आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया
शैतान की पहचान करना सबसे बड़ी चुनौती है शैतान आदमी के भीतर रहता है कभी भी अपनी ताकत दिखला सकता है । भगवान तक का शैतान पर कोई बस इसीलिए नहीं चलता है क्योंकि भगवान ने जब दुनिया बनाई तब कुछ नियम निर्धारित किए थे जिस में एक नियम ये भी था जो हमेशा रहेगा स्वयं भगवान भी जिसको बदल नहीं सकता है , वो है आदमी को अपने विवेक से कुछ भी करने की अनुमति दी गई थी । तभी लोग भला बुरा जैसा भी आचरण करते हैं भगवान किसी को रोकता टोकता नहीं है , जैसा कुछ लोग बतलाते हैं उसकी मर्ज़ी से सभी कुछ होता है सच नहीं भ्रामक है शायद उन्होंने ऐसी बात किसी ख़ास मकसद से ही फैलाई है जबकि वास्तव में खुद उन्हीं पर भगवान का कोई अंकुश नहीं दिखाई देता है । शैतान की उलझन है कि उसको लगता है वही सबसे समझदार और ताकतवर भी है इसलिए दुनिया को बदलना अथवा सुधारना चाहता है जो उसको यकीन है गलत ढंग से चलती है । लेकिन आपको मालूम ही नहीं होता कब कोई किस रूप में आपको मिलता है , कोई पिता कोई दोस्त कोई परिजन कोई अन्य आपके संपर्क में रहने वाले को अनुभव होता है कि जैसा उसको चाहिए आप उस तरह से नहीं चलते हैं । ऐसे में आपको डांटकर या फिर फटकार लगाकर सुधर जाने को कहता है अन्यथा आपको विवश कर सकता है राह रंग ढंग बदलने को । जब कोई नहीं मानता उसकी बात तब शैतान अपने असली रूप में प्रकट होता है , आपके घर से गांव से शहर से राजधानी तक वही रहता है । आजकल दुनिया में तमाम ऐसे शासक बन गए हैं जिनको सभी देशों को उस राह पर लाना है जो वो बताते हैं समझाते हैं डराते हैं प्रलोभन भी देते हैं । शैतान शुरुआत में शराफ़त का इक पर्दा लगाए रखते हैं वार्तालाप समझौता अपनी शर्तों पर बंधने को आपकी भलाई और सुरक्षा से जोड़ते हैं । अभी कोई जल्दबाज़ी मत करना उसको लेकर कोई छवि बनाने में पहले अपना चेहरा देखना कोई शैतान उस के पीछे भी छुपा हुआ है जो तमाम लोगों को नासमझ मानता है और खुद को सबसे काबिल और जानकार ।
शैतान को समझाना किसी काम नहीं आता है जो उसको समझाने की कोशिश भी करता है शैतान उसको अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है । लेकिन आपको शैतान से टकराना नहीं है बचना है उस से दुरी बना कर चुपचाप अपने रास्ते चलना है । चिंता मत करना ऐसी राहों पर शैतान की शैतानियत बेअसर साबित होती है उसको उसकी डगर जाने देना उचित है आपको उसकी तरफ देखना नहीं है । शैतान से कोई समझौता कभी नहीं किया जा सकता है उसका कोई ऐतबार नहीं है उसकी चाल में फंसकर लोग अचानक औंधे मुंह गिर जाते हैं । ज़िंदगी भर आपको ऐसे लोग मिलते रहते हैं जिनका कहना होता है वो कभी किसी का भी बुरा नहीं करते हैं लेकिन उनको सभी लोग बुरे दिखाई देते हैं उनको किसी और में कुछ अच्छाई नज़र ही नहीं आती है । आपको समझ आया होगा आसपास कितने लोग ऐसे समाज सुधारक बने फिरते हैं उनको किसी का उस ढंग से जीना पसंद नहीं जैसा उनको लगता है सही है दुनिया से लेकर अपने करीब तक सभी को अपने ही रंग में रंगना चाहते हैं । उनका अपना कोई रंग नहीं होता है गिरगिट भी उन जैसा रंग नहीं बना सकती है ये रंग बदलती दुनिया है जिस में सभी अपने बालों पर नहीं चेहरे पर ख़िज़ाब लगाए हुए हैं । अब इक ग़ज़ल और इक कविता से बात को विराम देते हैं ।
यहां तो आफ़ताब रहते हैं ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
यहां तो आफताब रहते हैंकहां , कहिये ,जनाब रहते हैं ।
शहर का तो है बस नसीब यही
सभी खानाखराब रहते हैं ।
क्या किसी से करे सवाल कोई
सब यहां लाजवाब रहते हैं ।
सूरतें कोई कैसे पहचाने
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं ।
पत्थरों के मकान हैं लेकिन
गमलों ही में गुलाब रहते हैं ।
रूह का तो कोई वजूद नहीं
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं ।
ख़ुदा से बात ( कविता )
डॉ लोक सेतिया
कहते हैं लोगदुनिया में अच्छा-बुरा
जो भी होता है
सब होता है तेरी ही मर्ज़ी से ।
अन्याय अत्याचार
धर्म तक का होता है
इस दुनिया में कारोबार ।
तेरी मर्ज़ी है इनमें
मैं कर नहीं सकता
कभी भी स्वीकार ।
सिर्फ इसलिए कि याद रखें
भूल न जाएं तुझको
देते हो सबको परेशानियां
दुःख दर्द समझते हैं
दुनिया के कुछ लोग ।
ऐसा तो करते हैं
कुछ इंसान
कर नहीं सकता
खुद भगवान ।
खुदा नहीं हो सकता
अपने बनाए इंसानों से
इतना बेदर्द
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़ ।
लगता है
कर दिया है बेबस तुझको
अपने ही बनाए इंसानों ने
जैसे माता पिता
हैं यहां बेबस संतानों से ।
अपने लिए सभी
करते तुझ से प्रार्थना
मैं विनती कर रहा हूँ
पर तेरे लिए ।
बचा लो इश्वर
अपनी ही शान
फिर से बनाओ अपना ये जहान
होगा हम सब पर एहसान ।
अब फिर बनाओ दुनिया इक ऐसी
चाहते हो तुम खुद जैसी
अच्छा प्यारा खूबसूरत
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ।
जिसमें न हो दुःख दर्द कोई
मिलती हों सबको खुशियां ।
अन्याय अत्याचार का
जिसमें न हो निशां
ऐ खुदा अब बनाना
इक ऐसी नई दुनिया ।

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