अक्तूबर 27, 2021

दुरूपयोग करना सीखा है ( पागलपन ) डॉ लोक सेतिया

       दुरूपयोग करना सीखा है ( पागलपन ) डॉ लोक सेतिया 

पैसा धन दौलत ताकत शोहरत कायदा कानून अधिकार आज़ादी से लेकर शिक्षा साधन जानकारी अथवा जो कुछ भी हमारे पास उपलब्ध होता है उन को सही इस्तेमाल करने का मकसद नहीं समझते लेकिन अवसर मिलते ही हर चीज़ का अनुचित उपयोग करना शायद हम भारतीय से अधिक कोई नहीं जानता है। शुरुआत खुद से करता हूं मुझे फेसबुक व्हाट्सएप्प सोशल मीडिया की समझ नहीं है खिलवाड़ कर रहा मनमाने ढंग से उपयोग करता हूं और सोचता हूं जानकार बन गया हूं। बहुमत ऐसे लोग सोशल मीडिया पर समय और साधन का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन समस्या उनकी है जिनको देश की समाज की बड़ी कठिन समस्याओं को हल करने की ज़िम्मेदारी मिली है पर वो सभी अपना दायित्व निभाना छोड़ ऐसे पागलपन करते रहते हैं जिनसे हासिल कुछ भी नहीं होता है। कोई भी शासक हर कार्य नहीं कर सकता है फिर किसलिए हर जगह शासक को उपस्थित होकर दिखाने को आडंबर करना ज़रूरी है। बहाना जो भी हो सत्ताधारी नेताओं अधिकारी वर्ग को शिलान्यास से उद्घाटन करने तक अपना नाम दर्ज करवाना ज़रूरी लगता है। वास्तव में जैसे कोई मज़ाक लगता है किसी जनसुविधा के निर्माण भवन सड़क पुल स्कूल अस्पताल का बन जाने के बाद इंतज़ार करना किसी वीवीआईपी के हाथ से मुहूर्त होने का। उनका वास्तविक मकसद ज़रूरत पीछे रह जाता है और राजनेताओं का शोहरत पाना अपना नाम लिखवाना महत्वपूर्ण बन जाता है। और ऐसा हर जगह हर दिन होता है कभी कभी लगता है देश में कुछ मुट्ठी भर बड़े नाम वाले लोग सब करते हैं बाकी करोड़ों लोग कोई काम नहीं करते हैं। शायद इसकी शुरुआत फ़िल्मी कहानियों से हुई होगी जिस में अभिनेता सब कर सकते थे नाचना गाना लड़ना झगड़ना ही नहीं गुंडागर्दी करने से लेकर मासूमियत भोलापन गरीब से धनकुबेर तक अभिनय में सब कर दिखाना। भोला भाला गंवार महानगर में डॉन बन सकता था और खाली जेब नायक पलक झपकते ही रईस बन कर शोहरत की बुलंदी को छू सकता था। दर्शक की सबसे बड़ी नासमझी ऐसे काल्पनिक असंभव को सच होता देख विश्वास करना और स्वीकार कर तालियां बजाना था। लगता है फ़िल्मी टेलीविज़न की काल्पनिक कथाओं का पागलपन इक नशा बनकर छाया हुआ है और सबको देश और समाज की वास्तविक तस्वीर जो बदसूरत है को अनदेखा कर झूठी दिलकश मनमोहक छवि देखना राहत देता है। जैसे नर्कीय जीवन जीते हुए कोई ख्वाबों में स्वर्ग की कल्पनाओं में खोया रहे मगर उसको बदलने की कोशिश नहीं कर झूठी उम्मीद करता रहे कि कोई मसीहा आएगा और उसका कल्याण कर देगा। बिना समझे जाने सोचे विचारे हमने उन को मसीहा समझ लिया है जिनके पास किसी को देने को कुछ भी नहीं है जो खुद जितना हासिल है उस से अधिक पाने को व्याकुल रहते हैं। ऐसे सत्ता धन दौलत के पुजारी देश समाज को लूटने वाले मसीहाई का दिखावा कर हमको उल्लू बनाते रहते हैं और हम उनकी नकली चमक दमक को वास्तविक समझ धोखा खाते रहते हैं। 

वास्तविक जीवन में कुछ भी बनने को समय महनत लगन और कितनी बाधाओं कठिनाईयों को लांघना होता है। सैनिक किसान मज़दूर बनकर कार्य करना भी आसान नहीं होता है डॉक्टर शिक्षक वकील न्यायधीश धर्मगुरु बनना किसी तपस्या से कम नहीं होता है और सिर्फ इतना ही नहीं ये बनकर अधिकार मिलने के बाद अपने पेशे का फ़र्ज़ पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाना किसी तलवार की धार पर चलने जैसा है। पांव ज़मीर डगमगाने लगते हैं लोभ लालच स्वार्थ खुदगर्ज़ी को देख कर। साधु संत बनकर भी लोभ मोह अहंकार से बचना आसान नहीं होता है। सच को समझने वालों से सच के झण्डाबरदार बने लोग झूठ की महिमा का गुणगान करने लगते हैं आम से ख़ास बनने गरीब से अमीर बनने की लालसा में। मगर जिन्होंने कोई शिक्षा कोई महनत कोई मुश्किल पार नहीं की बड़े पद पर पहुंच कर सिर्फ चोला पहन लिबास धारण कर डॉक्टर वकील न्यायधीश से सैनिक किसान होने का अभिनय कर खुद को समाज को छलने का कार्य करते हैं। धर्म उपदेशक समाजसेवक बनकर नाम शोहरत पाने के इच्छुक लोग दानवीर कहलाने को लालायित लोग भी शामिल हैं फोटो करवाने वीडियो बनवाने इश्तिहार बंटवाने को सबसे महत्वपूर्ण कार्य समझने में। काश अपना कर्तव्य निभाते तो इन व्यर्थ कार्यों की ज़रूरत कभी नहीं पड़ती। शासन के सर्वोच्च शिखर पर भी खुद को बड़ा महान और सबसे विशेष जतलाने का मतलब भीतरी खोखलापन ही है। साधु संतों से योगी सन्यासी कहलाने वाले अपनी महिमा अपना गुणगान करवाने को छोड़ नहीं पाते हैं अर्थात दुनिया की मोह माया लोभ लालच अहंकार से ऊपर उठते नहीं कभी वास्तविक रूप से। आदर्श को आचरण नहीं खेल तमाशा बना दिया है। मदारी बनकर हमको अपने खेल से आचंभित कर उसे जाने क्या क्या समझते हैं जो सही मायने में किसी पागलपन की निशानी है। 
 
लेकिन समस्या खुद हमारी है जो आज़ादी का महत्व नहीं जानते और आज़ाद होकर भी मानसिक तौर पर गुलामी के शिकार हैं। राजनेता अभिनेता खिलाड़ी धनवान लोग जिन्होंने वास्तव में सिर्फ खुद अपने लिए सफलता हासिल की किसी को कुछ देने नहीं सिर्फ हासिल करने को लगे रहते हैं उनको अपना आदर्श मसीहा क्या आराध्य तक समझने की मूर्खता करते हैं जबकि उन्होंने हमारे लिए देश समाज की भलाई के लिए कुछ नहीं किया होता है जो किया जो करते हैं केवल अपने खातिर करते हैं। ख़ास नाम शोहरत वाले लोगों के सामने नतमस्तक होकर उनकी चाटुकारिता करना आदत बन गया है घर गांव में हर किसी से अहंकार पूर्वक पेश आने और आपस में कुशल क्षेम पूछने में संयम बरतने वाले क्षण भर में बदले रंग ढंग में दिखाई देते हैं। शायद हमने सीखा ही नहीं अच्छाई सच्चाई और काबलियत का आदर करना बस उगते चढ़ते सूरज को सलाम करते हैं जबकि मालूम है समय बदलते यही सूरज शाम को खो जाता है रात के अंधेरे में। नकली सितारों को देखते देखते असली आसमान पर चमकते सितारों का दिलकश नज़ारा देखना हमने कभी का छोड़ दिया है । 
 

 
 


 
 

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