Sunday, 22 July 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -6 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -6

                                   डॉ लोक सेतिया 

 इस से पहले कि शुक्रवार की कहानी की बात की जाये , आपसे इक सवाल करना चाहता हूं। जवाब अपने मन में सोच लो फिर समझना मुझे क्या क्यों लगा। मान लो आप या मैं अथवा कोई भी और किसी दोस्त या अनजान व्यक्ति के निधन के बाद अनाथ हो गये किसी बच्चे को पालन पोषण के लिए लाते हैं तो अगर वो इक छोटी सी बच्ची है आपके बेटे के बराबर की और उसे बेटी की बड़ा करते हैं तो आपकी नज़र में आपका बेटा और अपनाई हुई बेटी भाई बहन जैसे लगते होंगे या जवान होने पर उन को विवाह के बंधन में बांध कर पति पत्नी बनाना चाहोगे और वो भी लड़की से बिना पूछे। इतना ही नहीं अगर उस बेटे को मालूम हो कि लड़की किसी और से मुहब्बत करती है तब भी नाटकीय ढंग से मां के गंभीर बिमारी की अवस्था में अंतिम इच्छा को मानकर उस से दिखावे को ही सही विवाह कर लोगे। मगर जब वो मां भी बिल्कुल ठीक हो जाती हैं तो ये जानकर कि उन दोनों में पति पत्नी का संबंध नहीं है फिर से इक मांग सामने रख सकती हैं कि मुझे पोता या पोती चाहिए और जब तक नहीं होता मैं एक समय उपवास रखूंगी। यहां भी अपनी पहली गलती को और बढ़ाते हुए अपने पर किये उपकार के बदला चुकाने को लड़की सोचती है कि जिस से मुहब्बत करती है और बाद में दिखावे की शादी को छोड़ जिसकी पत्नी वास्तव में बनना चाहती है उस से संतान पाकर मां की ये इच्छा भी पूरी करे। स्टुडिओ के दर्शक से लेकर एंकर तक इस सामाजिक संबंध की बात करते क्या सोचते भी नहीं। ये आम बात नहीं है आज की बिगड़ती सामाजिक व्यवस्था को दर्शाती है जिस में खून के रिश्ते को छोड़ बाकी सब लड़कियां कुछ भी समझी जा सकती हैं बहन नहीं। विरोधाभास की बात नहीं है कि हरियाणा में जाट समुदाय में गांव के गोत्र में विवाह नहीं करना उचित समझते। अपने पिता माता और नानी के गोत्र के साथ गांव में जिस गोत्र को महत्व देते हैं उसके लड़के लड़की भाई बहन समान समझते हैं। इसे आप कठिन समझते हैं आधुनिक युग में तो सही है मगर एक घर में साथ साथ पले बढ़े बच्चे दोस्त या भाई बहन की तरह ही आपस में नाता स्वाभाविक समझते हैं। गांव में अभी भी गांव की लड़की को इसी निगाह से देखना पसंद किया जाता है। 
                     शायद अब कहानी आप समझ गये होंगे दोहराना नहीं ज़रूरी है। जब लड़की अपने आशिक से शरीरिक संबंध की बात करती है तो वो इसे बेहद आपत्तिजनक मान कर इनकार कर रिश्ता तोड़ने की बात करता है। अपनी जगह वो शत प्रतिशत सही है , विवाह को इक खेल तमाशा बना देना हमारे समाज में बेहद अनुचित है। शादी कर जिस के साथ रहती है उस को छोड़ अपने आशिक के बच्चे की मां बनना तो ममता शब्द को भी अपमानित करना है। मगर जब प्रेमी नहीं मानता तब जिस से दिखावे की शादी की थी उसी से गले में मंगलसूत्र पहनने की बात कर पति पत्नी बनकर संतान पैदा करने की बात करती है। मगर अब हैरानी की बात है कि लड़का बताता है वो तो हमेशा उसी को चाहता था मगर कह नहीं पाया लेकिन मां को शायद समझ आ गया था तभी उसने गंभीर बिमारी में ये वचन मांगा था। लो जी ये सुखद अंत है। मगर इस से आप समाज को कोई भी अच्छा संदेश कदापि नहीं दे सकते हैं। ये क्या हो गया है कहानीकार को टीवी चैनल वालों को और ऐसी कहानी देख कर तालियां बजाने वालों को। इस से अधिक कुछ भी कहना संभव ही नहीं है। खेदजनक बात है , मार्गदर्शन नहीं राह से भटकाती हैं ये कथा कहानियां।

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