मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया
कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है हमारे अपने देश का ही शख़्स है जिसने कभी मांगा नहीं लेकिन सभी जानते है उस के रहते भला कोई और इस कीर्त्तिमान का दावेदार होने की सोच भी सकता है । कोई और दुनिया भर को उल्लू बना सकता है भगवान होने का भरोसा किसी और में कभी दिखाई नहीं देता है खुद भगवान पछताते हैं ऐसे व्यक्ति को धरती पर भेजा भी तो भारतवर्ष में जन्म दिया लेकिन उसको लगता है उसका जन्म नहीं हुआ अवतार लिया है । बस इक वही अजर अमर है बाकी सब संसार नश्वर है उसको रहना है और कण कण में दिखाई देना है सिर्फ इसी मकसद से उसने अपने महिमामंडन प्रसार प्रचार पर धन पानी की तरह बहाया है । उसने जो भी चाहा है पाया है इस ख़ातिर उसने क्या क्या नहीं गंवाया है खुद नैया पार लगाने को खेवनहार को भी डुबोया है । कौन है जो हंसता दिखाई देता है संविधान लोकतंत्र क्या सभी का रोना है किसने रोया है बस उसकी अश्रुधारा ने दुनिया को डुबोया है । उसकी कटु मुस्कान पर कौन फ़िदा नहीं होता वो नहीं चाहता तो देश दुनिया में कोई हादसा नहीं होता , काश कोई आपसा कभी नहीं होता । इक वही शाम का जैसे बढ़ता हुआ साया है काली घटा बनकर आसमान पर छाया है आपको समझ कभी नहीं आती उसकी क्या माया है । कोई जाल उसने बिछाया है हर मछली ने खुद कांटा निगला है उसको अपना रक्षक घोषित किया तब ज़िंदा रहने का अवसर पाया है । ज़हर सभी को अमृत बताकर पिलाया है जाने कैसा मज़ा है जो हर कोई मौत को खुद बुला लाया है । आज पहली अप्रैल पर हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है ख़ुशी मनाओ दुनिया को मूर्ख बनाने का कीर्तिमान हासिल कर उसने सभी को बदलाली में भी हंसना सिखलाया है आपदा को अवसर घोषित कर उसने इक और महान कारनामा कर दिखलाया है । कवियों ने जो पढ़ा नीचे लिखा है खूब लुत्फ़ उसने उठाया है ।
हैरान हैं भगवान ( क्षणिकाएं : हास्य - व्यंग्य )
क्या ऐसे होते हैं इंसान
क्या यही है शराफ़त की पहचान ,
चोर से कहते चोरी कर कोतवाल से भी पकड़वाते ,
कोयला करने लगा है हीरे की पहचान ।
भाई से भाई , बेटे से बाप की करवाते लड़ाई ,
आफ़त खुद जिसने बुलाई
शामत उसकी आई ,
खाते सभी से खूब मलाई ,
कहना मत उनको हरजाई आदत है बनाई ।
बेच ईमान दौलत कितनी कमाई ,
जिसकी खाई उसकी बजाई
दो तरफ़ा है किरपान ,
मान न मान सभी लोग नादान
बस इक अपनी आन बान शान ।
कौन किसका है कद्रदान ,
मिलता है सभी को जीने का वरदान
मीठा ज़हर पहचान ,
किस किस की ऊंची है दुकान
फ़ीके फ़ीके सभी पकवान ।
अपने बनकर समझते
सभी को पायदान ,
जाके पैर न फटी बिवाई ,
वो क्या जाने पीर पराई ,
बिछा हुआ क़ालीन नीचे छुपा
सभी कूड़ा कर्कट बाहरी शान ।
ऊपर बैठा हुआ हैरान
कोई भगवान ,
सच और झूठ की मिलावट
करते हैं नासमझ नादान ,
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ,
करते दुनिया पर कितने एहसान ।
क्षणिकाएं ( हास्य - व्यंग्य कविताएं )
1
सरकार है कायदा है कानून संविधान है
भूखों का पेट भरने को रोटी नहीं है , पर
भूखे मर जाने पर मिलता सभी को बराबर
लाखों की मुआवज़ा राशि का प्रावधान है ।
2
बड़ा ही निराला अदालती खेल है
अनगिनत बेगुनाह हैं कैदी जेलों में
हमेशा से गुनहगारों के लिए मिलती
बचने को अग्रिम ऐंटिसिपेटरी बेल है ।
3
लोकतंत्र भी इक खेल तमाशा है
कभी तोला है तो कभी वो माशा है
मुंह में पानी है नेताओं प्रशासन के
जनता क्या है बस मीठा बताशा है ।
4
मंच पर भाषण देते समय जनाब
चिंता भ्रष्टाचार पर जतला रहे थे
दलालों को इशारों इशारों में ही
घर शाम को अपने बुला रहे थे ।
राजनेता ( व्यंग्य - कविता )
दफ़्न रूह की आवाज़ कर गया
जी रहा मगर इक शख़्स मर गया ।
ऐतबार उसका , क्या करें भला
और कुछ कहा , कुछ और कर गया ।
मांगता सदा , ख़ैरात वोट की
जीत कर न जाने फिर किधर गया ।
रहनुमा बनाकर भूल हमने की
देश लूटकर घर बार भर गया ।
क्या नशा चढ़ा सत्ता जो मिल गई
ज़ुल्म की हदों से , है गुज़र गया ।
बेचने लगा अपना इमान तक
देख कर उसे शैतान डर गया ।
मैं ग़ुलाम हूं , सरकार आप हैं
कह के बात ' तनहा ' ख़ुद मुकर गया ।
सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता )
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में

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