Sunday, 2 June 2019

मोदी जी इतना बता दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      मोदी जी इतना बता दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   सीधा सा सवाल है कोई टेड़ी मेड़ी बात नहीं है। हम भी चाहते हैं देशभक्त देश सेवक बनकर दिखाना। बस इतना नहीं जानते बिना राजनीति की ताकत हासिल किये कैसे करें क्या करें। आप इतना सच सच बताओ कि किसी दिन अगर कभी आपके पास शासन की बागडोर नहीं हो कोई राजनीति की ताकत नहीं हो कोई शान शौकत नहीं हो राजा जैसा शाही रहन सहन और रुतबा नहीं हो बस इक सामन्य नागरिक बन जाओ तो क्या करोगे आप वास्तव में।  ये मत कहना झोला उठाकर चल दूंगा उसको पलायन करना कहते हैं। देश के सभी लोग अपने देश से प्यार करते हैं बिना कोई स्वार्थ भी देश से दिल से मुहब्बत करते हैं। देश का हर नागरिक जो भी काम करता हो किसान मज़दूर अपना कोई धंधा नौकरी या फिर काम की तलाश में रोज़गार ढूंढते लोग भी किसी न किसी तरह देश के भविष्य में योगदान देते हैं। कोई महान कार्य करने का तमगा लगाकर नहीं फिरते हैं। क्यों आप लोग राजनेता और बड़े बड़े सरकारी पदों पर आसीन लोग ही चाहते हैं देश और जनता की सेवा करनी है तो सत्ता और अधिकार ज़रूरी हैं। देशभक्त होने का दिखावा नहीं बनकर दिखाना अच्छा है और उसके लिए सत्ता मिली हो तब भी देश की वास्तविकता और बदहाली की चिंता होने पर खुद के लिए सभी कुछ विलासिता पूर्ण की जगह उतना ही हासिल किया जाना चाहिए जो ज़रूरी हो। जो सच्चे जनता के हितचिंतक होते हैं सादगी से रहना चाहते हैं शानदार रईस की तरह रहकर आम लोगों की गरीबी भूख की बात नहीं समझी जा सकती है। ये संविधान का उपहास है सत्ताधारी अपनी मर्ज़ी से नियम बनाकर देश के धन को खज़ाने को खुद पर खर्च करें बेशक ये कानूनी होगा मगर है लूट ही। कोई सीमा निर्धारित की जानी चाहिए देश के हर आम नागरिक की आमदनी और शासन संभालने वाले नेताओं अधिकारियों को मिलने वाली राशि वेतन सुविधा साहूलियात में कितने गुणा अंतर रखा जाये।

           ये कोई सरकार कभी किसी को नहीं बताती है कि देश के आम नागरिक की औसत आमदनी कितनी है और नौकरशाहों को सत्ताधारी लोगों को मिलने वाला वेतन का औसत कितना है। विकसित देशों में ये अंतर दो से पांच गुणा अधिक होता है तो हमारे विकासशील देश में जहां तीस फीसदी जनता गरीब है ये अंतर और कम होना चाहिए क्योंकि शासक को तभी समझ आएगा कितना आवश्यक है रोज़मर्रा जीने की ज़रूरत को। लेकिन आप लोग कभी नहीं बताओगे कि जब आम जनता को दिन की आमदनी सौ पचास होना भी लगता है दो वक़्त रोटी खाने को बहुत है तब आपका एक समय का खाना हज़ारों से लाखों तक होता है और आम नागरिक की आमदनी और नेताओं को मिलने वाली राशि अधिकारी कर्मचारी को मिलने वाले वेतन में अंतर ज़मीन आसमान से बढ़कर है। कई लाख गुणा किसी एक सत्ताधारी का एक दिन का खर्च और किसी के निवास का रखरखाव का बेतहाशा ख़र्च लोकतंत्र तो नहीं है। ये व्यवस्था न्यायकारी नहीं समझी जा सकती है।

     इस बार सबसे बड़ी चिंता का विषय है संसद में बढ़ती अपराधियों की गिनती। जिस संसद में 43 -44 फीसदी लोग आपराधिक मामलों के अभ्युक्त हों और जब देश में पैसे वाले और सत्ता वाले न्याय को खरीद कर छीन कर हासिल करते हों जिसकी पुलिस हर दिन अत्याचारी ढंग से आचरण करती मिलती हो उस में संसद बन जाने के बाद किसी का अपराध साबित किया जाना कितना संभव हो सकता है। सर्वोच्च न्यायलय चुनाव आयोग की कितनी कोशिशों से 2004 में संसद में अपराधी सांसद 12 फीसदी हुआ करते थे 2009 में बढ़ते हुए 24  होने 2014 में 32 फीसदी तक और इस बार 2019 में 44 फीसदी हो गई है। सत्ताधारी दल के आधे से अधिक सांसद करीब 55 फीसदी इसी कतार में आते हैं। ऐसे ही जारी रहा तो अगली संसद में बहुमत आपरधिक इतिहास वालों का हो सकता है मगर हम कहते हैं देश महान बन रहा है विश्वगुरु होने को है गर्व करने की बात है। शायद हमने वास्तविक ज़िंदगी को फ़िल्मी कहानी या किसी नाटक जैसा समझने की भूल की है। फिल्मकारों को पिछले चालीस साल से खलनायकी को समाज में मान्यता दिलाने और गुंडई को स्वीकार करवाने का दोषी ठहराया जा सकता है। उनको सफलता और कमाई से मतलब है समाज को रसातल में धकेलने से भी संकोच नहीं है। देश की फ़िल्मी अभिनय वाले नायक नहीं देश को उचित दिशा दिखाने और मार्गदर्शन देने वाले जन नायकों की ज़रूरत थी न कि ऐसे बाहुबली अपराध के आरोपी लोगों को चुनने की। ये भटकना राह भूलना नहीं है विपरीत दिशा को चलते जाना है।

     जो लोग अगर जेल में बंद नहीं तो समाज से बाहर किनारे पर होने चाहिएं जब उनको माननीय कहना शुरू किया तो अंजाम अच्छा नहीं हो सकता है। भूख गरीबी बेरोज़गारी की समस्या से गंभीर है ये कि ऐसे लोग सत्ता की बागडोर संभालेंगे जिनको नैतिकता और शराफत जैसे शब्दों से कोई नाता ही नहीं हो। जो महिला आरक्षण को चिंतित हैं 33 फीसदी होने पर क्या पहाड़ टूटेगा उनको आधी संख्या अपराधियों की कोई गंभीर सवाल नहीं लगती है। हौंसले की ज़रूरत है ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने को कानून बनाना देशहित और देशभक्ति का निर्णय होगा। दोषी हैं जब तक दोषमुक्त नहीं होते क्या देश सेवा करना चाहते हैं जनता की सेवा ही करनी है तो विधायक सांसद बने बगैर भी की जा सकती है। सत्ता का पद कुर्सी पाना ज़रूरी नहीं है वास्तविक देश और जनता की भलाई या जनकल्याण का काम करने को।

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