Saturday, 11 January 2014

जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कहानी एक वफादार कुत्ते की है। अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता। कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया। वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है। इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये। वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता। अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे। गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये। तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो। मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना। हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो। बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते। कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को। धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा। इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई। जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा। अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था।
                              आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है। अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं। मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है। हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं। इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं। कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं। जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं। जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते।
                                     चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये। मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है। अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी। संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है। हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत। आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है। आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं। नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता। संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा। आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी। अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते। सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था।
                     सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है। जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके। भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है। कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं। जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को। जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह। अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों। जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर। वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है। तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह।

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