Tuesday, 11 June 2019

सिलसिला हादिसा हो गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   सिलसिला हादिसा हो गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

विषय कई सारे हैं मगर सभी मझधार हैं और हम समझते किनारे हैं। शुरुआत इक बहुत पुरानी अपनी ग़ज़ल से करता हूं। इसी बहाने इधर उधर की इंट रोड़ा ले आता हूं इक इमारत बनानी है बिना नींव की मगर। जी हां लोग यही करामात करते हैं। ग़ज़ल पेश है।

  सिलसिला हादिसा हो गया - लोक सेतिया "तनहा"

सिलसिला हादिसा हो गया ,
झूठ सच से बड़ा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से ,
कद में कितना बड़ा हो गया।

कश्तियां डूबने लग गई ,
नाखुदाओ ये क्या हो गया।

सच था पूछा ,बताया उसे ,
किसलिये फिर खफ़ा हो गया।

साथ रहने की खा कर कसम ,
यार फिर से जुदा हो गया।

राज़ खुलने लगे जब कई ,
ज़ख्म फिर इक नया हो गया।

हाल अपना   , बतायें किसे ,
जो हुआ , बस हुआ , हो गया।

देख हैरान "तनहा" हुआ ,
एक पत्थर खुदा हो गया।

    कल पूछा था या सवाल किया था मुझे झूठ बोलने को कोचिंग देना शुरू करना है जिस किसी को सीखना हो बता सकता है। दो लोग तुरंत तैयार भी हो गए मगर इक लेखक दोस्त ने संदेश भेजा जनाब आपके बस का ये धंधा नहीं है कहां आप सच की बात कहने वाले और कहां झूठ में परांगत होने को बेताब लोग। उनको जवाब देना पड़ा अध्यापक रख कर लोग स्कूल चलाते हैं खुद जो नहीं पढ़ा सबको पढ़ाते हैं। चलो विषय पर वापस आते हैं आपको दिलकश कहानियां सुनाते हैं दिल बहलाते हैं।

      दिल बहलाना हर कारोबार में पहली शर्त है और ज़रूरी है। कुछ साल तक जिसको मानते थे कि ये तो जनकल्याण को सिखाते हैं भला इस से आमदनी की बात भी कैसे सोच सकते हैं। मगर योग को व्यायाम करने को करोड़ों का मुनाफे वाला धंधा बना दिया सब हैरान हैं। हींग लगे न फटकरी और रंग भी चौखा ये कहावत सच होती देख ली सबने। योग सिखला रहे थे आज अभी पार्क में दो लोग , इक महिला इक पुरुष बाकायदा लाऊडस्पीकर से समझा रहे थे चलते चलते हमने भी सुन लिया। जानना चाहोगे क्या कह रही थी महिला। आंखें बंद ध्यान अपने भीतर बाहरी शोर को नहीं सुनना है और ऊपर वाले से प्रार्थना करनी है मुझे निरोग रखना। भजन गाने लगी तालियां बजने लगी और योग को आस्था विश्वास के साथ मनोरंजन का मसाला डालकर दिल को बहलाने का सामान कर दिया। हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन , दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है। धर्म की सभा में जाओ तो नाचना झूमना गाना दिल लगाना सब की छूट है। रविवार को सतसंग के बहाने मिला करते हैं आशिक़ भी , घर वाले नहीं पूछते बेटी किस किस के साथ जाती है। सबको समझ आया जब खुद बाबाजी के किस्से आम हुए , हीर रांझा मुफ्त में बदनाम हुए। शिक्षा धर्म स्वास्थ्य सेवा से लेकर समाज सेवा की संस्था खोलने तक सब में खूब कमाई के अवसर हैं। आपको कोई नौकरी रोज़गार तलाश करने की ज़रूरत नहीं है बस ये हुनर सीखना होगा।

     इक जान पहचान का खड़ा मिला मुझे पार्क में बस बिना वजह ही पूछ बैठा सब उस दल को छोड़ भाग रहे हैं आपका क्या स्टेटस है वहीं है या कहीं और जा पहुंचे हैं। हम कहीं नहीं है बस थक गए हैं मगर चेहरे पर ताज़गी साफ छलक रही थी तो समझ आया अभी मझधार में हैं कोई किनारा नज़र आएगा तो बात बनेगी। बिना पूछे बताने लगे जैसे हमारे गांव का इक बदमाश हुआ करता था जो अपने खेत में काम करवाता था मगर कोई मज़दूरी नहीं देता था रोटी खाओ और दिन रात महनत करो। इक दिल उसको कस्सी से घाव लगा जो बढ़ते बढ़ते नासूर बन गया और उनको अपाहिज बनकर जीना पड़ा। खेती उनके बेटे ने संभाली तो पिता लात घूंसे मरता था मज़दूरी मांगने पर बेटा चार कदम आगे निकला लाठी डंडे से पिटाई करने लगा। आज उनको आध्यात्मिक ज्ञान मिला था ये बता रहे थे अंजाम क्या हुआ इक दिन बिजली की गिरी तार को फोन पर बात करते करते छू लिया और जान चली गई। अपने दल के नेताओं को लेकर बताया यही किया करते हैं और जैसा उनका कहना है इक दिन दल के बड़े नेता को बद्दुआ मिलती है ऐसा कहा भी था। जाने कैसे हौंसला किया होगा और फिर भी सही सलामत उन्हीं के दल के निष्ठावान कार्यकर्ता बनकर रहे।

    बात मुंह से निकली तो पराई हो जाती है , कह कर संभले और बोले हम तो उनके दादा जी के नाम के चाहने वाले हैं तभी उनके साथ रहे मगर बाप दादा को बदनाम किया है उन्होंने नाम मिट्टी में मिला दिया है। यूं ही दिल में इक ख्याल आया तो उनसे कह दिया , ये आप लोग जो दल बदलते हैं उसका तरीका क्या है। कहने लगे अभी तक उन्होंने दल बदला नहीं है मगर बहुत लोग हैं जो कभी किसी कभी किसी दल में शामिल होते रहते हैं। अपने शहर से ही कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसने दल बदला नहीं हो। किसी किसी को दूसरे से ये भी शिकायत रहती है कि जिस दल में जाता हूं आप भी चले आते हैं वहां ही। जाने दल बदलने का कुछ अलग मज़ा होता होगा मैंने विचार किया। क्या मुझे भी दल बदल करने का लुत्फ़ मिल सकता है सवाल किया उनसे। लगा उनको हंसी ठट्ठा कर रहा हूं मगर मेरे चेहरे पर भाव मासूमियत वाले उनको नज़र आये। भोले हैं आप भी जब किसी दल के सदस्य तक नहीं नेता होने की बात नहीं फिर दलबदल कहां से मुमकिन है। मैंने कहा आजकल सुनते हैं सब मुमकिन है। भाई हमें राजनीति से कोई मतलब नहीं है अपने मतलब की बात नहीं है , नॉट माय कप ऑफ़ टी। सोचा लोग घर बदलते हैं सामान साथ ले जाते हैं गांव बदलते हैं नौकरी बदलते हैं तो कितना जंजाल साथ लिए फिरते हैं , जो दल बदलते हैं उस दल से दूसरे दल साथ लेकर जाते क्या हैं। उन्होंने राज़ खोल दिया कहने को यही कहते हैं हमारे साथ वोट हैं जनता है मगर वास्तव में होता नहीं कुछ भी पल्ले में ऐसे ही पल्लू में गांठ लगाई होती है कोई पोटली नहीं होती है। सुदामा की तरह चावल भी नहीं साथ बंधे होते उनके पास। सोचो अगर कुछ वोट जनता का साथ होता तो भटकते फिरते इधर उधर असल में खोखली ढोल की पोल की शोर मचाने जैसी बात है। दलबदल का सिलसिला चलता रहता है और ऐसा भी होता है कि घूम फिर वापस गधी  बोहड़ के पास अर्थात लौट के बुद्धू घर को आये। 
 

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