सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल ( हास्य - कविता )
डॉ लोक सेतिया
पंडित जी से इक दिन पूछा बतलाओ कैसी है ग्रहचाल
ख़ाली जेब रहना है कब तक होंगें सब लोग मालामाल
नाम जानकर बोले मुझसे जैसे गुज़रे हैं पिछले सब साल
जैसे भारत देश की हालत बिगड़ रही है साल दर साल
लोक की लोकतंत्र की राशि इक है ग्रहों की उलटी चाल
जनता का कसूर नहीं है डेमोक्रैसी का भाग्य ही बदहाल
भारत और भ्र्ष्टाचार दोनों का ही ग़ज़ब है अपना कमाल
कोई रहता है पात पात पर कोई रहता है हर डाल डाल
बेचती हमेशा झूठे सपने राजनीति की सभी की टकसाल
पंछी समझता है मिला है दाना नहीं समझता कैसा जाल
मायाजाल में फंस कर लोग भूल गए सब अपनी सुर ताल
सय्याद दिलाता भरोसा रखता है वो सब का बड़ा ख़्याल
पिंजरे के तोते की तरह बतलाते उनकी किस्मत का हाल
चुनाव नतीजे में मुमकिन ही नहीं पाती अपनी सकें निकाल
राजनेताओं की प्रशासन की हमेशा होती तिरछी है हर चाल
चाबुक है उनके हाथ में जब तक , बचाओ सब अपनी खाल
सांसद विधायक सभी बिकते हैं राजधानी बन गई घुड़साल
सर पर सबके लटक रही तलवार बचने को नहीं कोई ढाल
कुछ हलवा पूरी छीन खाते सबको नहीं मिलती रोटी - दाल
न्यायालय की बात मत पूछो निकलते हैं रोज़ बाल की खाल
नचाती नाचती सत्ता की सुंदरी घने काले लम्बे जिसके बाल
राजनीति की कालिख़ लगाई जाती तो बन जाती रंग गुलाल
सितारे बदले खेल बदलेगा है काली पूरी उन की हुई है दाल
कुंडली खुलने लगी है लोगों की किसका खून सफेद या लाल
सांवली सलौनी सूरत पिया की सबको लुभाती थी बीते साल
कोई रोग लगा है चेहरे की हवाईयां उड़ीं बिखरे बिखरे हैं बाल
ख़ामोशी सी उन पर छाई है घर दफ़्तर सब की लगती हड़ताल
जन्मपत्रिका ग़ुम कौन चुरा गया तिजौरी से , होगी जांच पड़ताल

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