Sunday, 12 August 2018

क़व्वाली युग की सरकार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    क़व्वाली युग की सरकार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     मुझे अभी अभी बोध हुआ है कि पिछले चार साल से देश में कव्वाली की धूम है। मुझे गाने का शौक रहा है और कॉलेज में मैंने वार्षिक समारोह में कव्वाली सुनाई है। एक बार कव्वाली में मेरा पहला ईनाम था क्योंकि अकेले मेरे ग्रुप की ही कव्वाली थी। थोड़ी थोड़ी याद है :-


दिखला के झलक तुम छुप ही गए , जी भर के नज़ारा हो न सका। 

इक बार तुम्हारी  दीद हुई  , दीदार  दोबारा हो न सका।

मुद्द्त से तम्मना थी दिल में , अल्लाह को देखूं बेपर्दा।

जब दिल ने मुझ को मौका दिया , तकदीर को गवारा हो न सका। 

     ये मिलती जुलती कव्वाली है ऊपर जो सुन कर समझ सकते हैं कि क़व्वाली कैसी होती है। कहने को ग्रुप की बात होती है मगर वास्तव में एक गायक ही क़व्वाली सुनाता है बाकी या तो उसको दोहराते हैं या तबला हारमोनियम पर संगीत देते हैं। चार साल से एक ही गायक की धूम है बाकी कोई है नहीं है कोई फर्क नहीं पड़ता है।  क़व्वाली गायक का अंदाज़ ऐसा होता है कि लोग फ़िदा होकर झूमने लगते हैं। क़व्वाली में एक बात को बार बार गाया जाता है कभी ऊंची आवाज़ में कभी मध्यम तो कभी धीमी आवाज़ में। धुन एक ही रहती है और शोर ऐसा कि और कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती।  यही तो हो रहा है देश विदेश में एक ही कव्वाली सब सुन रहे सुना रहे हैं। दिन आने वाले थे , दिन आ रहे हैं। गा गा कर बुला रहे हैं , दिन रूठे हुए हैं वो मना रहे हैं। उनकी समस्या है क़व्वाली को कव्वाली कहना मुश्किल है कहीं दूसरे धर्म या देश की बात बीच में न आ जाये। क़व्वाली दरगाहों में गाई जाती है मज़ारों पर सुनाई देती है उनको थोड़ा परहेज़ है ये इनको हज़्म नहीं होती। क़व्वाली का अंदाज़ पसंद है जो एक की आवाज़ वही सबकी आवाज़ , बाकी कोई स्वर सुनाई नहीं देना चाहिए। कव्वाल किसी और की खातिर गाया करते हैं उनका राग खुद अपने लिए है , अपने ही कसीदे पढ़ना , ये ज़रा मुश्किल है। इसी लिए क़व्वाली नहीं ग़ज़ल भी नहीं कविता भी नहीं ये आठवां सुर है। क्या करें गुणगान करने वाले मिलते हैं किराये पर लिख भी देंगे महिमा उनकी पसंद की मगर उनको खुद अपनी आवाज़ अपनी धुन में गाना भाता है और कोई भी गा ही नहीं सकता उन जैसा। सत्तर साल से देश में बेसुरों की आवाज़ गूंजती रही है अब ऐसा नहीं होने देंगे चाहे कुछ भी हो जाये। क़व्वाली मुहब्बत की होती है और उनको मुहब्बत से बैर है , उनकी मुहब्बत सत्ता है कुर्सी है। पत्नी को छोड़ा महबूबा को भी आखिरकार छोड़ ही दिया। अकेले में अपने बॉस खुद हो महबूबा के नखरे और पत्नी की ख्वाहिशें कोई आसान है निभाना। झोला उठाकर चल देने की बात कहते हैं , मेरी क़व्वाली सुनो वरना चला जाऊंगा। 
            क़व्वाली सुनने की भी सीमा होती है , घंटा दो घंटे तक , चौबीस घंटे क़व्वाली सुनते लोग तंग आ ही जाते हैं। मगर उनका आदेश है सब को क़व्वाली सुननी है और ताली भी बजानी है। जो नहीं सुनेगा या ताली नहीं बजाता उसकी देश भक्ति शक के दायरे में आ जाती है। संविधान में कोई निर्देश तो नहीं है कि सत्ता के स्वर में स्वर मिलाना होगा , उनके पीछे पीछे दोहराना होगा। गाना चाहो न चाहो , गाना आये न आये गाना होगा। किसे खबर थी ऐसा भी ज़माना होगा। सरकार आज़ादी के जश्न के अवसर पर हर साल कवि सम्मेलन आयोजित किया करती है। अधिकतर कवि साफ नहीं भी कहते मगर इशारों में सरकार की बखिया उधेड़ते ही हैं कविता में। मेरी सलाह है इस बार इक नई पहल नई शुरआत कर लाल किले पर क़व्वाली का आयोजन किया जाए। कव्वाली का सवभाव राजनेताओं को भा सकता है। कव्वाली हर अवसर पर गाई जा सकती है और इस में कोई रोने रुलाने दर्द तड़पने की बात ऐसे नहीं होती कि किसी की आंख भर आये। ऐ मेरे वतन के लोगो गीत की तरह। सरकार को हमेशा आनंद में रहना पसंद होता है और खासकर इस सरकार को आनंद ही आनंद पसंद है और इन्हें आनंद भी कब किस बात में मिले कोई नहीं जनता। औरों का उपहास उड़ाना इस सरकार के मुखिया की आदत है। मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया , हर फ़िक्र को धुवें में उड़ाता चला गया , चार साल से यही हुआ है। जनता की फ़िक्र में नींद हराम करना उनको नहीं पसंद। इक नशे में रहने का मज़ा लिया है जो पहले कोई नहीं ले पाया था। दुनिया भर की सैर की हर दिन हर नागरिक पर 25 लाख तो केवल किराये वाले जहाज़ के खर्च हुए बाकी का हिसाब फिर कभी। शबे फुरकत का जागा हूं लोगो अब तो सोने दो , कभी फुर्सत से कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता। फ़रिश्तो की जगह लोगो करना पड़ा। फरिश्ता खुद वही है।
                कव्वाली की विशेषता यही है कि जब चाहो जिस जगह फिट कर सकते हैं और हमेशा हिट रहती है। मौज मस्ती भी और संगीत भी दोनों मिलते हैं। ड्रम बजा लिया नाच गा लिया हर तमाशा दिखला चुके तो ये हुनर भी हो जाये , लोग मर मिटेंगे अदाओं पर। इतिहास में अपनी अलग पहचान की चाह भी पूरी हो जाएगी क्योंकि अभी तक किसी भी सरकार ने राग क़व्वाली को आज़माया नहीं था। लाख दुखों की एक दवा है क्यों न आज़मा ले। तेल मालिश चंपी तेल मालिश। आपकी मर्ज़ी है जिस गीत को क़व्वाली बना लो। आप क्या नहीं कर सकते सब कर सकते हैं। झूठा इकरार ही सही , मतलब का यार ही सही। खुद खुद से बस खुदी से प्यार ही सही , अपने खास लोगों का वफादार ही सही। तुकबंदी करते जाओ क़व्वाली बनाते जाओ। सुझाव है आगे मर्ज़ी सरकार की।

1 comment:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, डॉ॰ विक्रम साराभाई को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !