जुलाई 11, 2024

झूठ ही अपनी पहचान है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     झूठ ही अपनी पहचान है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

ख़त्म हो चुकी सच की पहचान है , हर गली में खुली झूठ की दुकान है । दुनिया में सबसे बड़े झूठे हैं हम लोग अब यही अपनी असली पहचान है । सच कभी भूले से मुंह से निकला अगर झट निकाल फैंका उसी में जो दरवाज़े पर बाहर रखा इक पानदान है । झूठ का इतिहास लिखता कोई नहीं और हमारा इक वही अरमान है । हमने हमेशा झूठ को चुना है है अमर वही सच चार दिन का मेहमान है सच को करना है दफ़्न ऐसी जगह जिस जगह दफ़्न सभी का ईमान है । झूठ का देवता आपको दिखाएं हर जगह उसका घर हर बाज़ार उसका ही है कारोबार सबसे ऊंची उसकी आन बान शान है झूठ ही मुल्क़ बना कितना महान है । पाप पुण्य क्या हैं झूठ ऐसा बड़ा दान है जितना बड़ा झूठा है लगता है जैसे भगवान है । ज़िंदगी भी झूठ है मौत भी इक झूठ है आदमी अब आदमी ही नहीं झूठ का कोई सामान है देश अभी भी सोने की खान है कोयला महंगा सस्ती जान है । है कोई जो झूठ से अनजान है कोई मिले अगर सबसे बड़ा नादान है झूठ सबके मन को भाता है अपनी चाहत अपनी शोहरत अपनी दौलत पर वही इतराता है सच को झूठ जो बनाता है इस जहां का वही विधाता कहलाता है । सच आजकल झूठ से घबराता है हर किसी से दूर भाग जाता है झूठ बिना बुलाए चला आता है खुद भी खाता है दुनिया को खिलाता है बजट जब भी कोई बनाता है झूठ का बही खाता सबके मन भाता है । आप सभी कुछ भी मत यार करो सिर्फ और सिर्फ झूठों का ऐतबार करो , सच को हमेशा दरकिनार करो , झूठ को जी भर कर प्यार करो । 
 
सच खड़ा है बिल्कुल नंगा है उसको आती लाज है सर पर झूठ के सोने का ताज है पुराना युग ख़त्म हुआ सामने है जो भी जैसा भी वही आज है । संसद अदालत से प्यार मुहब्बत तक झूठी कसमें सभी खाते हैं जो सबसे बड़े झूठे हैं सत्यवादी कहलाते हैं । आशिक़ अपनी महबूबा को दुनिया की सब से हसीं कहते हैं प्यार और जंग में सब जायज़ है फ़रमाते हैं हुस्न वालों को आईना कभी नहीं दिखलाते हैं चेहरे पर मेकअप लगा किस किस पर सितम ढाते हैं । सच बोलना मना है जनाब खफ़ा हो जाते हैं तारीफ़ झूठी सुनाओ फिर से करीब आते हैं मान जाते हैं । झूठ की कीमत बढ़ती जाती है ईमानदारी हाथ मलती रह जाती बाद में बहुत पछताती है । झूठ की काली घटा सुबह शाम छाती है सच की धूप से आपको बचाती है झूठ की बारिश झूमती है गाती है दुनिया को रोज़ नया रंग समझाती है । सरकार है दुनिया में आती है लौट आती है झूठ की जो दौलत है ख़त्म कभी नहीं होती है सत्ता हंसती मुस्कुराती है जनता को जी भर रुलाती है । सच की जितनी पसलियां हैं टूट कर चूर चूर हो जाती हैं झूठ की छाती चौड़ी होकर जश्न मनाती है । सबसे समझदार वही है सब झूठों का सरदार वही है चोर भी है थानेदार वही है समझो सब संसार वही है । झूठ की तेज़ है रफ़्तार बहुत महंगी है उसकी कार बहुत कहानी लंबी कौन सुनता है हमने संक्षेप में समझा दिया है झूठ की कथा का सार बहुत । झूठ का होना है अभी विस्तार बहुत । अंत में इक मित्र शायर का शेर पेश है ' है कभी आसां कभी दुश्वार है ज़िंदगी तेरा अजब आकार है ' जवाहर ठक्कर ज़मीर  । 
 
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1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

...Jhuthe hi satyavadi kahlate hn...