Monday, 3 June 2019

शपथ खाना सपने बेचने के बाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   शपथ खाना सपने बेचने के बाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                  सपने बेचने का घोटाला ( पहला अध्याय )

   बात टीवी अख़बार के विज्ञापन की है। सरकारी विज्ञापन कहते हैं सब बढ़िया है हर तरफ स्वच्छ भारत है बच्चे स्कूल जाते हैं गरीब के घर खाना पकता है सब कुछ खूबसूरत है। चाय की दुकान पर बर्तन धोने वाले बच्चे को कोई महिला स्कूल पहुंचा देती है , तस्वीर इतनी जल्दी बदलती है बच्चा निकर बनियान की जगह स्कूल की यूनिफार्म पहने चाय के गलास नहीं किताबों का बस्ता लिए हुए खेलता नज़र आता है। मेरा देश बदल रहा है सुनाई देता रहता है जाने किधर से कोई गा रहा है। ढूंढा तो महिला बच्चा दोनों साथ साथ मिल गए , हमने कहा बहन जी बहुत महान हैं कितना अच्छा काम करती हैं। हंस दी वो महिला और वो बच्चा भी हमारी नासमझी और मूर्खता पर। कहने लगे जनाब इस युग में इतने भोले कैसे रह गए आप , इतना नहीं समझते ये हाथी के दांत हैं दिखाने को सरकारी विज्ञापन। हम तो दोनों कलाकार हैं अभिनय करते हैं और हर सरकार के विज्ञापन पैसे लेकर करते हैं जिस किरदार की ज़रूरत होती है निभाते हैं। अगली बार सरकार बदले या रहे विज्ञापन नये होंगे ये कारतूस बार बार नहीं चलते हैं। याद करो गरीबी हटाओ के इश्तिहार शाइनिंग इंडिया भारत निर्माण लंबा इतिहास है सपने बेचने वाले कमाल करते हैं कहीं की कहानी कहीं से जोड़ धमाल करते हैं। राजनीति लूट का व्यवसाय है विज्ञापन जनता को लुभाने का हथियार है महंगा पड़ता है सस्ता मिलता है जो भी बेकार है।  विज्ञापन कभी सच नहीं होते सपने हैं बिकते हैं ऊंचे दाम पर। सपनों को यकीन करो हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करो , कोई भूखा नहीं कोई बाल मज़दूर नहीं कोई बंधुवा मज़दूरी नहीं करता। और तो और जितने भी सांसद विधायक हैं किसी नेता के बंधक की तरह नहीं हैं जो सच है कहने पर कोई रोक नहीं कोई दल से निष्काषित नहीं होता अपने विचार आलाकमान से अलग रखने पर। कोई बड़ा नहीं छोटा नहीं किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं मिले हुए। किसी जाति पाति का धर्म का झगड़ा नहीं है सदभाव है एकता है। नेता अफ़्सर ईमानदार हैं रात दिन कर्तव्य निभाते हैं न कोई रिश्वत न किसी की सिफारिश की ज़रूरत है। जन गण सुरक्षित हैं पुलिस सभी को आदर से सहयोग देती है कोई डंडे का राज नहीं है सभ्यचार का सबक सीख लिया है कोई दादागिरी नहीं चलाते हैं। अब इस से अच्छा क्या हो सकता है और ये मुमकिन है बस आपको अपनी आंखें बंद रखनी हैं सपने को सच समझना है यकीन करना है जो सरकार बताती वही सच है जो हम आप देखते हैं सच है मगर उसको सच नहीं समझना डरावना ख्वाब है भूल जाना होगा। सपनों में जीने का आनंद लेना सीखो बहुत काम की बात है। याद आया कोई जाग कर सपनों को सच करने का भरोसा देता था उसने बाकायदा किताब लिख डाली थी 2020 का भारत कैसा होगा। न वो महान आदमी रहा न किसी को उस सपने को हक़ीक़त में बदलना ज़रूरी लगा। अगले साल उस सपने के टूट कर बिखरने की बात कोई याद भी नहीं करेगा , मेरा सुंदर सपना टूट गया।

    देश में कितने घोटाले हुए हैं सबकी रकम मिलाई जाये तो कम होगी इस रकम से जो सरकारी विज्ञापनों के नाम पर अपने ख़ास लोगों को खैरात की तरह बांटते हैं अपनी महिमा अपना गुणगान करवाने को। इस तराज़ू के पलड़े में कितने बिक गए कितने बिकने को तैयार हैं। सच का आईना दिखाने वाले सभी दर्पण दौलत की चकाचौंध में झूठ को सच साबित कर मालामाल हो रहे हैं। सभी वास्तविकता की बात कहते हैं खुद अपनी को चुप रहकर छुपाते हैं। इक पुरानी कहानी दोहराते हैं , राजा नंगा है की कथा बताते हैं। ठग आए दरबार को बताया शानदार कपड़ा बनाया है सच बोलने वाले ही देख सकते हैं झूठे लोग देख नहीं सकते हैं। जो कपड़ा उनके पास नहीं था हर किसी को दिखाई दिया सबने शानदार कहा और राजा को पोशाक बनवाने को सिलाई करने को दर्ज़ी भी बुलाये गए , उन्होंने भी ऐसे कपड़े की पोषक बनाई जिसका कोई वजूद नहीं था। हर कोई खुद को सच्चा साबित करना चाहता था नज़र नहीं आया भी दिखाई दे रहा कह रहे थे। राजा नई पोशाक पहन कर रथ पर सवार होकर निकला नगरवासी जय जयकार करने लगे थे। तभी रास्ते में इक बच्चा घर की छत पर से बोला राजा तो नंगा है। राजा नंगा है कहना तब भी गुनाह था आज भी अपराध है। सभी जानते हैं मगर खामोश हैं।

                     शपथ आइसक्रीम की ( अध्याय दूसरा )

  शपथ को लेकर साफ कुछ भी नहीं है। अदालत से लेकर समाज और प्यार मुहब्बत में इसको उपयोग किया जाता है। कसम खाना शपथ लेना उठाना या खाना ज़रूरी होता है अधिकारी डॉक्टर शिक्षक शपथ लिया करते हैं और सरकारी दफ्तर में हर साल रिश्वत नहीं लेने की शपथ खिलाई जाती है। नेताओं को शपथ लेना बेहद आनंददायक अनुभव लगता है बार बार खाने को मन ललचाता है। शपथ लेने का समारोह भव्य ढंग से आयोजित करना था इसलिए अधिकारी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते थे। सभी विभाग शामिल थे बंदोबस्त करने के लिए। सबको खाने को खूब मिलेगा इसकी उम्मीद भी थी और हर कोई अपनी पसंद का भी ख्याल रख रहा था। बजट की कोई सीमा नहीं थी और शपथ हज़ारों की भीड़ जमा कर ली जानी थी। अधिकारी समझना चाहते थे कि शपथ लिखित ली जाए क्या काफी नहीं है हर किसी को बोलना भी ज़रूरी है। शपथ लेने वाला खुश होता है नाम घोषित होने पर मगर शपथ दिलवाने वाले को कितनी बार वही दोहराना पड़ता है। कई बार गलती करने वाले को सुधारना भी होता है। इक बार खाई शपथ कितने दिन तक मान्य समझी जा सकती है क्या हर दिन शपथ को याद रखना होगा या इक बार लिखित को शीशे में जड़वा कर तमगा बनाकर रखना काफी है। शपथ के विपरीत आचरण करने पर क्या कोई दंड मिल सकता है। कुछ साल पहले हर सरकारी दफ्तर में तख्तियां टंगवाई गई थी यहां रिश्वत देना मना है , लोग समझे नहीं फिर किस जगह मना नहीं है। 

     बड़े सचिव स्तर के अधिकारी ने सवाल किया क्या व्यर्थ की चर्चा में उलझे हैं आप भी। इन बातों को छोड़ विचार करो कि शपथ किस रूप में खाई जाएगी खिलाई जानी है। क्या शुरू में खानी है तो फ्रूट चाट अथवा सालाद को शपथ नाम देकर इस्तेमाल किया जा सकता है और अगर आखिर में अंत में खानी होगी तो आइसक्रीम के रूप में स्वादिष्ट शपथ खिलाना उचित है। जिसको जो स्वाद अच्छा लगता है सब वैरायटी की उपलब्ध हो सकेगी। किसी को वेनिला किसी को स्टाबरी टूटी फ्रूटी या बुटरस्कोच पसंद अपनी अपनी। गर्मी के मौसम में शपथ ठंडी और स्वादिष्ट होनी चाहिए। शपथ आखिर में खाई जाए उचित है क्योंकि जिस तरह आइसक्रीम कुछ ही देर में पिघल जाती है शपथ भी लेने के चंद मिंट बाद भूल जाती है या भुला दी जाती है। शक़्कर के रोगी भी चुपके से खा लेते हैं मगर फिर भी उनको शुगरफ्री उपलब्ध करवा दी जाएगी। शपथ खाने का सब बंदोबस्त ठीक था और लाजवाब रहा सब का मुंह मीठा करने का अवसर मिला जितने भी महमान बुलाये गए थे। दो चार मन मसोस कर रह गए उनकी बारी आने तक आइसक्रीम खत्म हो चुकी थी।  

1 comment:

Sanjaytanha said...

बहुत बढ़िया लेख है sir