अक्टूबर 11, 2013

POST : 369 लोकनायक जे पी नारायण की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   लोकनायक जे पी नारायण की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         11 अक्टूबर जब भी आता है मुझे हैरानी होती है सभी टीवी चैनेल अमिताभ बच्चन जी का जन्म दिन मना रहे होते हैं उनको नायक नहीं महानायक सदी का घोषित किया जाता है ।  कल इक महान लेखक की बात पढ़ी थी , उनका कहना था नायक वो होते हैं जिनको सही राह मालूम होती है , वो खुद सही मार्ग पर चलते हैं और लोगों को भी साथ रखते हैं । जे पी जैसे वास्तविक नायक हमें याद नहीं रहते और फ़िल्मी अभिनेता को हम नायक बता उसका गुणगान करते हैं ।  इस से समझ सकते हैं कि हम मानसिक तौर पर कितने खोखले हो गए हैं ।  शायद हमें आज़ादी से पहले का तो क्या आज़ादी के बाद तक का इतिहास याद नहीं है ।  भूल गये हैं कि किसी भी नेता का इस कदर महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिये कि वो खुद को संविधान से ऊपर समझने लगे ।  आज भी हम वही गुलामी की मानसिकता के शिकार हैं और किसी न किसी को खुदा बनाकर उसकी परस्तिश करने में लाज अनुभव नहीं करते ।  ऐसे कितने खुदा लोगों ने तराश लिये हैं जो उनकी इसी बात का उपयोग पैसा कमाने और अमीर बनने को कर रहे हैं ।  उनका धन दौलत का मोह बढ़ता ही जाता है , शास्त्र बताते हैं जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और पाने की हवस हो वही सब से दरिद्र होता है ।  लेकिन हम जे पी जैसे जननायक को भूल जाते हैं जिसने कभी किसी पद किसी ओहदे को नहीं स्वीकार किया और हमेशा जनता की बात की ।  और जिस ने देश समाज को कुछ नहीं दिया जो भी किया खुद अपने लिए ही किया उसको हम भगवान तक बताने में संकोच नहीं करते ।  विशेष कर मीडिया को तो समझना चाहिए लोकतंत्र में चाटुकारिता कितनी खतरनाक होती है ।  अमिताभ बच्चन को सदी का महानयक कहना वास्तव में नायकत्व को अपमानित करना है ।  कौन बनेगा करोड़पति का धंधा लोगों को झूठे सपने गलत राह दिखाना है जिस में टीवी चैनल और ये अभिनेता दोनों शामिल हैं ।
                                     
             पच्चीस  जून 1 9 7 5 को जयप्रकाश नारायण जी के भाषण को आधार बना आपात्काल की घोषणा की गई थी ।  मैं उस दिन उनका भाषण सुनने वालों में शामिल था ।  आज वो लोग सत्ता पर आसीन हैं जो कभी आपात्काल में भूमिगत थे ,  आज देखते हैं वही खुद तानाशाही ढंग से आचरण करते हैं और मीडिया तब भी उनकी महिमा का गुणगान करता नज़र आता है ।  कोई उनको याद दिलाये कभी आपको किसी सत्ताधारी की तानाशाही लोकतंत्र विरोधी लगती थी , आज खुद दोहराते हैं वही सब ।  मुझे तो आज तक ये समझ नहीं आ सका कि इस अभिनेता ने देश व समाज को क्या दिया है ।  मगर हमारी मानसिकता बन गई है सफलता को , पैसे कमाने को महान समझने की ।  कोई के बी से से जीत लाये धन तो शहर वाले उसको सम्मानित करने लगते हैं ।  ये नहीं सोचते कि ऐसा करना कितना उचित या अनुचित है ।  सब जानते हैं कि ये धन जनता से आता है एस एम एस से और विज्ञापनों से ।  न चैनेल घर से देता है न ही अमिताभ जी , बल्कि दोनों की कमाई होती है ऐसा करके ।

    जे पी जी जैसे लोग कभी कभी मिलते हैं ।  आज आप अन्ना हजारे जी को जानते हैं भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये चलाये आन्दोलन के कारण ।  1975  में जो आन्दोलन देश भर में जे पी जी ने चलाया था वो अपने आप में एक मिसाल है ।  इंदिरा गाँधी जिनको बहुत ही साहस वाली महिला माना जाता है डर गई थी उनके आन्दोलन से और आपातकाल की घोषणा कर दी थी ।  19  महीने तक देश का लोकतंत्र कैद था एक व्यक्ति की कुर्सी की चाहत के कारण ।  कांग्रेस लाख चाहे ये काला दाग मिट नहीं सकता उसके दामन पर लगा हुआ ।  ये अलग बात है कि  उस आन्दोलन में ऐसे भी लोग शामिल हो गये थे जिनको आगे जा कर खुद सत्ता प्राप्त कर वही सब ही करना था ।  लालू यादव और मुलायम सिंह जैसे लोग होते हैं जिनको अपने स्वार्थ सिद्ध करने होते हैं ।  वे तब भ्रष्टाचार और परिवारवाद का विरोध कर रहे थे लेकिन आज खुद वही करने लगे हैं ।

    मगर जे पी जी का सम्पूर्ण क्रांति का ध्येय तब भी सही था और आज भी उसकी ही ज़रूरत है ।  शायद आज और अधिक ज़रूरत है क्योंकि तब केवल बिहार और दिल्ली की सरकार की बात थी जब कि आज हर शाख पे उल्लू बैठा है ।  मगर आज के नवयुवकों को ये बताना बेहद ज़रूरी है कि नायक वो होते हैं जो पद को कुर्सी को ठोकर मरते हैं उसूलों की खातिर। देश के सर्वोच्च पद के लिए इनकार कर दिया था जयप्रकाश नरायण जी ने ।

आज है कोई जो सत्ता को नहीं जनहित को महत्व दे । आज उनको याद किया जाना चाहिए , उनसे सबक सीख सकते हैं आम आदमी पार्टी के लोग कि वही सब फिर न दोहराया जा सके ।  भ्रष्टाचार के विरोध की बात कर सत्ता पा कर खुद और ज्यादा भ्रष्टाचार करने लगें ।  इधर लोग दो लोगों को भगवान कहने का काम करते हैं अक्सर ।  लेकिन उन दोनों तथाकथित भगवानों की  दौलत की चाहत थमने का नाम ही नहीं ले रही । क्या भगवान ऐसे होते हैं , भगवान देते हैं सब को , अपने लिए कुछ नहीं चाहिए उसको । 
 

मुझे  शायर कुलदीप सलिल जी  की ग़ज़ल के कुछ  शेर याद आ रहे हैं । 

 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे  मंज़ूर नहीं
कोई बन्दों में खुदा हो मुझे  मंज़ूर नहीं ।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
चाँद बस्ती में उगा हो मुझे  मंज़ूर नहीं ।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना
आपकी एक अदा हो मुझे  मंज़ूर नहीं । 

 

खूब तू खूब तेरा शहर ता-उम्र मगर  

एक ही आबो हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं ।  

 

 
 


 

2 टिप्‍पणियां:

Sanjaytanha ने कहा…

आज के सत्तानशीन लोग ...तब भूमिगत ...आज तानाशाह...तो तबकी स्थिति से क्या सीखा इन्होंने?

Sanjaytanha ने कहा…

Bdhiya aalekh 👍