Tuesday, 9 February 2021

अश्क़ बहाने पर मेरा शोध ( जीवन अनुभव ) डॉ लोक सेतिया

    अश्क़ बहाने पर मेरा शोध ( जीवन अनुभव ) डॉ लोक सेतिया 

  ( कुछ दोस्तों और दुश्मनों की मेहरबानी के आभार सहित फ़िल्मी गीतों ग़ज़लों का आभारी हूं )

ये सार्वजनिक करना उचित है अथवा नहीं कहना कठिन है विशेषकर तब जब मैंने अपनी ग़ज़ल में साफ़ कर दिया था बहुत पहले कि हमने आंसू बहाना छोड़ दिया। ग़ज़ल से शुरुआत करते हैं। 
 
ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया।

अब बहारो खिज़ा से क्या डरना
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया।

जब निभाना हुआ नामुमकिन तब
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया।

हो गये हैं जो कब से बेगाने
उनको अपना बनाना छोड़ दिया।

कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये
हर किसी को बताना छोड़ दिया।

उनको कोई ये जा के बतलाये
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया।

मिल गया अब हमारे दिल को सुकून
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया।

ख्याल आया हमारे दिल में यही
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया।

हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया।  
 
ये ग़ज़ल 2012 में ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश की हुई है। अश्क़ बहाना कोई खराब आदत भी नहीं होती है और मैंने अकेले में सबके सामने भी बहुत बहाये हैं अश्क़ मगर जब आपके आंसुओं की कीमत कोई नहीं समझे तब अनमोल खज़ाने को व्यर्थ गंवाना नहीं चाहिए। ये भूमिका आपको अपने अश्क़ दिखाने को नहीं लिखी ये समझाना चाहता हूं कि मेरा शोध कोई चोरी किया हुआ नहीं है। 

आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई 

 

आपने देखा होगा टीवी शो पर कोई अपनी दर्द भरी कहानी सुनाता है या कभी ऐ मेरे वतन के लोगो ज़रा आंख में भर लो पानी गीत सुनते हैं तब बस पल भर को हम संवेदनशील हो जाते हैं। बाद में कहीं कुछ भी सामने दिखाई देता रहे हमको मतलब नहीं होता। ये अश्क़ वास्तविक होकर भी हमेशा को नहीं रहती भावना वाले दिखाने को बाहरी होते हैं भीतर अंतर्मन में भावनाओं में नहीं बहने की बात होती है। शोध किया तब पता चला कि जब किसी के दुःख को सुनकर देख कर हमको रोना आता है तब हम औरों के लिए नहीं कहीं अपनी किसी दर्द भरी याद के ताज़ा होने पर भावुक होकर सहानुभूति जताते हैं। 

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया। 
कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त ,
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया। 
 

मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े

 

किसी की शोक सभा में किसी की मौत पर संवेदना व्यक्त करने जाने पर अपने आप पर संयम रखना होता है। मुस्कुराहट को छिपाना होता है चेहरे पर उदासी लानी पड़ती है भले आपको कोई एहसास नहीं हो अफ़सोस जतलाने को शब्द ढूंढते हैं। थोड़ा अलग होते ही दुनिया कारोबार जाने क्या क्या ज़रूरी होता है। अभिनय करना सभी जानते हैं कोई शायर कहता है " हर मोड़ पे मिल जाते हैं हमदर्द हज़ारों , लगता है मेरे शहर में अदाकार बहुत हैं। " मगर इक नायिका गाती है आज दिल पर कोई ज़ोर चलता नहीं मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े। मुस्कुराने की तो कोई कीमत नहीं आंसुओं से हुई है हमारी कदर। 
 

टुकड़े हैं मेरे दिल के ए यार तेरे आंसू 

 

महबूबा के आंसू आग बुझाते नहीं और बढ़ जाती है लगी आग। बहने नहीं दूंगा मैं दिलदार तेरे आंसू। तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्यों रोये। हमारा दर्दो ग़म है ये इसे क्यों आप सहते हैं।ये क्यों आंसू हमारे आपकी पलकों से बहते हैं।  न ये आंसू रुके तो देखिये फिर हम भी रो देंगे ,
हम अपने आंसुओं में चांद तारों को डुबो देंगे। फ़ना हो जाएगी सारी ख़ुदाई आप क्यों रोये। मगर समझने की बात और है। ऐ मेरे दिल ए नादां तू ग़म से न घबराना , इक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफ़साना। फ़रियाद से क्या हासिल रोने से नतीजा क्या , बेकार हैं ये बातें इन बातों से होगा क्या। इक ग़ज़ल है जिस में कहा है " घर की तामीर चाहे जैसी हो , उस में रोने की कुछ जगह रखना। 

बड़े लोगों के आंसुओं का समंदर 

 

राजनेताओं फ़िल्मी कलाकारों के आंसू सितम ढाते हैं। उनके आंसू देख कर लोग होश खो देते हैं। हारी बाज़ी जीत जाते हैं आंधी फ़िल्म की तरह तब और अब मामला इतना खतरनाक सीमा तक बढ़ गया है कि आंधी फ़िल्म नहीं बवंडर चक्रवात तूफ़ानी आंधी की पटकथा लिखने को कमलेश्वर जैसा मिलना मुश्किल है। बिग बॉस के घर से निकलने वाले को गले लगाकर आंसू बहाते हैं बाकी औपचारिकता निभाते हैं खुद बच गया खैर मनाते हैं। संसद में नेता आते हैं निर्धारित अवधि बाद चले जाते हैं क्यों इसका शोक मनाते हैं वास्तव में बाकी सदस्य यही सोच कर घबराते हैं उनके दिन भी घटते जाते हैं। ये विदाई के आंसू औपचरिकता भर नहीं हैं सच तो ये है बिना कुर्सी सत्ता उनको लगता है जीवन बेकार है अश्क़ निकल आते हैं। चलो आज इनका वास्तविक सच बताते हैं। पढ़ना इक रचना सुनाते हैं। इक नज़्म हाज़िर है। 
 

बड़े लोग ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी 
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं।  

ग़ालिब से लेकर आज तक लिखने वालों के आंसू 

 

चचा ग़ालिब कह गए रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल , जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। जनाब हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ़्तगू क्या है। ये कमाल की बात है हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है। अब उनको शिकवा है लिखने वाले कविता कहानी लिखा करें देश समाज की वास्तविकता पर खामोश रहना अच्छा है अन्यथा बुद्धीजीवी को परजीवी घोषित किया जा सकता है उन्हीं द्वारा जो खुद परजीवी हैं देश जनता की कमाई पर जीते हैं राजनीति उनका मकसद नहीं कारोबार बन गया है। छाज तो बोले सो बोले छलनी भी बोले जिस में हज़ार छेद। इनको महनत की कमाई से गुज़ारा करना पड़ा तो बेमौत मर जाएंगे शासक अधिकारी सभी। हमारे दोस्त रामनिवास मानव जी के शब्द हैं आंसुओं को लेकर। 
 

बार बार लिख कर थकी , थक कर हुई उदास

कब लिख पाई लेखनी , आंसू का इतिहास। 

हम लिखने वाले अपनी कलम से अश्क़ों की स्याही से लिखा करते हैं। दरबारी लोग सोने चांदी के कलम उपहार में पाते हैं जिन में स्याही की जगह गरीबों का लहू भरा होता है सत्ता वालों की मर्ज़ी का इतिहास लिखने को। आखिर में किसी शायर के दो शेर पेश हैं। 

न मिले ज़ख़्म न निशान मिले , पर परिंदे लहू-लुहान मिले। 

यही संघर्ष है ज़मीं से मेरा , मेरे हिस्से का आसमान मिले।


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