Sunday, 6 November 2016

ज़मीर ज़िन्दा रखना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

मुझे प्रशासन को जनहित के पत्र लिखते चालीस साल बीत गये हैं। अनुभव अच्छे भी रहे और बुरे भी। मैं कभी इस बात से घबराया नहीं कि जब भी सच बोलता हूं कुछ लोगों को मेरी आदत खराब लगती है खासकर उनको जिनकी असलियत सामने आती है। हैरानी इस बात की होती है कि जो भ्रष्टाचार करते हैं या कोई गैर कानूनी काम करते हैं उनको अपना अनुचित कार्य गलत नहीं लगता बल्कि जो उनको अनुचित काम नहीं करने दे वही गलत लगता है। और बहुत बार काफी लोग उनकी तरफदारी भी करते हैं , क्योंकि ऐसे लोग मान चुके होते हैं कि हमारे देश समाज में सभी कुछ जायज़ है। गंदगी फैलाना औरों के घर के सामने उनको अपना अधिकार लगता है। नेता और अधिकारी भी कभी कभी गैर कानूनी काम करने वालों को बचाते हैं निजि कारणों से। ऐसा भी होता है कोई किसी अख़बार वाले से शिकायत करता है सच छापने पर। जब कोई अपनी गलती मानने की जगह गलती बताने वाले को गलत कहने लगे तब उस से कुछ भी कहना बेकार है। इक बात साफ़ करता हूं कि समाज को वास्तविकता दिखाना हर लेखक का फ़र्ज़ है , भले ऐसा करने से कुछ बदले या नहीं। कोई अधिकारी अपना काम करना चाहे या नहीं चाहे ये उसका अपना विवेक है। मुझे समाजहित का कार्य करना है भले लोग नाराज़ हों या खुश हों। मुझे वो लोग अच्छे नहीं लगते जो मेरे सामने बढ़ाई करते हैं और औरों के पास जाकर बुराई किया करते हैं। इतना चाहता हूं कि अगर आपको देश और समाज की भलाई चाहिए तो कम से कम समाजहित का काम करने वालों को हतोत्साहित नहीं करें अगर सहयोग नहीं करना चाहते हो। अच्छे बुरे कर्म के फल की बात नहीं भी की जाये तब भी इक बात अवश्य याद रखना , आपकी अंतरात्मा जानती है आप अपना कर्तव्य निभाते हैं देश और समाज के प्रति अथवा नहीं। इसलिए आप मेरे लिए नहीं खुद अपने ज़मीर के लिए सही व्यक्ति का साथ दें और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाएं।

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १५०० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है - १५०० वीं ब्लॉग-बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी said...

जरूरी है ।