Saturday, 26 November 2016

आधा-आधा , फिफ्टी-फिफ्टी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        सिक्के के दो पहलू होते हैं , हर बात के दो पक्ष होते हैं। लोकतंत्र का खेल तमाशा भी सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से चलता है। कुछ कुछ याद आता है बचपन में खेलते थे चोर-सिपाही आधा-आधा। काला धन भी पूरा ही काला नहीं होता , उसको भी सफेद किया जा सकता है। अभी जब नोट बंद हुए हज़ार और पांच सौ वाले तो खबर पता चली दस बीस प्रतिशत कम देकर नोट बदल देने की। तब सरकार ने चेतावनी भी दी कि ऐसा करते पकड़े गये तो दंड मिलेगा। कानून की यही बात बहुत अच्छी है पकड़े जाओ तभी अपराधी नहीं पकड़ में आओ तो सभ्य नागरिक। पकड़े भी गये तब भी खुद को निर्दोष साबित करने को एक नहीं अनगिनत अवसर मिलते हैं। रंगे हाथ पकड़े गये और जुर्म कबूल भी कर लिया तब भी अदालत में कसम खाकर मुकरने की इजाज़त है। आर्थिक अपराध यूं भी चोरी नहीं कहलाते , समझौता कर लो या जुर्माना भर दो मामला निपट जाता है।  जब प्रधानमंत्री जी ने अचानक नोट बंदी की बात की और भाषण दिये हर दिन ये कहते हुए कि जो लोग सालों से लूट रहे थे अब उनकी खैर नहीं , उनको घोषित करने का अवसर पहले ही दिया जा चुका है। अब फिर बात होने लगी है काला धन घोषित करो और पचास प्रतिशत जुर्माना भर बाकी पचास प्रतिशत सफेद करा लो। क्या बात है चोर-सिपाही आधा-आधा। अब समझ लो ये काला धन कभी खत्म नहीं होगा , जब मर्ज़ी रंग बदलता रहेगा। आज काला है जो वही कल सफेद ही नहीं अल्ट्रा-वाइट होगा। लो जी भ्र्ष्टाचार जी आपका डर खत्म चिंता खलास। कबीरा तू क्यों भयो उदास।
                                                    बस सारी बातें चंद दिनों की थीं , महीना भी नहीं बीता और देश वापस वहीं जहां था। मगर सरकार यू-टर्न नहीं लेगी इस को लिख कर रखा हो तो मिटा देना। असल में सत्ता इक गोलचक्र में घूमती है उसको वापस आने को यू-टर्न लेने की ज़रूरत नहीं होती। आपने दिल्ली में इंडिया गेट देखा होगा , इक बड़ा घेरा है चौगिर्दा लोग घूम कर आनंद लेते नज़ारा देखते। अब वहां से रास्ता हर तरफ जाता है , पत्थर की हवेली से तिनकों के नशेमन तक , इस मोड़ से जाते है कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज़ कदम राहें। सही याद आया आपको ये आंधी फिल्म का गीत है। राजनीति आज भी वही है जनता को भावनाओं से बहला शासन पाना। खिलाड़ी बदलते रहे खेल नहीं बदला , किसी ने तब खेल दिखाया कोई आज दिखा रहा है।
                 लो जी अभी तो पार्टी शुरू हुई है , सब खुश इधर वाले भी उधर वाले भी। जनता तू भरोसा रख काला धन आया है तो अच्छे दिन भी लाया ही होगा। देखना तेरी गरीबी कैसे मिटती है , दुख भरे दिन बीते रे भईया अब सुख आयो रे। डरता काहे को है जो भी धन किसी ने डाला तेरे खाते में आधा तेरा आधा सरकार का। सीधा सा हिसाब है कोई बनिया का बही खाता नहीं जो गिनती में चूक हो जाये। जन धन खाते इसी सोच से खुलवाये थे समझे आप , बेचारे जिन्होंने अपने खाते में औरों को काला धन नहीं डालने दिया फिर गरीब के गरीब ही रहे बदकिस्मत लोग। अभी भी दिन बाकी हैं अगर साहस हो कुछ करने का , क्योंकि गलत काम बिना साहस नहीं किया जा सकता। डरपोक कभी अमीर बन ही नहीं सकते। सुबह देश के सब से बड़े न्यायधीश कह रहे थे अदालतों में न्यायधीश के पद रिक्त हैं न्याय का क्या हो। जब भृष्ट लोगों का काला धन काली कमाई का आधा लेकर ठीक करना हो तब क्या ज़रूरत न्यायपालिका की भी। देखो हिस्सा मिला और इंसाफ हुआ उनका , ये कोई मुगलेआज़म फिल्म का फ़िल्मी तराज़ू नहीं जो झुकता दिखाई देगा। कहते थे विदेश तक में नाम रौशन होगा देश ईमान की राह चल पड़ा है , क्या नाम दिया था जंग है अपराध आतंकवाद नशे का कारोबार और रिश्वत तथा लूट के खिलाफ। कसमें वादे बातें नारे सब खोखले साबित होंगे क्या पूछना उन से शायद बता सकें , छल फरेब धोखा कोई शब्द बचा ही नहीं कहने को लगता है। चलो थोड़ा हंस लिया कुछ दिन अब थोड़ा रो लो दोबारा अपनी हालत पर। हंसना-रोना फिफ्टी-फिफ्टी , आधा-आधा फिफ्टी-फिफ्टी।

1 comment:

Jyoti Dehliwal said...

आज के हालात पर बहुत ही सटीक व्यंग किया है आपने! पचास प्रतिशत जुर्माना भरने से काला धन सफेद कैसे हो सकता है? बहुत ही विचारणीय सवाल है ये।