हर शाख़ पे उल्लू बैठा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था , हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम - ए - गुलिस्ताँ क्या होगा
शौक़ बहराइची जी का शेर आज हक़ीक़त बन कर सामने खड़ा है । आज देश की आम जनता फिर से शासक वर्ग की ग़ुलाम बना दी गई है लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं है कि किस की चौखट पर जाकर अपनी फ़रियाद करे । सभी दरवाज़े बंद हैं , जो भी मौलिक अधिकार मानवाधिकार हनन करने से सत्ता की मनमानी करने पर अंकुश लगा सकते हैं , अंधे - बहरे - गूंगे ही नहीं विवेकशून्य होकर इस सब का तमाशा खुद शामिल होकर बना दिया गया है । क्या ग़ज़ब की बात है कि शासक वर्ग सत्ता पर बैठ कैसे जनतंत्र का चीरहरण करते रहे और जनता को दिखलाते रहे कि वही उनकी रक्षा करते हैं , ये रहस्य बड़े बड़े पदों से सेवानिवृति के बाद सार्वजनिक करते हैं । हैरानी हुई थी किसी सेना के बड़े अधिकारी की पुस्तक की बात सामने आई थी और भी कितनी तरह से कितना कुछ सत्ता के गलियारे में गंदगी मख़मली क़ालीन के नीचे छुपी हुई है लाख कोशिश कर भी सड़ांध बाहर महसूस होने लगी है । अब खबर है कि सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख न्यायधीश अपनी पुस्तक में बता रहे हैं कि जजों की नियुक्तियों में भी सब ठीक नहीं होता रहा है बल्कि जजों की नियुक्ति से पहले सरकार से परामर्श किया जाता रहा है और कॉलजियम में इस पर वाद विवाद होने के बावजूद भी सरकारी पसंद से जज बनाये जाते रहे हैं । आज महसूस होता है कि तभी सुप्रीम कोर्ट कितनी बार जानते हुए भी कोई ठोस कदम उठाती नहीं रही है । कभी इलेक्टोरल बॉण्ड को अवैध घोषित कर बंद करवाती है लेकिन जितना लूट और भ्र्ष्टाचार होने से ईडी सीबीआई सभी विभागों की आपराधिक कार्यशैली पर मूकदर्शक बनी रहती है जिस से जनता संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद करती रही है । राफ़ेल को लेकर शंका होती है मगर सुप्रीम कोर्ट सरकार के तर्क से कायल हो जाती है कीमत कैसे इतनी अधिक है जो पहले कम थी सरकार गोपनीय बात कहती है गोपनीयता कमाल की चीज़ है जिन बातों को गोपनीय रखने की शपथ उठाते हैं उनको जब चाहे किसी अपने को बताते हैं और जिनको छुपाना ख़ुद को बचाना है तब गोपनीयता कहते हैं । मुख्यमंत्री बनते जिस के करीबी लोग ज़मीने खरीद कर ऊंचे दाम बेच कर मालामाल हो जाते हैं क्योंकि उनको राज़ बता दिया जाता है कि वहां सरकार विकास योजना शुरू करने वाली है । विकास की ऐसी लूट तमाम जगह हुई है खोदने लगेंगे तो कितने मुर्दे गढ़े हुए मिलेंगे ।
पुलिस सुरक्षाबल सभी आंखे मूंदे सत्ताधारी लोगों के अनुचित और दमनकारी आदेशों का पालन कर जनता पर लाठी पैटल गन चलाती है जबकि शांति पूर्वक विरोध लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है । कितनी अजीब बात है कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्त तीसरे को मनमानी करते ख़ामोश रहे और इसकी जानकारी प्रधान सचिव अथवा प्रधानमंत्री कार्यालय को देने पर वहां से उल्टा मुख्य चुनाव आयुक्त को ही उनके लिए मिली शिकायत भेज कर जैसे उनको बढ़ावा दिया जो अब सामने आ रहा है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बर्बाद करने में चुनाव आयोग पूरी तरह दलदल में डूबने की कगार पर है । विधायिका की हालत सब जानते हैं अधिकांश आपराधिक छवि के लोग बैठे हैं हर विधान सभा से लोकसभा तक में । कार्यपालिका प्रशासन सत्ताधारी नेताओं की कठपुतली बनकर उनकी अनुचित बातों में सहायक बनकर अपने पद की गरिमा को धूमिल कर देश समाज से अन्याय कर रहे हैं । आज कोई बड़ा प्रशासनिक अधिकारी ईमानदार मिलता नहीं है जिस की तलाशी ली जाये वही रिश्वत घूस का करोड़ों रूपये छुपाये मिलता है , पकड़े जाते हैं छूट जाते हैं , चोर चोर मौसेरे भाई हैं । पुलिस हमेशा से ही जनविरोधी चरित्र की साबित हुई है अन्यथा देश की सुरक्षा व्यवस्था कानून की हालत इस कदर बदहाल नहीं हो सकती थी । हरियाणा में पुलिस के बड़े बड़े अधिकारियों की गैरकानूनी कार्यशैली सामने आई थी किसी ने जब ख़ुदकुशी की थी लेकिन सत्ता की सहूलियत है कि लोग इतनी सारी गंभीर बातों को भुला देते है । भूलना नहीं भी चाहें तो भी सिर्फ चिंतित हो सकते हैं परेशान हो सकते हैं कुछ भी किसी ख़ास वर्ग के ख़िलाफ़ कर नहीं सकते , क्या ये ग़ुलामी से बढ़कर बेबसी नहीं है । यकीन इस से अधिक विसंगति की बात ये है कि अभी भी बहुत बड़ी संख्या में लोग इन सभी की गलतियों को जानते हुए भी उनका समर्थन अपनी व्यक्तिगत स्वार्थों की खातिर करते हैं । जिनको समाज वीवीआईपी मानता है उनकी वास्तविकता इक नज़्म शीर्षक बड़े लोग से लिखी हुई है पचास साल पहले की घटना को देख कर विवरण देना घटना का व्यर्थ है जब सभी क़ातिल गुनहगार दुनिया में ज़िंदा नहीं है सिर्फ ये लेखक गवाह ज़िंदा है कितनी बार मरने के बावजूद भी । पढ़ना अवश्य ।
बड़े लोग ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बड़े लोग बड़े छोटे होते हैंकहते हैं कुछ
समझ आता है और
आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।
इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे
किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।
दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे
ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं ।

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