Monday, 17 June 2019

आयोग की बैठक से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया

     आयोग की बैठक से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया 

 योजना क्या है नीति कैसी है इस पर चर्चा करना व्यर्थ है। आपकी हर बात पत्थर की लकीर है आप ही न्याय आप ही सत्य आप ही देश आप ही संविधान। सरकार भी आप सरदार भी आप विधान आपका गुणगान आपका। बाकी सब नश्वर है बस स्थाई आप हैं मुहब्बत करना नहीं जानते हैं हरजाई आप हैं। दोहा आप गीत आपका कथा आपकी चौपाई आप हैं। बुरे हैं सब लोग सबकी भलाई आप हैं हम जनता छाछ भी नहीं हैं सब दूध मक्खन मलाई आप हैं। शांति के देवता हैं जंग और लड़ाई आप हैं। अब और क्या क्या हैं कैसे बताएं इस युग के हातिमताई आप हैं। बिना उस्तरे से हजामत करते हैं सभी की ऐसे नाई आप हैं। क्या और कोई चाहिए जब बधाई आप हैं। आयोग की बैठक की शुरुआत इन शब्दों से हुई। इसके बाद देश की समस्याओं पर चिंतन विचार विमर्श हुआ और सभी सर हिलाते सर झुकाते स्वीकार करते रहे। 

   गरीबी का नाम बुरा है गरीबी खराब नहीं है गरीबी नहीं होती तो अमीर अमीर नहीं कहलाते फिर भी गरीबी की बात करना लाज़मी है। गरीबी अभिशाप होगी गरीबों के लिए राजनीति करने वालों के लिए वरदान है। गरीबी को खरीदते हैं गरीबी को बेचते हैं गरीबी के नाम पर खैरात लाते हैं विश्व बैंक से आईएमएफ से कई देशों से और लेकर खैरात बांटते भी हैं। हम सरकार वास्तव में भिखारी हैं मगर बनकर दिखलाते हैं हम दाता हैं। गरीबी से मेरी पहचान है कितने साल से शासक बनकर रहता हूं मगर वोट मांगता हूं तो गरीब परिवार का होने की बात करता हूं। जितना भी रईस बन जाऊं भीतर की गरीबी मिटने वाली नहीं है मुझसे गरीब कोई नहीं है गरीबी मेरी ताकत है मेरी सत्ता का आधार है। गरीब लोगों को योग करना सिखाया जाएगा दुबले पतले होने का फायदा गिनवाया जाएगा। सरकारी खज़ाने से इक नया ताज बनवाया जाएगा अमीर शब्द जिस पर गुदवाया जाएगा हर भूखे नंगे को वही पहनाया जाएगा। इस तरह गरीबी का नाम तक मिटाया जाएगा। देश गरीब नहीं कहलाएगा इक अध्यादेश लाया जाएगा। 

       भूख को बिमारी को जड़ से मिटाना है देश को स्वस्थ बनाकर दिखाना है। चांद को पानी में सबको दिखाना है बच्चे की तरह जनता को बहलाना है। चांद तारों की बात करनी है भाग्य बदलने की बात करनी है कोई भी काम नौकरी नहीं करनी है ज्योतिषीय उपाय की बात करनी है।  ज्योतिष को भी बढ़ावा देना है भाग्य बदलने को सितारों की बदलने की राह देखनी होगी। भाग्य से जीत हार होती है फिर से अपनी सरकार होती है जनता से हर भूल बार बार होती है। ऊंचे ऊंचे बुत बनवाने हैं हम लोग कितने स्याने हैं पापी अपने घर लाने हैं चुनाव जितवा कर हर गुनहगार पापी के दाग़ धुलवाने हैं। 

                              नामुमकिन कुछ भी नहीं है अच्छे दिन लाना भी मुमकिन था मगर अच्छे दिन लाने की ज़रूरत क्या है। हमने गहराई से हिसाब लगाकर समझा बहुत सीधा गणित है। देश की गरीबी स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली न्याय व्यवस्था को सही ढंग से लागू करने पर जितना धन हर साल चाहिए उतना नहीं उस से अधिक हम ख़ास वीवीआईपी कहलाने वाले लोग हर महीने अपने सुख सुविधा के साधन वेतन भत्ते और मुफ्त घर गाड़ी खाना पीना और अपने गुणगान पर खर्च कर देते हैं। देशभक्त होने का ढौंग करते हैं अन्यथा क्या देश और जनता की खातिर साल में एक महीना हम सरकारी पैसा सुविधा छोड़ दें तो देश की करोड़ों जनता की भलाई हो सकती है। मगर हम सभी मुझे भी शामिल कर आप सब क्या देश को एक महीना अपनी सेवा नहीं दे सकते हैं बल्कि हम तो और अधिक चाहते हैं मांगते हैं। 

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