Friday, 14 June 2019

दान सम्मान और अपमान ( कथा सागर ) डॉ लोक सेतिया

    दान सम्मान और अपमान ( कथा सागर ) डॉ लोक सेतिया 

   आप इस को गंभीरता से पढ़ना क्योंकि इस एक कथा में सभी धर्मों की किताबों का सारांश है। जैसे किसी मिठाई में खोया मेवा मीठा खट्टा नमकीन मसालेदार और सेहत को फायदा देने की तमाम वस्तुओं को इक साथ मिलाते हैं और चटनी जैम के साथ लेकर बाद में चाय कॉफी शर्बत आदि का आनंद लेते हैं। दान की परिभाषा यही है चुपके से देते हैं बदले में कुछ पाने की चाहत नहीं रखते हैं जो आजकल कोई नहीं देता इसलिए दान का फल मिलता नहीं है। अपने दान दिया ही नहीं व्यौपार किया नाम शोहरत कुछ और पाने को वो मिल गया बहुत है बाप दादा के नाम दान देना पाने वाले पर निर्भर है कैसा असर है दुआ का। सम्मान की बात और है आदर दिल से करते हैं तभी आपका सम्मान बढ़ता है। घर पर पति-पत्नी को जली कटी सुनाने के बाद बाहर लोगों के सामने आदर पूर्वक संबोधित करना फलदायी नहीं होता है इसके साइड इफेक्ट्स गंभीर मिलते हैं। अहंकारी लोग जो खुद को सब से समझदार और जानकर समझते हैं उनको सच्चा आदर कभी नहीं मिलता है जैसे शासक नेताओं को लोग दिखावे को आदर देते हुए भी मन में बुरा भला कहते रहते हैं। दान सम्मान की इतनी कथा बहुत है समझने को मगर अपमान की कथा का विस्तार भी आकार भी बहुत फैला हुआ है आज का सतसंग इसी पर चर्चा को है। 

     जब भी कोई किसी को अपमानित करता है तो अपमानित व्यक्ति के भीतर उसकी बही में दर्ज होता जाता है। अपमान सहने वाला लाख माफ़ करने की बात करता रहे अपमान की मिली पूंजी वापस लौटानी पड़ती है और जितना विलंब होता है अपमान का विष और बढ़ता रहता है और इतना ज़हरीजा हो जाता है कि अपने अपमान करने वाले को जान से मारकर भी खत्म नहीं होता है दुश्मन को भी मारकर हिसाब बराबर कर लेते हैं मगर दोस्त बनकर अपना होकर नीचा दिखाने वाले की मौत पर ख़ुशी मनाकर भी मलाल रहता है अभी हिसाब रह गया है कोई अगला जन्म हुआ तो पूरा बराबर करना है। भगवान ने किसी को भी किसी को अकारण अपमानित करने का हक नहीं दिया है खुद भगवान पापी को पाप की सज़ा देता है तब भी उसको अपमानित नहीं करते हैं बल्कि समझाते हैं अपने क्यों किया जब जानते थे ऊपर सब हिसाब चुकता करना है। अपमान ऐसा क़र्ज़ है जिसका असल कम ब्याज ज़्यादा होता है पल पल अपमानित व्यक्ति को जितनी टीस महसूस हुई होती है अपमान की दौलत दोगुनी चौगुनी होती जाती है और आखिर में इक ढेर जमा हो जाता है। ऐसी इक कथा है जो सब जानते हैं फिर से सुनाता हूं। 

     इक राजा अपने घोड़ों के अस्तबल में खड़ा होता है कि तभी इक भिक्षुक साधु मांगने चला आता है। राजा को शासक होने का गुरुर होता है अभिमान होता है राज्य का मालिक हूं और सत्ता के मद में चूर अहंकार में अच्छे बुरे का भेद नहीं समझता है। अपने अस्तबल से घोड़ों की लीद उठाकर भिक्षा के कटोरे में दाल देता है। कुछ देर बाद राजा उस साधु की कुटिया पर माफ़ी मांगने को जाता है तो देखता है कि बाहर बहुत ऊंचा ढेर लगा हुआ है लीद का। साधु से सवाल करता है इतनी लीद कैसे जमा है तो साधु जवाब देता है अपने दान में जो मुट्ठी भर लीद दी थी बढ़ते बढ़ते इतनी हो गई कुछ ही पल में। राजा पूछता है इसका होगा क्या तो साधु बताता है आपको खानी होगी ये लीद अभी और बढ़ते बढ़ते पहाड़ जैसी हो जाएगी। राजा कहता है क्या कोई उपाय है तो साधु कहता है अगर लोग आपको अपमानित करेंगे तो आपके हिस्से की लीद उन सभी में बंट जाएगी और ये ढेर कम होता जाएगा। जब आपका पूरा राज्य आपको अपमानित करेगा तभी ये सारा ढेर खत्म हो सकता है। 

          राजा ने उपाय करने का निर्णय किया और अगले दिन अपने रथ पर नशे में चूर शारबी बनकर  इक बाज़ारी वैश्या को संग लेकर मस्ती करते हुए गली गली गांव गांव नगर नगर घूमता है। सब राज्य वासी उसको देख गाली देते हैं उसको अपमानित करने का काम करते हैं और बहुत बदनामी होती है। मगर राजा का इक मंत्री चुप रहता है राजा कहता है तुम क्यों खामोश हो तब मंत्री बताता है मुझे पता है ये सब लोग आपके हिस्से की लीद खा रहे हैं मगर जितनी अपने दी थी उतनी बची हुई है जो मुझे नहीं खानी है। दोस्तो ये काल्पनिक कथा हो सकती है मगर ये झूठ नहीं है ये अपमान का विष इक क़र्ज़ है जो चुकाना पड़ता है। ध्यान रखना।

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