Friday, 21 June 2019

लूट सके तो लूट ( भली लगे कि लगे बुरी ) डॉ लोक सेतिया

    लूट सके तो लूट ( भली लगे कि लगे बुरी ) डॉ लोक सेतिया 

  कहने को बहुत है चुप रहना सीखा नहीं सच बोलना कभी किसी सरकार को शासक नेता या अधिकारी को कब भाया है। घोटाले घोटाले का फर्क है किसी के घोटाले खराब थे किसी को लगता है ये शाकाहारी किस्म के घोटाले हैं। बहुत पुरानी किसी ठेकेदार की बात याद आई है कहा करते थे सरकार से और अपनी मां से जितना हो सके पा सकते है इतना ही नहीं उनका मत था सरकारी घी मुफ्त मिलता हो और आपके पास बर्तन नहीं हो तो अपने साफे या सर ढकने वाले कपड़े में झोली बना ले लेते हैं। बह जाएगा बेशक फिर भी चिकनाहट तो कपड़े में बची रहेगी रोटी चुपड़ने को इस्तेमाल कर लेंगे। माले मुफ्त दिले बेरहम या चोरी का माल बांसों के गज जैसी कितनी कहावतें हैं। अर्थात ये इक आम राय बनी हुई है जनता का धन सरकारी धन होता ही है अवसर मिलते ही लूटने को। आज आपको विस्तार से बताते हैं किस किस ढंग से होता है। तेरी गठरी को लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा या भी राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट , जिसने कहा उसका मकसद धर्म की आस्था की बात करना था मगर समझने वालों को कुछ और समझ आया है। 

  आज की घटना से बात शुरू करते हैं हरियाणा में सरकार योग दिवस मना रही है अब स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है रोगी है तो निजि अस्पताल नर्सिंग होम जा सकते है सरकार उपाय करेगी कोई बीमार ही नहीं हो। योग जब से अब से नहीं कब से है मगर योग करने से रोग नहीं होगा ऐसा कभी किसी ने दावा नहीं किया था। जब इसको कारोबार बना लिया किसी ने तो सरकार ने जानने की कोशिश ही नहीं की कि इस के करने वाले कितने स्वस्थ हुए हैं। युग ही इश्तिहारबाजी का है और टीवी अख़बार को विज्ञापन दे कर कोई भी महान कहला सकता है। पैसा फैंको तमाशा देखो। तमाशा दिखाने वाले और तमाशाई अपनी जगह हैं किसी सरकार को अपने अस्पताल अपने स्कूल अपने जनस्वास्थ्य विभाग की चिंता होनी चाहिए ताकि लोग इन सेवाओं से फायदा उठा सकें। रोहतक में राज्य सरकार योग दिवस मना रही थी आज सुबह और लोगों को चटाई और टीशर्ट बांटी गई मुफ्त में और बाद में वापस करने की जगह लोग साथ लेकर चलते बने। ये किसी टीवी चैनल पर दिखाया तो बात खुली अन्यथा हर दिन सरकारी आयोजन किये जाते हैं इसी तरह सरकारी खज़ाने से बेदर्दी से महंगे दाम सामान खरीद कर फिर किस वस्तु को कौन ले गया कोई हिसाब नहीं रखता है। चलो ये भी समझते है ऐसा होता कब कब है। 

      कुछ दिन पहले साईकल दिवस था नेता जी को ही नहीं उनके साथ कई और लोगों को भी फोटो करवानी थी साईकल पर दफ्तर जाने की। नई नई साईकलें सब एक जैसी नज़र आई तो समझे खरीदी गई होंगी आधे घंटे का तमाशा दिखावा करने को सरकारी खज़ाने से बाद में अगले साल फिर नई लेंगे इन को क्या किया किस को हिसाब देना है। दो दिन पहले तथाकथित मैराथन दौड़ हो रही थी कोई कह रहा था उस कंपनी का बैनर क्यों नहीं है बेशर्मी खुलेआम थी सरकारी लोग अधिकारी क्या किसी निजि कंपनी के कारोबार को बढ़ावा देने को ये करते हैं मगर सत्ताधारी लोग साथ हैं तो सब जायज़ है। कल रिहसल थी उसका आयोजन किया गया आज योग दिवस का सब सरकारी साधनों से दुरूपयोग की बात है। और ये साल के 52 सप्ताह में होता सैंकड़ों बार किसी न किसी नाम से है। मतलब समझें तो इतने दिन सरकारी अमला इस काम में लगा रहता है उस से पहले एक दो दिन तैयारी करते हैं। सरकार के पास जैसे करने को कोई काम बचा नहीं है 100 दिन इस तरह और सप्ताह की दो छुट्टियां और कितने दिन सैर सपाटे को भी शामिल कर लो तो बाकी कितने दिन हैं काम करना भी चाहो अगर।  सरकार कोई भी हो तौर तरीका वही रहता है करना नहीं करना कर रहे हैं इसका दिखावा करते रहना। अपने टीवी चैनल पर भाग्य बताने वालों को देखा है बारह राशियों का भाग्य क्या संभव है समान राशि वाले सभी का समान अच्छा खराब समय , मगर कौन सवाल करता है अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। कुछ ऐसे ही सरकारी अधिकारी आपके भाग्य बदलने की बात कहते हैं हम पर भरोसा रखो।

इस सप्ताह अभी रविवार को इक आयोजन और होना है राहगीरी नाम से हरियाणा पुलिस विभाग  गीत संगीत की मनोरंजन की महफ़िल सजाते है दो घंटे की। न तो इस से कोई जन संपर्क की बात होती है न कोई वास्तविक कार्य पुलिस विभाग का लगता है होता है। बस उनको करना है करते हैं कोई सवाल जवाब नहीं कर सकता कि इसका औचित्य क्या है हासिल क्या हुआ या हो सकता है। कुछ कर रहे हैं भले बेमतलब ही किया जाए आपको दिखाई देता है सरकार आये हैं। सलाम कीजिए आली जनाब आये हैं। देश भर में ऐसे निर्रथक अनावश्यक और बेमतलब के आयोजन कितने होते हैं जिन पर कितना पैसा खर्च किया जाता है जब देश की वास्तविक समस्याओं पर खर्च करने की कमी बताई जाती है। अधिकांश किसी नेता या अधिकारी की खुद की पसंद की बात को लेकर ये होता है। उनका शौक है जनाब आप कौन होते हैं मगर देश का राज्य का खज़ाना यूं लुटता रहे इसे खामोश होकर देखना भी अनुचित का साथ देना है।

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