Thursday, 30 May 2019

खोजना होगा भगवान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     खोजना होगा भगवान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      हमने खोजा था भगवान बहुत पहले इस की चर्चा की गई थी जब पेटेंट की बात चली थी। मालूम नहीं तब सरकार ने किया या नहीं शायद नीम हल्दी तुलसी की चिंता थी भगवान का पेटंट करवाने से आर्थिक नफ़ा नुकसान नहीं सोचा हो तो छोड़ दिया हो। भगवान भी क्या करते जब कोई उनकी अहमियत को नहीं समझता हो। पर अब लगता है किसी न किसी को दोबारा ऋषि मुनि बनकर तलाश करना होगा क्योंकि अफवाह सुनी है भगवान इस देश को कभी का छोड़ कहीं विदेश जा बसे हैं। देश की सुरक्षा का सवाल है इसलिए अभी ये राज़ छुपाया जा रहा है मगर उड़ती उड़ती खबर बाहरी देश से इधर पहुंची है कि उधर किसी सच्चे फ़कीर ने पा लिया है ऊपर वाले को। अपने देश में करोड़ों देवी देवता कभी वास किया करते थे और सबकी मनोकामना पूरी हुआ करती थी अब किसी को यकीन नहीं होता किस जगह किस से मनौती मांगी जाये जो मिल भी जाये। इधर उधर कितनी जगह भटकते फिरते हैं लोग। कहीं ऐसा तो नहीं देश की आबोहवा ठीक नहीं होने की विवशता के कारण भगवान घूमने फिरने आबोहवा बदलने विदेश चले गए हों और फिर किसी देश में मन रम गया हो और वापस लौटना ही भूल गए वहीं का निवासी बन कर रहने लगे हों। माना भगवान के पास धन दौलत की कोई थोड़ नहीं है अंबार लगे हैं उसके कितनी कितनी जगह। पर पासपोर्ट बनवाने हवाई टिकेट उपलब्ध कराने में कोई न कोई सरकारी अधिकारी या नेता ज़रूर शामिल हुआ होगा। बिना सबूत आरोप नहीं लगाना चाहिए लेकिन ये भी कोई बड़ा घोटाला हो भी सकता है। कोई अपने साथ भगवान को देवी देवताओं को लेकर जाता रहा हो और अपना मतलब पाने के बाद उसी देश छोड़ कर चुपचाप लौटता रहा हो। कई लोग कबूतरबाज़ी का खेल खेलने का कारनामा अंजाम लाने को बदनाम हुए हैं।  

          कई साल पहले मैंने कहा था कि अगर कोई ईश्वर होने का पेटेंट करवा ले तो क्या होगा।  हमको पहले से ये अपने नाम करवा लेना चाहिए। मगर हम भारत वासी खुद को भगवान हरगिज़ नहीं कह सकते।  भले है बहुत जो भगवान कहलाते हैं , मीडिया ने बना दिया अपने मकसद से , कुछ ताकत शोहरत मिलते ही खुदा बन जाते हैं इंसान नहीं रहते। मगर भगवान हैं ये नहीं कहते क्योंकि भगवान से उनको भी डर लगता है। मगर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि ये पेटेंट अपने नाम करवा लिया जाये कि भगवान को हमने ही खोजा था। ये झूठ भी नहीं है , हम साबित कर सकते हैं। हमारे साधू संत , सन्यासी , ऋषि मुनि , देवी देवता तक वर्षों बन बन भटकते रहे , तपस्या करते रहे पर्मात्मा को पाने को। इस अपने देश में करोड़ों देव वास किया करते थे , तो बहुमत भी अपना ही साबित किया जा सकता है। अब वो सब किधर गये ये सवाल मत पूछना , कलयुग में राक्षस ही मिलते हैं उनके रूप में। लेकिन जब हमने खोजा था भगवान को तो इसका पेटेंट अपने नाम होना ही चाहिये। अब आप सोचोगे कि ऐसा करने से क्या हासिल होगा। तो समझ लो जब भगवान पर अपना पेटेंट होगा तब उसकी बनाई हर चीज़ पर अपना अधिाकर खुद ही हो जायेगा। तब उनको पता चलेगा जिन्होंने हमसे गैट समझौते पर हस्ताक्षर लिये थे। हवा पानी चांद सूरज , रौशनी अंधेरा सब की यहां तक कि बरसात की रायल्टी देनी होगी , इंद्र से लेकर सभी देवता अपने ही हैं। तब पता चलेगा उनको भी कि पेटेंट करवाना क्या होता है।

          पूजा अर्चना पहले सुख शांति पाने को करते थे फिर भगवान से खाने को रोटी मिलती रहे घर की छत कायम रहे और परिवार फलता फूलता रहे यही बहुत समझा जाता था। धर्म की राजनीति करने वालों ने सत्ता पाने को अनुष्ठान करवाना शुरू किया तो बात खुलने लगी। सभी ने अपनी अपनी तरह धार्मिक कार्य करवाया और नामी गिरामी लोगों की सेवाएं लेकर विधि विधान से किया मगर मनोकामना कितने की पूरी हुई ये आंकड़े पता करने पर बवाल खड़ा हो जाता खुले आम घोषणा नहीं की जा सकती थी कि एक दो लोग ही सौ में से सफल हुए हैं जिन्होंने चुनाव की टिकट लेने से पर्चा भरने तक धार्मिक अनुष्ठान किये। मगर जो 44 फीसदी गुनहगार जीते भला भगवान की मर्ज़ी से तो नहीं हुआ होगा संभव। विजयी होने को धर्म कर्म को छोड़ जाने क्या क्या नहीं किया करवाया गया बताना उचित नहीं है। सांप गुज़र गया हम लाठी भांजते खड़े हैं अब। अब पछताए क्या होय जब चिड़िया चुग गई खेत। इक दार्शनिक बता रहे हैं लोग भगवान की पूजा अर्चना भी मतलब से करते हैं जो किसी काम का नहीं है आडंबर है औरों को दिखावा करने को। वास्तविक पूजा इबादत किसी को बताकर नहीं की जाती कोई शोर शराबा नहीं किया जाता। जो किसी धार्मिक स्थल जाकर कोई भेंट चढ़ावा देने के बाद उसकी चर्चा करवाते हैं उनका मकसद धार्मिक नहीं स्वार्थी कारण से आडंबर होता है। 

         मगर हमारी चिंता राजनेताओं के झूठे दिखावे की बातों को लेकर नहीं है। समस्या गंभीर है अपने देश में रोज़ सुबह शाम करोड़ों लोग मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाते हैं भगवान को मनाने को। हर को विश्वास करता है वो है उन जगहों पर , मगर अगर उन जगहों पर उसका निवास है ही नहीं तो बात चिंता करने की है। खोजना होगा भगवान। अब फिर से कोई करेगा जनकल्याण को ये तपस्या उसको ढूंढने की। कोई इस बात को किसी भी तरह कहे मगर इस में कोई शक नहीं है कि हमारा देश भगवान भरोसे ही चल रहा है चलता रहा है अन्यथा इस देश का सत्यानाश करने वालों ने कोई कोर कसर कोई कमी छोड़ी तो नहीं है। बाकी सब को फिर देख लेंगे क्या अच्छा बुरा क्या हुआ नहीं हुआ। मगर भगवान मिलना बेहद ज़रूरी है और वो भी असली वाला कोई नकली किसी का घोषित किया हुआ नहीं। दुनिया से क्या लेना देना जैसे भी चलती रहे अपना देश भगवान के बगैर कैसे चलेगा इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है।

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