Thursday, 10 November 2016

श्रद्धासुमन पांच सौ और हज़ार के नोटों को ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      आपने किसी को फांसी की सज़ा मिलते नहीं देखा होगा। फिल्मों में दिखाया जाता है फांसी की सज़ा सुनाने के बाद न्यायधीश पेन की निब को तोड़ देते हैं। ऐसा करने का सीधा सा मतलब यही है कि भले गुनाहगार कितना भी बुरा हो उसकी मौत का मातम मनाया जाना चाहिये। बेशक पांच सौ के नोट और हज़ार वाले नोट काला धन जमा करने के कितना भी काम आते रहे हों , उनकी हमेशा को विदाई पर थोड़ी संवेदना तो प्रकट की ही जानी चाहिये। मोदी जी ने जिस कलम से ये निर्णय लिखा उसको तोड़ा तो अवश्य गया होगा। कुछ नेता अभी उनका मातम मना रहे हैं मगर अपने दुःख को जनता की परेशानी बताकर। उन नेताओं के साथ सहानुभूति रखने में बुराई नहीं है , आखिर उनकी जीवन भर की कमाई दौलत राख होने को है। अब नेताओं की कमाई को सफेदी लगानी पड़े तो राजनीति हो चुकी। नेता और सरकारी अमला काला धन उसी को मानता है जो उनको छोड़ औरों के पास है। लोकतंत्र का यही अर्थ उनको समझ आता रहा है कि सत्ता वालों को सब कुछ करने की अनुमति है और उनके सौ खून माफ़ हैं। खैर आज बात उनकी है जो अब नहीं रहे , पांच सौ के नोट और हज़ार के नोट। सभी दो मिंट को मौन धारण करें।
                        शाम आठ बजे बताया गया उनके बस चार घंटे बाकी हैं , रात को बारह बजते ही उनका अंत तय हो चुका है। भगवान भी उसे नहीं बचा सकता जिसे सरकार खत्म करने का आदेश कर दे , इसलिये कहीं कोई प्रार्थना कोई दुआ भी नहीं की जा सकती। चार घंटे पहले ठीक ठाक थे दोनों ही। अर्धरात्रि से उनका सांस लेना भी वर्जित , चल ही नहीं सकते। ये अनहोनी भी अजीब है , समझ ही नहीं आता क्या हुआ , इसको क्या समझा जाये। अब उनके अवशेष ठिकाने लगाने को थोड़े दिन हैं , टुकड़ों में , किश्तों में उनका विसर्जन किया जाना है। हाय कितने अच्छे लगा करते थे दोनों , कितना मनमोहक रूप था उनका। यूं इक साथ कभी कोई प्रेमी युगल भी नहीं मरा होगा। स्वाभाविक मौत नहीं है , ख़ुदकुशी भी नहीं कह सकते , कोई दुर्घटना भी नहीं , कत्ल हुआ हो ऐसा भी सबूत नहीं है। फिर भी इतना साफ है वो नहीं रहे। अफसोस इस बात का है कि जिनको उनसे अपनी जान से अधिक प्यार था  , वो काला धन वाले उनकी मौत का मातम भी नहीं मना सकते। कोई कब्र खोद उनको दफ़्न भी नहीं कर सकते ताकि बाद में वहां जाकर आंसू बहा सकें , दो फूल चढ़ा सकें , मोमबत्ती जला सकें। भीतर ही भीतर रोना पड़ेगा उनको इनकी जुदाई में , जान अटकी हुई है कितनों की इन्हीं नोटों के बंडलों में।
                              कोई प्रवचन दे रहा है , खुद को ज्ञानी कह कर , जो खुद पर अधिक अभिमान करते हैं , सोचते हैं बिना उनके दुनिया का कोई काम नहीं चल सकता उनका यही अंत होता ही है। किसी को अहंकार नहीं होना चाहिये कि वही खुदा है , जो कहते थे पैसा खुदा से कम नहीं उनका आज नाम भी कोई याद नहीं करता। याद आया वो भी इक नेता ही थे। इन नोटों की आयु भी अधिक नहीं थी , जो इन से कम कीमत के हैं वो बहुत पहले से हैं , आज उनकी कद्र मालूम पड़ी सभी को , जब उन्हीं की ज़रूरत हुई। कल तलक बैंक वाले भी इन्हीं को संभाल कर गिनते थे बार बार , सौ पचास की औकात ही नहीं समझी जाती थी। छोटे भी बेकार नहीं होते अब समझे लोग , जनता की भी कद्र किसी दिन ऐसे ही समझ आएगी। लोग नाहक चिंता कर रहे हैं उनके बिना कैसे गुज़ारा होगा , आज तक किसी के नहीं रहने से कोई काम रुका है भला। अमर कोई नहीं है , सभी का अंत अवश्य होता है , देखना अभी इनकी जगह दूसरे आयेंगे जो सभी को और भी मोहक लगेंगे। फिर भी देखना उनको भी लगेगा उनका अंत कभी नहीं हो सकता।
            आशा है ये इक अच्छा कदम साबित होगा और भविष्य में कालिख किसी चेहरे पर नहीं होगी। मगर इक निवेदन ज़रूरी है भारतीय रिज़र्व बैंक से कि किसी दिन ऐसे तमाम नोटों की याद में इक शोक सभा आयोजित की जाये जो मृत घोषित किये जाते रहे या अभी किये गये हैं। उनका योगदान रहा है सरकार का कर एकत्र करने से हर योजना चलाने की खातिर , कल तक आप भी इन्हीं की पूजा किया करते थे। भले थे या बुरे थे काम सभी के आते तो थे , दो शब्द संवेदना के कहना तो बनता है। अभी भी मुद्रा परिवार ही आपके हर काम में योगदान देता ही है , बजट बनाना हो या खर्च करना , इनकी ज़रूरत होगी , रुपया रुपया है कीमत जो भी हो। माना उनका उपयोग काला धन जमा करने और तमाम अपराधों को अंजाम देने में किया जाता रहा , मगर दोषी कौन था , वो नोट या हम लोग और खुद सरकार जो आंखें बंद कर ये सब होने देती रही। इक रिवायत है किसी के चले जाने के बाद उसकी निंदा या बुराई नहीं की जाती है , श्रद्धांजलि सभा कर उसके गुणों का बखान किया जाता है , और दुआ मांगी जाती है।
 

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                                              समाप्त
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      टीवी पर बहस में बाबा रामदेव बता रहे थे कि अब गरीबों के खातों में धन जमा होगा , कैसे , वो कह रहे थे अमीर अपना धन गरीबों के खातों में डाल देंगे। यकीनन खुद रामदेव ऐसा नहीं करने वाले , ये उनका जनता के साथ भद्दा मज़ाक ही था।  मगर जनता जानती है काला धन अपने बैंक खाते में डलवाना अर्थात किसी की आफत अपने सर मोल लेना है। भाई इन बाबा जी से बचना।  
         

4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "'बंगाल के निर्माता' - सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

savan kumar said...

सही कहीँ आपने ........ कोई किसी की आफ़त सर नहीं लेता

http://savanxxx.blogspot.in

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही said...

सुन्दर प्रस्तुति।

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बढ़िया