Thursday, 27 June 2019

आग बरसाने वाले पेड़ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      आग बरसाने वाले पेड़ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   दुष्यंत कुमार अब बताओ हम कहां जाएं। आपको दरख्तों के साये में धूप लगती थी और कहने लगे चलो यहां से चलते हैं और सदा के लिए। आजकल जो पेड़ पूर्वजों ने छांव देने को फल की आस रखकर लगाए थे उनके पत्ते तक आग बरसाने लगे हैं। जिसको गुलशन कहते थे वही तपता रेगिस्तान बना डाला है उन लोगों ने जो मसीहाई का मुखौटा लगाकर आए थे और कहते थे हम इस धरती को जन्नत बना देंगे। दोजख़ भी क्या इस से बुरा होगा कोई इस नर्क को देख कर लोग जीने से घबराते हैं। बड़ी अजीब तहज़ीब के लोग हैं जो भगवान देवी देवताओं के नाम का शोर मचाते हुए ज़ालिमाना ढंग से इंसाफ का नाम लेकर क़त्ल करते हुए खुद को भगवान और धर्म के बंदे बताते हैं लेकिन हैं शैतान और शर्मसार करते हैं हैवानियत तक को भी। 

संविधान को समझते हैं सत्ता पाने तक काम की चीज़ है उसके बाद उनका अपना वहशीपन उनका कायदा कानून निज़ाम का दस्तूर सब कुछ है। और कहते ही नहीं समझाते हैं उनको देशभक्त और अच्छा भी बताना होगा नहीं तो आपका जीना दुश्वार मरना मुहाल हो जाएगा। ये दावा करते हैं कहीं अंधेरा नहीं है और अंधकार के ही पुजारी हैं बस्तियां जलाते हैं दूर से तमाशा देखते हैं जलाकर और सोचते हैं यही रौशनी है। घर को जलाने लगे हैं ये कैसे चिराग़ हैं जो रौशनी के नाम पर धुआं बांटने का काम करते हैं। कौन है जिसको इतिहास में जगह पानी है और शोहरत समझते हैं नाम बदनाम होने को भी। खलनायकी के कायल होने लगे हैं लोग और भले-मनसाहत को ठेंगा दिखाने को ताकत मानते हैं। सिंहासन पर राज है अंधकार का कारोबार करने वाले का उसका काम ही रौशनी के नाम पर अंधेरा बेचना है। जाँनिसार अख्तर जी की बात सामने है। जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये। आजकल लोग लिखते कम हैं पढ़ते बिल्कुल भी नहीं है जानकर होने का दावा करते हैं और जो सबक सीखा नहीं कभी खुद उसका उपदेश देते हैं। 

गधे को बाप बनाने की भी कोई हद होगी मगर जब सत्ता की खातिर कत्ल बलात्कार के गुनहगार को शासक संत कहने लगे तो समझना होगा मंदिर किसी कातिल का बनवाना उनकी मंशा थी और आगे इरादा क्या है कोई नहीं जानता है। ख़ुदपरस्ती की आदत इंसान को इतना भी खराब करती है कि भले बुरे का भेद नहीं समझ पाते हैं लोग। जो उनकी ज़ुबान से निकले वही झूठ सबसे बड़ा सच है और बाकी हर सच हर वास्तविकता जो सामने है उसका होना ही नहीं स्वीकार है अर्थात इसी का नाम सरकार है। ये राजनीति है या धोखे  का झूठ का कारोबार है जिसको कहते हैं इनायत है दरअसल अत्याचार है। हर युग के ज़ालिम को रहता अहंकार है हो रही नाम की हर तरफ जय जयकार है। दहशत से छीनता जो नहीं होता वो प्यार का हकदार है किसी को भी नहीं लेकिन इनकार का अधिकार है। ये सही गलत से भला किसको सरोकार है हर दीवार पर चिपका उनका इश्तिहार है , अब नज़र आती नहीं किसी को कोई दरार है। याद आता फिर दुष्यंत कुमार है। उनको कुछ भी कहना नहीं , कुछ भी कहना बेकार है। उन पर चढ़ा हुआ सत्ता का खुमार है। इस पार भी है वही शायद यही उस पार है। जनता खरबूजा बन कटती है सत्ता की तीखी कतार है ये कहलाती राहत की भरमार है। जो भी कहो पहले कहो कहना भी अब बेकार है। दो ग़ज़ल सुनते पढ़ते हैं सर धुनते हैं जब जीते हुए ज़िंदा लाश की तरह हो गए हैं संवेदनाशून्य समाज के कायर लोग हैं हम सभी।


  धुआं धुआं बस धुआं धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा' 

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ
न रौशनी का कहीं निशां। 
हैं लोग अब पूछते यही
कहां रहें जाएं तो कहां। 
बहार की आरज़ू हमें
खिज़ा की उसकी है दास्तां। 
है जुर्म सच बोलना यहां
सिली हुई सच की है ज़ुबां। 
जला रहे बस्तियां सभी
नहीं बचेगा कोई मकां। 
न धर्म कोई न जात हो
हमें बनाना वही जहां। 
उसी ने मसली कली कली
नहीं वो "तनहा" है बागबां।

दर्द अपने हमें क्यों बताये नहीं - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द अपने हमें क्यों बताये  नहीं ,
दर्द दे दो हमें ,हम पराये  नहीं।

आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी ,
आ तो जाते मगर , बिन बुलाये  नहीं।

चारागर ने हमें आज ये कह दिया ,
किसलिए वक़्त पर आप आये नहीं।

लौट कर आज हम फिर वहीं आ गये  ,
रास्ते भूल कर भी भुलाये  नहीं।

खूबसूरत शहर आपका है मगर ,
शहर वालों के अंदाज़ भाये  नहीं।

हमने देखे यहां शजर ऐसे कई ,
नज़र आते कहीं जिनके साये  नहीं।

साथ "तनहा" के रहना है अब तो हमें ,
उनसे जाकर कहो दूर जाये  नहीं।

( चारागर :::: डॉक्टर )          ( शजर ::::: पेड़ )

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