Wednesday, 22 May 2019

सत्ता के मुजरे का सुहाना सफर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता के मुजरे का सुहाना सफर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     राजनीति की वैश्या नाम बदलती है , साधना फिल्म की चंपा रजनी बन जाती है। वसंतसेना की कहानी याद थी भूल जाती है। भले घर में बहु बनकर रामायण सुनाती है सासु मां को बहुत भाती है। ये कहानियां फ़िल्मी हैं मगर सत्ता के कोठे का कड़वा सच यही है। सफर बेहद लंबा है मगर दिलकश है सुहाना है उसको कितनी बार दोहराया गया है। ये किरदार जिस किसी नायिका ने निभाया है उसकी पहचान बन गया है कोई बड़ी फ़िल्मी तारिका शायद ही है जिसने इस किरदार को नहीं निभाया हो। पाकीज़ा की मीनाकुमारी जब बदनाम गली के कोठे से गुलाबी महल की साहिब जान बन जाती है तो बड़े बड़े रईस मुजरा देखने आते हैं। ठेकेदार को अपनी औकात पता है वो दरवाज़े पर बैठा लुत्फ़ उठाता है मगर किसी खानदानी नवाब से नौंक झौंक होने पर कीमत भी चुकाता है। हंसते ज़ख्म की कहानी और है गलती से पुलिस वाले की बेटी को नाचने गाने वाली की बच्ची समझ गुंडे उठा ले जाते हैं किरदार बदल जाते हैं आखिर अपनी ही बेटी को पुलिस वाला अनजाने में वापस उसी दलदल में भेजने की बात करता है जिस जगह से पकड़ कर थाने लाया था और समझाया था बेटी किसी भले आदमी से शादी कर घर बसा लो छोड़ दो ये धंधा। किस किस जिस्मफरोश की बात की जाये।  चलो आज की राजनीति की वैश्या से मुलाकात की जाये। वही खुशबू वही शराब वही कमरा जिस्म बेचने वाली सगरेट सुलगाती हुई सोचती है और कौन होगा ये उसी की पहचान है। फ़िल्मी इत्तेफाक हुआ करते हैं आशिक़ चला आता है दोस्त ने भेजा होता है दिल बहलाने को। ये कमाल का जादू है लोग जिस मुजरेवाली पर लट्टू होते हैं हर दिन उसी का नाच गाना सुनने को चले जाते हैं। सत्ता की मुजरेवाली कभी बूढ़ी होती नहीं है चिरयौवन का वरदान मिला हुआ है। 

          पांच साल में समझना मुश्किल नहीं कि इस सत्ता की मुजरेवाली का प्यार झूठा है और बिकाऊ है। वो हर बार कोई नया पासा फैंकती है अबकि वफ़ा की मिसाल बनके दिखाएगी जन्नत की सैर पे साथ लेकर जाएगी। हम फिर उसकी चाल को  समझते और उसके झूठे आंसू झूठी मज़बूरी की कहानी सुनकर जाल में फंसने चले आते हैं। चुनाव आने पर राजनेता क्या क्या रंग दिखाते हैं नाचते झूमते नचवाते हैं खूब काली घटा बनकर छा जाते हैं मगर ये बिना पानी के बादल वोट मिलते ही बरसे बिना खो जाते हैं। लोग प्यासे के प्यासे रह जाते हैं सत्ता के खिलाड़ी अपनी प्यास बुझाते हैं जाम से जाम टकराते हैं। छलकाए जाम आइये  आपकी आंखों के नाम होंटों के नाम , कहानी बदल जाती है नायिका वही है शरीफ लड़की है शराबी से दिल लगाती है। लाख वफ़ा करती रहे बेवफ़ा कहलाती है। राजनीति करना सबकी बस की बात नहीं है पल पल बदलती रहती है बरखा रानी मौसम की तरह। सत्तर साल में कितने नाम से कितने ठिकाने बदल बदल कर सबकी प्यास बुझाने की कसम खाती है चौखट पर माथा टेकती है सर झुकाती है अच्छी बहुरानी बनकर रहने की बात करती है। समय बदलता है सेवा करने वाली मालकिन बन जाती है , किराये की दुल्हन कहीं रिश्ता निभाती है। 

      लो आज फिर उसी मोड़ पर खड़े हुए हैं हम आशिक़ बनकर। सज संवर कर निकलेगी डोली उसकी जिस की जीत की वरमाला पहनाई थी हमने रात बिना देखे पहचाने नशे की हालत में। गवाही देगा जिसने निकाह पढ़ा था और जाने क्या क्या समझा समझाया था। उसने इस बार बिल्कुल नया दिल बहलाने का हुनर सीख कर आने का भरोसा दिलाया है। कथककली से डिस्को से गुज़रा सफर अब आइटम सांग पर चला आया है। नाचने वाली को हमने भी नचवाया है। पग घुंगरू बांध मीरा नाची थी और हम नाचे बिन घुंघरू के क्या गाया है अपना रंग जमाया है। पर हम नाच देखने वाले कितनी बार नचनिया बन सकते हैं आखिर तो उनके लटके झटके ठुमके उन्हीं के हैं हम उनकी नकल कर सकते हैं वो बात नहीं हो सकती है। राज़ की बात यही है लोग समझते हैं राजकपूर नायक हीरा बाई का खेल देखने जाता है मगर मुहब्बत की बाज़ी हार जाता है तब तीसरी कसम खाता है। फिर कभी किसी नाचने वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठायेगा। हम भी बार बार धोखा खाते हैं उनको हटाने की कसम खाते हैं मगर हर बार उसी कातिल को बदले लिबास में घर लेकर आते हैं। सत्ता अपना मुजरा करती है हम उनकी जीत का जश्न मनाते हैं। दुल्हनिया लेने वाले राह से डोलियां उठवा जाते हैं हम बहु बेग़म फिल्म की तरह खली डोली घर लाते हैं। चलो आपका दिल बहलाते हैं इक ग़ज़ल सुनाते हैं। 

चंद धाराओं के इशारों पर - लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर ,
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते ,
जो न करते यकीं सहारों पर।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग ,
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर ,
अब भरोसा नहीं कहारों पर।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम,
जिन को उम्मीद थी सितारों पर।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,
फूल रख आये हम मज़ारों पर।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये ,
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर। 


जाते जाते इक मुजरे की भी बात हो जाए तो क्या खूब हो।  ये वीडियो पेश है पाकीज़ा फिल्म से।

 

 


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