Wednesday, 27 February 2013

ग़ज़ल 1 7 9 ( लोग कितना मचाये हुए शोर हैं )

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ,
एक बस हम खरे और सब चोर हैं !
साथ दुनिया के चलते नहीं आप क्यों ,
लोग सब उस तरफ ,आप इस ओर हैं !
चल रही है हवा , उड़ रही ज़ुल्फ़ है ,
लो घटा छा गई ,नाचते मोर हैं !
हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे ,
मिल गई कुर्सियां और मुंहजोर हैं !
क्या हुआ है नहीं कुछ बताते हमें  ,
नम हुए किसलिए आंख के कोर हैं !
सब ये इलज़ाम हम पर लगाने लगे ,
दिल चुराया किसी का है ,चितचोर हैं !
टूट जाये अगर फिर न "तनहा" जुड़े ,
यूं नहीं खींचते प्यार की डोर हैं ! 

Monday, 25 February 2013

ग़ज़ल 1 7 8 ( जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना )

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ,
नहीं भूल जाना ये वादा निभाना !
लगे प्यार करने यकीनन किसी को ,
कहां उनको आता था आंसू बहाना !
तुम्हें राज़ की बात कहने लगे हैं ,
कहीं सुन न ले आज ज़ालिम ज़माना !
बनाकर नई राह चलते रहे हैं ,
नहीं आबशारों का कोई ठिकाना !
हमें देखना गांव अपना वही था ,
यहां सब नया है, नहीं कुछ पुराना !
उन्हें घर बुलाते, थी हसरत हमारी ,
कसम दे गये, अब हमें मत बुलाना !
मिले ज़िंदगी गर किसी रोज़ "तनहा" ,
मनाकर के लाना , हमें भी मिलाना !

Saturday, 23 February 2013

ग़ज़ल 1 7 7 ( नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है )

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है , 
रौशनी समझे जिसे सब ,तीरगी है !
सांस लेना तक हुआ मुश्किल यहां पर,
इस तरह जीना भी कोई ज़िंदगी है !
सब कहीं आते नज़र हमको वही हैं ,
आग उनके इश्क की ऐसी लगी है !
कह दिया कैसे नहीं कोई किसी का ,
तोड़ दिल देती तुम्हारी दिल्लगी है !
पौंछते हैं हाथ से आंसू किसी के  ,
और हो जाती हमारी  बंदगी है  !
सब हसीनों की अदाओं पर हैं मरते , 
भा गई मुझको तुम्हारी सादगी है !
मयकदा सारा हमें "तनहा" पिला दो ,
आज फिर से प्यास पीने की जगी है !

Wednesday, 20 February 2013

ग़ज़ल 1 7 6 ( हो गया क्यों किसी को प्यार है )

हो गया क्यों किसी को प्यार है ,
बस इसी बात पर तकरार है !
कौन आकर हमारे ख़्वाब में ,
खुद बुलाता हमें उस पार है !
कुछ खबर तक नहीं हमको हुई ,
जुड़ गया दिल से दिल का तार है !
धर्म के नाम पर दंगे हुए ,
जल गया आग में गुलज़ार है !
रोग जाने उसे क्या हो गया ,
चारागर लग रहा बीमार है !
हर कदम डगमगा कर रख रही ,
चल रही इस तरह सरकार है !
शर्त रख दी थी "तनहा" प्यार में ,
कर दिया इसलिये इनकार है !

ग़ज़ल 1 7 5 ( ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना )

ज़रा सोचना ,सोचकर फिर बताना ,
हुआ है किसी का ,कभी भी ज़माना !
इसी को तो कहते सभी लोग फैशन ,
यही कल नया था ,हुआ अब पुराना !
उसी को पता है ,किया इश्क़ जिसने ,
कि होता है कैसा ये मौसम सुहाना !
मेरी कब्र इक दिन बनेगी वहीं पर ,
मुझे घर जहां पर कभी था बनाना !
सभी दोस्त आए बचाने हमें थे ,
लगाते रहे पर हमीं पर निशाना !
उठा दर्द सीने में फिर से वही है ,
वही धुन हमें आज फिर तुम सुनाना !
रहा सोचता रात भर आज "तनहा" ,
है रूठा हुआ कौन ,किसने मनाना !

Sunday, 17 February 2013

बेबस जीवन ( कविता ) 8 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

रातों को अक्सर ,
जाग जाता हूं ,
खिड़की से झांकती ,
रौशनी में ,
तलाश करता हूं ,
अपने अस्तित्व को !
सोचता हूं ,
कब छटेगा ,
मेरे जीवन से अंधकार।
होगी कब ,
मेरे लिये भी सुबह।
उम्र सारी ,
बीत जाती है  ,
देखते हुए  सपने  ,
एक सुनहरे जीवन के।
मैं भी चाहता हूं ,
पल दो पल को  ,
जीना ज़िंदगी को ,
ज़िंदगी की तरह।
कोई कभी करता  ,
मुझ से भी जी भर के प्यार  ,
बन जाता कभी कोई ,
मेरा भी अपना।
चाहता हूं अपने आप पर ,
खुद का अधिकार ,
और कब तक ,
जीना होगा मुझको ,
बन कर हर किसी का ,
सिर्फ कर्ज़दार ,
ज़िंदगी पर क्यों  ,
नहीं है मुझे ऐतबार !!

Saturday, 16 February 2013

ग़ज़ल 1 7 4 ( तीरगी कह गई राज़ की बात है )

तीरगी कह गई राज़ की बात है ,
बेवफ़ा वो नहीं चांदनी रात है !
लब रहे चुप मगर बात होती रही ,
इस तरह भी हुई इक मुलाकात है !
झूठ भाता नहीं ,प्यार सच से हुआ ,
मुझ में शायद छुपा एक सुकरात है !
आज ख़त में उसे लिख दिया बस यही ,
आंसुओं की यहां आज बरसात है !
हर जुमेरात करनी मुलाकात थी ,
आ भी जाओ कि आई जुमेरात है !
भूल जाना नहीं डालियो तुम मुझे ,
कह रहा शाख से टूटता पात है !
तुम मिले क्या मुझे ,मिल गई ज़िंदगी ,
दिल में "तनहा" यही आज जज़्बात है !

Friday, 15 February 2013

दर्द का नाता ( कविता ) 8 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सुन कर कहानी ,
एक अजनबी की ,
अथवा पढ़कर ,
किसी लेखक की ,
कोई कहानी ,
एक काल्पनिक पात्र के दुःख में ,
छलक आते हैं ,
हमारी भी पलकों पर आंसू ।
क्योंकि याद ,
आ जाती है ,
सुनकर हमें ,
अपने जीवन के ,
उन दुखों परेशानियों की ,
जो हम नहीं कह पाये  ,
कभी किसी से ,
न ही किसी ने समझा ,
जिसको बिन बताये ही।
छिपा कर रखते हैं हम ,
अपने जिन ज़ख्मों को ,
उभर आती है इक टीस सी उनकी ,
देख कर दूसरों के ज़ख्मों को।
सुन कर किसी की दास्तां को ,
दर्द की तड़प बना देती है ,
हर किसी को हमारा अपना ,
सबसे करीबी होता है नाता  ,
इंसान से इंसान के दर्द का !!

Tuesday, 12 February 2013

ग़ज़ल 1 7 3 ( कुछ भी कहते नहीं नसीबों को )

कुछ भी कहते नहीं नसीबों को ,
चूम लेते हैं खुद सलीबों को !
तोड़ सब सरहदें ज़माने की ,
दफ़न कर दो कहीं ज़रीबों को !
दर्द औरों के देख रोते हैं ,
लोग समझे कहां अदीबों को !
आज इंसानियत कहां ज़िंदा ,
सब सताते यहां गरीबों को !
इश्क की बात को छुपा लेते ,
क्यों बताते रहे रकीबों को !
लूट कर जो अमीर बन बैठे ,
आज देखा है बदनसीबों को !
क्यों किनारे मिलें उन्हें "तनहा" ,
जो डुबोते रहे हबीबों को !

Friday, 8 February 2013

अपने आप से साक्षास्तकार ( कविता ) 8 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हम क्या हैं ,
कौन हैं ,
कैसे हैं  ,
कभी किसी पल ,
मिलना खुद को।
हमको मिली थी ,
एक विरासत ,
प्रेम चंद ,
टैगोर ,
निराला ,
कबीर ,
और अनगिनत ,
अदीबों ,
शायरों ,
कवियों ,
समाज सुधारकों की।
हमें भी पहुंचाना था ,
उनका वही सन्देश ,
जन जन ,
तक जीवन भर ,
मगर हम सब ,
उलझ कर रह गये  ,
सिर्फ अपने आप तक हमेशा।
मानवता ,
सदभाव ,
जन कल्याण ,
समाज की ,
कुरीतियों का विरोध ,
सब महान ,
आदर्शों को छोड़ कर ,
हम करने लगे ,
आपस में टकराव।
इक दूजे को ,
नीचा दिखाने के लिये  ,
कितना गिरते गये हम ,
और भी छोटे हो गये ,
बड़ा कहलाने की ,
झूठी चाहत में।
खो बैठे बड़प्पन भी अपना ,
अनजाने में कैसे ,
क्या लिखा ,
क्यों लिखा ,
किसलिये लिखा ,
नहीं सोचते अब हम सब ,
कितनी पुस्तकें ,
कितने पुरस्कार ,
कितना नाम ,
कैसी शोहरत ,
भटक गया लेखन हमारा ,
भुला दिया कैसे हमने  ,
मकसद तक अपना।
आईना बनना था  ,
हमको तो ,
सारे ही समाज का  ,
और देख नहीं पाये ,
हम खुद अपना चेहरा तक ,
कब तक अपने आप से ,
चुराते रहेंगे  हम नज़रें ,
करनी होगी हम सब को ,
खुद से इक मुलाकात !!

Sunday, 3 February 2013

सब पराये हैं जिंदगी ( नज़्म ) 8 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

देख आये हैं ज़िंदगी ,
सब पराये हैं ज़िंदगी ।
किसी ने पुकारा नहीं ,
बिन बुलाये हैं ज़िंदगी ।
खिज़ा के मौसम में हम ,
फूल लाये  हैं ज़िंदगी ।
अपने क्या बेगाने तक ,
आज़माये हैं ज़िंदगी ।
दर्द वाले नग्में हमने ,
गुनगुनाये हैं ज़िंदगी  ।।  

आँखें ( नज़्म ) 8 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बादलों सी बरसती  हैं आंखें  ,
बेसबब छलकती हैं आंखें ,
गांव का घर छूट गया जो ,
देखने को तरसती हैं आंखें ,
जुबां से नहीं जब कहा जाता ,
बात तब भी करती हैं आंखें ,
मौसम पहाड़ों का होता जैसे ,
ऐसे कभी बदलती हैं आंखें ,
नज़र के सामने आ जाये जब ,
बिन काजल संवरती हैं आंखें ,
गज़ब ढाती हैं हम पर जब  ,
और भी तब चमकती हैं आंखें !!

Saturday, 2 February 2013

प्यास प्यार की ( कविता ) 8 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कहलाते हैं बागबां भी  ,
होता है सभी कुछ  उनके पास  ,
फिर भी खिल नहीं पाते  ,
बहार के मौसम में भी ,
उनके आंगन के कुछ पौधे !
वे समझ पाते नहीं  ,
अधखिली कलिओं के दर्द को ।
नहीं जान पाते  ,
क्यों मुरझाये से रहते  हैं ,
बहार के मौसम में भी  ,
उनके लगाये पौधे ,
उनके प्यार के बिना !
सभी कहलाते हैं ,
अपने मगर ,
नहीं होता उनको ,
कोई सरोकार ,
हमारी ख़ुशी से ,
हमारी पीड़ा से।
दुनिया में मिल जाते हैं ,
दोस्त बहुत ,
मिलता नहीं वही एक ,
जो बांट सके हमारे दर्द भी ,
और खुशियां भी ,
समझ सके ,
हर परेशानी हमारी  ,
बन कर किरण आशा की  ,
दूर कर सके अंधियारा ,
जीवन से हमारे। 
घबराता है जब भी मन ,
तनहाइयों से ,
सोचते हैं तब ,
काश होता अपना भी कोई !
भागते जा रहे हैं ,
मृगतृष्णा के पीछे हम सभी ,
उन सपनों के लिये ,
जो नहीं हो पाते कभी भी पूरे।
उलझे हैं सब ,
अपनी उलझनों में ,
नहीं फुर्सत किसी को  ,
किसी के लिये भी ,
करना चाहते हैं हम  ,
अपने दिल की किसी से बातें ,
मगर मिलता नहीं कोई  ,
हमें समझने वाला।
सामने आता है ,
हम सब को नज़र  ,
प्यार का एक ,
बहता हुआ दरिया  ,
फिर भी नहीं मिलता  ,
कभी चाहने पर किसी को ,
दो बूंद भी  पानी ,
बस इतनी सी ही है  ,
अपनी तो कहानी !!      ( मेरी दास्तां है , जाने किस किस की कहानी है )

दो आंसू ( कविता ) 8 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हर बार मुझे ,
मिलते हैं ,
दो आंसू ,
छलकने देता नहीं ,
उन्हें पलकों से ,
क्योंकि ,
वही हैं मेरी ,
उम्र भर की ,
वफाओं का सिला !
मेरे चाहने वालों ने ,
दिया है ,
यही ईनाम ,
बार बार मुझको !
मैं जानता हूं ,
मेरे जीवन का ,
मूल्य ,
नहीं है ,
बढ़कर दो आंसुओं से  !
और किसी दिन ,
मुझे मिल जायेगी ,
अपनी ज़िंदगी की कीमत ,
जब इसी तरह कोई ,
पलकों पर संभाल कर ,
रोक  लेगा ,
अपने आंसुओं को ,
बहने नहीं देगा ,
दो आंसू  !!