नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी बढ़ती गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी बढ़ती गई
हर तरफ जलते दिए पर तीरगी बढ़ती गई ।
प्यास के मारे तरसते रह गए बरसात में
अब कि बारिश में हमारी तिश्नगी बढ़ती गई ।
थी ज़माने की नसीहत प्यार करना जुर्म है
रोकती दुनिया रही पर आशिक़ी बढ़ती गई ।
दिल्लगी क्या चीज़ है कैसे बताएं हम भला
रोकना चाहा मगर दिल की लगी बढ़ती गई ।
याद उनके प्यार की दिल में बसाये हम रहे
भूलना चाहा कभी तो बेकसी बढ़ती गई ।
कब कहीं देखा ख़ुदा ता उम्र जो कहते रहे
जब मुसीबत आ पड़ी जो बंदगी बढ़ती गई ।
ख़त्म ' तनहा ' हो गई हैं हुस्न की वो शोखियां
पर हमारे इश्क़ की वो सादगी बढ़ती गई ।

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