अक्टूबर 08, 2020

POST : 1387 विश्व कल्याण नहीं खुदगर्ज़ी में अंधे हम लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        विश्व कल्याण नहीं खुदगर्ज़ी में अंधे हम लोग          

                                    (  आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

    सोच कर दिल घबराता है कि हम कहां से चले थे हमको किधर जाना था और हम किस जगह पहुंच गए हैं। चकाचौंध रौशनी है जिस में सच झूठ का फर्क नहीं दिखाई देता है इक शोर है जिस ने पूरे वातावरण को जैसे भयानक ख़मोशी में बदल दिया है। विवेक को छोड़ डर से लालच से हम किसी की हर बात को सच मानकर दोहराने लगे हैं। सच बोलने से कतराने लगे हैं झूठ को सच बनाने लगे हैं। विश्व देश समाज मानवता के मूल्य जानकर भुलाने लगे हैं अपने स्वार्थ नज़र आने लगे हैं सभी अच्छे आदर्श किसी ठिकाने लगे हैं। बोलने से पहले फायदे नुकसान के तराज़ू पर ज़मीर डगमगाने लगे हैं ऊंचे चढ़ने को पायदान ढूंढते खुद को नीचे गिराने लगे हैं। खुदगर्ज़ी में सामाजिक पारिवारिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने और अपने विचारों में ज़हर भरे ऐसा समाज का निर्माण कर रहे हैं जिस में खुद भी सुरक्षित नहीं और सभी के लिए खतरा हैं। हवा पानी धरती पेड़ पौधे किसी को भी छोड़ा नहीं है जीने को खुद मौत का सामान बनाते रहे हैं। आज़ादी का अर्थ नहीं जानते देशभक्ति के मायने याद नहीं और नैतिकता ईमानदारी इंसानियत की परिभाषा बदलने लगे हैं। मनोरंजन जीवन का मकसद नहीं हो सकता है सार्थक जीवन की बात महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। शिक्षा स्वास्थ्य और सभी के लिए समानता की बात को छोड़ अपने लिए इनका उपयोग खास बनने को करते हुए मार्ग से भटक गए हैं शिक्षक चिकित्सक उपदेशक समाजसेवा की धर्म की बात करने वाले लोग। इस सिरे से उस सिरे तक सभी शामिल हैं अपने समाज को रसातल को ले जाने के अपराध में।  धन दौलत पैसा शोहरत भगवान बन गए हैं और ये हासिल करने वाले हमारे नायक कहलाने लगे हैं कितने खोखले आदर्श हैं आधुनिक समाज के जिस के नायक ऐसे लोग हैं जिनको बहुत मिला है फिर भी उनको और अधिक की लालसा है सब है फिर भी और की चाहत है ये सबसे गरीब होना है। हर कोई जो है ही नहीं वैसा आदर्शवादी महान कहलाने को व्याकुल है। जैसे अपने चेहरे को किसी मुखौटे से छिपाते हैं कहते उपदेश देते हैं जो खुद उन बातों पर खरे उतरने की बात नहीं सोचते हैं।
      
   सच कहूं तो अभी समझ नहीं आ रहा कि आज लिखना क्या है। बस यही चाहता हूं कि कुछ नया लिखा जाये और सार्थक लिखा जाये। विषय तमाम हैं मन में फेसबुक से लेकर समाज तक , देश की राजनीति से लेकर पत्रकारिता तक। अपनी गली की बात से देश की राजधानी तक। इधर उधर यहां वहां सब कहीं का हाल। बहुत ही आश्चर्य की बात है जिस किसी से भी चर्चा करो सभी जानते हैं कि कहीं भी सब ठीक नहीं है। मगर किसी को सच में इस बात से सरोकार नहीं है कि उसको कब कौन कैसे सही करेगा। क्या हम किसी और देश की बात करते हैं , ये अगर हमारा अपना वतन है तो इसकी बदहाली को देख कर हम भला चैन से कैसे रह सकते हैं। कभी कभी लगता है जैसे हम लोग संवेदनहीनता का शिकार हो गये हैं। किसी को किसी के जीने मरने से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। जिसको देखो अपना ही रोना रो रहा है। ये बेहद चिंता का विषय है कि लोग शोर भले मचाते हों सब देशवासी एक हैं ये देश सभी का है और हम एक हैं मगर ये बात वास्तव में दिखाई देती नहीं है। क्या यही आधुनिक होना है , क्या हम सभ्य नागरिक बन रहे हैं या यहां हर कोई अपने स्वार्थ की बात ही सोचता है। सवाल  बहुत हैं सामने जवाब कोई भी नहीं। एक तरफ करोड़ों लोग दो वक्त रोटी को तरसते हैं तो दूसरी तरफ कुछ लोग बेरहमी से हर चीज़ की बर्बादी दिन रात करते हैं। क्या ये देश दो हिस्सों में बटा हुआ है , विशेष लोगों को सभी कुछ और बाकी आम लोगों को कुछ भी नहीं। कितने राजनैतिक दल कितने तथाकथित नेता हैं देश में , लेकिन सभी का ध्येय सत्ता की राजनीति करना बन गया है। सब जोड़ तोड़ सारी भागमभाग कुर्सी हथियाने का एक ही मकसद लेकर। कोई विचारधारा नहीं , कोई योजना नहीं देश में सभी को एक समान जीने के हक़ मिलने की। ये कैसा विकास हो रहा है जिसमें गरीब और अमीर के बीच अंतर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा , बल्कि और अधिक बढ़ता ही जा रहा है। क्या ये हैरानी की बात नहीं है कि जब देश समाज रसातल की तरफ जाता नज़र आता है तब हम तथाकथित पढ़े लिखे लोग कोई चिंतन करने की बजाय फेसबुक पर ट्विटर पर चैटिंग पर मौज मस्ती कर अपना समय बिताते नहीं व्यर्थ बर्बाद करते हैं। कभी काश सोचते कि यही वक़्त यही साधन यही ऊर्जा किसी और की भलाई करने पर लगाते। ऐसा लगता है हम आंख वाले अंधे बन चुके हैं , आस पास कुछ भी घटता रहे हम विचलित नहीं होते। मीडिया टीवी अख़बार सच के पैरोकार कहलाने वाले कभी निष्पक्ष और निडर ही नहीं रहते हैं बल्कि उनका उदेश्य धन कमाना और खुद को महान बताना होता है। कभी ऐसा नहीं होता था और  कहा जाता था कि पैसा ही बनाना है तो और कोई काम कर लो अगर जनहित और समाज की देश की बात करनी है तो अपना घर जला कर भी रौशनी करो। आज वही लोग टीवी अख़बार लेखन को शुद्ध कमाई का कारोबार समझने लगे हैं। विज्ञापन ,  संख्या , टी आर पी , यही मापदंड बन गये हैं इनके। सच बोलते नहीं हैं , झूठ को सच का लेबल लगा कर बेचने का काम करते हैं। एक अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं ये सब , एक नीचे गिरता है तो बाकी भी उससे भी नीचे गिरने को तैयार हैं , अव्वल आने के लिये। लगता है इनमें यही प्रतियोगिता चल रही है कि कौन मूल्यों का कितना अवमूल्यन करता है। धर्म जो दीन दुखियों की सेवा की बात किया करता था आज वो भी धन संपति जोड़ने और अहंकार करने की राह चल पड़ा है। हर बात में लाभ हानि का गणित होता है चाहे वो शिक्षा के विद्यालय हों , स्वास्थ्य सेवा देने वाले अस्प्ताल या फिर समाज सेवा ही क्यों नहीं हो। वो जिनके पास दौलत के अंबार लगे हैं वे भी दौलत की हवस में अंधे हो बिना जाने समझे हर उचित अनुचित रास्ता अपना रहे हैं। ये फिल्मी सितारे हों या खिलाड़ी या फिर येन केन प्रकरेण धन कमाने वाले यही आज के आदर्श बन गये हैं और इनका गुणगान किया करता है आज का मीडिया जो खुद इन के जैसा ही बनना चाहता है। जनहित , देशहित , त्याग और समाजिक मूल्यों की बातें शायद किस्से कहानी की बात लगती है या कुछ ऐसी पुरानी किताबों में लिखी हुई है जो अब उपयोगी समझी ही नहीं जाती। राम और कृष्ण का देश नहीं रह गया ये देश अब , रद्दी के भाव बिकती हैं आदर्शवादिता की सारी बातें। सच कहूं तो अपने देश की , अपने समाज की इस बर्बादी के लिये हम सभी किसी न किसी रूप में ज़िम्मेदार हैं। चलो सब आगे बढ़ें और अपने अपने हिस्से की धूल को साफ करें। दोष उसका नहीं जो आईना दिखाता है , दाग़ अपने चेहरे पर जो हैं , साफ उनको करना होगा। इनसे अधिक हैरानी की बात बुद्धीजीवी वर्ग का ये स्वीकार करना कि कुछ बदलना संभव नहीं है , जिनके ज़हनों में अंधेरा है बहुत , दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत। ऐसे लोगों से इतना कहना चाहता हूं।
 
  कागज़ कलम नहीं लैपटॉप कंप्यूटर पर सोशल मीडिया पर लिखने लगे हैं , पढ़ने को फुर्सत नहीं अब तो हर कोई चाहता है जल्दी से समझना , लंबी बात पढ़ने को फुर्सत नहीं है। पढ़ने के बाद विचार नहीं करना बस पसंद करना तक की बात है। दो लफ़्ज़ों की कहानी भी इतनी छोटी नहीं होती है। जाने कैसी पढ़ाई की है कि पढ़ना अच्छा नहीं लगता , हर कोई बोलना चाहता है सुनता कोई भी नहीं। मुझे कहते हैं लिखा तो सबको भेजने की ज़रूरत क्या है नहीं पढ़ता कोई विस्तार से इतनी लंबी बात। शब्द क्या है मन की भावना को इक आवाज़ देने का उपाय भीतर कुछ है बाहर आना चाहता है लब पर आते हैं शब्द तभी अर्थ समझता है सुनने वाला और शब्द सार्थक हो जाते हैं। किसी से कहना नहीं कोई जानेगा नहीं समझेगा नहीं तो लिखना किस काम का। जीवन में सबसे पहले खुद को समझना है फिर पाना है अपने आप को अपने अस्तित्व को जानकर। भगवान खुदा की बात उसके बाद की बात है मगर दुनिया के बहकावे में हम विपरीत दिशा को जाने लगे हैं। आज थोड़ा विस्तार से फिर भी कम शब्दों में संक्षेप से तमाम बातों की चर्चा करते हैं। सिलसिलेवार इक इक को लेकर चिंतन करते हैं। 

राजनीति समाज और साहित्य :-

     इनको अलग नहीं किया जा सकता है। राजनीति का पहला मकसद नीति की बात को समझना है मगर आजकल नीति की कोई बात ही नहीं करता। जिसको आप राजनीति समझते हैं वो वास्तव में किसी का या शायद सभी का इक सत्ता की सुंदरी पर आसक्त होना है। वासना में जब आकर्षण से बंधे किसी के पांव छूने चाटने लगते हैं तब मुहब्बत की प्यार की बात नहीं कुत्सिक मानसिकता की बात होती है। आजकल राजनीति सत्ता पाने का मार्ग बनकर रह गई है सत्ता पाकर देश समाज की दशा बदलने की बात छूट गई है। साहित्य अख़बार अथवा आधुनिक परिवेश में मीडिया टीवी चैनल वास्तव में किसी दर्पण की तरह होने चाहिएं। और आईने का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है उसको समाज की छवि को सामने लाना होता है। मगर यहां आईना खुद को तस्वीर समझने लगा है और वास्तविकता को नहीं देखता न दिखलाना चाहता है। फिर ये आईना किस काम का है , जब कोई दर्पण सच नहीं झूठी तस्वीर बनाकर दिखाने लगे तो उसको हटवा देना उचित है। ऐसे आईने को तोड़ना अच्छा है। जो चिंतक विचार बनकर राह दिखलाते थे समाज और राजनीति के आगे चलते थे मार्ग दिखलाते थे आज सत्ता और स्वार्थ की राजनीति के पीछे भागते हुए पागल होकर अपने मकसद से भटक गये हैं। हम यही कर सकते हैं कि इनको कोई महत्व नहीं देकर इनके पतन को ऊंचाई समझना छोड़ नकार दें। ये खुद ब खुद मिट जाएंगे अपनी नियति को पाकर। कोई इनकी दूषित सोच को सही नहीं कर सकता है इस तालाब का सारा पानी गंदा है इसको बदलना होगा तालाब को खाली कर नया साफ पानी डालना होगा। कोई विचार ही नहीं विचारधारा की बात क्या करें सत्ता की चाह ध्येय है धन दौलत शोहरत की हवस की कोई सीमा नहीं है।

मुहब्बत रिश्ते नारी पुरुष संबंध :-

    मुहब्बत क्या है ये वो नदी है आपको लगता है बहती जाती है और अपने समंदर से मिलती है। मगर नदी क्या है नदी दो किनारों का नाम है जो कहीं नहीं मिलते , उसी जगह रहते हैं आमने सामने दो आशिक़ साथ भी और फासले को निभाते हुए भी। कोई पुल इन किनारों को जोड़ता है मगर मिलवाता नहीं है बस इस किनारे से उस किनारे कोई आता जाता है। जैसे कोई डाकिया किसी खत को आदान प्रदान करता है। बहता पानी है दोनों के बीच में और राह में कोई प्यास बुझाता है कोई मैल धोता है कोई मछली पकड़ता है कोई डुबकी लगाता है कोई तैरता है कोई डूब कर फिर उभरता नहीं है नदिया में । पानी के साथ बहते बहते जाने क्या क्या अपनी मंज़िल की तलाश में बहता हुआ किसी जगह जा पहुंचता है। समंदर तक जाते जाते पानी जीवन का आखिरी पल समंदर से मिलने से नहीं उस में विलीन होने पर खो देता है। समंदर की गहराई आशिक़ के भीतर की घुटन को छुपाने को होती है और हम बाहर खड़े उसकी लहरों को देख समझते हैं थाह पा ली है। समंदर की ख़ामोशी को कोई हवा तोड़ने का काम करती है थोड़ी देर को तूफ़ान बनकर मगर तूफ़ान गुज़र जाता है हवाएं थम जाती हैं और समंदर खामोश ही रहता है। उसके भीतर की आवाज़ का कोई शोर नहीं होता है उसकी गहराई बहुत कुछ छुपाये रखती है। नदी का सफर पर्वत से समंदर तक धरती का सफर है पानी की धारा जीवन में मधुर संबंध प्यार रिश्ते नाते की तरह है जिसको समझे बिना हम कोई अनुभव नहीं हासिल कर सकते हैं। प्यार की मुहब्बत की भावना की धारा हमारे भीतर बहती नहीं है और स्वार्थ की अपने मतलब हासिल करने की भावना दुश्मनी और नफरत का ज़हर भरा रहता है जिस से हम जीते हैं मगर जीवन नहीं होता है। रिश्ते प्यार त्याग और समर्पण के नहीं रहे आत्मा मन से नहीं शारीरिक और स्वार्थ से होने लगे हैं वासना और मतलब ने प्यार को भी कारोबार समझ लिया है। पाना चाहते हैं देना नहीं चाहते तो कुछ और होगा मुहब्बत नहीं हो सकती है।


     दुनिया बदल चुकी है मगर हम अभी भी उसी जगह खड़े हैं सदियों से। आज भी सुबह टीवी अख़बार पर कोई बारह राशियों का राशिफल बताता है अर्थात एक नाम की राशि वाले सभी का समय एक जैसा रहेगा। कोई थोड़ा चालाकी करता है और बताता है भाग्य के साथ अगर आप खुद भी संभल जाओ तो बुरे से बच सकते हैं और अच्छे को और बेहतर बना सकते हैं। भगवान से आज भी हम प्यार और भरोसा नहीं करते बल्कि उस से डरते हैं घबराते हैं। आज भी टीवी वाले नागिन के महिला बनने की कहानी परोसते हैं विष कन्या की कहानी बनाते हैं और हमें दिशा दिखाने की जगह भटकाने का काम करते हैं। धर्म आज भी समझने और अच्छाई बुराई परखने की बात नहीं कहता और केवल धर्म के ठेकेदारों का कारोबार बढ़ाने की बात करता है। गिनती नहीं है कितने मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे हैं जिनको लेकर कहते हैं वहां जाकर मांगने से सब मिलता है मगर हर दिन लाखों लोग ऐसी जगहों पर जाते हैं सब मिला कर करोड़ों लोग कितना वक़्त और पैसा इस पर खर्च करते हैं फिर भी शायद ही उनकी कामना पूरी होती है और दूसरी तरफ धनवान लोग पूजा अर्चना भी आडंबर रचाने की तरह किया करते हैं और किसी अंधविश्वास की परवाह नहीं करते फिर भी उनके सब काम होते रहते हैं। विवाह तक कुंडली मिलाने के बावजूद असल में सफल नहीं होते और या संबंध विछेद की बात होने लगती है या किसी तरह से समझौता कर नर्क की तरह ज़िंदगी बिताने को तैयार हो जाते हैं। जिस जल के छिड़कने से इंसान की हर वस्तु शुद्ध हो जाती है उस से किसी महिला की पावनता कायम नहीं हो पाती भले उसका कोई दोष नहीं हो और उसके साथ किसी वहशी ने कदाचार किया हो। पुरुष की पावनता का कोई सवाल नहीं उठता है कुदरत ने पुरुष और नारी को जैसा बनाया है उस को समझे बिना और वास्तविक पावनता मन की आचरण की विचारों की होती है इसे समझे बिना कुल्टा शब्द उपयोग किया जाता है। जिन धार्मिक किताबों को लोग पूजते हैं उन्हीं से सबक लेते तो पता चलता वास्तविकता कुछ और है। मगर हम इसकी चर्चा से घबराते हैं और सवाल करने से बवाल खड़ा हो जाता है। तर्क वितर्क की बात करना छोड़ दिया है। वास्तव में हमारा धर्म आवरण की तरह है जो लिबास पहना हुआ है उसे धर्म समझते हैं लिबास के भीतर जो है वास्तव में उस इंसान उसकी अंतरात्मा की कोई बात नहीं करता है। कर्मकांड को धर्म मान लिया है ताकि वास्तविक धर्म की कठिन राह पर चलने से बच सकें। कोई विचार नहीं करता कि जब हर तरफ सभी धर्म की मानने की बात करते हैं तो पाप अपराध और अधिक बढ़ते कैसे जा रहे हैं। उस धर्म का क्या फायदा जो सच की भलाई की सच्चाई की राह से दूर करता जा रहा है जिसका मतलब है समझने और समझाने में कोई खोट है।
 
                         कौन लोग हैं जो हम सभी को आधुनिक समाज नहीं बनने देना चाहते हैं क्योंकि जिस दिन हम निडर होकर सच का साथ देने और झूठ का विरोध करने लगे उनका शासन बचेगा नहीं। ठीक समझे हैं आप इस में राजनीति कारोबार और धर्म गुरुओं से लेकर मीडिया टीवी चैनल अख़बार ही नहीं तमाम लिखने वाले भी किसी न किसी सीमा तक शामिल हैं कोई आपको सोचने की आज़ादी नहीं देना चाहता है। उन का स्वार्थ आपको अधिकतर लोगों को कूप मंडूक बनाये रखना ही है। शिक्षा आपको विवेकशील नहीं बनाती है तो उस शिक्षा से हासिल क्या हुआ इंसान को बेजान सामान बनाने वाली शिक्षा अपने कर्तव्य से भाग रही है। वर्ना इतना पढ़ लिख कर उच्च पद पाने के बाद भी कोई अंधविश्वास के चंगुल में कैद कैसे रह सकता है। कोई चिंतक कोई समाज सुधारक सामने नहीं दिखाई देता है कोई ज्ञान की रौशनी दिखलाने वाला नहीं है और जो अंधेरों का कारोबार करते हैं दावा करते हैं उजाला लाने का। किस जगह ठहरा हुआ है समाज जिस जगह सैंकड़ों साल पहले था और कब तलक आगे नहीं बढ़ेगा उस सब को छोड़कर। 
 

 जीने का ढंग क्या हो :-

       आप पैदल चलते हैं या किसी वाहन की सवारी कर सफर करते हैं आपको कुछ कायदे कुछ नियम समझने ज़रूरी होते ही हैं। बायीं तरफ चलना देख कर कदम रखना और ऊंचाई या निचाई फिसलन या धूल और गंदगी के इलावा जानवर आदि का ध्यान रखना होता है। सड़क पार करनी हो तब इधर उधर देख सही जगह से करना होता सुरक्षा की खातिर। जब आप वाहन चलाते हैं तब भी आपको बहुत बातों का ध्यान रखना होता है। किस गति से चलना किस तरफ कैसे मोड़ काटना सिग्नल पर रुकना और हैलमेट पहनना। आपको सिर्फ खुद अपने वाहन का ही ध्यान नहीं रखना होता , दायें बायें आगे पीछे चलते वाहनों का भी ख्याल रखते हैं। कभी सोचो अगर सब केवल खुद अपनी मर्ज़ी से इधर उधर होते बगैर सब को रास्ता देते चलने लगें तो कितना टकराव हो कितनी दुर्घटनायें घटती हैं ऐसी लापरवाही से। पुलिस हवालदार और जुर्माने का डर काफी मदद करता है खुद हमारी सुरक्षा में।  विश्व कल्याण और मानवता सभी की भलाई की बात को छोड़कर हम लोग सिर्फ अपने अपने मतलब को महत्व देने लगे हैं , कितना खुदगर्ज़ समाज का निर्माण कर लिया है हमने कभी सोचा है। 

                 मगर क्या हम अधिकतर जीवन में इन बातों पर विचार करते हैं , जीने का सही तरीका भी वही है जब हम सब केवल अपनी सुविधा नहीं सभी की परेशानियों और अधिकारों की परवाह करें। कभी ध्यान देना हमारी अधिकतर समस्याओं की जड़ खुद हमारे अथवा किसी दूसरे के सामाजिक नियमों की अनदेखी करना होता है। मुझे जो चाहिए जैसे चाहिए की सोच उचित नहीं है , क्यों और किसलिए भी सोचना समझना ज़रूरी है। काश इतनी छोटी सी बात सभी समझ लें कि चाहे जो भी हो हमें सही राह पर चलना है , मुश्किलों से बचने को आसान रास्ते नहीं तलाश करने। कहने को बेशक हम सब दावा करते हों कोई अनुचित कार्य नहीं करने का , मगर वास्तविकता ये नहीं है। अगर हम अनुचित नहीं करते तो कोई हमारे कारण परेशान नहीं होता। खेद की बात तो ये है कि हम हर अनुचित काम उसको उचित ठहरा कर करते हैं। आप अपने घर के सामने सफाई रखते हैं और चुपके से या छिपकर अपनी गंदगी पड़ोसी के दरवाज़े के सामने या जहां कहीं चाहते हैं डाल देते हैं। कोई रोकता है तो हम समझते हैं वही गलत है , इस तरह हम चोरी और सीनाज़ोरी करते हैं। रिश्वत खाना और खिलाना दोनों अनुचित हैं , हम उचित काम भी अपनी सुविधा से करवाने को ऐसा मर्ज़ी से भी करते हैं और कभी विवश होकर भी। आपने रिश्वत देकर अपना काम ही नहीं करवाया अपने दूसरों के लिए भी मुश्किल खड़ी कर दी , क्योंकि आपने गलत लोगों की आदत बना दी घूस लेने की।

            सोचो अगर सरकारी अधिकारी अपना काम निष्पक्षता से पूरी इमानदारी से करते तो आज देश की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं होती। चंद सिक्कों की खातिर अपना ईमान बेचकर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने देश के करोड़ों लोगों के प्रति अपराध किया है।  कितने राजनैतिक दल कितने तथाकथित नेता हैं देश में , लेकिन सभी का ध्येय सत्ता की राजनीति करना मात्र हो गया है। सब जोड़ तोड़ सारी भागमभाग कुर्सी हथियाने का एकमात्र मकसद लेकर। कोई विचारधारा नहीं , कोई योजना नहीं देश में सभी को एक समान जीने के हक़ मिलने की। ये कैसा विकास हो रहा है जिसमें गरीब और अमीर के बीच अंतर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा , बल्कि और अधिक बढ़ता ही जा रहा है। उद्योगपतियों कारोबारियों , सभी ने नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाईं हैं। अध्यापक या डॉक्टर क्या इस लिये होते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को मानव कल्याण के खिलाफ अपने मतलब के लिये इस कदर लूट खसूट का कारोबार बना देना चाहें। वकील और न्यायधीश न्याय को हैं अथवा अपनी ज़रूरत अपनी सुविधा अपनी आय ही सब से बड़ा धर्म है। कोई जो भी काम करता है उसको अपने कर्तव्य में ईमानदारी को महत्व देना होगा , जब कोई भी अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता और अधिकार सब चाहते तब यही होना है जो आज होता दिखाई देता है। कभी ये बड़े  बड़े धनपशु राजनेता खिलाडी अभिनेता तमाम तरह के धंधे करने वाले उद्योगपति कारोबारी लोग विचार करते इंसान को कितना चाहिए अंत दो गज़ ज़मीन की ज़रूरत है। इतना संचय करना अपव्यय करना अपने ऐशो आराम शानो शौकत पर मनवता के खिलाफ अपराध ही है कि जिस मायानगरी में ऊंची अटालिकाओं में ये रहते हैं उसी महानगर में दुनिया की सबसे गरीब लोगों को बड़ी बस्ती है। नहीं ये कोई भाग्य की बात नहीं है ये उचित से कहीं अधिक अनुचित ढंग से कमाई पाप की कमाई है। मानवता की इंसानियत की परवाह छोड़ कर ही इतना किया जा सकता है।

           आम आदमी क्या तथाकथित महान कहलाने वाले लोग भी अपने मार्ग से भटके हुए हैं। धर्मप्रवचक उपदेशक खुद मोह माया और नाम शोहरत में उलझे हैं , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। क्या यही उपदेश है किसी भी धर्मग्रंथ में लिखा कि धर्मस्थल अपने पास धन दौलत के अंबार जमा करते रहें। दीन दुखियों की सेवा की बात किस को याद है। पत्रकारिता और लेखकों कलाकारों अभिनय करने वालों फिल्मकारों आदि को मालूम है उनको क्या आदर्श स्थापित करने हैं। समाज का आईना जब बिगड़ गया है और धन दौलत हासिल करना सफलता का पैमाना बन गया हो तब क्या होगा।  पथप्रदर्शक मार्ग से भटक गये हैं। शायद किसी को फुर्सत ही नहीं ये सोचे कि उसका अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभाना उसकी निजि बात नहीं है। हर मानव समाज का हिस्सा है और हर हिस्से को सही काम करना चाहिए। आप प्रकृति को देखें हवा पानी आग मिट्टी , पेड़ पौधे सूरज सब नियमित अपना अपना काम करते हैं , दुनिया तभी कायम है। आपके जिस्म में हर अंग अपना अपना काम ठीक करता है तभी हम ज़िंदा हैं , हाथ पांव क्या बदन का छोटे से छोटा भाग ठीक नहीं हो तब मुश्किल होती है।  जिस्म के अंदर भी मांस हड्डी रक्त और हृदय गुर्दे और फेफड़ों की तरह कितने और भाग हैं मस्तिष्क  की नाड़ियों से लेकर महीन ग्रन्थियों तक , सब अपना काम रात दिन करते हैं तभी जीवित हैं हम सब। यही नियम समाज का भी है , जब हम में कोई अंग रोगग्रस्त होता है बिमारी का असर सारे समाज पर पड़ता है।

                  शायद अब आप सोचोगे कि काश इंसान के लिये भी कोई कानून का पालन करवाने वाला हवालदार होता जो हर लाल बत्ती की तरह गलत दिशा में जाने से रोक देता। मगर वास्तव में ऐसा है , वो ईश्वर है या जो भी जिसने इंसान को बनाया है , उसने इक आत्मा इक रूह इक ज़मीर सभी में स्थापित किया है। मगर क्या हम अपनी अंतरात्मा अपने ज़मीर की आवाज़ सुनते हैं , ये फिर लाल बत्ती पर कोई हवालदार खड़ा नहीं होने पर सिग्नल तोड़ आगे निकल जाते हैं। सब जानते है उचित क्या है अनुचित क्या , पाप पुण्य का अंतर समझने को शिक्षित होना ज़रूरी नहीं है। जब भी किसी के साथ अन्याय करते हैं या किसी को उसका अधिकार नहीं देते तब हम जानते हैं ऐसा गलत है। हर धर्म यही समझाता है मगर हम खुद को धार्मिक बताने वाले धर्म-अधर्म में अंतर जानते हुए भी अनुचित मार्ग अपनाते हैं खुदगर्ज़ी में। लेकिन क्या हम सोचते हैं हमें अपने अपकर्मों की कर्तव्य नहीं निभाने की कोई सज़ा नहीं मिलेगी। ये खुद को धोखे में रखना है। आप बबूल बोते हैं तो आम कैसे खाओगे। आपका बीजा बीज इक दिन उगेगा पेड़ बनकर , अगले जन्म की बात नहीं है , इसी जन्म में सब को अपने अपकर्मों की सज़ा मिलती है ये कुदरत का नियम है जो किसी सरकारी कानून की तरह बदला नहीं जा सकता। हैरानी की बात ये है कि जब हम सभी को कोई दुःख कोई परेशानी होती है तब हम ये नहीं सोचते कि ऐसा अपने किसी अपकर्म के कारण तो नहीं हुआ , हम किसी और को दोषी ठहरा अपने आप को छलते हैं। सही यात्रा के लिये यातायात के नियम पालन करने की ही तरह सार्थक जीवन यात्रा जीवन में मानवीय मूल्यों का पालन कर ही संभव है। 
 
                    जैसे मेरे अंदर सोया हुआ कोई फिर से जाग गया। बहुत दिन से अखबारों में चर्चा  को नगर  में मानव अधिकार आयोग की सभा आयोजित होनी है। सोचा चलो चल कर देखते हैं शायद कुछ विशेष मिल जाये जो सार्थक हो। पता चला कि सैमीनार आलीशान बैंकट हाल में होना है क्योंकि सरकारी सभी इमारतों के हाल वातानुकूलित नहीं है , और बड़े बड़े लोग आने हैं भाषण देने को। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा प्रवेश के मुख्य द्वार पर बैठे पुलिस वाले आम लोगों को दूसरे रास्ते से भेज रहे हैं। मैंने पूछा क्या सभा उधर हो रही है , तो बताया गया कि नहीं सभा तो यहीं ही है मगर , मैंने कहा , क्या ये दरवाज़ा ख़ास लोगों के प्रवेश के लिये सुरक्षित है। तब इक पुलिस वाले ने इशारा किया दूसरे को कि मुझे यहीं से अंदर जाने दे , और मैं भीतर चला गया। हाल भरा हुआ था और अधिकतर सरकारी लोग , पंचायतों के सदस्य , और तमाम बड़े तबके के लोग या संस्थाओं से जुड़े लोग ही नज़र आ रहे थे। जिन गरीबों मज़दूरों , घरों में दुकानों में काम करने वाले बच्चों को कोई अधिकार नहीं मिलता , उन में से कोई भी वहां नहीं दिखाई दिया मुझे। देखते ही किसी शानदार पार्टी का आयोजन जैसा प्रतीत हो रहा था। सभा शुरू हुई तो बात मानवाधिकारों की हालत पर चिंता की नहीं थी , संचालक अधिकारी लोगों की महिमा का गुणगान करने लगा था। मुझे इक मुल्तानी कहावत याद आई , तू मैनू महता आख मैं तैनूं महता अखेसां। उसके बाद आयोग के लोग बताते रहे कि दो तीन साल में ही हरियाणा का मानव आयोग एक कमरे से शुरू होकर आज एक पूरे भवन में काम कर रहा है। बिलकुल सरकारी विकास के आंकड़ों की तरह , जिसमें ये बात पीछे रह जाती है कि जिस मकसद से संस्था गठित हुई वो कितना पूरा हुआ या नहीं हुआ। बस कुछ सेवानिवृत लोगों को रोज़गार मिल गया , यही अधिकतर अर्ध सरकारी संस्थाओं में होता है जहां करोड़ों का बजट किसी तरह उपयोग किया जाता है , साहित्य अकादमी भी ऐसी ही एक जगह है।

                  भाषण होते रहे और अधिकतर मानवाधिकारों के हनन की बात से इत्तर की ही बातें हुई। लगता ही नहीं कोई समस्या भी है किसी को मानवाधिकार नहीं मिलने की। अच्छा हुआ कोई पीड़ित खुद नहीं आया वहां वरना निराश ही होता , जो कुछ लोग थोड़ी समस्याएं लेकर गये उनको भी पुराने सरकारी ढंग से स्थानीय अफ्सरों से मिलने की राय दी गई। और जिनकी शिकायत उन्हीं को हल निकालने की बात कह कर समस्या का उपहास किया गया जैसे। तीन चार घंटे चले कार्यक्रम में कहीं भी चिंता या मानवाधिकारों की बदहाली पर अफसोस जैसा कुछ नहीं था , मानों कोई दिल बहलाने को मनोरंजन का आयोजन हो। बार बार संवेदना शब्द का उच्चारण भले हुआ , संवेदना किसी में कहीं नज़र नहीं  आई। वास्तव में ये सभी वो लोग थे जिनको कभी जीवन में अनुभव ही नहीं हुआ होगा कि जब कोई आपको इंसान ही नहीं समझे तब क्या होता है। पता चला ये आयोग राज्य के बड़े सचिव मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को सेवानिवृत होने के बाद भी पहले की ही तरह सरकारी सुख सुविधा पाते रहने को इक साधन की तरह उपयोग किया जाता है। जो सरकार सत्ता की अनुकंपा से ऐसा रुतबा पाते हैं उन्हीं से अपेक्षा रखना कि नागरिक को सरकार और अधिकारी वर्ग से वास्तविक मानवाधिकार दिलवाने का कर्तव्य निभाएं इक मृगतृष्णा जैसा है। न्यायधीश तक सेवा काल खत्म होने के बाद अपने लिए सब कुछ पाने को इसका उपयोग करते हैं। शायद ही किसी को वास्तविक मकसद की कोई परवाह है। अंधी पीसती है कुत्ते खाते हैं की कहावत सच लगती है , शिक्षित लोग देश समाज की नहीं अपनी चिंता करते हैं और उनको अपने सिवा कोई नज़र आता नहीं है।  और यही सरकारी नेताओं विभागों संगठनों संस्थाओं की बड़ी बड़ी सभाओं में होता है जिनको वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता है बस अच्छी अच्छी बातें भाषण होते हैं जिनका हासिल कुछ भी नहीं होता है। अपने उद्देश्य को भूलकर अपने को विशेष और बेहद महान घोषित करते पढ़े लिखे अनजान होकर जानकर होने का दम भरते झूठे लोग। जनता देश की समस्याओं का समाधान ढूंढने नहीं खुद सबसे बड़ी समस्या बन गए हैं।
 

शांति की खोज से हिंसा की राह तक  :-

 
    बस अब आतंकवाद को खत्म करने का वक़त आ गया है , ये ब्यान उस समय का है जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था। तब समझ आया था तब तक आतंकवाद को खत्म करने का समय ही नहीं आया था। अपने घर को आग लगी तब समझ आया वर्ना देश जलता रहा शासक बंसी बजाते रहे। अमेरिका भी 11 सितंबर से पहले आतंकवाद को हथियार बेचने का कारोबार समझता रहा था। हमारे नेता हर समस्या पर उचित समय पर कदम उठाने की बात करते हैं। गरीबी भूख बदहाली खराब शिक्षा और स्वास्थ्य दवाओं को ठीक करने का वक़्त कभी नहीं आने वाला है क्योंकि राजनीति करने को इनकी बहुत ज़रूरत है। आतंकवाद पर कहते हैं पड़ोसी देश बढ़ावा देता है और सीमा पार से आतंकी आते हैं मगर क्या हमने आतंकवाद को अपने घर महमान बनाने की बात नहीं की है। अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को खुद कंधार ले जाकर रिहा करने का फल था संसद पर हमला। आज बात का विषय केवल आतंकवाद नहीं है और न ही किसी भी दल की सरकार की ही बात है बात देश के हर वर्ग की है केवल राजनेताओं की ही नहीं है आम नागरिक से कारोबार करने वाले नौकरशाही और उद्योग जगत के साथ टीवी अख़बार और समाज को दर्पण दिखाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग की भी है। ये बेहद ज़रूरी है कि आज चिंतन और मनन ही नहीं किया जाये कि हमने आज़ादी के बाद क्या खोया क्या पाया है बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनको सुधारना भी होगा। अपनी महानता का डंका पीटना छोड़ खुद को सक्षम बनाना होगा और ऐसा आंखें बंद कर नहीं किया जा सकता है।
 
       जिस देश की महिमा का गुणगान किया जाता है वो ऐसा तो नहीं था। झूठ मक्कारी बेईमानी ख़ुदपरस्ती और कर्तव्य पालन की नहीं अधिकारों और ताकत सत्ता धनबल के दुरूपयोग की खराब आदतों ने देश की जड़ों में दीमक की तरह खोखला करने का काम किया है सारी व्यवस्था को ही। देशभक्ति और साहस केवल भाषण देने बोलने और लिखने का नाम नहीं है। हम अन्याय अत्याचार के सामने घुटने टेकने के आदी होकर किसी भी तरह से मतलब पूरा करने में विश्वास रखते हैं। आतंकवाद हिंसा कोई भी किसी भी कारण करता है उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। पूर्वोतर की बात हो या पंजाब में हुए आतंकवादी हमले उनका कोई धर्म नहीं होता है मगर खेद की बात है आज भी कोई भिंडरावाले को संत बताता है तो किसी ने गोडसे का मंदिर बना रखा है। ये दोगलापन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। हर सरकार दोषी है जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देकर केवल सत्ता की राजनीति करते रहे हैं। बेशर्मी है कि देश की आधी आबादी को दो वक़्त रोटी नसीब नहीं और राजनेता और अधिकारी राजाओं की तरह विसालिता पूर्वक जीवन जीते हैं और अपने खुद के ऐशो आराम पर ही नहीं अपने झूठे गुणगान करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं। जिस आज़ादी की बात भगतसिंह गांधी सुभाष ने सोची थी वो कहां है। हमने अपने पूर्वजों से अंगेरजी शासन की निर्दयता की बात सुनी है तो उनकी देश के धन को ईमानदारी से खर्च करने की भी मिसाल देखी है क्योंकि उनकी बनाई हुई इमारत पुल अवधि बीत जाने के बाद भी कायम रहे हैं जबकि हमारे नेताओं के अपने खास लोगों को ठेके देने की बात आम है जिस में घटिया सामान और अन्य कारणों से हादसे हुए हैं। जिस भी दल की सरकार जिस भी राज्य में रहती है उसके लोग लूट को अपना अधिकार मानते हैं। इतना ही नहीं बड़े बड़े नेता अधिकारी वर्ग को अपने दल के लोगों की बात नहीं मानने पर अंजाम भुगतने की बात तक कहते हैं।
 
         हमारी पुलिस हमारे सभी विभाग के अधिकारी कर्मचारी अगर अपना कर्तव्य निष्ठा से और देश के लिए ईमानदार होकर निभाते तो शायद हालत बहुत हद तक अच्छी हो चुकी होती। मगर उनके लालच और स्वार्थ के साथ नेताओं की चाटुकारिता ने देश की दशा को बदहाली तक ला खड़ा किया है। हम आम लोग भी नियम कानून को तोड़ने में संकोच नहीं करते हैं मगर अपने देश के संविधान की उपेक्षा करने के बाद भी नेता अधिकारी और आम नागरिक खुद को देशभक्त कहते हैं। उद्योग जगत ने केवल अपने मुनाफे कमाने को उद्देश्य बना लिया है और तमाम करोड़पति लोग देश की खातिर कोई योगदान नहीं देते हैं अन्यथा हमारे देश की परंपरा रही है समाज कल्याण पर अपनी आमदनी खर्च करने की खुद अपने पर केवल ज़रूरत भर को खर्च करने की। धर्म के नाम पर भी संचय करने का कार्य किया है हर किसी ने और ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सभी धर्म साधु संत वास्तविक उद्देश्य से धर्म के मार्ग से भटक गये हैं। कलाकार टीवी फिल्म वाले देश को जनता को जगाने और संदेश देने की जगह पैसा बनाने को टीआरपी और विज्ञापन जाल में उलझे रसातल को जाते जा रहे हैं। नारे लगाना जुलूस निकलना गीत गाना झंडा फहराना देशभक्ति क्या यही है या हम सभी को अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने की वास्तविक देशभक्ति की ज़रूरत है। जिस दिन हम देश को बाकी सबसे अधिक महत्व देंगे और अपने पास और अधिक की लालसा को छोड़ सभी को समानता की बात का विचार करने लगेंगे शायद देश को सारे जहां से अच्छा बनाने की ओर उस दिन चलने लगेंगे।

             हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। साल 2020 भी आना था आया और जाने  को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है बेशर्मी की हद है आप इसको छलना और ढगी से भी विश्वासघात करना कह सकते हैं।

             ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। 

 जो बोओगे वही काटोगे :-

     विषय का विस्तार बहुत है , चिंता का अंबार बहुत है। निरर्थक की बहस नहीं है समझने को सार बहुत है। सब पहले यही समझते हैं हमने अपनी संतान को अच्छी परवरिश दी है बड़े होकर समझेंगे हमारी उलझन को। किसी और की बात सुनते हैं पढ़ते हैं कि ऐसा हुआ क्या कर दिया तो दिल में पहली बात आती है खुद उन्होंने भी यही किया होगा शायद अपने बड़ों के साथ। मगर ऐसा होता नहीं है हर माता पिता अपनी संतान को अपनी हैसियत से बढ़कर नहीं है पास वो भी उपलब्ध करवाना चाहते हैं। बच्चों की बिना अर्थ की तुतली आवाज़ को भी सुन कर ख़ुशी महसूस करते हैं उनको बढ़ावा देते हैं फिर भी वही बच्चे बड़े होने पर माता पिता की बातों को अनावश्यक उपदेश कहकर अनसुना करते हैं कभी खिल्ली उड़ाते हैं और समझते हैं हम पढ़ लिख कर आधुनिक समाज को जानते हैं इनको खबर नहीं दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। तमाम बच्चे समझते हैं हमने माता पिता को पैसा कमा कर दिया सब सुख सुविधा उपलब्ध करवाते हैं इस से बढ़कर उनको क्या चाहिए। बस उनको इतना सा ही तो समझाते हैं जैसा हम सोचते हैं आप वैसा किया करो। रिश्तों का संबंध कभी शर्तों पर नहीं कायम रहता है माता पिता संतान को किसी अनुबंध में बांधकर नहीं रखते हैं कि आपको बदले में इस तरह करना होगा। मगर फिर भी बड़े होकर हर बच्चे को लगता है मुझे जितना मिला थोड़ा है और माता पिता को भी शिकायत होने लगती है इसकी उम्मीद नहीं की थी। यही बात घर से बाहर समाज की है और देश को लेकर भी इक निराशा दिखाई देती है जिस जिस से जो अपेक्षा है पूरी नहीं होती हर कोई समझता है मैं जो भी करता हूं ठीक करता हूं। अपने आप से बाहर निकल कर समझते हैं जो कड़ी घर से शुरू होती है पूरे समाज और देश को जोड़ती हुई निर्धारित करती है हम क्या क्यों कैसे हैं। 

      हमने संतान को बड़े होकर क्या करना है क्या बनकर दिखाना है कैसे आधुनिक ढंग से जीना है कितना धन किस किस तरीके से जोड़ना है नाम शोहरत पाने को क्या करते हैं दुनियादारी की समझ देते हैं। अच्छे इंसान बनने की सच कहने के साहस की ईमानदारी की कर्तव्य की बातें सिखाना शायद हम सोचते हैं बड़े होकर खुद सीख जाएंगे बच्चे। हमने बहरी परिवेश कपड़े पहनने अच्छे नज़र आने की बात समझाई मगर भीतर मन से सुंदर होने का सबक पढ़ाया नहीं या खुद हमें भी नहीं पढ़ाया गया था। हम चाहते हैं जो बनाना उसको बनाने को पहले बहुत कुछ करना भी था जो किया ही नहीं। हमने बचपन से सभी से अनावश्यक मुकाबला करने की सोच बना ली थी और अपनी संतान को तुम औरों से किस बात में कम हो सबसे बढ़कर समझदार हो की भावना को स्थापित किया और बढ़ावा दिया है। अपनी गलती को समझना तो क्या स्वीकार भी नहीं करना ऐसी आदत बनाने के दोषी हम खुद हैं। मैं ये हूं मैं वो हूं जाने हर किसी को खुद को बेकार इक अहंकार कैसे आ जाता है जो बाहर हर किसी को अपने से कमतर समझते समझते घर में भी सब से काबिल होने का गुरुर पैदा कर देता है। स्वाभिमान की बात और होती है आत्मसम्मान की कीमत नहीं समझते हम मतलब को गधे को बाप कहना पड़ता है ये धारणा बना ली है। जिन विकसित देशों में जाकर व्यवस्था और सब बड़े छोटे बराबर होने को देख हम तारीफ करते हैं खुद अपने देश और समाज में आचरण करते हुए उस तरह नहीं चलते हैं। मनमानी और मतलबपरस्ती की आदत को हमने समझा है अवगुण नहीं खासियत है अपनी बुरी बात को अच्छा साबित करना चाहते हैं। 

     कितने अच्छे स्कूल कॉलेज की पढ़ाई कितना अच्छा कारोबार हो जो सबसे महत्वपूर्ण है नैतिक आचरण जो जैसा है उसी तरह का नज़र आना और गलती करने पर पछतावा या भूल का सुधार करने का हौंसला रखना कोई सोचता ही नहीं इनके बिना आदमी विवेक शून्य बनकर ऐसा समाज बनाता है जो संवेदना से रहित है। ऊपर चढ़ने की चाहत में राह उचित अनुचित का विचार करते ही नहीं हैं। आधुनिकता और झूठी दिखावे की सभ्यता ने हमसे जो बेहद मूलयवान था छीन लिया है जो दिया है वो सच कहा जाये तो किसी काम का नहीं है। हीरा खोकर पत्थर जमा करने का काम करते हैं हम लोग। मगर सब जानते समझते ऐसा होने कैसे देते हैं हम , कारण है कि हम चिंतन नहीं करते अपने बारे न देश समाज के बारे। कोई कौन होता है हमें उपदेश देने वाला हम सही हैं या गलत उनको क्या लेना देना। खुद अपने आप से डरते हैं खुद को आईने में देखने का साहस नहीं करते। जब किसी से कोई शिकायत रखते हैं तब क्या सोचा कभी औरों को भी हमसे कितनी शिकायत हो सकती हैं। जब हम मज़बूर होते हैं तब समझते हैं बेबसी का दर्द क्या है लेकिन जब हर किसी की विवशता पर हंसते हैं मज़बूर होने पर किसी का शोषण करते हैं भूल जाते हैं इंसानियत क्या है।

      नाम मुहब्बत प्यार के अपनेपन के हैं फिर भी इन में सब कुछ होता है मधुर संबंध मिलना बड़ा कठिन है। लोग हैं जो निभाए जाते हैं जैसे कोई बोझ ज़िंदगी ने सर पर रख दिया है ढोना मज़बूरी है। हर रिश्ते की कुछ कीमत होती है जो चाहे अनचाहे चुकानी पड़ती है। रिश्ते बनाते नहीं हैं बने बनाये मिलते हैं और निभ सके चाहे न निभे निभाने पड़ते हैं। दिल का दिल से कोई नाता होता भी है सच कोई नहीं जानता बात दिल की कहते हैं दिल से पूछो दिल की दिल ही जानता है। दर्द से दिल भरा होता है फिर भी मिलते हैं हंसते मुस्कुराते हुए ये चेहरे हैं कि मुखौटे हैं जो क़र्ज़ की तरह होटों पर हंसी रखनी होती है और अश्कों को छुपकर किसी कोने में बहाना होता है अकेले अकेले। दुनिया भर में कोई कंधा सर रख रोने को नहीं मिलता कोई आंचल पलकों के भीगेपन को पौंछता नहीं है। दर्द देते हैं अश्क मिलते हैं रिश्ते क्या कोई ख़ंजर हैं जो घायल करना जानते हैं मरहम लगाना नहीं आता है। ये जो सुनते हैं हमदर्दी के साथ निभाने के नाते किस दुनिया की बात है इस दुनिया में तो नहीं मिलते खोजते रहते हैं जीवन भर। मुझे अकेला छोड़ दो कौन है जो ऐसा कहना नहीं चाहता पर कहा नहीं जाता है कहने पर सवाल होते हैं। जब आपको साथ चाहिए आप अकेले होते हैं भरी महफ़िल में और जब कभी आपको अकेले रहना होता है भीड़ लगी रहती है। कोई तकलीफ हो लोग आते हैं हालचाल पूछने को मगर ज़ख्मों को छेड़ कर दर्द बढ़ा जाते हैं , रिश्ते हैं रिश्तों की रस्म निभा जाते हैं। ज़रूरत होती है बुलाओ भी नहीं आ सकते पर बिन बुलाये भी चले आते हैं कितने अहसां जताते हैं।
 
      बेगानों ने कहां किसी को तड़पाया है ये किस्सा हर किसी ने सुनाया है जिसको चाहते हैं उसी ने बड़ा सताया है। दर्द देकर कोई भी नहीं पछताया है हर अपने ने कभी न कभी सितम ढाया है। रिश्ते ज़ंजीर हैं रेशम की डोरी नहीं हैं हर किसी का इक पिंजरा है बंद रखने को कैद करने को। रिश्ते आज़ादी नहीं देते हैं जाने कितने बंधन निभाने होते हैं हंसते हंसते तीर खाने पड़ते हैं। कोई नाता नहीं जो खुली ताज़ा हवा जैसा हो जिस का कोई खुला आकाश हो पंछी की तरह उड़ने को फिर शाम को घौंसले में लौट आने को। कितनी शर्तों पे जीते मरते हैं सच नहीं कहते इतना डरते हैं , बात झूठी करनी पड़ती है करते हैं। सुलह करते है फिर फिर लड़ते हैं। मतलब की दुनियादारी है हर रिश्ता नाता बाज़ारी कारोबारी है हर पल बिकती है वफ़ादारी है कितनी महंगी खरीदारी है। भीड़ है हर तरफ मेला है जिस तरफ देखो इक झमेला है कोई बवंडर है कि तूफ़ान कोई ये जो इतना विशाल रेला है। जीना किसने दुश्वार किया है हर किसी को गुनहगार किया है कभी छुपकर कभी सरेबाज़ार किया है। अपने भी तो रिश्तों का व्यौपार किया है खोने पाने का हिसाब हर बार किया है। कितने रिश्तों ने परदा डाला है कितनों ने शर्मसार किया है। ये रिश्ते हैं कि पांव की बेड़ियां हैं हाथ पकड़े हैं कि लगी हथकड़ियां हैं। ज़िंदगी भर जिसको निभाया है हुआ फिर भी नहीं अपना पराया है इक बार नहीं सौ बार आज़माया है। अब नहीं मिलती धूप के वक़्त कहीं भी छाया है। 
  
       आज आगे की बात करते हैं। इक कहानी जैसी बात है दो अजनबी मिलते हैं जान पहचान होती है। कोई कहता है अकेला हूं मुझे साथ लेते चलो। चलना है तो चल सकते हो मेरे साथ लेकिन मैं नंगे पांव पैदल चलता हूं और बस चलते जाना है बने बनाये रस्ते पर नहीं खुद अपनी राह बनाता हूं। तुम जब तक साथ चल सकते हो चलना जब थक जाओ रुक जाना तेज़ जाना हो आगे बढ़ जाना कोई शर्त नहीं साथ निभाने की जितना साथ चल सकते हैं चलना जब नहीं निभे तो अलग हो जाना किसी शिकायत गिले शिकवे के। तुम को मेरी राह कठिन लगेगी कभी तो चले जाना अपनी मर्ज़ी की राह पर अलविदा कहकर। मुझे नहीं आता है दिखावे की दुनियादारी निभाना और मुझे औरों को भी साथ लेकर चलना है खुद आगे बढ़ने को किसी को राह में नहीं छोड़ना है। धन दौलत महंगे उपहार नहीं हैं खाली जेब है और खुश रहता हूं जिस भी हाल में , मिलते हैं लोग बिछुड़ते रहते हैं यादें बनकर रह जाते हैं। आज तुम मुझे कोई कीमती उपहार देना चाहते हो कल मुझसे चाहोगे बदले में शायद नहीं दे पाऊं ये जो तुम नहीं लेना चाहता दे रहे हो यही अमानत है जब भी चाहो लौटा दूंगा मगर मुझे रिश्तों में हिसाब करना नहीं आता है। बहुत कुछ है जो एक साथ रहते मिलता है जिसको धन दौलत से तोला नहीं जा सकता है। कुछ भी नहीं छुपाया था सब बताया था अपनी विवशता अपनी सोच और अपने मकसद को लेकर भी। अचानक सवाल करने लगे आपकी कोई बात मुझे मंज़ूर नहीं है और मज़बूरी को अविश्वास समझ लिया अब और नहीं आपके साथ चलना संभव है। ठीक है जितना साथ चले अच्छा है। ये इक पंजाबी की कविता या ग़ज़ल की बात है। कोई झूठ नहीं कोई हेरा फेरी नहीं मगर मंज़िल अपनी अपनी जाना है तो किसी मोड़ पर राह बदल सकती है। हम लोग रिश्तों को इक कैद बना लेते हैं दोस्ती या प्यार या कोई भी नाता हो चाहते हैं अपनी शर्तों पर साथ निभाना है लेकिन दिल से कोई ऐसा नहीं कर सकता है। घर को पिंजरा मत बनाओ रिश्तों को जंजीर बनाकर साथ जकड़ने से रिश्ता इक बोझ बन जाता है। कोई मिलता है तो किसी मोड़ पर अलग भी होना पड़ता है ऐसे में बिछुड़ने का दर्द हो मगर गिले शिकवे कर जो मधुर नाता रहा उसको कड़वी याद बनाना उचित नहीं है।

          जीवन खोने और खो कर पाने का नाम है। हम पाना सब कुछ चाहते हैं खोने को तैयार नहीं होते है। सभी कुछ आज तक किसी को नहीं मिला है। जो मिला उसको लेकर खुश नहीं होते और जो नहीं मिल सका उसको लेकर दुःखी रहते हैं। दोस्ती रिश्तों के संबंध में देना है तो बदले में पाने की शर्त रखकर मत दो क्योंकि जितना भी मिलेगा आपको कम लगेगा जितना दिया वो बहुत अधिक लगता है। जब पलड़े में तोलने लग जाते हैं तो दुनियादारी होती है अपनापन प्यार मुहब्बत नहीं बचता है। फिर आपको बार बार जतलाना पड़ता है किसी को चाहते हैं जबकि जतलाने की बताने की ज़रूरत होनी नहीं चाहिए। 
 

   अभी बाकी है पढ़ना-लिखना :-

               चलो खुद अपनी सभी लिखने वालों की वास्तविकता की  बात करते हैं उनकी भी आज जिनका दावा है कि वो दर्पण हैं समाज का। बहुत जोखिम भरा काम है ये , आईने को आईना दिखाना। इतनी छवियां उनमें दिखाई देती हैं कि नज़रें हार जाती हैं उनको निहारते निहारते। ये विषय इतना फैला हुआ है कि इसका ओर छोर तलाशते उम्र बीत सकती है। इसलिये कुछ आवश्यक बातों पर ही चर्चा करते हैं ताकि ये समझ सकें कि आज का साहित्य , आज का लेखक कहां खड़ा है , क्या कर रहा है और किस दिशा में जा रहा है। जब भी कोई कलम उठाता है तब वास्तव में सब से पहले वो खुद अपने आप को तलाश करता है , मैं क्या हूं , मेरा समाज कैसा है , कहां है। तब सोचता है कि ये समाज होना कैसा चाहिये , मुझे क्या करना चाहिये इसको वो बनाने के लिये। इतिहास में जितने भी महान लेखक हुए हैं वो सभी अपने इसी मकसद को लेकर लिखते रहे हैं। उन्होंने ये कभी नहीं सोचा था कि उनको लिखने से क्या हासिल होगा या क्या नहीं मिलेगा। कुछ भी पाना या खोना उनका ध्येय नहीं था , केवल इक लगन थी जो उनको लिखने को विवश करती रही। और उन्होंने दुनिया को वो दिया जो सदियों तक कायम रहा। इधर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो लिखने को विवश नहीं होते , कोई विवशता उनको लिखने को बाध्य करती है।  जैसे अखबार या पत्रिका का संपादक नित लिखता है नये विषय पर इसलिये नहीं कि उसकी सोच विवश करती है , बल्कि इसलिये कि उसको इक औपचारिकता निभानी है।

                इधर देखते हैं इक भीड़ नज़र आती है लिखने वालों की , मगर ध्यान दें तो समझ नहीं आता इसको क्या कहना चाहिये। साहित्य सृजन या कुछ और या मात्र कागज़ काले करना। कुछ भी तो दिखाई नहीं देता जो सार्थक हो , कोई बताता है वो महिला विमर्श की बात कहता है , कोई जनवादी-वामपंथी लेखन का पैरोकार बना बैठा है , कोई दलित लेखन का दम भरता है। ये कैसा साहित्य है जिसको पूरा समाज नज़र नहीं आता , कोई खास वर्ग दिखाई देता है जिसमें। कितना भटक गया है आज का लेखक , क्या हासिल करना चाहता है वो समाज को इस तरह टुकड़ों में विभाजित कर के। सब की बात क्यों नहीं करना चाहता ये इस नये दौर का नया लेखक। जब लिखने वाला खुद को और अपने समाज को पहचानने के वास्तविक ध्येय से भटक जाता है , और चाहता है लोग उसको पहचानें , उसके लेखन का सम्मान हो , मूल्यांकन हो तब वही होता है कि आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। लगता है यही करने लगा है आज का लेखक। वह समाज को कुछ देना नहीं चाहता बल्कि उससे कुछ पाना चाहता है। अथवा जितना देता है उससे अधिक पाने की लालसा रखता है। कई-कई किताबें छपवा डाली हैं , शायद ही कभी सोचा हो कि उनमें लिखा क्या है। बहुत हैरानी होती है जब अधिकतर पुस्तकों में कुछ भी काम का नहीं मिलता , कुछ तो जो सार्थक हो , जो समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करे। अन्यथा व्यर्थ समय और शब्दों की बर्बादी से क्या हासिल होगा। अब उस पर शिकायत कि लोग पढ़ते ही नहीं किताबों को , क्या कहीं लेखन में कमी नहीं जो पाठक ऊब जाता है कुछ पन्ने पढ़कर। एक हास्यस्पद बात है , बहुत सारे लेखक खुद अपने ही लेखन पर फिदा हैं। जैसे कोई दर्पण में अपनी ही सूरत को निहारता रहे और अपने आप पर मोहित हो जाये। कहते तो हैं कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता , मगर मेरे कॉलेज के इक सहपाठी कहते थे कि दर्पण हर देखने वाले को बताता है कि तुमसे खूबसूरत दूसरा कोई नहीं है। शायद हम खुद अपने आप को बहलाना चाहते हैं। माना जाता है कि खुद को और बेहतर बनाने के लिये अपने से काबिल लोगों का साथ हासिल करना चाहिये मगर आजकल के लेखक उनका साथ पसंद करते हैं जो उनको महान बताकर हरदम उनकी तारीफ करता रहे। अपनी कमियों से नज़र चुराकर लेखक काबिल नहीं बन सकता है। सम्मान , पुरूस्कार आदि की अंधी दौड़ में शामिल लेखक सच से बहुत दूर। 

    धर्म जो दीन दुखियों की सेवा की बात किया करता था आज वो भी धन संपति जोड़ने और अहंकार करने की राह चल पड़ा है। हर बात में लाभ हानि का गणित होता है चाहे वो शिक्षा के विद्यालय हों , स्वास्थ्य सेवा देने वाले अस्प्ताल या फिर समाज सेवा ही क्यों नहीं हो। वो जिनके पास दौलत के अंबार लगे हैं वे भी दौलत की हवस में अंधे हो बिना जाने समझे हर उचित अनुचित रास्ता अपना रहे हैं। ये फिल्मी सितारे हों या खिलाड़ी या फिर येन केन प्रकरेण धन कमाने वाले यही आज के आदर्श बन गये हैं और इनका गुणगान किया करता है आज का मीडिया जो खुद इन के जैसा ही बनना चाहता है। जनहित , देशहित , त्याग और समाजिक मूल्यों की बातें शायद किस्से कहानी की बात लगती है या कुछ ऐसी पुरानी किताबों में लिखी हुई है जो अब उपयोगी समझी ही नहीं जाती। राम और कृष्ण का देश नहीं रह गया ये देश अब , रद्दी के भाव बिकती हैं आदर्शवादिता की सारी बातें। सच कहूं तो अपने देश की , अपने समाज की इस बर्बादी के लिये हम सभी किसी न किसी रूप में ज़िम्मेदार हैं। चलो सब आगे बढ़ें और अपने अपने हिस्से की धूल को साफ करें। दोष उसका नहीं जो आईना दिखाता है , दाग़ अपने चेहरे पर जो हैं , साफ उनको करना होगा।  हो जाता है। देश में और राज्यों में साहित्य अकादमी में लोगों को पद काबलियत को देख कर नहीं बल्कि सत्ताधारी नेताओं की चाटुकारिता करने से मिलते हैं और सत्ता के चाटुकार कभी सच्चे लेखक नहीं बन सकते। ऐसे लोग हर वर्ष अपनों अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम करते हैं। साहित्य भी गुटबंदी का शिकार हो चुका है , साहित्य अकादमी के पद पर आसीन व्यक्ति हर उस लेखक को सरकारी आयोजन में नहीं बुलाता जो उसको पसंद नहीं है। जिनको लोग समझते हैं कि अच्छे साहित्यकार हैं तभी पद पर हैं कई बार वो लेखक ही नहीं होते।

                    वापस मूल विषय पर आते हैं। हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरुद्वारे किसलिये जाते हैं , अक्सर ये याद नहीं रहता। क्या हम ईश्वर को देखने गये थे , दर्शन करने , स्तुति करने या केवल अपनी बात कहने।  कभी कुछ मांगने तो कभी कुछ मिलने पर धन्यवाद करने। कितनी बार तो हम श्रद्धा से नहीं किसी भय से या अपराधबोध से जाते हैं। कभी काश ये सोच कर जाते कि आज अपने भगवान का हाल-चाल पूछेंगे , कि वो कैसा है और वो बताता कि कितना बेबस है परेशान है अपनी दुनिया को देख कर। हम जो अपनी दुनिया में ये शिकायत करते हैं कि अब बच्चे स्वार्थी बन गये हैं , मां बाप से क्या पाया है कभी सोचते ही नहीं , हर दिन मांगते रहते हैं और अधिक , लौटाना जानते ही नहीं। भगवान को भी तो ऐसा ही लगता होगा कि हम कभी खुश ही नहीं होते , उसने कितना दिया है , क्या क्या दिया है , हम हैं कि सब अपने पास रख लेना चाहते हैं। भगवान को नहीं चाहिये हमसे कुछ भी , मगर हम इतना तो कर सकते थे कि जितना हमें मिला उसका आधा ही हम उसके नाम पर लौटा देते उनको देकर जिनके पास कुछ भी नहीं है। ऐसे हमारा आस्तिक होना किस काम का है , जब हमने धर्म की किसी बात को जीवन में शामिल किया ही नहीं।

                  यही हाल तो है साहित्य का भी। समाज के दुःख दर्द पर लिखना , क्या इतना ही काफी है। क्या हमें दूसरों के दुःख दर्द से वास्तव में कोई सरोकार भी है। करते हैं प्रयास किसी की परेशानी दूर करने का। सब से पहले हर लिखने वाले को चिंतन करना होगा कि जैसा उसका लेखन पढ़कर प्रतीत होता है क्या वो वैसा है। अधिकतर किसी का लेखन पढ़कर जो छवि मन में उभरती है , जब नज़दीक जाकर मिल कर देखें तो वह सही नहीं दिखाई देती। प्यार की , संवेदना की , मानवता की , परोपकार की बातें लिखने वाला अपनी वास्तविक ज़िंदगी में कठोर , निर्दयी और आत्मकेंद्रित होता है। ईर्ष्या , नफरत , बदले की भावना को मन में रख कर उच्चकोटि का साहित्य नहीं रचा जा सकता। जिसको देखो खुद को महाज्ञानी समझता है , खुद को सब कुछ जानने वाला समझना तो सब से बड़ी मूर्खता है। समझना है तो ये कि अभी हम कुछ भी नहीं जानते और जानने को कितना कुछ है। ढाई आखर प्रेम के पढ़ना बाकी है अभी। 
 

     नेपथ्य और मंच :-  

  कविता ग़ज़ल नहीं मंच पर बेकार अनावश्यक बातें चुटकले तक और सभाओं में भाषण में तथ्य रहित झूठी बातें तालियां और अपने स्वार्थ हासिल करने को धर्म को आडंबर बनाने की बात जैसे कोई मदहोशी में विवेक खो बैठा हो ऐसा लगता है। आपको अपनी विरासत पर गर्व होना उचित है मगर साथ ही आपको पुराने इतिहास की गलतियों को सबक की तरह लेना चाहिए और किसी किताब में लिखी कहानी को आधुनिक युग में सही या गलत है इसे समझना चाहिए। जीवन बदलने और चलते रहने का नाम है ठहरने का नहीं बहता पानी स्वच्छ रहता है ठहर गया तो गंदला होने लगता है। अपनी पीढ़ियों की अनुचित परम्पराओं कुरीतियों को छोड़ना चाहिए। आखिर कब तक सदियों पुरानी जाति धर्म की भेदभाव की आपसी टकराव की नफरत की बातों का बोझ ढोते रहना है। सत्यमेव जयते और सभी जगत के लोग अपने हैं वास्तविक आदर्श त्याग हम खुदगर्ज़ समाज बन गए हैं।

अक्टूबर 05, 2020

POST : 1386 देश अपना तबाह कर बैठे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       देश अपना तबाह कर बैठे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   लोग कैसा गुनाह कर बैठे , देश अपना तबाह कर बैठे। राजनेताओं अधिकारी वर्ग न्यायपालिका धर्म की दुकानदारी करने वालों फ़िल्म टीवी मीडिया अख़बार यहां तक कि तथाकथित लिखने वाले पढ़े लिखे साहित्य की समाज की बात और सच का आईना दिखलाने का दावा करने वालों के भटकने की ही बात नहीं है। ये हम लोग हैं जिन्होंने अपने देश को समाज को इन सभी के रहमो करम पर छोड़ दिया है ये देश को व्यवस्था को बर्बाद करते रहे और हम सभी मूक दर्शक बनकर तमाशा देखते रहे कुछ भी नहीं किया खुद अपने देश और समाज को सुरक्षित रखने की खातिर। अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत। ये अपने कर्तव्य से विमुख होने को दोष उनको देकर दिल को झूठी तसल्ली दिलासा देना है अपनी भूल को समझते तो इसको कभी होने नहीं देते और हो गया तो ठीक करने को बहुत कुछ कर सकते थे। चलो आज खुद अपनी बात पर विचार करते हैं। 
 
   जिनकी महानता की बात की जाती है जिन्होंने देश को आज़ाद करवाने को जीवन अर्पण किया तन मन धन सभी न्यौछावर करने के बाद बदले में कुछ चाहते नहीं थे उनके आदर्श उनकी कुर्बानी को हमने जाना नहीं समझा नहीं। हमने सूरज में धब्बा ढूंढने का काम किया उनके देश जनता से प्यार को समझने की बात छोड़ उनकी गलतियां तलाश करते रहे। अपने माता पिता पूर्वजों की बुराई करना सबसे बड़ा अपराध है क्योंकि ऐसा करते हुए हम भूल जाते हैं कि आज  जिस ऊंचाई पर खड़े हैं उस ईमारत की बुनियाद उन्हीं से बनी है। और हमने क्या किया केवल अपने मतलब अपने फायदे खुदगर्ज़ी को महत्व देते रहे। देश समाज को दरकिनार किया उसके लिए अपने फ़र्ज़ की नहीं बस अधिकार की चिंता की , समझदार मानते हैं खुद को इतना नहीं सोचा समझा कि जिस पेड़ की छांव चाहते हैं जिस से फल खाने को व्याकुल हैं उस की देखभाल सुरक्षा कोई और नहीं करेगा। 
 
दो तरह के लोग होते हैं एक जो देश समाज को सभी देकर गर्व से सीना उठाकर चलते हैं जिनको मालूम होता है यही उनकी सफलता है सार्थक जीवन देश जनता समाज को लेकर अपना कर्तव्य निभाने का मतलब जानते हैं। उनको सत्ता की धन दौलत की ताकत की ज़रूरत होती ही नहीं उनकी ताकत उनके जीवन का निस्वार्थ निडरता से कर्तव्यपथ पर चलना होता है। शोहरत की कामना करते ही नहीं उनकी शोहरत उनके आचरण से खुद होती है और ऐसी शोहरत उनके बाद भी रहती है कोई उन पर कितने झूठे आरोप लगाए वास्तविकता सभी जानते हैं। वास्तविक अच्छे महान लोगों की बुराई उनको छोटा करने की कोशिश करने वाले लोग खुद बेहद बौने होता हैं जिनको लगता है कि पहाड़ की ऊंचाई पर खड़े होने से उनका कद बड़ा लगता है जबकि असलियत ये है कि पहाड़ पर खड़े व्यक्ति और भी बौने लगते हैं। किसी को छोटा कर के आप बड़े नहीं बन सकते हैं। बड़े लोग अपनी बढ़ाई नहीं करते हैं। 
 
   अपने हमने सोचना है किस को अपना आदर्श समझते हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण जिनका जन्म दिन 11 अक्टूबर को है जिन्होंने जीवन भर गांधीवादी विचारधारा पर चलने का काम किया और अपने निजी रिश्तों से अधिक महत्व देश समाज को देने का काम करते रहे। तानाशाही का विरोध किया आपात्काल के बाद दुष्यंत कुमार के शब्दों में " एक बूढ़ा आदमी है मुल्क  में या यूं  कहो , इस अंधेरी कोठरी में एक रौशन-दान है "। मगर इस से बढ़कर विडंबना की बात क्या हो सकती है कि जिसने जीवन में कितनी बार सत्ता के बड़े बड़े पदों को ठुकरा कर जनसाधारण की बात की और देश को नई दिशा दिखलाई हमने उनको भुला दिया है। गांधी जी लालबहादुर जी के जन्म दिन भी 2 अक्टूबर को थे उनकी सोच को सादगी को भी हमने नहीं समझा उन्होंने कभी अपनी खातिर कुछ सत्ता धन का लोभ नहीं रखा। आज हम उनको महान बताने लगे हैं जिनको सत्ता दौलत ताकत ऐशो-आराम देश की जनता की समस्याओं से अधिक ज़रूरी लगते हैं। 
 
    हम क्या कर सकते हैं कहकर बचना उचित नहीं है। तमाम अनुचित कार्य तानाशाही मनमानी करने वाले नेताओं का गुणगान खुद अपने ही देश से कपट करना है। जिन अपराधी घोटालेबाज़ सत्ता का इस्तेमाल अपने मकसद से करने वालों ने देश की दुर्दशा की है उनको किस ने सत्ता पर बिठाया है और इतना ही नहीं हम लोग शासक वर्ग नेताओं अधिकारी लोगों के अहंकारी और कर्तव्य नहीं निभाने ईमानदार नहीं होने की बात को उनकी असलियत को समझने के बाद भी उनके सामने नतमस्तक होकर खड़े होते हैं जो देश के गुनहगार हैं उनके पक्ष में खड़े होना है। अगर उनकी गलत नीतियों का विरोध करने का साहस नहीं भी है तो उनकी जय जयकार और समर्थन करने का काम तो नहीं कर सकते हैं। 
 
    कुछ नहीं बहुत कुछ अभी रह गया है कहना है जल्दी ही आगे लिखना होगा। आखिर में इक ग़ज़ल का मतला अभी लिखनी है रचना आपके सामने पेश है। 
 

              लोग कैसा गुनाह कर बैठे , देश अपना तबाह कर बैठे।

 

अक्टूबर 03, 2020

POST : 1385 चैन नींद करार कहां ( केबीसी की बात ) डॉ लोक सेतिया

      चैन नींद करार कहां ( केबीसी की बात ) डॉ लोक सेतिया 

   केबीसी बिगबॉस जैसे शो मेरी पसंद नहीं हैं क्योंकि मनोरंजन की आड़ में वास्तविक खेल पैसे का होता है और पैसा बनाने को समाज को गलत दिशा दिखाई जाती है। आलोचक को वास्तविकता समझने को सभी को देखना और समझना होता है। आलोचना के नाम पर आलोचना नहीं की जानी चाहिए। मगर इस में भी मेरे अंदर के लेखक को कुछ अच्छा और सार्थक मिल जाता है समझने को। कल 2 अक्टूबर के विशेष एपिसोड में जो दो लोग आये थे या बुलाये गए थे उनका ध्येय खुद अपनी खातिर धन अर्जित करना नहीं था बल्कि देश में मज़दूरों की दुर्दशा को सभी के सामने लाना था और जीतने पर धनराशि उनकी संस्था आजीविका ब्यूरो के उपयोग को देना जिसे मज़दूरों की स्वस्थ और उनके क़र्ज़ से निजात दिलाने पर खर्च किया जा सके था। राजस्थान में उदयपुर और कुछ अन्य जगह उनके कार्यालय हैं और उनकी इक हेल्पलाइन भी है जिस पर कोई मज़दूर कॉल कर सहायता हासिल कर सकता है। पिछले 15 साल से 5 लाख मज़दूरों को सहायता दे रहे हैं। संक्षेप में ही सही उन्होंने जो वास्तविक जानकारी आंकड़ों सहित उपलब्ध करवाई उस को जानकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति विचलित हो सकता है। आज उन सभी बातों की चर्चा करते हैं। 

       देश में करीब 14 करोड़ मज़दूर हैं जो खेती बाड़ी भवन निर्माण उद्योग घरेलू या अन्य कारोबार करने वाले अमीर मालिकों के लिए काम करते हैं। सबसे पहली बात आजीविका के कृष्णावतार शर्मा जी और राजीव खंडेलवाल जी ने लॉक डाउन में मज़दूरों के अपने रहने काम करने की जगह से बाहर निकलने की समस्या को लेकर समझाया। पचास पचास लोग दो पारी में काम करते थे उनके रहने को काम करने को इक हॉल जितनी जगह होती है आधे लोग काम करते थे आधे सोते आराम करते खाना उसी जगह बनाते और उनके लिए एक शौचालय था। ऐसे में काम बंद हुआ तो सभी सौ लोग इक साथ रहना कठिन था राशन क्या पीने को पानी भी नहीं था ऐसे में ज़िंदा रहने को बाहर निकले तो उनको अपराधी बताया गया उनसे पुलिस सरकारी लोग कड़ाई से पेश आते मानवता का दर्द नहीं समझते संवेदनाओं से कोई सरोकार नहीं। 

   बंधुआ मज़दूरी और शोषण की बात आम है साथ में सरकारी आयोग के निर्धारित दैनिक मज़दूरी तीन सौ से अधिक को भी राज्य लागू नहीं करते और अधिकांश दो सौ से कम दैनिक मज़दूरी मिलती है। जिस बात से सबसे अधिक चिंता और हैरानी हुई वो ये है कि जो लोग पत्थर को काटकर मूर्तियां या कोई बुत अदि बनाते हैं उनकी काटने की मशीन से उड़ने वाली धूल से उनको पांच साल में ही कोई रोग जिसका ईलाज नहीं है हो जाता है इतना ही नहीं ऐसे मज़दूर 15 साल काम करने के बाद मरने को विवश हैं। हे भगवान आपके मंदिर बनाने की खातिर कितने इंसान अपनी ज़िंदगी से खिलवाड़ होने देने को विवश हैं। उन्होंने बताया कि अन्य देशों में ये काम करने को मशीन को आधुनिक बनाते हैं ताकि धूल नहीं उड़े मज़दूर की आंखें और सांस में जाने का सवाल ही नहीं बचता है। ऐसा करने पर दस बीस हज़ार रूपये खर्च होंगे जो किसी इंसान की ज़िंदगी की कीमत से अधिक हर्गिज़ नहीं हैं। देश की दस फीसदी आबादी की सुरक्षा और उनके अधिकार तो क्या उनको समानता और आदर से रहने को भी उचित वातावरण नहीं है। अमिताभ बच्चन जी ने कहा आज उनको नींद नहीं आने वाली है। मुझे नहीं मालूम उनको नींद आई या फिर नींद की कोई दवा खानी पड़ी मगर मुझे नींद की दवाई खाकर भी चैन नहीं मिला करार नहीं दिल को आएगा लिखने के बाद भी। धर्म की बात करने वाले मंदिर बनवाते समय शायद मानवता की इंसान की ज़िंदगी की अहमियत समझते ही नहीं अन्यथा जिस मंदिर की मूर्तियां तराशने में मज़दूर की ऐसी दशा होती होगी वहां ईश्वर निवास करता होगा कभी सोचा ही नहीं था।

    अमिताभ बच्चन जी अदाकार हैं अभिनय करते हैं किरदार निभाते हैं उन डायलॉग से कथा से विचलित नहीं होते। उनका गांधी जी की विचारधारा को आज भी महत्वपूर्ण कहने से उस विचारधारा को अपनाना नहीं होता है। उनकी सोशल मीडिया की दिखावे की ज़िंदगी वास्तविक से अलग और विपरीत होती है। हाथी के दांत खाने को अलग दिखाने को अलग होते हैं अन्यथा भला इतना नाम धन दौलत शोहरत पाने के बावजूद भी कौन बनेगा करोड़पति खेल का हिस्सा केवल और अधिक पैसे की हवस की खातिर नहीं बनते क्योंकि इतना तो उनको पता है ये कोई ज्ञान की बात नहीं है कमाई करने को टीवी चैनल और आयोजक लोगों को अमीर बनाने के कल्याण करने वाला मुखौटा लगाकर अपना अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं उल्लू बनाते हैं। ये कभी किसी अच्छे उद्देश्य की खातिर संलग्न लोगों को बुलाना भी उनकी रणनीति है ऊंठ के मुंह में जीरे की तरह भलाई थोड़ी साथ साथ खाने को मलाई उनके हिस्से आती है। चिंता इसकी भी है कि उनकी ये असलियत कभी कोई सामने नहीं लाता है। थाली में छेद का इल्ज़ाम लगेगा टीवी मीडिया सभी इक थैली के चट्टे बट्टे हैं।

अक्टूबर 01, 2020

POST : 1384 गांधी जी लाल बहादुर जी के आदर्श की बात कौन कर रहे हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     गांधी जी लाल बहादुर जी के आदर्श की बात कौन कर रहे हैं 

                                       ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

          उनकी विचारधारा की धज्जियां उड़ाने के बाद हर साल उनके आदर्श पर भाषण चर्चा उनके फोटो या समाधि पर फूल चढ़ाने का आडंबर करते खुद को देश सेवक जनकल्याण के पैरोकार बताने वाले लोग आत्मचिंतन करते तो उनका नाम भी अपनी ज़ुबान पर लाते संकोच करते। कथनी करनी का इतना विरोधाभास देख कर लगता है कितनी बार उनकी हत्या बार बार होती रहेगी। जाने ये कैसी आज़ादी है जिसमें बड़े बड़े अपराधी सीना ठोककर अपराध करने के बाद निर्दोष करार दिए जाते हैं और जश्न मनाते हैं ये सच जानते हुए भी कि खुद उन्होंने कभी कानून को हाथ में लेकर मनमानी करने को अपनी उपलब्धि और शौर्य घोषित किया था। अदालत में सच को सच नहीं कहा गया और सज़ा से बचने को झूठ का सहारा लेकर अदालत की आंखों में धूल झौंकने का कार्य किया। दो अक्टूबर को गांधी जी के आदर्श की बात कहने से पहले इस पर विचार करना चाहिए। देश में हर तरफ अराजकता और अपराध का आलम है और धर्म की बात कहने वाले राम राज्य का दावा करने वाले जिस बेटी की हत्या बेरहमी से की गई बलात्कार के बाद उसी के परिवार को बंधक बनाने जैसा कार्य कर रहे हैं सुरक्षा के नाम पर इस से अधिक अनुचित आचरण कोई सरकार नहीं कर सकती है। अन्याय और अराजकता ही नहीं पुलिस और न्याय व्यवस्था का अनुचित इस्तेमाल किया जा रहा है। जय जवान जय किसान की बात कौन करे जब किसान के लिए उनकी सहमति जाने बिना ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं जो किसानों को मंज़ूर नहीं हैं। गांधी होते तो फिर से दांडी यात्रा करते कोई वापस गांव की ओर जाते न कि विदेशी शासकों की तरह किसानों को बड़ी बड़ी कंपनियों के जाल में फंसाने को उनके लिए भलाई या आज़ादी कहने का छल करते और संसद से सड़क तक सत्ता के विरोध को दमन पूर्वक दबाने की कोशिश होती। 

      शायद अब हमें निर्णय करना चाहिए कि हम और देश की सरकार या तथाकथित बड़े बड़े लोग जो दो ऑक्टूबर को कहेंगे कि आज भी गांधी और लाल बहादुर जी के आदर्श उपयोगी हैं खुद जानते ही नहीं गांधी जी लाल बहादुर जी कौन थे क्या सोचते थे कैसे रहते थे। जैसे कोई डाकू लुटेरा साधु का भेस पहन कर ठगता है। वास्तव में समाज में नैतिकता का पतन इस हद तक हो चुका है कि हम धर्म आदर्श से देशभक्ति को केवल दिखाने को कुछ शब्द बोलने को मानते हैं उनका अर्थ समझने या विचारधारा पर चलने को कभी ज़रूरी नहीं समझते हैं। मरने के बाद उनकी आत्माओं को भी घायल करने की बात की जाती है।

सितंबर 22, 2020

POST : 1383 धार्मिक कथाओं ने भटकाया है ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया

   धार्मिक कथाओं ने भटकाया है ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया 

  भगवान है ये केवल कल्पना नहीं न ही किसी की थोपी हुई आस्था से समझा जा सकता है। ये इक गंभीर विषय है जिस पर चर्चा भी और चिंतन मनन भी किया जाना चाहिए ताकि हम खुद विमर्श विवेचना करने के बाद यकीन कर सकते। शायद धार्मिक कथाओं का सृजन करते समय भविष्य में समाज और विश्व के बदलाव की ऐसी कोई उम्मीद लिखने वालों को नहीं रही होगी कि लोग शिक्षित होकर सोचने समझने और सवाल करने लगेंगे। जो कथाएं कहानियां ईश्वर के होने का सबूत समझ लिखी गईं आज पढ़ लिख कर ही नहीं कम शिक्षित व्यक्ति भी सामाजिक बदलाव के चलते हर विषय पर समझने सवाल करने लगा है। आज कोई अगर इन धार्मिक कथाओं की बातों को लेकर विचार करता है तो इक उलझन खड़ी होती है मन में क्योंकि तथाकथित देवी देवता ईश्वर के अवतार कभी कुछ कभी कुछ कहते करते और सही गलत समझाते रहे हैं। सोचते हैं तब हैरानी होती है असंभव को संभव ही नहीं कभी उचित कभी अनुचित किसी भी चीज़ को साबित करने को खोखले तर्क घड़ने की ज़रूरत होती है। किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता इसलिए किसी किताब किसी घटना किसी कथा की ऐसी बात का उल्लेख नहीं किया है। मगर इतना सब समझते हैं कि जो भी उन कथाओं में हुआ घटा बताया गया है जिसको आदर्श समझने को कहते हैं क्या आधुनिक युग में वही किया जाना स्वीकार्य हो सकता है। मकसद अच्छा रहा हो ये मुमकिन है मगर अविश्वसनीय और ऊल जलूल बातें विवेक से काम लेने पर हास्य या कपोल कल्पना लगती हैं। मगर वास्तविकता से सामना करने से बचने को इक भय का वातावरण बनाने को घोषित किया गया है कि इन पर संशय करना अनुचित ही नहीं अधर्म है और नास्तिकता है। अर्थात हमारी आस्था वास्तविक नहीं है डर से या फिर किसी लोभ लालच ज़रूरत से जुडी हुई है। ईश्वर को पाना इसे नहीं कहते हैं कभी सोचा है साधु संत ऋषि मुनि भगवान की खोज में अकेले चिंतन करने अदि ध्यान करने की बात क्यों करते थे। ये कथाओं में लिखा है मगर हमको करने की ज़रूरत नहीं है ये समझाया गया है। ताकि जिनको धर्म ईश्वर को लेकर केवल अपने हित लाभ हानि की करनी है उनको आसानी रहे। 

    और इसका नतीजा हम बस किसी बंद कुवें के मेंढक होकर मौसमी टर्र टर्र के आदी बन गए हैं। हमने कुछ बातों को किसी दिखावे आडंबर की तरह करने को भगवान और भक्ति से जोड़ दिया है। शायद ये उसी तरह है जैसे कोई अपनी आंखें बंद कर किसी कोल्हू के बैल की तरह उसी गोल दायरे की परिधि में घूमता रहता है मगर पहुंचता नहीं कहीं भी। आपको मार्ग की जानकारी नहीं और आपको मंज़िल मिलने की उम्मीद है। ज़रा सोचना कितने धर्म हैं कितने मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे हैं हम रोज़ कितने आयोजन करते हैं धर्म के नाम पर कितने धर्मोपदेशक हैं हम सतसंग जाने किस किस तरफ जाते हैं। अगर ये वास्तव में सही दिशा होती तो समाज में सच्चाई और धर्म हर तरफ होना चाहिए था जबकि है नहीं ऐसा। मुझे ही ले लो क्या लिख रहा बहुत ज्ञान की बात कहने लगा मगर क्या मैं वास्तविक जीवन में सत्यवादी हूं , बिल्कुल भी नहीं मानता हूं। लेकिन चाहे अच्छा बुरा सब है मुझ में कभी सच कभी झूठ भी बोलता हूं फिर भी ईश्वर है ये विश्वास करता हूं क्योंकि चिंतन मनन से अनुभव किया है। मुझे लगता है ऐसा करना कोई अनुचित हर्गिज़ नहीं हो सकता है। आप भी मेरी बात को पढ़कर विचार करना शायद खुद आप भी अनुभव करना चाहोगे।

POST : 1382 माल मालामाल हैं कंगाल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       माल मालामाल हैं कंगाल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   सब जानते थे समझते थे जानकर अनजान बने हुए थे अब कैसे कहें दुनिया भर की खबर रखने वाले इतने मासूम और भोले थे कि उनके साथ मिलने जुलने मुलाकात साक्षात्कार लेने से उनकी शोहरत का गुणगान उनकी तथाकथित दानवीर समाजसेवा एनजीओ की चर्चा करने वाले आंखे होते अंधे बने हुए थे गांधारी की तरह अपने स्वार्थ की पट्टी जो बांधनी मज़बूरी थी। हैरान हैं कि ये हंगामा हुआ कैसे इक अभिनेता की मौत का हादिसा भूत बनकर फिल्म नगरी पर काला साया बनकर छा गया है। सच आधा ही सही सामने आ गया है समझने वालों को बहुत समझ आ गया है। जो खड़े थे बड़ी ऊंचाई पर उनका सर चकरा गया है धुआं सा आंखों के सामने आ गया है। थाली में छेद नहीं है छलनी में हज़ार छेद हैं छुपे हुए जाने कितने नाम हैं किस किस के भेद मतभेद हैं। शब्दों का चलन कितना बदल गया है कभी कॉलेज में लड़के लड़कियों को माल कहते थे आपस में इशारे की भाषा में आजकल अभिनय करने वाली महिलाएं माल चाहती हैं नशे में झूम लूं मैं का कमाल चाहती हैं। धमाल मालामाल की नई मिसाल चाहती हैं। हाल अच्छा है करना बदहाल चाहती हैं अपने हुस्न को अपने जलवों को करना जमकर इस्तेमाल चाहती हैं बस चुपके चुपके सबसे छुपके नहीं हो कहीं सवाल चाहती हैं कभी कभी बस बवाल चाहती हैं। जो भी है हो बाकमाल चाहती हैं। 
 
         पाकीज़ा की साहिबजान और उमराओ जान जैसे किरदार फ़िल्मी नहीं असली होते थे कभी शहर के बाहर कोई बस्ती नाच गाने की जिस्मफ़रोशी का खुलाबाज़ार सजता था। बड़े बड़े धनवान ज़मीदार रईस और शराफ़त की नक़ाब ओढ़ने वाले छुपकर दिल बहलाने आते थे किसी को अपना बनाते थे निशानी कोई छोड़ जाते थे। फिर जब बूढ़े हो जाते थे किस्से बहुत याद आते थे औरों को नसीहत देने को अपनी सच्ची कहानी किसी अजनबी की कहकर सुनाते थे। दर्द की दास्तां नहीं है मौसम है आशिक़ाना गुनगुनाते थे सपनों में खोकर अभी तो मैं जवान हूं अभी तो मैं जवान हूं सोच कर किसी को शर्म आती थी वो घबराते थे। उस बदनाम बस्ती उस सदाबहार रौशनी के बाज़ार में लोग मिलते थे पहचान लेते थे दुआ सलाम करने से बचते थे ये राज़दार बनकर इक दूजे के राज़ कभी नहीं किसी को बतलाते थे मिलकर जिस थाली में खाते उस में छेद नहीं करते की बात निभाते थे। कितने शरीफ़ लोग शान से जीते थे शान से मर जाते थे कभी अनाथ कभी बेचारी बेबस महिला को आसरा देने को कोई घर बनवाते थे किसी को संचालिका बना कोई क़र्ज़ चुकाते थे। 
 
    ये वही नगरी है जिस में साधना ख़ामोशी नया दौर नया ज़माना जैसे सार्थक कहानियों की फ़िल्में बनाते थे। कागज़ के फूल बहु बेगम धूल का फूल साहब बीवी और ग़ुलाम दो बदन हक़ीक़त शहीद उपकार जैसी हर फिल्म दर्शक को संदेश देती थी बहारें फिर भी आएंगी की आशा जगाते थे। दौलत शोहरत और ताकत मिलने से उसी नगरी में नग्नता और अपराध को महिमामंडित करने से हिंसा का पाठ पढ़ाने वाले किरदार निभाकर कोई महानायक कोई सबसे अधिक कमाई करने वाला अभिनेता बन गया है। उनके पास दीवार फिल्म के डॉयलॉग की तरह पैसा धन दौलत शोहरत ही नहीं सत्ता और राजनीति की ताकत भी है बस इक चीज़ नहीं बची है इमान और ज़मीर आदर्श और नैतिकता उनके लिए किसी और के लिखे बोल हैं जिनको बोलना है चेहरे पर मासूमियत लाकर तालियां बजवाने को। अधिक कहने की ज़रूरत नहीं है शीशे के महलों के भीतर शानदार क़ालीन बिछे हैं जिनके नीचे छिपी गंदगी किसी बाहर वाले को पता नहीं चलनी चाहिए आखिर में मेरी इक ग़ज़ल का इक शेर पेश है। 

                           सब से बड़े मुफ़लिस होते हैं लोग वही ,

                            ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

सितंबर 21, 2020

POST : 1381 मांगी किसी ने मिली किसी को ( आज़ादी-आज़ादी ) डॉ लोक सेतिया

 मांगी किसी ने मिली किसी को ( आज़ादी-आज़ादी ) डॉ लोक सेतिया 

   कहते हैं हम आज़ादी ढूंढ कर लाये हैं अभी तलक किसान गुलाम बनकर रह रहे थे। बिन मांगे ही नहीं बिना चाहे सरकार मेहरबान होकर आज़ादी की खैरात बांटना चाहती है मगर किसान हैं जो उनकी आज़ादी से डर रहे हैं। बात डरने की नहीं है मरने की है समझने की नहीं भटकने की है क्योंकि लोग भूले तो नहीं कन्हैया पर इल्ज़ाम लगा था हमें चाहिए आज़ादी जैसे नारे लगवाने का देश विरोधी काम किया था। बिन मांगे मोती मिलें मांगे मिले न भीख। मैं आज़ाद हूं अमिताभ बच्चन की असफल मगर लाजवाब फिल्म थी जिस में अख़बार वाले इक किरदार काल्पनिक खड़ा करते हैं आज़ाद नाम से रोज़ चिट्ठी छापते हैं तब टीवी चैनल नहीं होते थे आजकल यही वो मिलकर करते हैं कंगना रिया सुशांत उनकी कल्पना की उड़ान हैं। कन्हैया का आज़ादी मांगना अपराध जनाब का अभी तक किसान आज़ाद नहीं थे कहना अच्छी बात खूब है। ज़िंदा रहने को माहौल नहीं मरने को सिर्फ कोरोना नहीं है बड़े नाम वाले अमीर लोग दौलत के नशे के साथ नशीली ज़हरीली दवाओं का भी मज़ा उठाते हैं। सत्ता वालों का नशा आसानी से नहीं उतरता है। राजनेता और धर्म वाले नफरत की आंधी से आग लगाने वालों को अच्छा और प्यार मुहब्बत करने वालों को खराब बताते हैं। सियासत का मुहब्बत से छत्तीस का आंकड़ा है ईबादत बगावत अदावत खिलौने हैं सत्ता की थैली भरी पड़ी है। मैं आज़ाद हूं साबित करने को फिल्म में नायक को ऊंची ईमारत से छलांग लगाकर ख़ुदकुशी करने की बात निभानी पड़ती है। सोशल मीडिया वालों से टीवी चैनल वाले तक मौत का ख़ौफ़ बेच रहे थे अब सरकार भी अपने झोले से आज़ादी का खिलौना निकाल लाई है। सबसे बड़ा खिलाड़ी पुराना अभिनेता नहीं है आजकल कोई और है जिसका खेल लोग समझ नहीं सकते फिर भी ताली बजाते रहे अब हाथ धोते धोते थक गए हैं ताली नहीं बजती थाली को लेकर संसद में विचार किया जाने लगा है। संसद में सवाल पूछना बंद है अन्यथा लाख नहीं लाखों करोड़ का सवाल यही है शासक क्या करते रहे हैं आज भी जिस थाली में खीर हलवा पकवान खाते हैं वो जनता की खून पसीने की कमाई की फसल से बनाई रोटी होती है उसी में छेद करते हैं। बात मुंबई की नहीं दिल्ली की भी है और हर राज्य की राजधानी की भी। नेता अधिकारी कर्मचारी खाते जनता की हैं बजाते लूटने वालों की हैं। दुष्यंत कुमार के शब्द हैं , " इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक ए जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।

सितंबर 16, 2020

POST : 1380 कांच का लिबास संग नगरी ( बात निकली है ) डॉ लोक सेतिया

  कांच का लिबास संग नगरी ( बात निकली है ) डॉ लोक सेतिया 

    उनकी नकाब हट गई तो उनका असली चेहरा सामने आएगा जो खुद उन्हीं को डराएगा। आईना उनको कोई दिखा नहीं सकता है दाग़ ही दाग़ हैं बता नहीं सकता है। उनको खुद अपनी सूरत से अधिक अपनी सीरत से घबराहट होती है। कला की देवी ये देखती है और खामोश कहीं छुपकर रोती है। उनकी दुनिया उनके तौर तरीके उनके ढंग शायद हम कल्पना भी नहीं कर सकते बाहर से दिखाई देते हैं विशाल बेहद मज़बूत मगर भीतर से खोखले और कागज़ के फूल की तरह थोड़ी हवा से या छूने से बिखर जाते हैं। तभी उनकी वास्तविकता की चर्चा कोई करता है तो हंगामा खड़ा हो जाता है जबकि उनको हक है देश समाज की हर बात पर बोलने का ही नहीं जब जिस को जैसे चाहे अच्छा बुरा साबित कर अपनी आमदनी बढ़ाने सफलता का परचम लहराने को खलनायक के किरदार से लेकर हिंसा को बढ़ावा देने और सामाजिक मूल्यों मर्यादा को ताक पर रख कर फिल्म कला के नाम पर अश्लीलता और अपराध को बढ़ावा देने महिमामंडित करने का। कभी आपने सोचा है उनको देश से अपने दर्शक वर्ग से कितना सरोकार है सच तो ये है कि फ़िल्मी अभिनय से लेकर टीवी अख़बार में विज्ञापन देने तक जो सामने नज़र आता है उनकी असलियत से विपरीत है। उनकी आम आदमी के लिए कोई संवेदना ही नहीं होती है उनके लिए धन दौलत शोहरत और सबसे ख़ास समाज जिसको जो भी चाहे करने की छूट मिली हो की अपनी दुनिया है जो किसी और को अपने बराबर नहीं समझती है यहां तक कि देश के राजनीतिक दल भी उनके मोहपाश और स्वार्थ की खातिर उनको समाज के नियम नैतिक मूल्यों और देश के कानून की परवाह नहीं करने को उचित समझते हैं।  ये दोनों इक दूजे के लिए हैं मगर पति पत्नी की तरह नहीं इनका रिश्ता मतलब रहने तक का है। चोरबाज़ार में सबसे बड़ी दो दुकान इन्हीं की हैं। इनका संबंध चोर चोर मौसेरे भाई जैसा है मगर हम आज केवल फिल्मनगरी की बात करते हैं। आपको जो टॉनिक बेचते हैं तेल मालिश करवाते हैं न खुद आज़माते है नहीं खाते न लगवाते हैं। हम लोग कर चोर से दिल चोर कहलाते हैं मगर फिल्म वाले कहानी क्या फिल्म तक कहीं से चुरा लाते हैं अपनी बनाकर खूब धन कमाते हैं। आपको झूठी बातें बतलाते हैं नायक गरीब है ईमानदार है महनत उसूल से रईस बन जाता है उल्लू बनाना यही कहलाता है। ये कमाने को सब कुछ करते हैं किसी सच पर नहीं पैसे पर मरते हैं।

  बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी तभी फ़िल्मी नायिका को ऐतराज़ है कोई अंदर की बात बाहर कहे क्योंकि अंदर सब तरह की गंदगी भरी हुई है जिसको कोई सामने नहीं लाने देता है। टीवी अख़बार वालों का स्वार्थ जुड़ा रहता है उनको नायक महानयक बनाकर अपना उल्लू सीधा करने को। सदी का तथाकथित महानायक जालसाज़ी भी करता है किसान होने का झूठा दस्तावेज़ हासिल करने को किसी राज्य की सत्ताधारी सरकार से मिलकर गांव की पंचायत की ज़मीन अपने नाम करवाता है ताकि लोनावला में जो ज़मीन किसान ही खरीद सकता है गैर कनूनी हथकंडे अपना कर खरीद सके। कभी सोचा है जो अभिनेता ईमानदारी और सच्चाई के किरदार निभाता है वास्तव में आचरण में सब कुछ कर सकता है। और उनकी पत्नी जो किसी दल की सांसद थी तब क्या उनको देश अपने पद और कायदे कानून की चिंता थी। इतना ही नहीं जब अदालत ने अमिताभ बच्चन को पंचायती ज़मीन लौटने की बात की तब भी चालबाज़ी से उस ज़मीन को जिस दल की सांसद उनकी पत्नी थी उसी दल की और सांसद के एनजीओ को देने का काम किया जबकि उनको पंचायत को वापस देने का वादा निभाना था। ये कोई अकेली घटना नहीं है सुनील दत्त का बेटा संजय दत्त अपने घर में अवैध हथियार रखने और गुनहगार लोगों का साथ देने का दोषी होता है। कोई और अपनी गाड़ी से किसी को कुचलता है कभी नियम को तोड़कर काले हिरण का शिकार करता है। जाने कितने ऐसे लोग हैं जिनको कानून की रत्ती भर भी परवाह नहीं है जो मन चाहा करते हैं। ये आपको कोई खेल खेलने को उकसा रहे हैं पैसे कमाने का नहीं आपको बर्बादी का रास्ता दिखला रहे हैं मगर ये इसी की कमाई से मौज उड़ा रहे हैं।

    आज का सिनेमा उसकी फ़िल्में कहानी संगीत अपने मार्ग से वास्तविक उद्देश्य से भटक गया है। अन्यथा कभी इस के अभिनेता निर्देशक और संगीतकार गीतकार उच्च आदर्श और सामाजिक मूल्यों को सबसे अधिक महत्व देते थे। पैसे कमाने को दर्शक को गलत संदेश नहीं देना चाहते थे। सोच विचार और सामाजिक कर्तव्य निभाने को लेकर आधुनिक सिनेमा पहले से ऊपर जाने की जगह नीचे ही गिरता गया है। खुद दिशाहीन ही नहीं हुआ बल्कि साथ में बाक़ी समाज को भी गलत दिशा को ले जाने का ही काम किया है। वास्तव में मुंबई नगरी में ऐसी कितनी घटनाएं सामने ही नहीं आती हैं ये इक विडंबना भी है कि देश की बड़ी बड़ी समस्याओं को छोड़ हर कोई किसी एक अभिनेता की मौत पर अटका हुआ है और नतीजा राजनीति और जाने किस किस के मकसद जुड़ने से हर दिन कोई जिन्न इस बोतल से बाहर निकलता रहता है। कोई जादू का चिराग़ किसी ने बिना जाने समझे बस यूं ही मसल दिया और नहीं मालूम ये क्या बला है इस से कैसे निपटा जा सकता है। ये ऐसी नगरी है जिस में कांच का लिबास पहने हुए लोग हैं संग का बना हुआ शहर है अर्थात पत्थर के लोग भगवान इंसान सभी चलते फिरते भावनाशून्य हैं। उनकी हंसी खोखली और आंसू नकली हैं दिखावे के उनका सरोकार खुद के सिवा किसी से नहीं है। कोई ऐसे भी हैं जिनकी छवि देशभक्त वाली है जबकि उनकी नागरिकता किसी और देश की है क्यों है वही जानते हैं खाने कमाने को ये देश है और बसने को कोई और भाता है।

   आपने देखा है टीवी शो पर जब भी आते हैं जाने कैसी कैसी बातें बनाते हैं उनकी गंदी वाहियात बातों पर दर्शक तालियां बजाते हैं। कुछ लोग उनसे कहने को प्यार का रिश्ता बनाते हैं मंच पर उनके संग झूमते हैं गाते हैं उनको अपना आशिक़ चितचोर कहते हैं बेशर्म होकर बहुत कुछ बताते हैं और उनके अपने बैठे मुस्कुराते हैं वास्तविक जीवन में ये हो तो ख़ुदकुशी कर जाते हैं। चुल्लू भर पानी मिले डूब के मर जाते हैं। उनकी शोहरत की बुलंदी झूठ की बुनियाद पर टिकी हुई है कुरेदने भर से कलई उतर जाती है ये दुनिया बस इसी बात से घबराती है। उनकी कमाई की रोटी को कोई नानक निचोड़ दे तो खून की नदिया बह जाएगी। हम जो भी हैं वही नज़र आते हैं ये तो अंधेरा बढ़ाने वाले हैं फिर भी सितारे कहलाते हैं। नाम की ज़रूरत नहीं हैं तमाम अभनेता नायिकाओं के किस्से सभी जानते हैं दुनिया जिस को मुहब्बत की कहानी मानते हैं वास्तविकता को नहीं पहचानते हैं। ये आपकी दुनिया के किरदार नहीं हैं भले जो भी ये कभी वफ़ादार नहीं हैं ये बेवफ़ाई करते हैं मगर गुनहगार नहीं हैं। ज़मीर क्या होता ईमान किसे कहते हैं कहते हैं अभिनय करते हैं खुद होते नहीं है जैसे नज़र आते हैं अदाकार हैं कोई किरदार नहीं है। ये लाईलाज रोग है समाज को बीमार कर रहा है ये आपके लिए कोई उपचार नहीं है। कोई  शायर कहता है , इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं , कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। रौशनी छीन के घर घर से चिराग़ों की अगर , चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। आखिर  में मेरी इक ग़ज़ल भी पेश है।

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें
सुनाते रहे बस कहानी की बातें।

तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने
हमें पूछते अब निशानी की बातें।

गये डूब जब लोग गहराईयों में
तभी जान पाये रवानी की बातें।

रही याद उनको मुहब्बत हमारी
नहीं भूल पाये जवानी की बातें।

हमें याद सावन की आने लगी है
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें।

गये भूल देखो सभी लोग उसको
कभी लोग करते थे नानी की बातें।

किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें। 

सितंबर 11, 2020

POST : 1379 नचा रहे हैं धागे उनके हाथ हैं ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   नचा रहे हैं धागे उनके हाथ हैं ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

   कठपुतली करे भी तो क्या धागे किसी और के हाथ हैं नाचना तो पड़ेगा। सिम्मी नायिका ने इक पुरानी फिल्म में ये डायलॉग जिस ढंग से बोला था कमाल था ये और बात है कि आनंद फिल्म में उसको बदले अंदाज़ में नाटकीय ढंग से बोलने पर उसकी पहचान हो गया मशहूर होना बड़ी बात है। कौन कठपुतली है कौन नचा रहा है ये रहस्य है सामने कोई और हैं पर्दे के पीछे जाने कौन कौन हैं। देश की कानून व्यवस्था को सरे आम बीच बाज़ार कोई नंगा करता है और चाहता है ये खेल हर किसी को दिखाया जाये उनकी हुकूमत है ये ज़रूरी है सबक सिखाया जाये। कोई अरमान जलाया जाये किसी की हस्ती को मिटाया जाये। यहां पर सभी उनके इशारे पर चल रहे थे जो मकसद था मीडिया वाले भी वही कर रहे थे। कोई  रोकने वाला नहीं था कोई टोकने वाला नहीं था सभी अधिकारी अपने आका का हुक्का भर रहे थे ज़ुल्म क्या होता है समझ नहीं इंसाफ कर रहे थे यही कह रहे थे। इंसाफ करने वाले बैठे थे अपनी शान से ये तमाशा चलता रहा आराम से। कोई उस कागज़ के पुर्ज़े उड़ा रहा था जिस पर लिखा हुआ था कोई शपथ उठा रहा था कोई कह रहा था कोई दोहरा रहा था। देश की एकता अखंडता न्याय की निष्पक्षता की भय या पक्षपात नहीं करने की बात को खोखली हैं ये बातें समझा रहा था। आज़ादी न्याय और देश का संविधान क्या है। लोग हैरान हैं परेशान बिल्कुल भी नहीं हैं लोग तमाशाई हैं उनको मज़ा आ रहा है। उधर कोई इंसाफ़ का तराज़ू लड़खड़ा रहा है उसको सब खबर है कोई ख़ंजर है कोई ज़ख़्म खाने खुद उसको बुला रहा है। ये जासूसी उपन्यास लिखा जा रहा है नज़र जो भी आता है समझ आ रहा है मगर राज़ की बात कौन बता रहा है पटकथा कोई लिखवा रहा कोई निर्देशन का हुनर दिखा रहा। रहस्य और भी गहरा रहा है।

    घर शीशे का लिबास भी शीशे जैसा ऐसे में हाथ में पत्थर रखने का नतीजा क्या होगा। मुश्किल यही है जो लोग आईने बेचने का कारोबार करते हैं उनको खुद आईना देखना ज़रूरी नहीं लगता है। अपने चेहरे पर लगे दाग़ उनको अच्छे लगते हैं डिटर्जैंट बेचने का सामान हैं। ये जंग है कि कोई खेल है बहुत अजीब ये घालमेल है किसी शतरंज की बिसात पर मोहरे हैं कितने जो बेमेल हैं। बाज़ी किसी की खिलाड़ी कोई है ये सियासत का अदावत मुहब्बत का इक दौर है। शराफत का कहीं नहीं कोई ठौर है जंगल में नाच रहा कहीं मोर है। चलो थोड़ा पीछे नज़र डालते हैं हर इक किरदार को फिर से पहचानते हैं यहां सच नहीं झूठ ही झूठ है ये इक बात सभी जानते हैं मानते हैं। कोई हारी बाज़ी की बात है बिछाई किसी ने नई बिसात है आधा दिन है आधी रात है नहीं शह नहीं कोई मात है ये बस घात है लात खाई है लगानी लात है। बादशाह खुद को समझते हैं लोग जीत हार की खातिर लड़ते मरते हैं लोग कौन समझाए क्या क्या कहते हैं लोग बात कहते हैं फिर मुकरते हैं लोग। फिर उसी ने अपनी कठपुतली को उंगलियों पर अपने नचाया है जब तेरा साथ है डर की क्या बात है पेड़ पर चने के चढ़ाया है जानते हैं खेल है प्यादों का कौन क्या है किसे क्या बनाया है। किसी शायर ने समझाया था कि " खुश न रहिएगा उठाकर पत्थर , हमने भी देखे हैं चलकर पत्थर "।

     ये आपदा को अवसर बनाने की बात है ख़ुदकुशी की नहीं क़त्ल की बात है। यही समय है ताकत को आज़माते हैं सच झूठ को मिलवाते हैं उनको कहते हैं झगड़ा निपटाते हैं खुद जीतने को उनको हरवाते हैं। फिर कभी जब धागे उलझ जाते हैं चाहते कुछ नहीं कुछ भी कर जाते हैं। बादशाह अपने दरबार में बैठकर चाल क्या चलनी है समझाते हैं कोई मोहरा है सूली पर चढ़ाते हैं घबरा मत हम तेरे साथ हैं उसको ललकार हम तुझे बचाएंगे मज़ा लेते हैं उसको मज़ा चखाते हैं। ये दो ऐसे नादान हैं जो समझते हैं हम बड़े पहलवान हैं हम खुदा हैं हम अपने भगवान हैं आप अपनी हम इक पहचान हैं। बस सी हुई चूक है इक मगरूर है मद में चूर है पर दुनिया का तो यही दस्तूर है सांड लड़ते हैं फसल बेल बूटे बर्बाद होते हैं दोनों थक जाते हैं पीछे हट जाते हैं। सब ने समझा था काठ की तलवार है ये सियासत की जंग है बेकार की हाहाकार है मगर चोट कोई कभी ऐसे लग जाती है ये ज़ुबां तख़्त पर जो बिठवाती है यही सूली पे भी कभी चढ़वाती है। पहले सोचो फिर तोलो फिर बोलो ये दादी नानी समझाती है जब ज़ुबां काबू नहीं आती है कोई महाभारत कहीं करवाती है। शब्द का ज़ख्म कभी भरता नहीं खंजर का ज़ख्म धीरे धीरे भर जाता है ज़हर पीकर भी लोग बच जाते हैं कोई पी के अमृत भी मर जाता है।

      डॉ बशीर बद्र जी कहते हैं उनकी ग़ज़ल के शेर हैं। अब है टूटा सा दिल खुद से बेज़ार सा , इस हवेली में लगता था बाज़ार  सा। बात क्या है मशहूर लोगों के घर सोग का दिन भी लगता है त्यौहार सा। इस तरह साथ निभाना है मुश्किल , तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा। जो था चारागर अब खुद बीमार है दुश्मन का दुश्मन है अपना यार है कठपुतली है उसकी उसका औज़ार है। या इस पार है या उस पार है अभी क्या खबर कोई मझधार है ये डूबती नैया लगती क्या पार है। कैसा मातम है खास लोगों का जश्न है कि कोई त्यौहार है। शराफ़त न जाने कहां छुप गई किसलिए वो भला शर्मसार है। ये शहर मुहब्बत का नहीं है यहां मुहब्बत भी शराफ़त भी ईबादत भी सियासत भी बिकती है इस शहर का मिजाज़ यही है। ग़ज़ल सुनते हैं इक जगजीत सिंह जी की आवाज़ में।


सितंबर 07, 2020

POST : 1378 कोरोना आपकी अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना आपकी अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

         फ़िल्मी अभिनेता की मौत का मातम मनाने से फुर्सत मिलते ही टीवी चैनल एक बार दोबारा से कोरोना राग अलापने लगे। जैसे ही इस को लेकर बहस होने लगी कि सत्तर साल में जितना विकास हुआ था उसका भी सत्यानाश हो गया है ये कोई विरोधी नहीं विश्व बैंक के अधिकारी रहने वाले ने कहा है। सरकार ने अपनी बला टालने की खातिर कोरोना को दोषी ठहराने की बात की तो कोरोना को मज़बूर होकर अपनी सफाई देने को सामने आना ही पड़ा। जैसा होता है सब ने देखा है टीवी चैनल वालों को खुद अपनी खबर भले नहीं होती है जिन आंतकवादियों अपराधियों मुजरिमों को पुलिस तलाश नहीं कर पाती उनका साक्षात्कार टीवी वाले दिखलाते हैं। ओसामा बिन लादेन से पहले भी ऐसा होता था उसके बाद ये रिवायत बन गई खुलेआम बताते हैं आज आपको उनसे मिलवाते हैं। रिया को भी अपनी कहानी खुद अपनी ज़ुबानी सुनानी पड़ी क्योंकि बात या असली मामला वही छीना झपटी पैसे दौलत का है। मरने वाले की आत्मा की शांति को श्राद्ध कौन करे बाद की बात है पहले उसका वारिस होना है तो क़ातिल कोई और है कहना ज़रूरी है ख़ुदकुशी करने का इल्ज़ाम कोई अपने पर नहीं लेना चाहता। कोरोना को भी जो अपराध किया नहीं उसका आरोपी बनाया जाना मंज़ूर नहीं है। 

      पहला सवाल था कोरोना आपको क्यों आना पड़ा इस देश में कोई कमी थी और सब कितना खराब था तुझे आकर पहले से मरे हुए लोगों को मारने की ज़रूरत क्या थी। कोरोना ने कहा मुझे बुलाया गया है बिना बुलाये मुझे इधर नहीं आना था मुझसे खतरनाक और बहुत थे देश की जनता का लहू चूसने वाले। क्या करता मुझे इस शानदार ढंग से नमस्कार करते हुए जान बूझकर बुलावा दिया तो कैसे नहीं आता। क्या आप नहीं जाने उनके बुलाने पर जिनकी हैसियत क्या कमाल की है नामुमकिन को मुमकिन करने वाले से हाथ मिलाना कौन नहीं चाहता है। हाथ मिलाने के बाद हाथ धोने की चर्चा भी अजीब लगती है गले लगाया था हाथ में हाथ भी थामा था कोरोना को जो होना था होना था बस वही कोना था जिस जगह बैठा कोरोना था। उसके बाद हर सरकार हर सत्ताधारी नेता ने खुद मनमानी की कोरोना को फैलाने का काम किया मुझे बदनाम किया खुद नहीं अपना काम किया। कोरोना की लूट की छूट ने उनकी वास्तविकता को सामने ला दिया। मैं जाना भी चाहता था मुझे रोककर अवसर बना दिया मेरे नाम से घर दफ़्तर सब बना लिया। 

     पहले कहते थे उनसे पहले किसी ने कुछ भी नहीं किया सभी ने लूटा है बर्बाद किया है अब जब सब कुछ खुद अपने हाथ से लुटवा बैठे या लुटवाना चाहते हैं तब अपने गुनाह का दोष मुझ पर लगाना ये तो झूठ की सीमा को पार करने के बाद बेगुनाह को सूली चढ़ाने की बात है। हाथ जोड़कर मुझे बुलाया था अब कहते हैं किस से पूछकर आया था। सच बताऊं तो मैंने उन पर एहसान किया है उनकी गिरती साख की लाज बच गई है मेरे बहाने उनके सर से बला टल गई है। दिल ही दिल से मेरा उपकार समझते हैं जो कभी नहीं समझते थे इस बार समझते हैं कोरोना को लोग खुद उनका नया अवतार समझते हैं। ओ चारागर लोग तुझे सबसे बड़ा बीमार समझते हैं अपने सर पर लटकी हुई तलवार समझते हैं सरकार है बड़ी बेकार समझते हैं तुझ से बढ़कर कोई नहीं लाचार समझते हैं। सबसे बड़े दुश्मन को सब यार समझते हैं इस पार ही नहीं लोग सभी उस पार समझते हैं। जाने है कौन देश का गुनहगार समझते हैं चौकीदार नहीं कोई सौ बार समझते हैं। सच तो है सरकार बहुत खुश है कोरोना वक़्त पे आया है क्या क्या नहीं सरकार ने कोरोना से पाया है कोरोना ने उनको बचाया है ये अवसर उन्होंने जमकर आज़माया है। फितरत है उनकी सितम करते रहे हैं अब झूठा ये इल्ज़ाम कोरोना पे लगाया है ये ज़ुल्म भी देखो सरकार ने ढाया है।

        कुछ कहते कहते कोरोना उदास हो गया है उसका इम्तिहान नहीं किसी और का इम्तिहान था जो ज़ीरो नंबर लेकर भी खुश है कोरोना सौ नंबर पाकर पास हो गया है। हर बात जैसे सरकारी मज़ाक हो गया है घोड़ा सत्ता का खुश है हर शख़्स घास हो गया है। अदालत का फैसला नया इतिहास बनाया है इक बेगुनाह को झूठे आरोप लगा मुजरिम बनाया है उसको बाइज्ज़त बरी किया झूठ बोलने वाले पर जुर्माना लगाया है। क्या सरकार को निर्णय मंज़ूर नहीं होगा कोरोना बेकसूर है तो किसी और का कसूर होगा। आखिर वही हुआ जिसका डर था चोरी की है उसी ने खुद जिसका ये घर था। दरवेश कह रहा ये कौन है जो शाहंशाह बन कर आ गया है दौलत सारी दोस्तों को लुटा गया है भीख मांगता था खुद भिखारी सबको बना गया है।

सितंबर 05, 2020

POST : 1377 लॉक-डाउन की महिमा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    लॉक-डाउन की महिमा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 
     लॉक-डाउन को लेकर दुविधा में हैं लोग कब से कब तक और कितना कैसा कोई नहीं जानता खुद घोषित करने वाले अनजान हैं। हटते हटते ज़माना लगता है लगाने को चुटकी बजाना लगता है है हक़ीक़त मगर फ़साना लगता है आपको झूठा बहाना लगता है। मुश्किल बाहर जाना मुसीबत को घर बुलाना लगता है। अंधों में काना ही अब स्याना लगता है कोरोना को भगाना थाली बजाना लगता है। किसी को अवसर भुनाना लगता है किसी का खाली खज़ाना लगता है बारिश का मौसम सुहाना लगता है रोज़गार पकोड़े बनाना लगता है। सीबीआई को बुलाना पड़ेगा कोई गुनहगार पकड़वाना पड़ेगा कोरोना को मज़ा चखाना पड़ेगा उसे अब तो सूली चढ़ाना पड़ेगा तरीका वही आज़माना पड़ेगा गधे को बाप सबको बनाना पड़ेगा। किसी को कहीं से हटाना पड़ेगा किसी और देश को भाग जाना पड़ेगा नहीं सुनता कोई सुनाना पड़ेगा कुछ और ज़ोर से चिल्लाना पड़ेगा। ये सारा का सारा बोझ उठाना पड़ेगा नहीं सजदा करना मगर सर फिर भी झुकाना पड़ेगा दुष्यन्त कुमार को दोहराना पड़ेगा जो सच है आखिर बताना पड़ेगा। लॉक-डाउन लगाकर हटाना पड़ेगा चिड़िया चुग गई खेत बाद में पछताना पड़ेगा। कभी तो हर किसी को जाना पड़ेगा ये सिलसिला चलता है चलाना पड़ेगा रिवायत को आखिर निभाना पड़ेगा किसी को उठाकर बिठाना पड़ेगा। लॉक-डाउन का मतलब पढ़ाना पड़ेगा अनलॉक-डाउन तुझको समझना और समझाना पड़ेगा।

        लॉक-डाउन की कथा बनाई है लॉक-डाउन कोरोना का सौतेला भाई है दूध दूध है छाछ छाछ है मख्खन घी और मलाई है मिलकर रसमलाई बनाई है। नहीं मालूम किसने चुराई है लॉक-डाउन क्या कोई हलवाई है कोरोना है बड़ा कड़वा देखो तो लगता है कोई मिठाई है। बात मन की उसको जब सुनाई है क्या कहें कितनी उसको भाई है अब कसम सच्ची उसने खाई है सरकारी दामाद है कोरोना घरजवाई है। ऐलान जनाब ने किया आखिर आठ बजे सीधे संबोधन में कोरोना से बात बिगड़ी बन गई है ठन गई थी मगर फिर टनाटन गहरी छन गई है। वैक्सीन नहीं कोई दवाई नहीं हम कथा उसकी सुनाएंगे कोरोना संग लॉक-डाउन की भी महिमा गाएंगे सुबह शाम उसको जब मनाएंगे नाचेंगे झूमेंगे और गाएंगे बीमार चंगे हो जाएंगे। हम ये राज़ दुनिया से छुपाएंगे कोरोना क्या है कुछ भी नहीं मगर सब कुछ है ये समझा कर और उलझाएंगे। हमारे पास बेचने को रखा क्या है दुआ भी है बद्दुआ क्या है किया क्या और हुआ क्या कौन समझे ये माजरा क्या है। लॉक-डाउन चीज़ कितनी अच्छी है बात झूठी भी लगती सच्ची है हमने छाना कोना कोना है छिप गया डर कर जब कोरोना है हमने उसको ज़िंदा छोड़ने का किया वादा है पेश हो जाओ पक्का इरादा है।  सीबीआई  ने जाल बिछाया था तब कोरोना बहुत घबराया था दुहाई है दुहाई है कोरोना बहना है और  लॉक-डाउन उसका भाई है। राम ने खूब मिलाई है जोड़ी इक अंधा है दूजा है कोड़ी बात रहती है ज़रा अभी थोड़ी सुना रहे हैं उसको लोरी। गहरी नींद उनको जब आएगी अर्थव्यस्था पटड़ी पर खुद चली आएगी कथा सुनाने को नई ऐप्प बनाई जाएगी आरती भजन कीर्तन सतसंग जनता ताली भी बजाएगी सरकार कोरोना संग निभाएगी मगर जब सब जनता मनाएगी भाई लॉक-डाउन चला जाएगा बहना कोरोना भी भाग जाएगी।
        

सितंबर 03, 2020

POST : 1376 फ़िल्मी नायक हैं असली नहीं ( बोल फ़रीदा ) डॉ लोक सेतिया

  फ़िल्मी नायक हैं असली नहीं ( बोल फ़रीदा ) डॉ लोक सेतिया 

        नामुमकिन को मुमकिन करने वाले नायक या फिर ख़लनायक का अभिनय करते हुए सिनेमा के पर्दे पर सब कुछ कर सकते हैं वास्तविक ज़िंदगी में उनकी सच्चाई बिल्कुल अलग होती है। सच्चाई ईमानदारी और आदर्श की कहानी का किरदार निभाने वाले वास्तविक जीवन में झूठ छल कपट धोखा और समाज के नैतिक मूल्यों को ताक पर रख कर बिना संकोच या लाज शर्म उस सीमा तक अनुचित आचरण करते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। और उनके अच्छे बुरे क्या खराब और गुनाह समझे जाने वाले कर्मों को भी हम चाव से सुनते हैं और कितनी अजीब बात है देख कर पढ़ कर सुनकर भी उनके लिए खराब भावना नहीं होती है। इक झूठ फरेब की नकली चमकती दुनिया को हमने हक़ीक़त से बढ़कर समझ लिया है उनके अफ़साने हक़ीक़त को झुठलाते हैं। हमने किसी को नायक किसी को महनायक किसी को भगवान तक कह दिया उनके अभिनय या खेल या कोई कला को दिखला सफल होने के कारण। उस कलाजगत खेलजगत का वास्तव में देश समाज और हमारे साधारण लोगों के जीवन से कोई मेल तो क्या सरोकार भी शायद ही होता है। शायद उनको मालूम ही नहीं है कि साहित्य कला संगीत और अभिनय नृत्य का वास्तविक मकसद आम व्यक्ति की ज़िंदगी और सुख दुःख दर्द परेशानी समस्याओं को जानकर उन पर चिंतन करना होना चाहिए। मगर ये बेहद खेदजनक है कि सफलता पाने का अर्थ पैसा दौलत कमाकर इंसान इंसानियत के एहसास से दूर केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखना बन गया है इसलिए उनके किरदार से समाज को अच्छा संदेश नहीं मिलता बल्कि भटकाने की बात होती है। कभी शायद कोई सोचेगा कि कभी समय हुआ करता था जब सिनेमा फिल्म और कहानी गीत कितने सार्थक मार्गदर्शक की तरह अपना कर्तव्य निभाते थे और उन नैतिक आदर्शों की खातिर अपने स्वार्थ को छोड़ने में कोई संकोच नहीं होता था पैसा उनका भगवान नहीं होता था। अब टीवी सीरियल फिल्म और सोशल मीडिया भी हम सभी को सच से दूर किसी झूठी काल्पनिक दुनिया में भटकाने का ही काम करते हैं। उनका मकसद धन दौलत हासिल करना होता है कोई सामाजिक कर्तव्य निभाना नहीं।

    ये बताना ज़रूरी था विषय को समझने की खातिर। डायलॉग बोलने की तरह भाषण देकर तालियां बजवाने वाले नायक भी नहीं बहरूपिया कहना उचित होगा को हमने समझ लिया कि वो चुटकी बजाते ही हम सब की देश की जनता की समस्याओं को हल कर सकता है। जैसे किसी बकवास विषय पर बनी हिट फिल्म को फिर से बार बार बनाते हैं उस ने नायक का किरदार निभाते हुए कितने तमाशे रोज़ दिखला दिखला कर हम सभी को सोचने समझने ही नहीं दिया कि उसका कोई करिश्मा देश की जनता के लिए कुछ भी कर नहीं पाया है और हमने उसको अनावश्वक ही कोई मसीहा समझने है मानने की गलती की है। अब पता चला आकाश छूने की बातें करने वाले ने देश को पाताल में धकेल दिया है विकास विकास करते करते विनाश को लाते रहे हैं। फिल्म की कहानी में लेखक अपने बनाए किरदार को सही अंजाम तक ले जाने में पग पग साथ रहकर बचाए रहता है लेकिन यहां खुद नायक का अभिनय करने वाला जब जैसे चाहा मनमानी करते हुए जनता की ज़िंदगी की कहानी से खिलवाड़ करता रहा है। उसको रत्ती भर भी एहसास नहीं है कि उसने क्या किया है क्यों किया है और क्या से क्या हो गया है। कहानी अभिनय निर्देशन सभी उसी का है जिसको कुछ भी मालूम नहीं उनके बारे में।

        फ्लैशबैक में पिछली कहानी को देखते हैं। उसने कितने रंग कितने रूप बदल बदल कर मनोरंजन करने का काम किया है। अभिनेता संजीव कुमार ने सात रंग जीवन के सात किरदार निभाए थे मगर गोविंदा ने इक फिल्म में अनपढ़ होते हुए भी वकील डॉक्टर पुलिस अधिकारी की पोशाक पहन कर फोटो करवा घर में लगवाई हुई थी। जिसे देख नायिका भी चक्कर खाई थी। डबल रोल करने वालों की गिनती करना ज़रूरी नहीं है गब्बर सिंह कहता है पचास पचास कोस दूर की दहशत मगर जनाब के लिए हज़ारों मील की भी दूरी कोई दूरी नहीं है। कभी फोटोग्राफी कभी पहाड़ों की सैर कभी शेर चीते हाथी से याराना कभी इस कभी उस देश जाना अपना तमाशा बनाना खुद तमाशाई बन इतराना अपने मुंह मियां मिट्ठू कहलाना। बाबुल की दुआएं लेती जा रुलाने वाले गीत पर झूमना ठहाके लगाना क्या नहीं कर दिखाया है हर शाख पे उल्लू बैठा है किसी ने किस किस को नहीं उल्लू बनाया है। इक छलिया आया है कोई जोकर संग लाया है अच्छे अच्छों को उसने तिगनी का नाच नचाया है।

     खीर बनाने लगे थे कढ़ी बन गई है रोटी पकते पकते तवे पर जल गई है उसकी चाय लेकिन बिना आग पर रखे उबल गई है। उसने लिट्टी चोखा भी खाया है आपदा को अवसर उसने बताया ही नहीं बनाया है। ये कौन जाने किस जहां में सबको लाया है समझा रहा है सब झूठी मोह माया है। अब हर कोई लगता है जैसे घबराया है रात को डरावना सपना किसको नहीं आया है। इक गंभीर कहानी की फिल्म नासमझ बच्चों की खातिर बनाई कार्टून फिल्म बन गई है सब दोस्तों से दुश्मनी होने लगी है उसकी सभी से ठन गई है। हालत बिगड़ गई है फिर भी उसका दावा है कि बात बन गई है। मन ही मन खिचड़ी कोई पकाता है देता नहीं किसी को सबको दिखलाता है खुद चटखारे ले कर खाता है अफ़सोस फिर भी भूखा का भूखा रह जाता है। सपने देखने को जागते ही फिर से सो जाता है। इतिहास के पुराने मंज़र को दोहराता है सब तोड़ता है तोड़ता ही जाता है कहता है फिर से नया देश बनाता है। कोई नशा है जादू है जाने क्या है बर्बाद करता है सभी को फिर भी मनभाता है का शोर मचाता है सच को हमेशा कुचलता है उसकी लाश को छिपाता है। सब कहने लगे हैं भागो भागो वो इधर आता है। ऐलान कर दिया भगवान बन गया है इंसान है हैरान क्या इंसान बन गया है उसका कोई अरमान बन गया है देश में सभी से महान बन गया है। अभिशाप मिला है सबको इक वही वरदान बन गया है। आपने डुप्लीकेट देखे हैं किसी नायक की नकल करते हैं कुछ ऐसा ही है हर महान नायक देश के बड़े बड़े इतिहास के लोगों की नकल करते करते खुद को असली उनको नकली साबित करते करते जोकर बन गया है। झूठ की पहचान होती है कि उसके पैर नहीं होते समझते रहे हैं मगर झूठ बोलने वाले की कोई ज़ुबान नहीं होती है बढ़बोला होना उसकी निशानी है। यही आज की कहानी है समझनी है समझानी है।

सितंबर 02, 2020

POST : 1375 मैं गोरा तू काला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           मैं गोरा तू काला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      रंग गोरा होना चाहिए फिर चाहे नज़र नहीं लग जाये उस से बचने को कालिख का टीका लगवाना पड़ जाये। ये सिर्फ महिलाओं की चिंता नहीं है पुरुष भी सब से आकर्षक दिखाई देने को क्या नहीं करते हैं। ये जो गोरा और काला होने का सवाल है ये शक़्ल सूरत पर नहीं हर जगह मुंह उठाये खड़ा रहता है। अगर ऐसा नहीं होता तो काला धन बिना बात बदनाम नहीं होता उसको किसी और बैंक ने जारी नहीं किया हुआ है। विदेशी बैंक में जमा होने से बदरंग नहीं हो गया जो फिर लौट कर राजनीतिक दल को मिलते ही खुशरंग हो जाता है। काले गोरे का भेद भाव आखिर कब तक ये समस्या उनकी खड़ी की हुई है जिनको अपने चेहरे के दाग़ छुपाने को बाकी सभी पर कालिख पोतनी पड़ती है। उनका ढंग यही है खुद को ऊंचा साबित करने को औरों को बदनाम कर कर छोटा साबित कर दो। सभी को देश के दुश्मन कहने से आपकी देशभक्ति का सबूत मिल जाता है। किसी कवि की हास्य कविता सुनकर समझ कर कोई विश्व का सबसे बड़ा निंदक बन गया है उसने निंदा करने को छोड़ कोई और काम नहीं किया है और उस से तमाम लोगों की निंदा सुनकर देशवासी उस के अनुयाई बन गए हैं। पहले जो सरकार की आलोचना करते थे उसकी कमियां निकालते थे आजकल सरकार को तमाम गलतियों नाकामियों और अनुचित बातों को छुपाने से लेकर अच्छा बताकर गुणगान करने का काम करने लगे हैं। खुद उनकी इस बात को लेकर निंदा हो रही है मगर उनको अपनी निंदा की चिंता नहीं है ये निंदा भी उनको भाने लगी है पैसा विज्ञापन टीआरपी लुभाने लगी है। उनके मनोरंजन से दुनिया उकताने लगी है भोर होते ही उबासी आने लगी है उनकी नग्नता देख कर देखने वालों को शर्म आने लगी है। कोई महिला दिलकश अदाएं दिखलाने लगी है ज़ुल्फ़ों को लहराने लगी है मस्ती ही मस्ती छाने लगी है झूठ को सच बनाकर सुंदरी इतराने लगी है। 

       काले और गोरे रंग की जोड़ी दुनिया की सबसे अच्छी जोड़ी है। बिना एक के दूजे की पहचान नहीं बचती है काली साड़ी गोरी पर क्या जचती है माना हम भी काले हैं लेकिन हम दिलवाले हैं ये कहते सभी मतवाले हैं गोरी हम तेरे रखवाले हैं। ख़िज़ाब बालों पर लगाते थे काला बनाते थे आजकल जितने गुलाब वाले हैं लगते जैसे हैं सब कमाल रंगने का है भीतर से काले थे काले हैं। आपने देखा है बड़े लोगों को पहन कर काला लिबास नज़र आते हैं अपने बेडौल जिस्म को रंग काले से छिपाते हैं काले रंग को नाहक बदनाम किया है सच कहो कोई सफेद काम किया है। निंदा करने का मज़ा क्या है या इलाही ये माजरा क्या है। उसने सबसे बड़ा निंदक होने का ख़िताब पाया है महिलाओं को कितना देखो भाया है। ख़िज़ाब अपने बालों पर नहीं लगाया है दुश्मनों को कालिख़ लगाने का हुनर आज़माया है उसकी सजधज बड़ी निराली है अच्छी लगती है उसकी गाली है। हर कोई बनकर खड़ा सवाली है सबकी झोली भरनी थी किया था वादा अभी तक मगर खाली खाली है। कौन असली है कौन जाली है बात सच्ची है पर निराली है दाल में काला नहीं है उसकी पूरी की पूरी दाल ही काली है।

  सात रंग की जो कहानी थी वो कहानी बहुत पुरानी थी उसने लिखी ऐसी कहानी है जिस में प्यास ही प्यास है नहीं चुल्लू भर भी पानी है। याद आने लगी सबको अपनी नानी है कौन राजा है कौन राजा जानी है कहते हैं देश की जनता बड़ी भोली है मगर फिर भी बड़ी स्यानी है। बस  वही इक देने वाला है बाक़ी लोग तो भिखारी हैं चतुर सुजान है कोई हम क्या हैं निरे अनाड़ी हैं। अपना था जो भी लुटवा बैठे हैं रहबर कैसा बना बैठे हैं रंग इतने बदलते बदलते अपने चेहरे भुला बैठे हैं। अब कोई रास्ता नहीं मिलता है भटकने लगे हैं ऐसे जंगल में सभी ये वीराना कभी गुलशन था फूल सतरंगे खिलते थे कभी। अब  सभी इक उसी के रंग में रंगे हैं ये हम्माम हैं सभी नंगे हैं जो ख़राब हैं बस वही चंगे हैं।


     


सितंबर 01, 2020

POST : 1374 ये आईने तोड़ के फैंक दो ( सच के क़ातिल ) डॉ लोक सेतिया

   ये आईने तोड़ के फैंक दो ( सच के क़ातिल ) डॉ लोक सेतिया 

    सच वो है जो भगवान से भी सवाल करे विधाता ये दुनिया को कैसा बनाया किसी को सभी कुछ किसी को कुछ भी नहीं। हम जिस को देखते हैं वो पत्थर का भगवान अमीरों का लगता है खुद सबसे बड़े आलीशान भवन में हीरे मोती सोना चांदी लिबास भी चमकदार और पूजा अर्चना की गूंज में स्वादिष्ट पकवान। गरीब उसके पास जाकर भीख की तरह दया करने को कह सकता है अपने अधिकार की बात नहीं कर सकता अन्यथा पूछता आपने जन्म दिया तो ज़िंदगी और ज़िंदा रहने का हक भी देता। मगर उस भगवान की बेबसी है वो अपनी वास्तविकता खुद ब्यान भी नहीं कर सकता है। कुछ लोग खुद ही भगवान बन बैठे हैं आज ऐसे ही तमाम लोगों की बात कहते हैं खरी खरी कहने की ज़रूरत है। अन्यथा दुष्यन्त कुमार की तरह कहना होगा " तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान ए शायर को , ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए "। 

   ये सच के झंडाबरदार बने फिरते हैं बेचते हैं अपना झूठ सच साबित कर ऊंचे दामों पर और खुद पर कोई अंकुश नैतिकता का नहीं मानते हैं। ख़ास लोग जब चाहते हैं उनको बुला सकते हैं और उनकी कही हर बात इनको गीता कुरान बाईबल लगती है उनको बात जैसे जब उनकी मर्ज़ी ये दर्शकों को सुनवाते ही नहीं मनवाते भी हैं। जिसकी खाते हैं उसकी बजाते हैं उसी की महिमा बखान कर आगे ऊपर बढ़ते जाते हैं झूठ के परचम को सच बताते हैं लहराते हैं। दर्द की मत करना बात सबसे बेदर्द और बेदिल बेज़मीर यही नज़र आते हैं। मगर आम जनता के हालात इनको समझ नहीं आते हैं उनकी घनी अंधेरी रात को ये चांदनी बताते हैं। कभी किसी को गुनहगार जब बताते हैं उस से पूछो कितना ज़ुल्म ढाते हैं जाने कहां कहां से मनगढ़ंत सबूत ले आते हैं और खुद वकील गवाह न्यायधीश सब बनकर अपनी अदालत में मनमर्ज़ी का फैसला सुनाते हैं। ये ज़हर देते हैं खुद को चारागर बतलाते हैं। ये खुद पागल हैं इनको पीलिया हुआ है पागलपन करते जाते हैं खबर ढूंढते नहीं हैं खबर बनाते हैं बेखबर की खबर को अखबर बनाते हैं। हाथ जोड़कर इनसे लोग जान अपनी बचाते हैं पर जान की कीमत इनको चुकाते हैं तभी बच पाते हैं। इक ग़ज़ल उनकी बातों की सुनाते हैं उसके बाद कोई और दरवाज़ा खटखटाते हैं। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।

मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।


        चलो अगली चौखट पर सर को झुकाते हैं अपने पर हुए ज़ुल्म की दास्तां उनको भी सुनाते हैं जिनके पर इंसाफ़ का तराज़ू है न्याय का मंदिर कहलाते हैं। कोई तोला है कोई माशा है उनका भी अजब सा तमाशा है। वो जो कहते हैं यकीन से कहते हैं समझते हैं जैसे आसमान पर रहते हैं आम लोग उनको दिखाई नहीं देते हैं। खुदा हैं उनकी खुदाई है हां मगर सत्ता पर बैठा जो अपना भाई है कुछ मत पूछो वो करिश्माई है बस उसी ने सभी को राह दिखाई है। चोर चोर मौसेरा भाई है दौलत मिल बांटकर सभी ने खाई है ये खज़ाने की इक खुदाई है लूट है देशसेवा कहलाई है। कनून क्या है संविधान क्या है इधर कुंवां उधर खाई है माखनचोर माखन चुराता है देखती रहती उसकी माई है ये दूध है वो मलाई है। यहां बिकता है ज़मीर भी सर झुकाता है राजा फकीर भी जिसकी फूटी हुई है तकदीर भी उसको मिलती नहीं नज़ीर भी। बस उनको कुछ कहना भी गुनाह होता है सच की बात है फ़नाह होता है। इक ग़ज़ल उनको भी कहती है जनता ज़ुल्म सहती कुछ नहीं कहती है ख़ामोशी बोलती नहीं फिर भी कहती है। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

फैसले तब सही नहीं होते ,
बेखता जब बरी नहीं होते।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें ,
दर हकीकत वही नहीं होते।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर ,
सबके उन जैसे ही नहीं होते।

क्या किया और क्यों किया हमने ,
क्या गलत हम कभी नहीं होते।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका ,
कह के सच हम दुखी नहीं होते।

जो न इंसाफ दे सकें हमको ,
पंच वो पंच ही नहीं होते।

सोचना जब कभी लिखो " तनहा " ,
फैसले आखिरी नहीं होते। 

         इक और है जो खुद हमने बनाया है इक निज़ाम खुद अपना अपनाया है वो कुछ नहीं बस हमारा साया है मगर ये साया शाम का बढ़ता साया है इंसान से लंबा उसका साया है। सांसद विधायक हमने बनाया है हमको डराता है बहुत दूर बच के रहते हैं चेहरा नहीं नक़ाब लगाया है देशभक्ति का गीत गाकर जब सुनाया है मत कहो क्या है क्या बताया है। उनकी हर बात बात होती है दिन उनके उनकी रात होती है उनसे भला मुलाक़ात होती है कोई श्मशान है कोई बरात होती है सूखा मचाती हुई बरसात होती है। बात को मुख़्तसर बनाते हैं फिर ग़ज़ल इक उनको लेकर पढ़ते सुनते सुनाते हैं। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा , क्या तराना है मिलकर गाते हैं। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 
सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है। 

       झूठ ही झूठ है सच कोई नहीं देखता न दिखलाता है। इन सभी आईनों को तोड़ कर फैंक दो इन में कुछ भी दिखाई नहीं देता है इन अंधों को आईना समझ बैठे हैं लोग। चुप रहना ज़ालिम को मसीहा कहना ज़ुल्म सहकर यही किया है देश की जनता ने। अपने अधिकार मांगने से नहीं मिलते हैं छीनने पड़ते हैं सर झुकाकर नहीं उठाकर जीना होगा तभी आज़ादी का कोई मतलब होगा। झूठ को जो सच कहते हैं उनको बताना होगा हम जानते हैं सच क्या है समझाना होगा। हौंसलों को अपने फिर से आज़माना होगा झुकना नहीं टकराना होगा अपने स्वाभिमान को जगाना होगा। आस्मां को ज़मीं पर लाना होगा इक और ग़ज़ल है अपना यही तराना होगा।

   ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम तो जियेंगे शान से,
गर्दन झुकाये से नहीं।

कैसे कहें सच झूठ को ,
हम ये गज़ब करते नहीं।

दावे तेरे थोथे हैं सब ,
लोग अब यकीं करते नहीं।

राहों में तेरी बेवफा,
अब हम कदम धरते नहीं।

हम तो चलाते हैं कलम ,
शमशीर से डरते नहीं।

कहते हैं जो इक बार हम ,
उस बात से फिरते नहीं।

माना मुनासिब है मगर ,
फरियाद हम करते नहीं।