Wednesday, 30 December 2020

अच्छे दिन नहीं अच्छा साल लाएंगे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  अच्छे दिन नहीं अच्छा साल लाएंगे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

सरकार चिंतित नहीं होती चिंतन करती है सत्ताधारी नेताओं शासन करने वालों का कोई दिन खराब नहीं होता है। उनको जो चाहिए जितना चाहिए मांगना नहीं पड़ता खुद हासिल करने का इख़्तियार मिला हुआ है। सोशल मीडिया से जानकारी मिली है जिसको आधुनिक एप्प्स वाली सरकार अनदेखा नहीं कर सकती है। अधिकांश लोग ख़त्म हो रहे साल को जमकर लताड़ लगा रहे हैं बुरा ही नहीं बेहद खराब होने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं। उनको नहीं पता आने वाला अगला साल संख्या बढ़ जाने से कितना शुभ साबित होगा या नहीं होगा लेकिन उनकी निराशा को देखते हुए सत्ताधारी नेता को कुछ बिल्कुल नया और बेमिसाल करने का विचार आया है। उसको फिर साबित करना है कि उनकी हर समस्या का हल उसके पास है और किसी के पास नहीं है। 
 
    ये इक्कीसवीं सदी है दो हज़ार बीस साल गुज़र चुके हैं उस से पिछले सालों  को ईस्वी सदी से पूर्व उल्टी गिनती से बताया जाता है। सोचते सोचते जहांपनाह को ध्यान आया है कि गणित में भारतीय योगदान शून्य की खोज सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन ऐतहासिक किताबों और घटनाओं में शून्य वर्ष को लेकर कहीं कोई बात नहीं मिली है। उनको हमेशा किसी कथा की सीख ध्यान में रही है जिस में उल्टी गिनती की बात से समस्या खुद समाधान बन जाती है। हिंदुत्व सभ्यता पांच हज़ार साल पुरानी है और उनकी मंशा यही है कि आधुनिक युग को छोड़कर वापस उसी वेदों उपनिषदों की कथाओं में वर्णित तौर तरीकों से देश और समाज को चलाया जाए। शून्य शब्द और अंक उनके जीवन में बड़े काम आये हैं उनको यकीन है देश जिस दशा में है उसको शून्यकाल कहना उचित है। संसद में शून्यकाल का अपना दौर रहा है और शून्यकाल का शून्यालाप स्तंभ अख़बारों में छपता रहा है। 
 
कैसे आने वाला साल बढ़िया हो सकता है उनको उपाय सूझ गया है। सालों की गिनती एक और जोड़कर बढ़ाने की जगह घटाने की परंपरा शुरू की जा सकती है और अभी एक संख्या बढ़ाने की बजाय दो हज़ार बीस घटाकर शून्य वर्ष से अपना इतिहास शुरू किया जाना उचित होगा। पिछले हिसाब किताब पर मिट्टी डालकर फिर से नया दिन नई रात जैसी शुरुआत। जिस वर्ष की संख्या इकलौती शून्य हो उस से कोई भयभीत होने की ज़रूरत नहीं होगी वो खुद एक होने को भला बनकर रहेगा। क्या आप अमुक समस्या से परेशान हैं चिंता छोड़िए मिल गया समाधान है। हैरानी की बात नहीं है आपको हर कोई इश्तिहार दिखलाकर या छपवाकर समझा रहा है। साबुन बेचने वाला इम्युनिटी बढ़वा रहा है अंधा है फिर भी आपको सही राह दिखला रहा है। समझदार वही है जो सबको उल्लू बना रहा आदमी आदमी से उकता रहा है। वक़्त वक़्त की बात है कोई इधर से उधर कोई यहां से वहां जा रहा है। बस जल्दी ये साल जा रहा है दफ़्तर में बैठा कोई नक़्शा बना रहा है इतिहास की किताब के पन्नों को फाड़कर पुर्ज़े उड़ा रहा है। दावा है कालिख है सफ़ेद कागज़ पर स्याही से लिखा किसने मिटाने से नहीं मिट सकता जलाने से धुंवां होता है इक इक पन्ने को नदी में बहा रहा है। जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल सुना रहा है , तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे , राजेंदर नाथ रहबर की लिखी ग़ज़ल है।
 
सरकार इसको लेकर पूरी तैयारी कर रही है पिछले तमाम निशानों को मलियामेट किया जा रहा है। इतना ही नहीं बाबा जी जैसे चालाक साहूकारों और जालसाज़ी अभिनय कलाकारी खेल और टीवी सोशल मीडिया वालों से गठजोड़ कर देश की भलाई की कड़वी दवाई का इश्तिहार जारी करवा सबको पिछले समझा जाना पढ़ा लिखा भूलाने का उपचार देश हित में करवाया जाएगा। सब कुछ भूलकर उनकी मर्ज़ी का सबक पढ़वाया रटवाया जाएगा। शून्य होने का महत्व जब सबको समझ आ जाएगा कोई सभी खोकर भी बिल्कुल नहीं घबराएगा। पहले हर कोई शून्य की महिमा जाएगा उसके बाद एक बनकर ख़ुशी से इतराएगा। सरकार आधी रात को भी अध्यादेश जारी कर सकती है ये घोषणा की जा सकती है कि असली विकास वास्तविक आज़ादी और जनकल्याण की वास्तविक शुरुआत इस तरह से शून्य वर्ष की शुरआत से हो सकती है। आपको भरोसा रखना चाहिए क्यों दुनिया का आरम्भ शून्य और अंत भी शून्य ही है क्या लाये थे क्या लेकर जाओगे। पहली जनवरी को शून्य वर्ष का जश्न मनाओगे।  
 
आपको संविधान कानून न्यायालय मौलिक अधिकार चुनाव जैसे किसी झमेले में नहीं जाना है। उनका होना नहीं होना खुद ब खुद हो जाएगा क्योंकि उनका अस्तित्व शून्य समझा जाएगा। राजा राज चलाएगा अपने सलाहकार बनाकर खुद मौज मनाएगा कोई जियेगा कोई मर जाएगा बस उसी को सब मिलेगा जो राजा की आरती गाएगा। संसद विधानसभा आलीशान भवन बनवाएगा सब पुराना ढाकर अपना नाम खुदवाएगा। खेत को बाड़ कौन लगाएगा राजा ये बतलाएगा बाड़ खेत को जब खाएगा कितना मज़ा सरकार को आएगा ये तमाशा उसके मन भाएगा। जो उसने किया सभी से करवाएगा भीख मांगकर हर कोई खाएगा उसकी तरह मौज मनाएगा। जब पास नहीं कुछ रह जाएगा काहे को दिल घबराएगा। तनहा अपनी ग़ज़ल सुनाएगा। 

                 नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई 

                 है अपनी जेब तक ख़ाली कहीं पर घर नहीं कोई।

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