं तो लगता है हमारा समाज इंसानों के जीने के लायक नहीं रहा है। आपने कभी विचार किया है इतिहास लिखने वाले जब किसी युग के इतिहास की खोज करते हैं तो उस वक़्त की हर बात को देखते हैं। तस्वीरों को सामान को उस काल की लिखी हुई कहानियों गीतों नाटकों और अवशेषों को देखते हैं और समझते हैं तब कैसे लोग हुआ करते थे। 
 
             सोचो आज जो घटता है और जैसे हर दिन अराजकता बढ़ती नज़र आती है , जब इस सब की वास्तविकता को समझ कर इतिहासकार लिखेंगे तो हम मूर्ख कायर और जंगली लोग कहलाएंगे। इस समय के टीवी सीरियल की कहानियां देख कर यही लगेगा कि कैसे हम इस से मनोरंजन किया करते थे। इन में हर कोई छल कपट ही नहीं कत्ल तक यूं करता है जैसे इंसान नहीं गाजर मूली है आदमी। क्या यही सच है हमारे घर की सभी महिलाएं आपराधिक कार्यों में पुरुषों को भी मात देती हैं। अस्पताल पुलिस सब को जब चाहे पैसे देकर अपराध में साथ मिला लेती हैं। जिन फिल्मों की आमदनी पर गर्व करते हैं अभिनेता वो फ़िल्में संदेश क्या देती हैं और समाज को किस दिशा में धकेल रही हैं। हम खुद तमाशाई हैं और हम खुद तमाशा भी हैं। क्या इससे अधिक मूर्खता कोई कर सकता है। 
 
                   भौतिक उन्नति किसी काम की नहीं अगर मानसिक और सामजिक तौर पर हम पहले से और पिछड़ते जा रहे हैं। सत्ता पर बैठे लोगों को यही पसंद है कि लोग सही गलत की बात पर चर्चा ही नहीं करें और केवल अपने लाभ की बात पर ध्यान दें। अपने स्वार्थ में हम राजनेताओं की चालों के मोहरे बनकर रह गए हैं। नेता हमें बांटना चाहते हैं लड़वाना भिड़वाना चाहते हैं और हमारी लाशों पर खड़े होकर शासन पाना चाहते हैं। क्या ये हमारे दुश्मन नहीं हैं क्या हमारी भलाई कर सकते हैं ऐसे लोग। हमने खुद अपनी आज़ादी अपने अधिकारों को किनके रहमोकरम पर छोड़ दिया है। हम समझ ही नहीं रहे ये दावानल की आग हम सभी को जला कर राख कर देगी किसी दिन। नेता आग को बुझाते नहीं हैं दूर से खड़े देखते हैं और हवा देने का काम करते हैं। हमारे पूर्वजों ने हमें ये तो नहीं दिया था विरासत में। सद्भावना और भाईचारे वाला सभ्य समाज आज हैवानियत को शर्मसार करता लगता है तो इसका ज़िम्मेदार कोई तो है। सीमा की बात करना व्यर्थ है कोई सीमा पतन की बची कहां है। कोई मसीहा नहीं आएगा बचाने हमें , खुद ही संभलना होगा और बचाना होगा अपने समाज को ताकि अपने बच्चों को हम इक अच्छा समाज देने का कर्तव्य निभा सकें।

         हम समझते हैं बड़ा सा घर हर सुख सुविधा और आराम के साधन बहुत बड़ा बैंक बैलेंस अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने को होना हमारी सफलता का सबूत है। मगर इसको हासिल करने को जो खोते हैं उसका पता ही नहीं है। हमारे बाज़ार में उसका मोल कुछ भी नहीं है मगर , अनमोल भी कुछ होता है ये हम जानते ही नहीं हैं। जो बिकता नहीं उसे कोई खरीद नहीं सकता उसकी कोई कीमत नहीं होती , आज कीमत लगती है ये खिलाड़ी कितनी कीमत का , ये अभिनेता कितने में काम करता है , जिसे आप महानायक कहते हैं वो पैसे लेकर झूठ ही बोलता नहीं उन वस्तुओं को बेचकर जिसे खुद कभी उपयोग नहीं करता बल्कि गुमराह करता है गलत राह बताता है। नहीं भाई नायक वो नहीं होते जो सही राह नहीं दिखाते हों , ये तो खुद भटके हुए लोग हैं और हमने इन्हीं को अपना आदर्श बना लिया है ये हमारी मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जो नेता सत्ता पाने को कुछ भी कर सकते हैं और जिनको सत्ता जाना डराता हो उनको आप मसीहा समझते हैं तो अपने नायक मसीहा और महानता को कितना बौना कर दिया है।

                   आज कोई किसी के घर जाता है तो उसकी शख्सियत को ड्राइंग रूम एलसीडी टीवी के साइज़ और रईसी के साज़ोसामान से आंकता है। ये सब नहीं है तो समझता है हमारे बराबर का नहीं है , ये हमने हमने स्टैंडर्ड रखा हुआ है। किन मूल्यों पर कोई चलता है इसको हम स्टैंडर्ड नहीं मानते इतना घटिया हमारा स्टैंडर्ड है। सादगी से जीना विलासितापूर्ण वस्तुओं को अपनी आदत या ज़रूरत नहीं बनाना लगता है बड़ी बात नहीं है छोटी बात है। कभी ऐसे रहना पड़ा तो , जिनकी आज बातें करते हैं वो तमाम आदर्शवादी लोग इसी तरह से रहते थे और इसी तरह रहना भी चाहते थे। हमने दिखावा और आडंबर को बड़े होने का प्रमाण समझ लिया है जबकि ये बड़े नहीं छोटे होने की बात है , आपकी सोच बड़ी होनी चाहिए। खुद इन बातों को महत्व देकर हम चाहते हैं समाज आदर्शवादी मूल्यों पर चलने वाला हो और भौतिकता की दौड़ में अंधा नहीं हो तो हम दोगले हैं। बबूल बोकर आम खाने की अभिलाषा करते हैं। घरों की मंज़िलें ऊंची हैं इंसानों की इंसानियत नीचे गिरती जा रही है , प्रगति नहीं ये अवनति है। और हमने मंज़ूर किया है और और और नीचे जाना ऊपर उठने को। 

 

अगस्त 27, 2018

POST : 885 हम शर्मिन्दा हैं ( देश के हालात पर ) डॉ लोक सेतिया

     हम शर्मिन्दा हैं ( देश के हालात पर ) डॉ लोक सेतिया 

 किस किसे से शर्मसार हैं । हम कैसे गुनाहगार हैं । करते आज इज़हार हैं । हम सब कसूरवार हैं । किन हालात में ज़िंदा हैं , बापू हम शर्मिंदा हैं । तुम इक विचार थे हमने तुम्हें इश्तिहार बना डाला । तेरी समाधि पर सर झुकाने वाले लोग तेरी बताई राह से विपरीत चलते हैं । तेरे नाम तेरी तस्वीर तेरे चश्में तक को अपने मतलब को इस्तेमाल करते हैं । तुझे कत्ल करने वाले का मंदिर बनवा उसकी पूजा करते हैं लोग और हम अहिंसा की आड़ में कायरता दिखलाते हैं । सादगी से जीने और आखिरी आदमी के आंसू पौंछने की बात क्या देश के सेवक जनता के धन से शाही ढंग से रहते हैं भूखी जनता का लहू पीते हैं । हम सब देखते हैं चुप रहते हैं ऐसे नेताओं को हम देशभक्त कहते हैं । हमें कभी माफ़ मत करना हम अपराधी हैं जो अन्याय के सामने झुक जाते हैं । भगतसिंह हम शर्मिंदा हैं । हमने तुम जैसे शहीदों की कुर्बानी को व्यर्थ कर दिया है । हम आज भी गुलामी का बोझ ढोते हैं , अपनी बेबसी पर छुपकर रोते हैं । तुझे भी हमने इक तमगा बना लिया है सीने पर लगाकर आडंबर करते हैं तेरी राह चलने का जबकि हम देश को देना कुछ भी नहीं चाहते और पाना सभी कुछ चाहते हैं । नेहरू जी हम शर्मिंदा हैं । जिस लोकतंत्र को तुमने सींचा था उसकी धज्जियां उड़ाने वालों की बात सुनकर हमारा खून नहीं खौलता और हम तालियां बजाते हैं तुम्हारे दिन रात महनत और लगन से खिलाये चमन को बर्बाद करने वालों के सामने हम बेबस हैं । जिन्होंने कुछ भी निर्माण किया नहीं केवल विकास के नाम पर महान नेताओं के नाम का इस्तेमाल ही किया है और बांध कारखाने स्कूल अस्पताल नहीं बनवाये मगर मूर्तियां और झूठी दिखावे की शान पर धन बर्बाद किया है और समझते हैं यही देश का विकास है आज सत्ता पर काबिज़ होकर शांति नहीं अशांति का माहौल बना रहे हैं । आज तुझको बदनाम करते हैं हर रोज़ सुबह शाम इक यही काम करते हैं खुद क्या हैं नहीं जानते झूठ की बना कर पहचान ऐलान करते हैं ।
 
    लाल बहादुर जी हम शर्मिंदा हैं । जय जवान जय किसान की बात याद नहीं किसी को । स्वाभिमान की बात कोई नहीं समझता और विदेशी लोगों के सामने झुके हुए हैं और मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचाने का काम बेशर्मी से करने वाले ईमानदारी की बात करते है ।  देश की आज़ादी की जंग के वीरो हम शर्मसार है क्योंकि हम आज़ादी की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं और राजनेताओं अधिकारीयों की मनमानी के सामने नतमस्तक हैं । अपने अधिकार नहीं छीनते हम बस भीख मांगते हैं सरकारों से । देश के महान साधु संतो , समाजसुधरक महात्माओ  हम शर्मिंदा हैं । हमने आपकी सभी शिक्षाओं को भुला दिया है और सच्चाई की राह पर निडर होकर नहीं चलते हैं । आचरण की बात नहीं भौतिकता की अंधी दौड़ में समाज को रसातल में ले जाने का कार्य कर रहे हैं । सब दार्शिनकों ज्ञानीजनों की सीख को दरकिनार कर निम्न स्तर की चर्चा और घटिया मनोरंजन हमारा ध्येय बन गए हैं । धर्म को मुखौटे की तरह उपयोग करते हैं धार्मिकता कहीं नहीं बची है । किस किस का नाम लिया जाये किस किस धर्मग्रंथ की बात की जाये , सबको हमने केवल सर झुकाने और पूजा करने को बेजान वस्तु बना दिया है । समझना क्या हम कभी पढ़ते तक नहीं उन आदर्श की किताबों को । हमारे महान आदर्श पूर्वजो हम शर्मिंदा हैं ।  हम ने ऐसा समाज बनने दिया है जिस में समानता नहीं है , मानवता नहीं है , दया भाव नहीं है । केवल अहंकार और स्वार्थ हर किसी को महत्वपूर्ण लगते हैं । हम किस बात पर गर्व कर सकते हैं कुछ भी ऐसा नहीं दिखाई देता । अपराधी क़ातिल लुटेरे खुले आम जुर्म करते हैं सरकार कानून पुलिस किसी को एहसास नहीं अपनी निष्क्रियता का , बेबस हैं सभी बच्चों महिलाओं की सुरक्षा उनका आदर मान सम्मान कुछ भी बच नहीं सकता किसी से ऐसी आज़ादी है , गुंडे बदमाश लोगों को धनवान को मिलता है न्याय मनचाहा , हम केवल शर्मिन्दा हैं ।
 

 

अगस्त 25, 2018

POST : 884 निराशा की राजनीति कब तक ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      निराशा की राजनीति कब तक ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       आज खुले दिल की बात , सबसे बड़ी दौलत कोई किसी को जो दे सकता है वो है आशा । आज़ादी आशावादी लोगों का सपना थी जो साहस से सच किया तमाम लोगों ने । तब सभी आज़ादी के दीवाने यही कहते थे सोचते थे और यकीन करते थे कि भले हम अपने सामने जीवन काल में नहीं भी देख पाएं देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त होना ही है । आजकल के नेता झूठे वादे देते हैं और अब तो निराशा बांटते हैं ये जतला कर कि वो देश से नहीं बल्कि देश उन पर निर्भर है । शायद देश के साथ इस से बड़ा अपराध कोई नहीं हो सकता कि आप देशभक्ति से अधिक महत्व व्यक्तिपूजा को देने लगो । कोई भी नेता कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जिस के बिना देश का काम काज या सरकार नहीं चल सकती । इस सोच में केवल निराशा छुपी हुई है जो कुछ लोग खुद भी सोचते हैं और औरों को भी डराना चाहते हैं कि किसी नेता का कोई विकल्प नहीं है । देश की सवासौ करोड़ जनता और संविधान के साथ ये अनुचित बात है । कितने नेता आये गये मगर देश कायम रहा और हमेशा रहेगा । चाटुकारिता की भी सीमा होती है और ऐसी चाटुकारिता देश हित के विरुद्ध है । अगर आप वास्तव में देश के लिए मुहब्बत रखते हैं दिलों में तो सबसे पहले आशावादी नज़रिया कायम करें कि चाहे जो भी हो देश फले फूले और आगे बढ़ता रहेगा । निराशावादिता से किसी को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है । आप ने कभी महसूस किया है देश भक्ति के सभी गीत लोगों में उम्मीद जगाते हैं इक ऊर्जा का संचार करते हैं । हम सभी जीवन में कठिनाइयों का सामना करते हैं केवल आशा के भरोसे कि हम इन से बाहर निकल सकते हैं । मगर आज कुछ लोगों की हालत अंधे कुंवे में बंद ऐसे लोगों की तरह है जो शायर कैफ़ी आज़मी की नज़्म में आज़ादी चाहिए रौशनी चाहिए के नारे लगाते रहते हैं मगर जब उनको बाहर निकाला जाता है तो वापस अंधे कुंवे में छलांग लगा देते हैं और दोबारा वही नारे लगाने लगते हैं । ऐसे निराशावादी लोग वास्तव में कोई कोशिश ही नहीं करते हैं बस शोर मचाते हैं । कुछ लोग समझते हैं उनकी चमक बढ़ेगी अगर बाकी लोगों की चमक को धुंधला कर दिया जाये । घर परिवार में भी कोई आदमी ऐसा होता है जो भाई पिता दादा सब की महनत को नकारता है ऐसा कहता है अपने किया क्या है सब मैंने किया है । मगर ये भूल जाता है खुद उसको इस काबिल किसने बनाया है । और जो उसे मिला उसी से कुछ कर दिखाना है मगर ऐसे लोग करने से ज़्यादा जो किया गया उसकी कमियां बताने में समय बर्बाद करते हैं और कर नहीं पाते खुद कुछ भी । करना कर दिखाना और बात है और करूंगा की बातें करना दूसरी बात ।

         विकल्पहीनता आदर्श दशा नहीं हो सकती , लोग भगवान तक बदलने का साहस रखते हैं । कोई ज़बरदस्ती है कि उसी को वरमाला डालनी होगी । आप क्या गुंडे बदमाश की तरह किसी लड़की को डरा कर हासिल करना चाहते हैं कि मुझे नहीं मिली तो किसी और की नहीं होने दूंगा । तेज़ाब से जलाने वाले प्यार नहीं किया करते हैं । जिन लोगों ने बनाया है उन्हीं को डरा रहे हो , हार के डर से घबरा रहे हो । नासमझ खुद हो सबको समझा रहे हो , जिधर नहीं जाते उधर जा रहे हो । उलझनों को और उलझा रहे हो , खुद उलझे हुए आप और सबकी उलझन बढ़ा रहे हो । कुछ खबर है कहां से आ रहे हो कोई खबर है कहां जा रहे हो । कैसे समझाएं क्या खो रहे हो क्या पा रहे हो । खुद अपने साये को सुबह शाम देख अपना कद बढ़ता समझ धोखा खा रहे हो । खुद अपने में सिमटते दोपहर को देख साया भरमा रहे हो । 
 
             अपने कभी ग्रामोफोन पर काले तवे पर घूमती सुई से संगीत सुना है , कभी कभी जब सुई किसी एक जगह अटक जाती थी तो संगीत नहीं शोर पैदा होता था । आजकल कुछ उसी तरह का शोर है जो देश की जनता को परेशान किये है । देश को छोड़ किसी नेता को इतना महत्व देने वाले पहले भी होते रहे हैं , मगर  उनके रहने नहीं रहने से देश को कोई फर्क नहीं पड़ा न पड़ना चाहिए । वास्तविक देश भक्त कभी ऐसा नहीं मानते कि उनके बिना देश का क्या होगा , उल्टा समझना ये चाहिए कि देश है तो वो हैं । आप किसी दल से संबंध रखते हों या आम नागरिक हों जिसे दलगत राजनीति से कोई मतलब नहीं , देश के लिए आपके दिल में जो भावना रहती है वतन से प्यार की वो सबसे बढ़कर है । चाहे जो भी हो अगर सत्ता की राजनीति में लोगों को आशा की बजाय इक डर इक दहशत और निराशा देता है और ये जताता है कि सिवा उसके शायद कोई अनहोनी हो सकती है तो उसको समझाना होगा देश अगर समंदर है तो वो इक तिनके की हैसियत रखता है । नायक वही होते हैं जो देश को निराशा नहीं आशा की उम्मीद की राह चलने को कहते हैं । आज इक गीत बहारें फिर भी आयेंगी फिल्म से पेश है , आशावादी भावना जगाता है ।
 
बदल जाये अगर माली , चमन होता नहीं खाली ,
बहारें फिर भी आती हैं , बहारें फिर भी आएंगी । 
 
अंधेरे क्या उजाले क्या , न ये अपने न वो अपने ,
तेरे काम आएंगे प्यारे , तेरे अरमां तेरे सपने ,
ज़माना तुझ से हो बरहम , न आएं राह में मौसम ,
बहारें फिर भी आती हैं , बहारें फिर भी आएंगी । 
 
थकन कैसे घुटन कैसी , चल अपनी धुन में दीवाने ,
खिला ले फूल कांटों में , सजा ले अपने वीराने,
हवाएं आग भड़काएं , फ़िज़ाएं ज़हर बरसाएं ,
बहारें फिर भी आती हैं , बहारें फिर भी आएंगी । 
 

 




अगस्त 24, 2018

POST: 883 हम तो मर के भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

            हम तो मर के भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

        ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं , मैं तो मर के भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा । 

   कहते तो यही हैं ज्ञानीजन कि बाकी सभी जीव जंतु पशु पक्षी मरने के बाद भी काम आते हैं केवल आदमी ही है जो किसी काम नहीं आता मरने के बाद । मगर ऐसा नहीं है आदमी का बदन किसी काम नहीं आता हो बेशक मगर आदमी का नाम बहुत लोगों के काम आता है । कई राजनीतिक दल ऐसे ही बाप दादा के नाम को भुनाने में लगे हुए हैं बात केवल गांधी की ही नहीं है । ये और बात है गांधी के नाम की ज़रूरत आज की सरकार को भी पड़ गई जो किसी ने सोचा भी नहीं था । ये राजनीति है और यहां हर वो चीज़ काम आती है जो फायदेमंद लगती है । नेताओं के लिए इंसान और सामान में कोई अंतर नहीं है सब बेचते हैं नाम भी बदनामी भी । आज फिर इतिहास को दोहराने की बात हो रही है । राजनीतिक दल में गंभीर चिंतन जारी है क्या यही अवसर है उस नेता की मौत से चुनावी नैया पार लग सकती है । पहले जिन दल वालों ने ऐसा हासिल किया अपने नेता की मौत से जनता की भावनाओं को उभार कर चुनाव में जीते उनकी बात अलग थी उनकी मौत स्वाभाविक नहीं थी और उनकी हत्या को शहीद बताकर उपयोग किया जा सकता था । अब तो जिनकी मौत हुई है कुछ दिन पहले तक उनको और उनके साथियों को राजनीति के हाशिये पर रखा गया था । लोग भावुक हैं मगर नासमझ नहीं हैं । काश पहले पता होता अभी उनकी शोहरत इतनी है तो दो चार योजनायें ही उनके भी नाम कर देते । मगर जो लोग भूल गये थे किसके लगाये पेड़ की छांव में बैठे उस पर लगे फल खा रहे हैं उनको फिर किसी मुद्दे की ज़रूरत है इतना अकाल है । 
 
               शायद लोग हैरान होंगे कि जब उनकी मौत के बाद श्र्द्धासुमन अर्पित करने को उनकी फोटो की ज़रूरत थी तो किसी भी तस्वीर बेचने वाले के पास उनकी तस्वीर नहीं मिली और गूगल से डाउनलोड कर फ़्लैक्स वाले से बनवानी पड़ी विनती कर के । बाज़ार में ऐसे ऐसों और कैसे केसों की तस्वीरें थी क्या बताऊं आपको हैरानी होगी । मगर कोई फर्क नहीं पड़ता है जिन की तस्वीर लोगों के दिलों में बसी हुई हो उनकी फोटो इश्तिहारों पर छपवाने की ज़रूरत नहीं होती । याद है कभी उनकी भी फोटो हर जगह दिखाई देती थी मगर जब सत्ता नहीं रही तो दल कोई भी हो उनकी तस्वीर कहीं नहीं दिखाई दी । यही ऐसे नेता थे जो जब सत्ता में आये तो जिस जगह पिछले राजनेता की तस्वीर लगी हुई थी दिखाई नहीं दी तो दोबारा लगवाई थी । यही अंतर होता है असली नायक और बनावटी नायक का । आज फिर से उनकी फोटो को बनवाने की बात सोची जाने लगी है मगर मगर दुविधा है उनकी राह अलग थी आपका रास्ता और है । कहीं दांव उल्टा नहीं पड़ जाये और लोग तुलना करने लगें तो आप उनके सामने इक पासंग भर भी नहीं साबित होंगे । 
 
           सब से बड़ी समस्या आपकी यही है कि कोई भी नेता किसी भी दल में आपके बराबर का हो आपको मंज़ूर नहीं है तो अपने ही दल में जिस नेता को आप ने भुलाना चाहा बुरी याद की तरह उसी को अपने से ऊंचा स्थान देना कैसे सहन होगा । ज़रूरत में बाप बनाने की बात है मगर बाप है कहने से लोग आपको उनका बेटा मान भी लेंगें आपको पता नहीं । 14 साल बाद राम बनवास से वापस आये थे तो लोग दीपावली मना रहे थे , सत्ता से बाहर होने के ठीक 14 साल बाद भी उनकी शोहरत कायम है देख कर विचार तो आया होगा ।  तेरा क्या होगा कालिया , लोग याद रखेंगे इतने प्यार से क्या ? जो लोग वास्तव में देश जनता की भलाई को दलगत स्वार्थ से ऊपर रखते हैं उन्हें लोग सदियों तक याद रखते हैं प्यार से । उनके लिए किसी शायर का इक शेर याद आता है :-

      माना कि चमन को न गुलज़ार कर सके , कुछ खार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम ।