कैसे हैं शासक कैसा है लोकतंत्र ( बोध - कथा ) डॉ लोक सेतिया
किसी युग में जिज्ञासु लोग ज्ञान की तलाश में पहाड़ों पर किसी वीरान जगह समाधि लगाकर चिंतन मनन किया करते थे और उनको आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हुआ करती थी । आधुनिक काल बदलते बदलते ज्ञान की तलाश को छोड़ कर अज्ञानता मूर्खता छल कपट लोभ लालच और अपने स्वार्थ में अंधा होने की कला सीख जाते हैं कुछ लोग और खुद को उंचाईयों पर देखना चाहते हैं । शासक बनने की कोई शिक्षा किसी गुरु जी के आश्रम में नहीं मिलती है , हर कोई अवसर की तलाश करता रहता है साधरण नागरिक से शासक बनकर अपने समाज को अपनी मर्ज़ी से बर्बादी की तरफ धकेलने की । बस जैसे ही कोई शासक बनता है कुछ अवगुण उसको अपने आप मिलते जाते हैं , तब किसी साधरण इंसान को इंसान नहीं समझता ऐसा शासक ।बेरहम और अहंकारी बन कर मनमानी करता है नियम कानून अच्छाई बुराई की परवाह छोड़ अपने चाबुक से उन सभी को घायल करता है जो भी विवश होकर उसके पर न्याय की उम्मीद लिए आते हैं । मंत्री से लेकर सभी विभागों के अधिकारी कर्मचारी तक जनता को अपना गुलाम समझते हैं जिन पर मनमाने ढंग से अपने नियम कायदे लागू कर जितना बस चलता है ज़ुल्म करते हैं ताकि राहत पाने की कीमत उनसे वसूल कर खुद धनवान और साधनसंपन्न बन सकें ।
सरकार और राजनेता खुद कभी किसी नियम कानून पर नहीं चलते हैं बस किसी तरह शासन की बागडोर मिलते ही शराफत इंसानियत से नाता तोड़कर सिर्फ मतलबी बनकर राजसत्ता का यपयोग करते हैं । कोई भी संविधान की उठाई शपथ से लेकर ईमानदारी और कर्तव्य निभाने की चिंता नहीं करता है । जनता पर ज़ुल्म ढाते रहते हैं लेकिन आप ज़ालिम हैं सुनना नहीं चाहते जो भी वास्तविकता बताता है उसको सूली पर चढ़ाना जानते हैं न्याय व्यवस्था को अपने हाथ का खिलौना मानते हैं । लेकिन कोई कितना भी झूठा प्रचार करता रहे कुछ सच लिखने वाले उनकी वास्तविकता को किसी तरह कभी उजागर करते रहते हैं हंस हंस कर ज़ुल्म सहते हैं लेकिन ज़ालिम हैं आप उनको कहते हैं । आपके विज्ञापन आपने नाम शोहरत पाने के सभी खोखले तौर तरीके किसी दिन ढह जाते हैं जैसे आजकल सभी कुछ कभी भी ढहता दिखाई देता है । हर ढहता पुल गिरती इमारत आपकी अपराधकथा कहता है । आपको इक लोककथा , बोधिकथा , नीतिकथा जैसी इक कहानी सुनाते हैं सबक समझ आएगा कौन क्या हैं क्या कहलाते हैं ।
शासक राजा को अन्याय क्या , समझाने का सबक
इक राजा का राजकुमार गुरु के पास शिक्षा पाने गया हुआ था , शिक्षा पूरी होने के समय खुद राजा गया गुरु के आश्रम में राजकुमार को ले जाने को । पूछा गुरु जी शिक्षा पूरी हो गई है तो राजकुमार को ले जा सकते हैं । गुरु जी ने कहा आप गुरुकुल के बाहर इंतज़ार करें अभी शिक्षा पूरी कर भेजता हूं । राजकुमार को गुरु जी ने बुलाया और कहा आपके पिता आपको राजमहल ले जाने आये हैं और अब आप जा सकते हैं । राजकुमार झुका गुरु जी को प्रणाम किया और तभी गुरु जी ने अपने पास रखी छड़ी लेकर राजकुमार की पीठ पर मार दी । राजकुमार दर्द से भीतर तक कंपकपा गया । मगर गुरु जी को कुछ कह नहीं सकता था यही सीखा था नियम था । राजकुमार को सज़ा मिली कोई नहीं जनता था , उसने पिता राजा को भी नहीं बताया । किस बात की सज़ा मिली सोचता रहा ।
सालों बाद जब राजकुमार राजा बन गया तब उसने गुरु जी को सादर आमंत्रित किया दरबार में असीस देने को । जब गुरु जी आये तो प्रणाम करने के बाद कहा गुरु जी इक सवाल आपसे पूछना है अगर अनुमति दें तो । गुरु जी बोले ज़रूर पूछो । राजा बन चुका राजकुमार बोला आपने आखिरी दिन मुझे पीठ पर छड़ी से मारा था , मैं नहीं जनता मेरा क्या कसूर रहा होगा । गुरु जी बोले राजन वो कोई सज़ा नहीं थी न ही तुमने कोई अपराध ही किया था । वो आखिरी सबक था , मुझे पता था आपने आगे चलकर इक दिन पिता की जगह राजा बनना है । आपने सभी को अपराधों की सज़ा भी देनी होगी , मगर निर्णय करते समय आपको याद रहेगा कि किसी बेगुनाह को सज़ा मिल जाए तो वो कभी नहीं भूलता है । इसलिए आपको कभी किसी को भी गलती से ऐसे दंड नहीं देना है । न्याय करने वाले को इसका आभास होना ज़रूरी है कि किसी को अकारण दंडित नहीं किया जाये । आधुनक युग के शासक प्रशासक नेता अधिकारी समझते हैं उनके सभी अनुचित कार्यों को कोई नहीं जानता कोई उनको गलत नहीं समझता जबकि खामोश ज़ुल्म सहने वाले लोग उनके आपराधिक आचरण को भूलते नहीं हैं बेबस है तो ऊपरवाले से मानते हैं उनका हिसाब कभी लेगा अगर कोई ईश्वर कहीं है तो ऐसे पापियों को सज़ा अवश्य मिलेगी । आपकी व्यवस्था से अलग इक व्यवस्था है जिस में कोई पक्षपात नहीं होता है । अंत में इक ग़ज़ल न्याय को लेकर सच्ची है जो नहीं कहा सब कहती है ।
फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
फैसले तब सही नहीं होतेबेखता जब बरी नहीं होते ।
जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।
गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।
क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।
हमको कोई नहीं है ग़म इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।
जो न इंसाफ दे सकें हमको
पंच वो पंच ही नहीं होते ।
सोचना जब कभी लिखो ' तनहा '
फैसले आखिरी नहीं होते ।

3 टिप्पणियां:
आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - मृणाल सेन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।
पते की बात कही है .
बढ़िया आलेख लालची शासकों पर👌👍
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