Sunday, 12 April 2020

समझना अच्छे कर्म दान धर्म कर्तव्य आदर्श और नैतिक मूल्यों को ( आलेख - चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

 समझना अच्छे कर्म दान धर्म कर्तव्य आदर्श और नैतिक मूल्यों को 

                                 ( आलेख - चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

आज जो भी लिख रहा हूं वास्तव में खुद मेरा अपना लिखा या समझाने का विषय नहीं है। हमने जिन जिन किताबों को धार्मिक आदेश उपदेश माना स्वीकार किया हुआ है उनकी ही बताई बात को आधुनिक काल के युग में आचरण को देखने समझने और विवेचना करने समाज को जो भी जैसा है आईना दिखलाने की बात है। दो शायरों के शेर आपको सुनाता हूं यूं कोई भी शायर कवि ऐसा नहीं जिसने आईना दिखलाने को लेकर कहा नहीं हो। कृष्ण बिहारी नूर कहते हैं " चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो आईना झूठ बोलता ही नहीं। " अब जो लोग टीआरपी विज्ञापन या पैसे के लिए काम करते हैं वो सच का आईना नहीं हैं ये किसी तरह मनचाहे ढंग से छवि बनाने का छल करने वाले आईने हैं जैसे अजायबघर में देखे हैं। राजेश रेड्डी जी कहते हैं " न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊं। " सच कहना आसान नहीं है सच का स्वाद मीठा नहीं होता और कड़वा सच कोई नहीं सुनना चाहता है। 

आज पहला विषय अच्छे कर्म और दान की परिभाषा को समझना है। शायद ही कोई होगा जिसने राजनेता सरकारी विभाग के कर्मचारी अधिकारी पुलिस के सिपाही से थानेदार दरोगा तक सभी के घूस रिश्वत या कोई काम करने के बदले उपहार की मांग किसी भी रूप में लेने को लेकर देखा नहीं हो। अब कुछ लोगों को हम देख रहे हैं जो जेबें भरते थे अन्याय करते थे दानवीर और अच्छे कर्म करने लगे हैं जनता की सहायता करने लगे हैं। क्या उनकी सोच बदल गई है कदापि नहीं , ये बिलकुल उसी तरह है जैसे काली कमाई झूठ धोखा व्यवसाय कारोबार में गड़बड़ मिलावट जैसे ही नहीं हर किसी की जान से खिलवाड़ कर ज़हर बेचने तक का कारोबार करने के बाद किसी धार्मिक जगह दान आदि करते हैं ये मानकर कि उनके पाप अपराध का भार कम हो गया मगर पापी की पाप की कमाई के दान से वो डाकू से धर्मात्मा बन नहीं जाते हां चाहते हैं लोग उनके अधर्मों को नहीं दान देने की चर्चा करें। ये धर्म है ही नहीं जब कोई किसी जगह पाप करता रहता और जाकर माफ़ी मांगता रहता है या फिर पूजा अर्चना करता ही किसी स्वार्थ की चाहत से है। 

अपने बड़े बड़े धनवान लोगों के दान देने की भी चर्चा सुनी है जो घोषणा करते हैं सरकार को किसी संस्था को या किसी और समय पर दाता बनकर अच्छे काम की। लेकिन इनका ये काम दो कारण से होता है या तो पहले से नाम शोहरत अथवा सरकार से कोई मतलब लेने के बाद या भी देने के बाद उसका कई गुणा पाने की खातिर। वास्तविक दान या अच्छा काम वो होता है जो हम अपनी खून पसीने की कमाई से अपनी ज़रूरत को छोड़ किसी की सहायता करते हैं कठिनाई में। ऐसे अधिकतर दस बीस सौ या हज़ार का दानकर्म को लेकर कोई शोर नहीं करते न ही बदले में कुछ चाहते हैं। 

अब बात सरकार शासक की राजधर्म की। चाणक्य उपनिषिद रामायण गीता गुरुग्रंथ साहिब बाईबल कुरान सभी राजा और शासक का कर्तव्य बताते हैं जब नागरिक विपदा में हों उनकी देखभाल सहायता करने को अपने खज़ाने का मुंह खोलना। मगर यहां तो जब भी समस्या होती है सरकार का मुखिया जनता से ही मांगता है और लोग देते हैं ऐसा सरकार विवशता की खातिर नहीं करती कि उसका खज़ाना खाली है। हमने देखा है उनको अपने उचित क्या अनुचित खर्च को जनता के पैसे से ही नहीं देश के संसाधन को संपत्ति को बेचकर गिरवी रखकर भी शान से रोज़ धन की बर्बादी करते रहना। क्या जब देश की जनता को ज़रूरत है तब भी किसी तरह से उसी से लेकर उसको देने को अपनी महानता बताना उचित है। कहीं किसी भी धर्म में ऐसा नहीं सबक सिखाया गया। मगर आपको समझाया जाएगा कि ऐसे में बहुत धन की ज़रूरत है मज़बूरी है तभी जो दे सकते हैं उनसे विनती है और वास्तव में सरकारी विनती आदेश की तरह से होती है जिस को जो भी अधिकारी या नेता कहते हैं नहीं देने पर अंजाम जानते हैं। मगर कोई कुछ नहीं कहता ये सोचकर कि जो भी कर रहे भलाई का काम कर तो रहे हैं। 

अब आपको वास्तविकता बताते हैं हर नेता हर सरकार पिछली सरकार के पास धन का अंबार होने पर सवाल करती है। खुद सत्ता में हैं तब इनके पास भी सत्ता के अधिकार के उपयोग कर चंदा और जगह जगह ज़मीन जायदाद आलीशान दफ्तर और साधन आ जाते हैं। किस तरह से किस किस से सब को पता है माजरा लेन देन का है। आपने अपने शासन में जिन लोगों की सेवा की बात और ये जो भी अनुचित होता था उसको बदलने की बात कही थी मगर अपने भी वही किया और पिछली सरकारों से बढ़कर किया। तभी आज उन सबसे अधिक धन आपके पास है क्या इस कठिन समय आपने अपने नेताओं की जमा की करोड़ों की पूंजी और दल के पास जमा धन जायदाद से इक कौड़ी भी जनता को देने की बात की है। एक महीने का वेतन या कम वेतन जनता की आंखों में धूल झौंकने की बात है। नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। 

अंत में बात आदर्श और नैतिक मूल्यों की। कोई कहता है लॉक डाउन में शराब की दुकान खोलनी चाहिएं क्योंकि उनसे सरकार को खूब आमदनी होती है। मगर वास्तव में ये जितने भी धंधे होते हैं सत्ता धारी नेताओं का हिस्सा होता है भले दो नंबर का। उनकी आमदनी का सवाल है। अब सबसे बड़ा सवाल ये कह रहे हैं कि किसान को फसल काटनी है कुछ उद्योग को काम करना है उनको अनुमति देनी होगी और उनकी मज़बूरी है पेट भरना है तो अपनी उगाई फसल को छोड़ नहीं सकते। मगर क्या उनकी जान की कोई कीमत है क्योंकि दावा कुछ भी करें उनकी सभी की जीवन की रक्षा नहीं की जा सकेगी। कोई कह सकता है रास्ता क्या है। अब आपको बताते हैं जो राह हो सकती है आप के पास संसाधन हैं और संसाधन हासिल करने को अधिकार भी हैं। क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि सरकार किसान की फसल खुद खेत से कटवाने और उसकी कीमत चुकाने का काम करे। जब आप देश भर में हर किसी के घर की जानकारी अपने सरकारी विभाग के कर्मचारी अधिकारी भेजकर कुछ दिन में कागज़ पर लिख सकती है तो अब ज़मीन पर भी काम कर दिखाने का काम किया जाना मुमकिन है। मगर खेद की बात यही है कि सरकार को जनता की सुविधा ज़रूरत के समय कर्तव्य नहीं निभाने ज़रूरी लगते आदेश लागू करना आता है। ये सब मापदंड साबित करते हैं कि वास्तव में हमारे समाज की धर्म की सरकार की कारोबारी लोगों की समाचार और समाज की वास्तविकता दिखाने वालों की जो असलियत है उसको आदर्श तो हर्गिज़ नहीं कह सकते हैं।

No comments: