Friday, 27 July 2018

पाप नहीं , अपराध है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया { 7 अक्टूबर 2001 को रविवासरीय अंक " अमर उजाला " में प्रकाशित रचना }

         पाप नहीं , अपराध है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

          7 अक्टूबर 2001 को रविवासरीय अंक " अमर उजाला " में प्रकाशित रचना 

   गरीबो खुश हो जाओ। सरकार ने कर दिया है ऐलान कि  जो भी अब तुम्हें अन्न देने से इनकार करेगा वह दंड का भागीदार बनेगा। बस अब तुम भूख से नहीं मर सकते। जब भूख लगे जिससे मर्ज़ी जाकर अनाज मांग लो। जो न दे उसे सरकार का यह विज्ञापन भी दिखा दो , जिस पर प्रधानमंत्री वाजपेयी जी और खाद्य मंत्री दोनों के फोटो लगे हैं। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि अन्न पैसे देकर मिलेगा या उधार भी मिलेगा। हां कोई इनकार नहीं कर सकता। उम्मीद है भूख से तड़पने वालों ने यह विज्ञापन ज़रूर पढ़ लिया होगा। सरकार ने लाखों रूपये इस विज्ञापन को छपवाने को अख़बार को बेकार तो नहीं दिए। रोटी न मिलती हो तो भी अख़बार तो पढ़ लेना चाहिए , ताकि सरकार क्या क्या कर रही है यह तो पता चलता रहे। 
( 17 साल हो गये हैं इस बात को , सूचना के अधिकार को अब कम अहमियत देती है सरकार वर्ना ये जानना चाहिए कि इन सालों में कितने अधिकारी नेता या जमाखोर मुजरिम साबित हुए और सज़ा मिली उनको )
     सरकार अनुपयोगी खर्चे कम कर रही है। बजट में घाटा बढ़ता जा रहा है। उसे सीमा में लाना है।  मगर सरकार के विज्ञापन तो बहुत उपयोगी होते हैं।  बस इसी से पता चलता है सरकार कितना बढ़िया काम कर रही है। यह सभी विज्ञापन इतिहास में दर्ज हो जाते हैं तो सबूत बन जाते हैं। सामने भले कुछ भी हुआ नज़र नहीं आता हो और खबरें छपती रहती हों योजनाओं की वास्तविकता उजागर करती हुई। मगर उन खबरों को भुला दिया जाता है जिन में सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है और लोग भूख से मर रहे हैं बताया गया होता है। जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार नहीं लगाई सरकार चैन से सो रही थी। अब मज़बूरी में में कुछ करना पड़ा है तो करना कम दिखाना अधिक है। अपना गुणगान करना है अपना ढोल बजवाना है। मीडिया वालों से भाईचारा बढ़ाना है अपने खिलाफ की हर खबर को दबवाना ढकवाना है और अपनी मर्ज़ी की खबर भी बनवाना है। शायद इन इन विज्ञापनों की संख्या से अदालत को तसल्ली हो जाये कि सब कुछ ठीक ठाक है। 
              लेकिन जिन के पास सरकारी दुकानों से अनाज खरीदने को पैसे नहीं हों वो क्या करें। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं , तो कई हैं जिनके राशन कार्ड आधारहीन बता रहे हैं आधार कार्ड से जुड़े नहीं हुए। वो सरकारी गोदामों को लूट नहीं सकते क्योंकि लूटने का हक अमीर लोगो और अधिकारीयों के पास सुरक्षित है। चूहों पर इल्ज़ाम धर कर गोदाम खाली हो जाते हैं। होटल ढाबे वालों को विज्ञापन दिखाने से खाना मिल जाये और बिल सरकार बाद में चुका दे ऐसा करते तो नेताओ अधिकारीयों को फायदा ही होता। जिन बेरोज़गार लोगों के पास काम ही नहीं , पैसे कहां से लाएं सरकारी दुकानों से अनाज खरीदने को। कौन उनको अनाज देगा और कौन नहीं देने पर दंडित करेगा। जिन का कर्तव्य था ज़िम्मेदारी होनी चाहिए उन नेताओं के तो फोटो आदेश देने वाले के रूप में ऊपर छपे हैं। 

            मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है , क्या मेरे हक में फैसला देगा।

विज्ञापन कभी सूचना देने का काम करते थे , अब लोगों को लुभाने और मुर्ख बनाने का काम करते हैं। सरकारी विज्ञापन तो टीवी चैनल और अख़बार वालों की जीवन धारा हैं ये नहीं मिले तो बेमौत मर जाएं बेचारे। तेज़ दौड़ते हैं मगर सरकारी बैसाखियाँ लेकर। कंपनियां हर सामान बेचने का विज्ञापन देती हैं और ऐसे भी विज्ञापन होते हैं जिनको देख हंसी आती है। छोटे बच्चे भी समझने लगे है हमें उल्लू बना रहे हो। झूठ की कोई सीमा नहीं बचती विज्ञापन में। जिनको लोग महानायक भगवान जाने क्या क्या समझते हैं , अमिताभ बच्चन से सचिन तेंदुलकर तक जो खुद नहीं उपयोग किया उसी का दावा करते हैं बढ़िया है। सोना गिरवी रखने से मालिश का तेल परेशानी दूर करने की सलाह देते हैं। सचिन को अगर आर ओ का पानी नहीं मिलता तो जाने क्या होता ये भी डर सबको दिखाते हैं। पिछले कुछ सालों से राजनेता की भी मार्किटिंग होती है , किसी को बताया गया ब्रांड अम्बेड्स्टर है जनाब। बिकना भी शान बन गया है , बेचो खुद को और महान कहलाओ। 
         पाप नहीं अपराध है का विज्ञापन देकर समझ लिया समस्या का समाधान हो गया है। इतने साल बाद लोग भूल गए अन्यथा अख़बार को दिल्ली में भूख से बच्चियों की मौत की खबर छापनी ही नहीं थी। अब लड़ाई दिल्ली और देश की सरकार के बीच की हो गई है। मगर सरकारी विज्ञापन काम तो आते ही हैं , दिल्ली सरकार को विज्ञापन देने से पहले राज्यपाल से अनुमति लेनी पड़ती है देश की सरकार को कोई नहीं रोकता टोकता। गरीबी हटाओ के इश्तिहार से कितने लोग अमीर बन गए। स्वच्छ भारत मेक इन इंडिया मेड इन इंडिया खुले में शौच बंद सभी विज्ञापनों पर सच है वास्तविकता में झूठ। गंगा साफ होते होते और मैली हो गई है। हर ऐसे योजना ने भ्र्ष्टाचार के नए नए तरीके इजाद किये हैं और कीर्तिमान स्थापित किये हैं। कुछ गरीबों की गरीबी मिटती ही ऐसे ही गरीबी मिटाओ कार्यकर्म से है। इस देश के रहनुमाओं ने नेताओ अधिकारीयों बाबुओं ने बाढ़ सूखा भूकंप सब की राहत से राहत का अनुभव किया है। मुश्किल यही है कि सरकारी विज्ञापन जिनके लिए होते हैं वही नहीं पढ़ते। उनकी भलाई है इसी में , गरीब झुगी झौपड़ी वाले पढ़ लिख गए तो क्या होगा। सभी विज्ञापन पर यकीन कर , कोई काम नहीं मिलने पर किसी सेठ करोड़ी मल के घर के सामने खड़े होकर उस से पूछेंगे तुम्हारे घर में अनाज है या नहीं है। सेठ जी कहेंगे जितना मर्ज़ी ले लो भाव तीस रूपये किलो का है। वो अख़बार में छपा इश्तिहार दिखला कर कहेंगे पैसे नहीं हैं मगर तुम मना करोगे तो सरकार से शिकायत करेंगे और तुम जेल में होगे। करोड़ी मल उनको सरकारी गोदाम जाने को कहेगा तो वो कहेंगे उस में सड़ा गला हुआ अनाज है जानवर भी नहीं खाते हैं। जब मुफ्त में पाने का अधिकार है तो बढ़िया ही खाएंगे। 
                      सामने वाले घर में इक भिखारी आंखें दिखा रहा है , घर की मालकिन ने बताया अभी बनाई नहीं रोटी थोड़ी देर में आना। अपने स्मार्ट फोन पर सरकारी ऐप पर शिकायत की धमकी देकर कहता है रोज़ रोज़ चक्क्र नहीं लगा सकता कल से वक़्त पर बना रखना वरना ...   सरकारी विज्ञापन देखा है न। लोग पहले गरीब को रोटी खिलाते थे पुण्य कमाने के लिए। दरवाज़े से कोई भूखा लौट जाये तो पाप समझा जाता था। मगर अब कनून के अनुसार अपराध है। कल मेरा जन्म दिन है याद रखना कुछ मीठा भी बनाना और केक तो ज़रूरी है ही।

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