Saturday, 7 July 2018

शोहरत की कामना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         शोहरत की कामना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

            मुझे याद है मेरे इक जन्म दिन पर मेरे बेटे ने मुझे उपहार में एक डायरी दी थी , उस पर अंग्रेजी भाषा में लिखा था " शोहरत इक गुनाह बन जाती है जिस पल आप उसकी कामना करते हैं। ये आपके आचरण पर है कि आपको शोहरत नसीब होती है अथवा नहीं। " आज भी वो डायरी मेरी अलमारी में सुरक्षित है। मुझे नहीं पता बेटे ने जब लिखी ये बात तब उसके मन में क्या रहा होगा। जहां तक खुद को मैं जनता हूं मैंने कभी कोई काम शोहरत हासिल करने को नहीं किया। बहुत काम उल्टा ऐसे किये और करता रहता हूं जिस से मुझे शोहरत या नाम नहीं बदनामी मिल सकती है शायद फिर भी मेरा ज़मीर मुझे विवश करता है जनहित और अपने लेखन की ईमानदारी को कायम रखने को। अभी इक दोस्त ने कहा मेरी पोस्ट पर लोग लाइक या कमेंट करने से बचते हैं इस डर से कि उनको सरकार विरोधी नहीं समझा जाये। जबकि सच किसी के विरोध में नहीं होता है। 
                 आज नाम की बात नहीं करते , किस किस का नाम लिया जाये। सभी तो नाम शोहरत के पीछे भाग रहे हैं। जाने क्या क्या नहीं अपनाते ढंग , सोशल मीडिया पर अधिकतर को किसी भी तरह यही चाहिए।  लोग समाजिक संस्थाओं में शामिल होते हैं मगर उद्देश्य शोहरत होती है समाज की भलाई नहीं। आप का बहुत नाम है देश विदेश में शोर है आपके नाम के चर्चे हैं फिर भी आपको लगता है आपसे पहले के नेताओं से अच्छे हैं आप और लोग उनको अच्छा नहीं समझें और आपको उनसे अच्छा समझें। लोग किसी को टंगड़ी लगाकर गिरा कर उससे आगे जाना चाहते हैं। जिनका मकसद औरों को बुरा साबित करना होता है उनको अक्सर निराश होना पड़ता है। हम जिस समाज में रहते हैं वो हमेशा मुहब्बत बांटने वालों को याद करता है नफरत फ़ैलाने वालों को हम कभी नायक नहीं समझते हैं। उसने ये नहीं किया उसने वो गलत किया यही दोहराने से आपको शोहरत हासिल नहीं हो सकती , खुद आपने जो किया उसी से निर्धारित होगा आपको क्या जगह मिलती है। मुझे बहुत लोग नीचा दिखाने का जतन करते हैं मगर मैं कभी उनकी बातों का बुरा नहीं मानता हूं। निंदक नियरे राखिये। सबक सीखता हूं। पाना कुछ नहीं है न खोने को है कुछ भी। इसलिए अपना कर्म करता रहता हूं। मुझे मेरे बाद कोई याद रखे ऐसा ख्वाब नहीं देखता। किसी शायर का इक शेर उधार लेकर अपनी बात कहता हूं :-

             बाद ए फनाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र ,

                जब हमीं न रहे ,  तो रहेगा मज़ार क्या। 

      कल फिर राजस्थान में मोदी जी की अपने ही पसंद के बुलाये लोगों की जामातलाशी ली गई। दुष्यंत कुमार कह गए थे , फिरता है कैसे कैसे ख्यालों के साथ , उस शख्स की जामातलाशी तो लीजिये। ये ख्याल दिल वाले बहुत डराते हैं , हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खटटर तो डरते थे अब मोदी जी की सभा में सुक्षाकर्मी लोगों की तलाशी ले रहे थे कि किस किस ने काले रंग का कुछ भी पहना हुआ तो नहीं है। काले झंडे काली पट्टियां दुनिया भर में विरोध का सभ्य शांतिपूर्वक ढंग समझे जाते हैं। ये कोई खतरे की चीज़ नहीं हैं , शायद फिर आपत्काल से पहले जयप्रकाश नारायण के भाषण की बात दोहराना ज़रूरी है। सुरक्षा कर्मी की निष्ठा देश के लिए होनी चाहिए किसी राजनेता या अधिकारी के लिए नहीं और अगर शांतिपूर्वक विरोध करने वालों पर कोई नेता या अधिकारी बलप्रयोग की बात करता है तो उनका हुक्म नहीं मानना है। जिसे जनता के कपड़ों के रंग पर भी ऐतराज़ है उसे जनता के बीच जाना ही नहीं चाहिए। ये आपका डर आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। मोदी जी के अंध समर्थक तो कहते हैं जब सभी किसी के विरोध में खड़े हों तो समझो आदमी बढ़िया है। मोदी जी विरोध भी शोहरत दिलाता है। मुझे याद है , मैं बंसी लाल जी का समर्थक नहीं हूं , उनकी बात याद आई तो बता रहा हूं , काली पट्टियां काले झंडे दिखाने वालों को लेकर उन्होंने कहा था मेरी मां 36 गज़ काले कपड़े का घाघरा पहनती है। जिनका रंग गोरा होता है उन पर काला रंग और निखार ले आता है। आप तो बेदाग़ होने का दम भरते हैं फिर काले रंग से क्यों इतना डरते हैं।

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