Friday, 31 May 2019

जीवन का पिंजरा और चौराहा ( लीक से हटकर ) डॉ लोक सेतिया

  जीवन का पिंजरा और चौराहा ( लीक से हटकर ) डॉ लोक सेतिया 


     आज कोई कहानी नहीं कविता नहीं ग़ज़ल नहीं कोई निरर्थक बहस नहीं कोई राजनीति की धर्म की बात नहीं और दुनिया की नहीं अपनी ज़िंदगी को सच्ची बात खुलकर। मैंने बहुत थोड़ा पढ़ा है मगर जितना भी पढ़ता रहता हूं उस को लेकर चिंतन करना समझना आदत है। किताबों से बेहद लगाव है और किताबों से संगीत से फिल्मों से पुरानी युग की से भी मुझे काफी सबक समझने सीखने को मिले हैं। कल इक अख़बार में बोध कथा और इक किताब में इक ग़ज़ल पढ़कर ये फ़लसफ़े की बात लिखना ज़रूरी हो गया है।

       सोचता हूं तो एक साथ दोनों बातें सच लगती हैं। जैसे कोल्हू का बैल अपनी परिधि में घूमता रहता है आंखों पर दो खोपे बंधे रहते हैं और बैल समझता है चलता जा रहा है जबकि रहता वहीं का वहीं है अपनी भी दशा उसी जैसी है। जीवन की राह में कितने चौराहे मिलते रहते हैं चलते चलते , इक राह लगती है आसान होगी छोटी होगी , इक और लगती है बनी हुई पगडंडी है पहले भी तमाम लोग उसी से गुज़रते रहे हैं कोई अनजानी नहीं होगी , इक उबड़ खाबड़ लगती है जिस पर कांटे भरी झाड़ियां हैं रेगिस्तान है पत्थरीली राह है कोई छांव नहीं कठिन लगती है और इक और सीधी चली जाती है। हम समझते नहीं हमारी मंज़िल क्या है और कौन सी राह उस को जाती है , हम अपनी मर्ज़ी की राह चलते रहते हैं और कभी मंज़िल नहीं मिलती है। शायद आज से ही सही दिशाहीनता को छोड़ अपनी मंज़िल की तरफ चलने का निर्णय लेना होगा।

  पिजरे की बात इक बोध कथा से फिर याद आई। संक्षेप में सुनाता हूं। इक आदमी पहाड़ों पर सैर करने को गया। उसने देखा चरों तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ हरे-भरे पेड़ और ठंडी ठंडा हवाएं खूबसूरत वादियां हसीन मंज़र का आनंद ले रहा था। अचानक उसको कोई आवाज़ पहाड़ों से टकराती हुई उसके कानों को सुनाई दी। जैसे कोई पुकार रहा हो आज़ादी आज़ादी। वह आदमी हैरान होकर ढूंढने लगा कहां से ये चीख आ रही है। काफी तलाश करने के बाद उसे इक तोता मिला जो इक पिंजरे में बंद था जो चिल्ला रहा था आज़ादी आज़ादी। उस आदमी ने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। पर तोता डरकर अंदर की तरफ भाग गया। आदमी बहुत देर तक तोते को पुचकारता रहा पर तोता पिंजरे से बाहर नहीं निकला और अंदर से ही राग अलापता रहा , आज़ादी आज़ादी। काफी कोशिश के बाद आदमी ने हाथ डालकर तोते को आराम से पकड़ कर बाहर निकाला और खुले गगन में छोड़ दिया। अगली सुबह फिर से उस आदमी को वही आवाज़ सुनाई दी मगर जब जाकर देखा तो हैरान हुआ दरवाज़ा खुला है फिर भी तोता अंदर बैठा चिल्ला रहा है आज़ादी आज़ादी। हम लोग भी जीवन में सभी जगह उसी तरह से किसी पिंजरे में रहने के अभ्यस्त हो चुके हैं। पिंजरा छोड़ेंगे तभी पता चलेगा कि दुनिया कितनी हसीन है।

       कुछ शेर बलबीर राठी जी की ग़ज़ल से चौराहे को लेकर सुनने से पहले ज़रूरी बात खरी भी कड़वी भी। सभी लोग अपने को जानकर समझते हैं अच्छी अच्छी बातें कहते हैं समझाते हैं। सोशल मीडिया पर और क्या होता है संदेश पढ़कर लगता है कितने आदर्शवादी लोग हैं भलाई की बातें धर्म की उपदेश जैसी सुंदर सुंदर तस्वीरें भी मगर कितने हैं जो उन को पहले खुद आचरण में अपनाते भी हैं। लिखने वाले साहित्य की दुनिया की खबर की आईने दिखाने की बात करने वाले टीवी अख़बार वाले भली भली महानता की बातें कहते हैं खूब ज़ोर शोर से लेकिन खुद इनकी बात मत पूछना नसीहत करते हैं अमल में लाते नहीं है। जिसे देखो खुद को जानकर समझदार ही नहीं शरीफ ईमानदार होने का दिखावा करते हैं मगर जब ज़रूरत हो कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं उचित अनुचित का कोई मापदंड नहीं। चेहरा कोई है मुखौटा बदलते रहते हैं सुविधानुसार। अब कुछ शेर पेश हैं।

मेरे पीछे सूनी राहें और मेरे आगे चौराहा , 

मैं ही मंज़िल का दीवाना मुझको ही रोके चौराहा। 

ऐसे मुसाफिर भी थे जिनकी अक्सर यूं भी उम्रें गुज़रीं , 

जिस भी सिम्त सफर को निकले उनको मिला आगे चौराहा। 

चौराहों पर आकर सारी राहें गड्ड मड्ड हो जाती हैं ,

जो अपना रस्ता पहचाने उसका क्या कर लेगा चौराहा। 

जिन दीवानों के कदमों में मंज़िल अपनी राह बिछा दे ,

राठी ऐसे दीवानों को खुद रस्ता दे दे चौराहा।

हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया ( हास-परिहास ) 

                        डॉ लोक सेतिया ( किसी की डायरी से )

    इस बार भी बुलावा नहीं आया कितना शानदार उत्सव था। सखियां ज़रूर छेड़ेंगी मान जाती खुद ही चली जाती भला कोई रोक सकता था। जब मानते हैं अभी भी तुम उनकी पत्नी हो तो अधिकार था जाती साथ की कुर्सी पर विराजमान होती। टीवी चैनल वाले भी उनकी माता जी मतलब आपकी सासु मां को घर बैठ टीवी पर देखते दिखाना छोड़ तुम्हीं पर कैमरा फोकस करते हम भी देखते कितना अच्छा लगता। कोई बहाना समझ ही नहीं आ रहा इस बार पिछली बार कहा था बुलाने का इंतज़ार करती रही बुलावा मिला ही नहीं। जाने कैसे लोग पता लगा लेते हैं जो जानकारी मिली कि जिस भी नेता को पद पर आसीन होने की शपथ लेनी हो उसके परिवार को बुलावा भेजना ज़रूरी है और इस के लिए उनके कहने की ज़रूरत नहीं समझी जाती है। खैर इस बार ये उम्मीद नहीं थी जाऊं चाहे नहीं भी जाऊं बुलाना तो होगा ही। उस दिन जानकर घर से बाहर नहीं निकली न किसी से संपर्क किया किसी तरह भी। सब समझे होंगें चली गई होगी इस बार बुलावा आने की राह तकने की भी ज़रूरत नहीं होगी। 

     हम लोग रिश्तों को लाख आपसी मन मुटाव होने पर भी निभाते हैं ख़ुशी के वक़्त बुला लेते हैं दुःख की घड़ी चले जाते हैं खबर मिलते ही। पति पत्नी में तो रूठना मनाना घर के भीतर होता है बाहर समाज को पता नहीं चलने देते कोई झगड़ा भी है। ऐसे मिलते हैं आदर्श जोड़ी की तरह इक दूजे की ख़ुशी को मिलकर मनाते हैं। जाओ जी बड़े वो हो , अरी तुम भी अजीब हो घर की मालकिन सबको बुलाती है तुम को भला बुलाने की ज़रूरत थी कोई। खत नहीं फोन नहीं व्हाट्सएप्प संदेश भेज कर लोग जिसको नहीं पसंद उनको भी आने को निमंत्रण भिजवा देते हैं खुद नहीं जाना तो डाक से कुरियर से ही। अधिकतर चले जाते हैं उत्सव का अवसर है गीले शिकवे भुलाकर फिर से मरासिम कायम रखने को सिलसिला चल पड़ता है। 

    अगली सुबह सखियां चली आईं बधाई देने को। मिठाई मंगवाना भूल गई ओह याद किसी की न सताये राम जी। झूठ बोलना पड़ा मिठाई की दुकान से लड्डू मिले ही नहीं पहले से बुक करवा लिए थे उन्हीं के दल वालों ने। घर पर ही हलवा बनाकर खिलाना पड़ा। गई क्यों नहीं सवाल आना था जाने क्यों जवाब सूझ भी गया सखी इस बार डाक विभाग की गलती है उन्होंने इतना खूबसूरत निमंत्रण पत्र भिजवाया है मगर पहुंचा उत्सव खत्म होने के बाद तो कैसे जाती। सखियां नहीं समझी सच है या बहाना है। ये राजनेता लोग विपक्षी नेता को या अपने ही दल के विरोधी को जानकर देर से बुलावा भेजते है सभा में आने का पर घर के लोगों वो भी पत्नी को इस तरह नहीं बहलाया जा सकता है। चलो इसी बात पर इक ग़ज़ल आर पी महरिष जी की सुनते हैं। 

आईने में देखना अच्छा लगा , अपना अपना चौखटा अच्छा लगा। 

आत्मश्लाघा में खुद अपनी पीठ को , थपथपाना ठोंकना अच्छा लगा। 

आज विश्वामित्र के बहरूप को , मेनका ने फिर छला अच्छा लगा। 

आधुनिक बनने की अंधी दौड़ में , उनको चस्का जाम का अच्छा लगा। 

एक खलनायक की कटु मुस्कान पर , हो गए दर्शक फ़िदा अच्छा लगा। 

बाद उत्सव के निमत्रण पत्र वो , खूबसूरत सा मिला अच्छा लगा। 

हम तो रुकने ही को थे महरिष मगर , उसने रोका रास्ता अच्छा लगा।       


Thursday, 30 May 2019

खोजना होगा भगवान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     खोजना होगा भगवान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      हमने खोजा था भगवान बहुत पहले इस की चर्चा की गई थी जब पेटेंट की बात चली थी। मालूम नहीं तब सरकार ने किया या नहीं शायद नीम हल्दी तुलसी की चिंता थी भगवान का पेटंट करवाने से आर्थिक नफ़ा नुकसान नहीं सोचा हो तो छोड़ दिया हो। भगवान भी क्या करते जब कोई उनकी अहमियत को नहीं समझता हो। पर अब लगता है किसी न किसी को दोबारा ऋषि मुनि बनकर तलाश करना होगा क्योंकि अफवाह सुनी है भगवान इस देश को कभी का छोड़ कहीं विदेश जा बसे हैं। देश की सुरक्षा का सवाल है इसलिए अभी ये राज़ छुपाया जा रहा है मगर उड़ती उड़ती खबर बाहरी देश से इधर पहुंची है कि उधर किसी सच्चे फ़कीर ने पा लिया है ऊपर वाले को। अपने देश में करोड़ों देवी देवता कभी वास किया करते थे और सबकी मनोकामना पूरी हुआ करती थी अब किसी को यकीन नहीं होता किस जगह किस से मनौती मांगी जाये जो मिल भी जाये। इधर उधर कितनी जगह भटकते फिरते हैं लोग। कहीं ऐसा तो नहीं देश की आबोहवा ठीक नहीं होने की विवशता के कारण भगवान घूमने फिरने आबोहवा बदलने विदेश चले गए हों और फिर किसी देश में मन रम गया हो और वापस लौटना ही भूल गए वहीं का निवासी बन कर रहने लगे हों। माना भगवान के पास धन दौलत की कोई थोड़ नहीं है अंबार लगे हैं उसके कितनी कितनी जगह। पर पासपोर्ट बनवाने हवाई टिकेट उपलब्ध कराने में कोई न कोई सरकारी अधिकारी या नेता ज़रूर शामिल हुआ होगा। बिना सबूत आरोप नहीं लगाना चाहिए लेकिन ये भी कोई बड़ा घोटाला हो भी सकता है। कोई अपने साथ भगवान को देवी देवताओं को लेकर जाता रहा हो और अपना मतलब पाने के बाद उसी देश छोड़ कर चुपचाप लौटता रहा हो। कई लोग कबूतरबाज़ी का खेल खेलने का कारनामा अंजाम लाने को बदनाम हुए हैं।  

          कई साल पहले मैंने कहा था कि अगर कोई ईश्वर होने का पेटेंट करवा ले तो क्या होगा।  हमको पहले से ये अपने नाम करवा लेना चाहिए। मगर हम भारत वासी खुद को भगवान हरगिज़ नहीं कह सकते।  भले है बहुत जो भगवान कहलाते हैं , मीडिया ने बना दिया अपने मकसद से , कुछ ताकत शोहरत मिलते ही खुदा बन जाते हैं इंसान नहीं रहते। मगर भगवान हैं ये नहीं कहते क्योंकि भगवान से उनको भी डर लगता है। मगर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि ये पेटेंट अपने नाम करवा लिया जाये कि भगवान को हमने ही खोजा था। ये झूठ भी नहीं है , हम साबित कर सकते हैं। हमारे साधू संत , सन्यासी , ऋषि मुनि , देवी देवता तक वर्षों बन बन भटकते रहे , तपस्या करते रहे पर्मात्मा को पाने को। इस अपने देश में करोड़ों देव वास किया करते थे , तो बहुमत भी अपना ही साबित किया जा सकता है। अब वो सब किधर गये ये सवाल मत पूछना , कलयुग में राक्षस ही मिलते हैं उनके रूप में। लेकिन जब हमने खोजा था भगवान को तो इसका पेटेंट अपने नाम होना ही चाहिये। अब आप सोचोगे कि ऐसा करने से क्या हासिल होगा। तो समझ लो जब भगवान पर अपना पेटेंट होगा तब उसकी बनाई हर चीज़ पर अपना अधिाकर खुद ही हो जायेगा। तब उनको पता चलेगा जिन्होंने हमसे गैट समझौते पर हस्ताक्षर लिये थे। हवा पानी चांद सूरज , रौशनी अंधेरा सब की यहां तक कि बरसात की रायल्टी देनी होगी , इंद्र से लेकर सभी देवता अपने ही हैं। तब पता चलेगा उनको भी कि पेटेंट करवाना क्या होता है।

          पूजा अर्चना पहले सुख शांति पाने को करते थे फिर भगवान से खाने को रोटी मिलती रहे घर की छत कायम रहे और परिवार फलता फूलता रहे यही बहुत समझा जाता था। धर्म की राजनीति करने वालों ने सत्ता पाने को अनुष्ठान करवाना शुरू किया तो बात खुलने लगी। सभी ने अपनी अपनी तरह धार्मिक कार्य करवाया और नामी गिरामी लोगों की सेवाएं लेकर विधि विधान से किया मगर मनोकामना कितने की पूरी हुई ये आंकड़े पता करने पर बवाल खड़ा हो जाता खुले आम घोषणा नहीं की जा सकती थी कि एक दो लोग ही सौ में से सफल हुए हैं जिन्होंने चुनाव की टिकट लेने से पर्चा भरने तक धार्मिक अनुष्ठान किये। मगर जो 44 फीसदी गुनहगार जीते भला भगवान की मर्ज़ी से तो नहीं हुआ होगा संभव। विजयी होने को धर्म कर्म को छोड़ जाने क्या क्या नहीं किया करवाया गया बताना उचित नहीं है। सांप गुज़र गया हम लाठी भांजते खड़े हैं अब। अब पछताए क्या होय जब चिड़िया चुग गई खेत। इक दार्शनिक बता रहे हैं लोग भगवान की पूजा अर्चना भी मतलब से करते हैं जो किसी काम का नहीं है आडंबर है औरों को दिखावा करने को। वास्तविक पूजा इबादत किसी को बताकर नहीं की जाती कोई शोर शराबा नहीं किया जाता। जो किसी धार्मिक स्थल जाकर कोई भेंट चढ़ावा देने के बाद उसकी चर्चा करवाते हैं उनका मकसद धार्मिक नहीं स्वार्थी कारण से आडंबर होता है। 

         मगर हमारी चिंता राजनेताओं के झूठे दिखावे की बातों को लेकर नहीं है। समस्या गंभीर है अपने देश में रोज़ सुबह शाम करोड़ों लोग मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाते हैं भगवान को मनाने को। हर को विश्वास करता है वो है उन जगहों पर , मगर अगर उन जगहों पर उसका निवास है ही नहीं तो बात चिंता करने की है। खोजना होगा भगवान। अब फिर से कोई करेगा जनकल्याण को ये तपस्या उसको ढूंढने की। कोई इस बात को किसी भी तरह कहे मगर इस में कोई शक नहीं है कि हमारा देश भगवान भरोसे ही चल रहा है चलता रहा है अन्यथा इस देश का सत्यानाश करने वालों ने कोई कोर कसर कोई कमी छोड़ी तो नहीं है। बाकी सब को फिर देख लेंगे क्या अच्छा बुरा क्या हुआ नहीं हुआ। मगर भगवान मिलना बेहद ज़रूरी है और वो भी असली वाला कोई नकली किसी का घोषित किया हुआ नहीं। दुनिया से क्या लेना देना जैसे भी चलती रहे अपना देश भगवान के बगैर कैसे चलेगा इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है।

Wednesday, 29 May 2019

मुझे अपना किरदार निभाना है ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

   मुझे अपना किरदार निभाना है ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    मुझे अभिनय करना नहीं आता है सीखा नहीं सीखना चाहा भी नहीं। फिर किसी ने बहुत प्यार से आदर से अपनत्व से कहा अगले महीने कोई शाहकार बनाने लगा है उस में मेरी बड़ी भुमिका रखी है। दोस्त लोग बिना पूछे हक से विश्वास से निर्णय कर लेते हैं। उनको कैसे बताऊं आपकी अनुकंपा की ज़रूरत नहीं है। मैं 68 साल से अपना किरदार निभाता रहा हूं वही हूं वही रहना है कुछ और जो नहीं हूं उस किरदार को निभाना ही नहीं है। मैं अच्छा नहीं हूं जानता हूं सब लोग भी मानते हैं फिर झूठ मूठ नकली अच्छाई का अभिनय कर क्या होगा। जैसा हूं रहने दो मुझे बनना नहीं अच्छा उनकी तरह। उनको देखो कितना कमाल का अभिनय किया है सच्चे देशभक्त होने का और सब ने उनको सरपंच बना दिया है देश का। किसी ने सोचा ही नहीं ये अभिनय है या वास्तिवकता भी है इस किरदार में। कितने महान नायक फ़िल्मी नाटक में अभिनय करने वाले कमाल का अभिनय करते आये हैं मीनाकुमारी के आंसू असली निकलते थे ग्लिसरीन की ज़रूरत नहीं पड़ती थी मगर ये तो पल में तोला पल में माशा हैं भाई वाह क्या बात है। 

     आज उनकी नहीं किसी की भी नहीं बस अपनी खुद की बात कहनी है। कल कोई समझा रहा था उस से सबक सीखना चाहिए दस मिंट हंसना बीस मिंट मस्ती का संगीत सुनना सब थोड़ा थोड़ा तय वक़्त पर करना अच्छा होता है। कुछ मीठा थोड़ा नमकीन कुछ ठंडा कुछ गर्म बारी बारी मज़ा लेते हैं , हम ठहरे गांव के पले बड़े मिला तो जी भर खाया नहीं मिला तो राम नाम लेकर चादर ओढ़ ली सो गए। राशनिंग का हिसाब नहीं आता है। इक जूते की दुकान वाले ने समझाया ऊंची एड़ी का जूता खरीद कर पहन लो छोटा कद लंबा नज़र आता है। मुझे ऐसे ऊंचाई पाने से परहेज़ रहा है , कभी बचपन में सफ़ेद कमीज़ पायजामा डालता था दोस्त कहते क्या एक ही जोड़ा है बताता चार हैं मगर चरों सफ़ेद रंग के हैं। कॉलेज जाकर परेशानी हुई दो पैंट दो कमीज़ थी रोज़ धोनी पड़ती थी हॉस्टल में रहते खुद ही , उस पर ऊपर वाला हर दिन बारिश करवा देता था। हॉस्टल से कॉलेज की कच्ची सड़क पर छींटे पड़ ही जाते थे। तंग आकर सफ़ेद रंग को ही छोड़ दिया और रंगदार कपड़े सिलवाने लगा। किसी ने कहा चमकते काले रंग का सूट पहनोगे तो पतले लगा करोगे मगर बात जची नहीं खा पी कर मोटे बनकर अब पतले दिखाई देने का मतलब क्या है। कोई भूखे नंगे खानदान से हैं खाते पीते घर के हैं रंजो-ग़म से दूर हैं। नहीं ये फ़िल्मी बात है हम बिल्कुल नहीं मगरूर हैं। 

    लोग समझते नहीं हैरान होते हैं पढ़ाई डॉक्टर की की और काम लेखक का करते हो ये तो नामुमकिन को मुमकिन करना है। अब कोई नेता जी दावा करते हैं वो हैं तो सब मुमकिन है तो लोग तारीफ करते हैं मगर ज़रा भी नहीं विचार करते जो मुमकिन नहीं था उसका वादा किया अच्छे दिन का फिर उसको जुमला बता दिया और कहने लगे अच्छे वच्छे दिन कोई नहीं होते हैं भूत जैसी कल्पना की बात है। होनी को अनहोनी कर दे की बात है सब मुमकिन है मगर मुमकिन हुआ क्या कुछ भी नहीं। भटक गया अपनी बात करते करते सभी उसी की करने लगते हैं। मैंने अपना किरदार मर्ज़ी से नहीं चुना है तकदीर से मिला है अपना लिया है अब लोग कहते हैं आप ऐसे क्यों हैं। अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफर के हम हैं , रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। इतनी बीत गई कितनी बाकी है ज़िंदगी अब बदलने को वक़्त बचा कहां है। या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो , मैं ग़म को ख़ुशी कैसे कह दूं जो कहते हैं उनको कहने दो। 

     याद आया जवानी की बात थी इतनी समझ कहां थी कहा था प्यार में , जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे , तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे। कब तक यही रस्म निभाई जा सकती है मुहब्बत में माना झूठ बोलना ज़रूरी है मगर दिन को रात कहने से रात होती तो नहीं। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। माफ़ करना ज़माने वालो मुझे अपने बताए किरदार को निभाने की ज़िद न करो मुझे रहने दो मैं जैसा भी हूं। लोक सेतिया बहुत महनत से बना हूं अब बदलने की बात संभव नहीं है। क्षमा चाहता हूं अभिनय करना आता नहीं है जो हूं साफ सामने हूं रहने भी दो।

Tuesday, 28 May 2019

आई लव फतेहाबाद कथा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     आई लव फतेहाबाद कथा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 ये कथा अभी लिखी जा रही है इसलिए मौलिकता और कभी नहीं छपने की बात बिना घोषित यकीन कर लेना। खबर पढ़ते ही मुझे ज्ञान की अनुभूति हुई कि ये कथा लिखनी ज़रूरी है और पढ़ने से बेहद कल्याणकारी होनी भी है। हरियाणा सरकार मुझसे सम्पर्क कर इसके अधिकार हासिल कर सकती है। खबर है कि अपने शहर फतेहाबाद में आने जाने के सभी रास्तों पर " आई लव फतेहाबाद " लिखवाया जाएगा। इस का असर दूरगामी होने की संभावना है। शहर से प्यार उसकी गलियों से सड़कों से ही नहीं आपस में एक दूजे से भी प्यार होगा ही। प्यार ही प्यार बेशुमार। इस कथा से पहले इक और कथा की बात बताना उचित होगा , पहले उस पुरानी कथा की बात ध्यानपूर्वक पढ़ना समझना। 

      नाम नहीं लेते अब जो लोग नहीं हैं उनकी सच्ची कथा है। शहरी मंत्रालय की मंत्री संसद में ब्यान देती है दिल्ली कोई रहने लायक जगह नहीं है और जिनकी यहां ज़रूरत नहीं उनको वापस अपने राज्य चले जाना चाहिए। बाहरी लोगों ने आकर दिल्ली को बर्बाद किया है मुझे इस राजधानी में रहना भाता नहीं है। ये आपत्तिजनक बात थी मगर लोग ताली बजाते रहे मामला पर्दे के सामने और पीछे का अंतर कोई नहीं समझता है। ग़ालिब की बात याद आई थी कौन जाता है दिल्ली की गलियां छोड़कर। अगले दिन इक अख़बार के मुख्य संपादक जी का संपादकीय लेख वही बात दोहराता हुआ पढ़ना पढ़ा। जाने क्यों मुझे दिल्ली अच्छी लगती थी और आज भी अच्छी लगती है भले दिल्ली को छोड़े करीब चालीस साल होने को हैं। दिल अभी भी दिल्ली को चाहता है आई लव दिल्ली। फतेहबादी हूं कोई शक नहीं पला बढ़ा रहा दिल्ली गया वापस भी आया दोनों आंखों की तरह एक समान है। मैंने संपादक जी को अपने पैड पर हाथ से खत लिखा और बताया मुझे आपकी बात अनुचित लगी है। मेरा यकीन है आप एम पी से आये थे मगर सब मिला दिल्ली से नाम शोहरत दौलत अन्यथा कोई नहीं जानता था कौन हैं आप। अपनी मुहंबोली बहन का रिश्ता गांव की बहन की बदहाली देख इक उद्योगपति अख़बार मालिक ने उसे समझाया अपने पति को ये शहर छोड़ दिल्ली आने को मनाओ नहीं तो तुम्हारे बच्चे भूखे रहेंगे। खैर संपादक जी मान गए कि इंग्लिश अख़बार में नहीं इक हिंदी का अख़बार मिले तो चला आऊंगा और उनके लिए  हिंदी भाषा का अख़बार निकालना शुरू किया। अब आप जिस दिल्ली में रहते उसी को खराब बताते हैं और मेरा मानना है आपको कभी वापस नहीं लौटना है।

         खरी बात कड़वी लगी भी इतनी कि अख़बार में नहीं छापकर मुझे मेरा ही खत वापस भेजा ऊपर इक लाइन लिखी थी " ज़रूरी नहीं कि हर बात आपकी समझ आ ही जाये "। बुरा लगा ये कोई तरीका नहीं था पहले भी लिखता था उनका जवाब कभी कॉलम में तो एक बार संपादकीय लेख की शुरुआत ही की थी , फतेहाबाद के लोक सेतिया हैं लिखते रहते हैं कभी कॉलम में तो कभी मुझे भी। ये ढंड सभ्य नहीं लगा था बस रख दिया था फाइल में। शायद साल से अधिक समय बाद इक खबर पढ़ने को मिली शहरी मंत्रालय का अख़बार वालों को बेहद कम कीमत पर दिल्ली में प्लॉट्स आबंटन को लेकर जो नियमानुसार नहीं था। साथ नाम पते दिए हुए थे जिनको फायदा पहुंचाया गया। मैंने इन का वापस मुझी को लौटाया मेरा खत तलाश किया और उसके पीछे इतना ही लिखा मैंने। आज अख़बार में ये समाचार पढ़ कर सब समझ आ गया है जो अपने सही कहा था मुझ नासमझ को समझ ही नहीं आया था। बंदरबांट कहूं या अपनों को रेवड़ियां देना मगर आपको समझा था पत्रकार आप तो धंधे वाले कारोबार निकले। हिम्मत की बात है उनका फोन आया मुझे नहीं पता था सोसाइटी या संगठन ने कैसे शामिल कर लिया मुझे भी। अभी उनकी आत्मा दिल्ली में भटकती होगी क्योंकि उनका वो घर अभी वहीं है दिल्ली में।

       आई लव फतेहाबाद कथा यहां से शुरू होती है। इक आशिक़ रोज़ महबूबा को सोशल मीडिया पर संदेश भेजा करता था संक्षेप में , आई एल जानू लिखता था। शहर के हर रस्ते पर आई लव फतेहाबाद पढ़ते पढ़ते बात दिल तक जा पहुंची और अपनी माशूका को लिख दिया " आई एल एफ " पढ़ते ही झटका लगा ये जानू की जगह एफ का अर्थ किसी और को भेजना था गलती से मुझे भेज बैठा। आग लगनी थी जवाब दिया ये कौन नई कलमुंहीं ढूंढ ली को भेजते हो लव यू का संदेश। हाथ पैर जोड़ कसम खाई तब सब बताया तो जान बची। मगर हर चीज़ का फायदा भी होता है नुकसान भी , दोस्तों को बताया बहुत काम की बात है जो भी फतेहाबाद में रहते हैं यही संदेश जिसे मर्ज़ी भेज सकते हैं। दोस्त भाई बहन माता पिता कोई भीं हो सब को लगेगा वाह क्या बात है जो शहर से प्यार करता है।

           अभी भविष्य में इक नया पार्क आई लव फतेहाबाद बनाया जाना उचित होगा जिस में मुहब्बत करने को खुली छूट होगी पुलिस आपकी सुरक्षा को रहेगी हर वक़्त। अभी ये कल्पना है सच हो जाये क्या खबर। खबर ही तो है , गुलाबी नगरी का ये नया संबोधन आपको कैसा लगा। सब मिलकर बोलो , आई एल एफ थोड़ा ऊंचा बोलो आई एल एफ। आपका कल्याण हो।

हम छोड़ चले हैं दल को ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     हम छोड़ चले हैं दल को ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  खबर ने तहलका मचा दिया जंगल की आग की तरह फ़ैल गई ये खबर। मोदी जी ने इस्तीफ़ा दे दिया है। जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई दिन में रात हो गई। सभी नेता दंग रह गए इसकी कल्पना नहीं की थी मगर ऐसा क्यों हुआ। सारे दल के सांसद और सभी नेता जमा हुए उनको विनती की बिना आपके दल का क्या होगा जल बिन मछली जैसी हालत होगी। जो राहुल गांधी के इस्तीफे को नाटक कह रहे थे मोदी जी को हल्के में नहीं ले सकते थे। दिल ही दिल में हर कोई सपना भी देख रहा था उनकी जगह मुझे या मेरी पसंद के नेता को पद मिल जाये तो क्या बात हो मगर खुलकर सामने कोई उनकी जगह लेने की बात ज़ुबान पर नहीं ला सकता था। अब मोदी जी की मर्ज़ी है जब जो दिल किया कर सकते हैं लेकिन ये कदम नोटबंदी से बहुत बड़ा फैसला था। आखिर किसी ने साहस कर सवाल कर ही दिया जनाब ऐसी कोई महान भूल हुई है हम सभी से जो आप इतने खफा हैं और नहीं मानने की ज़िद पर अड़े हैं। राहुल गांधी के इस्तीफे से हमारा क्या लेना देना है आपकी जीत तो करिश्मा है फिर आपको पद छोड़ने की बात कहने की ज़रूरत क्या है। 

     जब सभी दल के लोग और गठबंधन वाले कारण जानने पर अड़े रहे तो उनको बताना ही पड़ा क्या है जो इतना बड़ा कदम उठा रहे हैं। मोदी जी बता रहे है ध्यान से सुनिए। अपने दल को मैंने जिस ऊंचाई पर पहुंचा दिया है वो इक चरमसीमा है इस से बढ़कर कुछ संभव नहीं है। मगर मुझे गांधीजी सपने में आते हैं और कहते हैं उन्होंने उस दल को भंग करने की बात की थी उसका नामोनिशान मिटाने की नहीं सोची थी। मुझे राहुल गांधी से हमदर्दी है उनको इतनी बुरी हार मिले ये मैंने नहीं चाहा था। अब उनकी दल की कश्ती मझधार में हिचकोले खा रही है और उनके दल के लोग डूबते जहाज़ को छोड़ हमारे दल में आते जा रहे हैं। मुझे गुजराती हिसाब खूब आता है जो बड़ी कंपनी डूबने के कगार पर खड़ी हो उसको अपनाकर फिर से खड़ा करना ऐसा शानदार अवसर की तरह होता है। जैसा आपको लगता है मैं कोई सत्ता की राजनीति को छोड़ नहीं रहा हूं बल्कि मुझे इस चुनौती को स्वीकार करना है और उसका अध्यक्ष बनकर इतिहास बदलने का इतिहास बनाना भी है बनाकर फिर दोहराना भी है। ये बात हज़्म करना और मुश्किल लगने लगा जिस दल का हाल खराब किया फिर उसी को वापस खड़ा करना ऐसी नासमझी कौन करेगा। हाहाकार मच गई लोग हाथ जोड़ने पांव पकड़ने से आगे अपनी जान देने तक की बात करने लगे। तुम बिन जीवन कैसा जीवन। तेरे बिन जी न सकेंगे हम। इक बात अचरज की थी अमित शाह चुप बैठे मुसकराते रहे कुछ भी नहीं बोले , हर कोई शक करने लगा ये कोई उनका किया धरा तो नहीं। आखिर खुद मोदी जी ने उनसे इस्तीफ़ा स्वीकार कर पदमुक्त करने को दोबारा कहा तो उनको खड़े होकर जवाब देना पड़ा। 

       अमित शाह कहने लगे मुझे मोदी जी के इस्तीफे देने की बात से कोई हैरानी नहीं हुई है। वास्तव में उनकी बातों को मैंने कभी संजीदगी से नहीं लिया क्योंकि उनकी आदत है कभी सेवक कभी चौकीदार और अब फ़कीर होने का ऐलान करना। उनको लोगों की ही नहीं दल के नेताओं की भी भावनाओं से खेलने की आदत इक नशे की तरह है जो उनको मज़ा देती है। मगर मुझे मोदी जी की रग रग का पता है वो कुछ भी कर सकते हैं पद को कभी छोड़ नहीं सकते हैं इसलिए जैसे इस्तीफ़ा देने की बात कही मुझे समझ आ गया था ये कोई और है मोदी जी कभी नहीं हो सकते हैं। ये राज़ की बात है मगर अब राज़ खोलना ज़रूरी है , इस पद पर जो भी होता है उसका इक डुप्लीकेट ढूंढ लिया जाता है और बहुत जगह उस नेता की जगह कोई सभा कोई आयोजन उनका नकली किरदार निभाने वाला जाकर हाज़िर होने की रस्म अदायगी कर सकता है। मैं दावे से कहता हूं कि ये वास्तविक असली मोदीजी नहीं उनका डुप्लीकेट है। ठीक उसी समय मुख्य दरवाज़े से कोई ताली बजाता हुआ आता है और फिल्म की तरह से बैकग्राउंड से मोदी मोदी की आवाज़ भी सुनाई देती है। अमित शाह बताते हैं यही उनकी असली होने की पहचान है जो मुझे पता था और अभी तक सुनाई नहीं पड़ रही थी तभी मुझे रत्ती भर भी चिंता नहीं थी। मगर ये नाटक नहीं है अभी नाटक बाद में खेला जाना है ये तो इक अभ्यास था नाटकीयता की परख करनी थी जो सफल रही है। असली नाटक खेला जायेगा मगर अपने दफ्तर में नहीं किसी और जगह पर असली नकली की पहचान तब सामने आएगी।

     

Monday, 27 May 2019

बात फूलों की ( दिल की बात ) डॉ लोक सेतिया

        बात फूलों की ( दिल की बात ) डॉ लोक सेतिया 

                         ( ये रचना भीम सैन कुमार जी के नाम )

   अभी अभी सुबह की सैर पर मंदिर के करीब इक दोस्त अपने घर के बाहर बगीचे में खड़े थे। दुआ सलाम हुई बहुत मधुर सवभाव है उनका और संगीत सुनने का शौक उनका मेरी तरह से ही है। आने लगा तो बगिया से ताज़ा ताज़ा खिला चमेली का फूल मुझे देकर कहा इसे ले जाओ खुशबू अच्छी है। बस तभी विचार उठा कि आज फूलों की ही बात करनी है। बहुत गीत याद आते हैं फूलों की बात को लेकर मगर इक शेर अपना भी है उसको सुनाता हूं शुरुआत करते हुए। 

              फूल जैसे लोग इस ज़माने में , सुन रखे होंगे किसी फ़साने में।

   ये आज का सच है मगर हैं अभी भी फूल जैसे कोमल दिल और चमेली की खुशबू से लोग मिल ही जाते हैं कुमार साहब जी की तरह। लगता है हमने जैसे असली ताज़ा फूलों से रिश्ता तोड़ लिया है नकली कागज़ के या प्लास्टिक वाले या फिर किसी पैकिंग में बंद सजे गुलदस्ते के फूल किसी को पेश करने को बाज़ार से खरीद लाते हैं। विवाह समारोह हो या आये दिन आयोजित सभाएं ऐसे ही सजी होती हैं फोटो लेने को अच्छी मगर खुशबू उनकी नहीं होती कोई सेंट छिड़कने का भी असर नहीं रहता है। कीमत बहुत है उनकी सजावट की मगर फूलों का एहसास प्यार का मुहब्बत का आस पास भी नहीं दिखाई देता है। लोग ही पत्थर की तरह हो गये हैं कोई भावना कोई संवेदना कोई कोमल एहसास बचा ही नहीं है। रिश्तों में महक नहीं है इक चुभन सी रहती है जिस से भी मुलाकात हो जाये कभी पुरानी पहचान वाले से मिलकर भी दिल खिल उठता था। चलो कुछ गीत कुछ ग़ज़ल दोहराते हैं फूलों की बात जिनमें अपना अलग ही रंग  भरा करती थी। 

     फूल तुम्हें भेजा है खत में फूल नहीं मेरा दिल है , प्रियतम मेरे मुझको बताना क्या ये तुम्हारे काबिल है। 
     अब के हम बिछुड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें , जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।
     पांव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी , वरना हमको नहीं इनको भी शिकायत होगी।
     आप जो फूल बिछाएं उन्हें हम ठुकराएं , हमको लगता है कि ये तौहीने मुहब्बत होगी।
                ऐ फूलों की रानी बहारों की मलिका तेरा मुस्कुराना गज़ब ढा गया।
                  फूलों की तरह लब खोल कभी , खुशबू की ज़ुबां में बोल कभी।
सबसे अलग गीत आज भी हर विवाह के अवसर पर बजाया जाता है जब भी दुल्हन मंच की ओर हौले हौले चलती हुई आती है और हर नज़र उसी तरफ होती है। हर लड़की को तब किसी राजकुमारी सा एहसास होता होगा ऐसा महसूस होता है। बस वही पल मिलन का सबसे सुंदर और सुनहरा पल होता है।

             बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है मेरा महबूब आया है।

 इन दिनों पार्क में घर के सामने पीले पीले फूल खिले नज़र आते हैं पेड़ पर छत पर घर का आंगन है जहां से मन खिल उठता है देख कर ही। कुदरत की सुंदरता से बढ़कर कोई सजावट नहीं हो सकती है वास्तविकता है कोई बनावट नहीं बचपन के रिश्तों की तरह। सैर करते करते इक घर के बाहर से गुज़रते हुए इक बूढ़ी महिला अपने दरवाज़े के बाहर कुर्सी डालकर बैठी हुई थी कोई नाम नहीं जान पहचान नहीं फिर भी राम राम की मधुर आवाज़ सुनाई दी तो लगा जैसे गांव की पुरानी परंपरा बचाए है इक अपनापन हर कोई अपना लगता है। आज हर तरफ फूलों जैसी महक मिली तो अच्छा लगा और सोचा सबको इस भीनी भीनी खुशबू से मिलवाया जाये। शायद उसका थोड़ा एहसास आपको भी हुआ तो ज़रूर होगा। इक नज़्म फूलों पर आखिर में। 

पल दो पल में मुर्झाऊंगा - लोक सेतिया "तनहा"

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ,

शाख से टूट के क्या पाउँगा।

आज सजा हूँ गुलदस्ते में ,

कल गलियों में बिखर जाऊंगा।

उतरूंगा जो तेरे जूड़े से ,

बासी फूल ही कहलाऊंगा।

गूंथा जाऊंगा जब माला में ,

ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा।

मेरे खिलने का मौसम है ,

लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा।

चुन के मुझे ले जायेगा माली ,

डाली को याद बहुत आऊंगा। 

पुष्प पर कविता इक और भी है माखनलाल चतुर्वेदी जी की पुष्प की अभिलाषा। 

मुझे तोड़ लेना बनमाली , 

उस पथ पर देना तुम फेंक। 

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने ,

जिस पथ पर जावें वीर अनेक।

 

   

Sunday, 26 May 2019

जाने कहां गये वो लोग ( भारत एक खोज ) डॉ लोक सेतिया

  जाने कहां गये वो लोग ( भारत एक खोज ) डॉ लोक सेतिया 

    नेहरू गांधी पटेल भगतसिंह सभी साथ बैठे हैं। आज भी उनको अपनी नहीं देश की चिंता है। भला ये कौन हैं जो सवाल करते हैं नेहरू को क्यों बनाया और किसी को क्यों नहीं बनाया। गांधी जी कुछ कहते उस से पहले गोडसे बोल उठा जो कब से बाहर खड़ा हुआ है अपनी भूल पर पछतावा करते हुए। कहा उनको नहीं समझ अगर जिनको वो समझते हैं उसको बनाया जाता तो उनकी संस्था का नाम निशान नज़र नहीं आता। अब धारा 370 की बात भी नहीं करते उनको पता है नेहरू नहीं कोशिश करते तो कश्मीर भारत का हिस्सा बनता ही नहीं। धर्म के नाम पर भेदभाव की बात नहीं करते थे नेहरू जी और उनकी जगह और कोई बनाते तो धार्मिक उन्माद की सोच कभी इस कदर हावी नहीं होती। सबको साथ लेकर चलने का काम नेहरू से बेहतर कोई नहीं कर सकता था। गांधी जी बोले उन को देश से क्या लेना देना जो नहीं जानते देश की आज़ादी में हम सभी ने किस तरह से एकता का परिचय दिया। जिनको नेहरू के प्रधानमंत्री बनने पर ऐतराज़ है खुद उनका क्या योगदान है आज़ादी के अंदोलन में , कभी उनसे पूछा गया बताओ नेहरू जी कितने साल जेल में रहे शर्म आएगी उतने साल सत्ता पर नहीं रहे और किसी भी नेता को अपने से कम या छोटा नहीं समझा। विपक्ष को भी बढ़ावा देते रहे उनकी तारीफ करते रहे , लोहिया जयप्रकाश या अटल सबको बहुत आदर देते थे खुले मन से उनकी अच्छी बातों की तारीफ किया करते थे। पटेल कहने लगे मंदिर क्या इस तरह से बनता है समर्थकों  को नियम कानून की अवेहलना कर अपराध की तरह से तोड़ कर मुझ जैसा शासक होता तो ऐसे लोग कहां होने चाहिएं थे सब जानते हैं। मर्यादा को ताक पर रखकर धर्म मंदिर को सत्ता की राजनीति की सीढ़ी बनाने की इजाज़त उनको कभी नहीं मिलती। नेहरू जी अमीर पिता की संतान थे विदेश से पढ़ाई कर आये थे धन दौलत की कमी नहीं हो सकती थी। विलासिता भरा जीवन छोड़ आज़ादी की खातिर जेल जाना उनकी देश की भक्ति और निस्वार्थ सोच थी कोई सत्ता की भूख नहीं था। इक कांटों का ताज था वो पद उन हालात में ये आज के सत्ताधारी नहीं समझ पाएंगे जो कहने को नेहरू जी के शब्द दोहराते हैं सेवक मानता हूं उन्हीं के शब्द हैं मगर रहते हैं शहंशाह की तरह देश के खज़ाने को खुद पर खर्च करते इक सफ़ेद हाथी की तरह। नेहरू जी बोले मुझे अच्छा लगता है कोई भी दल सत्ता पा सकता है मगर खराब लगता है जब 44 फीसदी सांसद आपराधिक छवि के दाग़दार ही नहीं धनबल से चुनकर आये हैं। देश के संविधान और चुनाव आयोग की कोई चिंता किसी को नहीं और 88 फीसदी करोड़पति सांसद हैं लोकसभा में। देश से प्यार करने वाले नेता ऊपर किसी और जहां में बैठे आज भी किसी को बुरा भला नहीं कह रहे कोई नफरत की भावना किसी में नहीं है मगर हैरान हैं और चिंतित भी कि अभी तक लोग अच्छे लोगों को पहचान कर चुनना नहीं सीख पाए हैं और मतलबी लोगों की झूठी बातों में आकर खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने का काम करते हैं। सबसे अधिक निराशा सत्तधारी नेताओं और पढ़े लिखे अधिकारी सरकारी कर्मचारी डॉक्टर इंजीनयर शिक्षक वर्ग से है जो जिस शाख पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं।

कुछ सुझाव हैं सरकार अगर सोचे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  कुछ सुझाव हैं सरकार अगर सोचे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

                          ये अलग बात है बाहर से बना है जोगी ,

                         आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह। 

        ये शेर है अपने हरियाणा के ही निवासी डॉ एस पी शर्मा "तफ्ता" जी का कहा हुआ। पिछली पोस्ट से बात निकली थी सियासत मुहब्बत और इबादत की तो गुरु जी की ताज़मीनों का ज़िक्र किया था। इस शेर पर भी उनकी तज़मीनों की बात है उनकी किताब में ज़रा समझते हैं आर पी महरिष जी क्या बतलाते हैं। 

जिसको देखो वही हिर्सो -हवा का रोगी
है सदाचार के बहरूप में कोई भोगी 
उसकी साज़िश का शिकार आज भी सीता होगी।

ये अलग बात है बाहर से बना है जोगी ,  

आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह।

        यूं ही ये बात अच्छी लगी तो सांझी की है जबकि विषय बेहद संजीदा बात है जो इक अदने से नाचीज़ लिखने वाले अनाम से लेखक का सब जानने समझने वाली सरकार को सलाह देने की इक कोशिश है। वादे भूल जाते हैं कोशिशें कामयाब हो जाती हैं अमिताभ बच्चन इक नायिका से बुलाते हुए डायलॉग बोलते हैं बात शराबी की है मगर सच साबित होती है देर से सही नायिका चली आती है। सरकार भी क्या खबर बहरी होते भी सुन ले और मान जाये उम्मीद पर दुनिया चलती है। कोई बहुत बड़ी और कठिन मांगे नहीं हैं बस सुझाव है वो भी पढ़ाई पढ़ाने का। चलो सीधे सीधे सुझाव रखते हैं। 

          आप अच्छे हैं सब कहते हैं हम भी मान ही लेते हैं अब स्वीकार करने के सिवा कोई विकल्प बचा कहां है जनाब। आप अच्छे हैं ज़माना खराब। आपको बहुत कुछ करना भी होगा और बहुत नहीं करना मगर किया है बताकर यकीन दिलवाना भी होगा , बहुत कठिन है डगर पनघट की। मगर ये इक काम करने में आपको कोई कठिनाई नहीं होने वाली। तमाम तरह की पढ़ाई पढ़ाने को पाठशाला  हैं बस नहीं हैं तो इश्क़ मुहब्बत प्यार की पढ़ाई सच्ची इबादत की शिक्षा और सबसे ज़रूरी सियासत की पढ़ाई की पाठशाला कॉलेज और स्कूल कहीं नहीं मिलती है। यकीनन राजनीति से बढ़कर अच्छा कारोबार कोई नहीं है भले कोई जीते या फिर हारे किसी की रोज़ी रोटी की समस्या नहीं होती है। खूब मुनाफे की कमाई का धंधा है जो दुनिया में कभी भी नहीं हुआ आज तक मंदा है। रोज़गार के अवसर की क्या बात है ये ऐसा शहर है जिसकी सुबह भी हसीन है और रंगीन हर  रात है। कोई शिक्षा किताब की नहीं ज़रूरी है नेताजी बन जाओ फिर जीहज़ूरी ही जीहज़ूरी है। कोई और क्या चाहता है सत्ता जैसी दिलरुबा चाहता है। 

       मुहब्बत की बात सुनकर तलवार मत निकालना ये कोई लैला मजनू की बात नहीं है। आदमी आदमी से प्यार करना सीख ले तो झगड़ा खत्म ही हो जाएगा। नफरत से हासिल हुआ कुछ भी नहीं ऐसे झगड़ने से मिला कुछ भी नहीं। धर्म वालों ने उल्टी शिक्षा पढ़ी भी पढ़ाई भी भाईचारा बनाने को होती है लड़ाई भी। लोग सब देशवासियों से मुहब्बत प्यार ऐतबार करने लग जाएं तो उलझनें हों ही नहीं कहीं मंज़िल की तरफ हों सारी राहें।  कभी पहले नहीं देखा सुना आजकल परेशान हो जाते हैं देश की समस्या सरकार की आलोचना या फिर झूठ को झूठ कहने पर लोग सोशल मीडिया फेसबुक पर बुरा भला गाली गलौच करने के साथ किसी को देश विरोधी कहने तक आ गए हैं। ये कैसा निज़ाम है जिसकी कोई खामी नहीं बता सकता अपनी सोच नहीं रख सकता असहमति ज़ाहिर नहीं कर सकता। कोई गांधी के कातिल की महिमा गाता उसको देशभक्त बताता है कोई अपने धर्म को बदनाम करता है किसी दूसरे धर्म के लोगों से नफरत फैलाने का काम करता है। किसी ने लिखा अमुक जाति के लोग कभी हम को अपने से नीचे कहते थे अब हम उनको सबक सिखा सकते हैं। जिसने गांधी को कत्ल किया उसकी देशभक्ति विदेशी अंग्रेज़ों को छोड़ देती है और ऐसे व्यक्ति को मारने को विवश करती है जो अहिंसा का पुजारी है। ऐसे कातिल का मंदिर बनाने वाले कैसे देशभक्त कहला सकते हैं जो देश के ही लोगों को हिंसा का शिकार करना उचित मानते हैं। जिनको अपने देश के लोगों के सालों पहले किसी और पीढ़ी के लोगों द्वारा कहे अनुचित शब्द ध्यान हैं उनको विदेशी अंग्रेज़ों के हमारे पूर्वजों पर किये अन्याय अत्याचार की बात क्यों नहीं याद आती , उनके लिए तो पलक पावड़े बिछाने लगते हैं। अपने देश के लोगों से नफरत और विदेशी लोगों के दिखावे के आदर को गर्व समझना दोहरे मापदंड हैं। देश की एकता अखंडता के विरुद्ध आचरण देश को विभाजित करने जैसा गुनाह ही है। ऐसी सोच को बदलने की ज़रूरत है और उनको जो नकारात्मक शिक्षा पढ़ाई जाती रही है उसे बदलना ही नहीं रोकना होगा।

        ये बेहद ज़रूरी है हर कोई दिल से हर देशवासी को प्यार और आदर दे। नफरत दिल में लेकर आप इक बिमार समाज की रचना करते हैं। हमने विदेशी शासकों के गुलाम बनाने को माफ़ कर दिया मगर अपने देश के लोगों को लेकर सदियों पुरानी नफरत दिमाग में भरी हुई रखते हैं। किस की गलती है कब किसने ये फिर से शुरू किया इस को छोड़ भविष्य में सदभावना प्यार मुहब्बत से मिलकर देश को बेहतर बनाने की कोशिश की जाये तो कितना अच्छा होगा। कीचड़ से खेलना बंद होना चाहिए जो हो चुका हो चुका उसे दोहराना उचित नहीं है। दीवारें खड़ी करना आसान है बीच की दीवार हटाने का जतन किया जाये इसकी ज़रूरत है।

Saturday, 25 May 2019

मुहब्बत भी इबादत भी सियासत भी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 मुहब्बत भी इबादत भी सियासत भी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   या इलाही ये माजरा क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है। हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है। समझ कोई नहीं पाया इश्क़ की खुदा की खुदाई की और राजनेताओं की सियासत गहरी बातों को। जो नहीं है उसी के होने का यकीन करते हैं जो सताने में मज़ा लेते हैं दिलरुबा अल्लाह रहनुमा नाम है उनका उनकी मर्ज़ी नहीं जीने भी देते उन्हीं पर फ़िदा हैं सारे मरते हैं। कौन जाकर सवाल उनसे करे किसकी शामत आई है लोग डरते हैं। ये अजब ग़ज़ब है जिनकी बात समझ नहीं आती किसी को कोई मतलब नहीं निकलता है उनको दार्शनिक ज्ञानवान करार कर देते हैं। चलो जो होगा देखा जाएगा इक बार हौसला तो करते हैं ये जो भी हैं मुहब्बत इबादत सियासत वाले इनको सोच के तराज़ू पर तोलने को धरते हैं। 

     वही होता है जो ऊपर वाला चाहता है अगर ये सच है तो उसको जाकर पकड़ना होगा। कुछ ही अमीरों पर करम उसका ये तो बड़ी नाइंसाफी है उसकी बरकत उसकी रहमत सभी पर बराबर क्यों नहीं होती है। और ये कैसा दस्तूर बना दिया है जो दुःख दर्द देता है उसी की आरती इबादत करते हैं उसको खुश करते हैं दुःख दर्द मिटाने की झूठी उम्मीद रखते हैं। कोई उसके घर से खली हाथ नहीं आता ये सच है मगर इक ज़ख्म का ईलाज मांगते हैं और गहरे घाव कौन देता है। इस ग़म से तो पिछले ग़म कम था मांगी ख़ुशी थी मिलते ग़म ही ग़म हैं। ये अजब राजनीति की पहेली है समस्या हैं समाधान कहलाते हैं करते क्या हैं बस बातें बनाते हैं। 

  जिनके पास दिल नहीं उन्हीं से मुहब्बत की हमने। अपने खुद से अदावत की हमने। ये ग़ज़ल आखिर में सुनाऊंगा अभी छपी है पुष्पगंधा में , मुझी को नहीं मिली अभी सब पढ़ कर कहते हैं खूब कही है। ऊपर वाला कभी नहीं आया नीचे वालों की खबर लेने क्या हाल है उसकी बनाई दुनिया का। हम को ऊपर जाने की मोहलत नहीं इजाज़त मिलती है मरने के बाद तो ज़िंदगी गुज़ार ली अब जाकर शिकवा गिला करना फज़ूल है यही मान लेते हैं भरोसा रखते थे हुई भूल है। जाकर मिलने का हौसला नहीं होता सरकार के दरबार या ऊपर वाले के रचे शानदार सचखंड जैसे रौशन जगमगाते आलीशान घर के बाहर से ही घबराहट होने लगती है। दरबान खड़े समझाते हैं अदब से बात करना कुछ भी नहीं मिला तो शिकायत नहीं करना हाथ जोड़ मांगना दया करो मुझ पर रहम करो विनती आरती अरदास कोई और उपाय नहीं है। उसका धन्यवाद करते हैं उसकी रज़ा है जो दुःख दर्द बेबसी तकलीफ़ दी उसमें भी भलाई थी और भी दे सकता था नहीं दिए दर्द जो सहन नहीं होते। 

सबको देने वाला है फिर सबको जाकर उसी की मूरत को धन दौलत सोना चांदी आभूषण सुंदर परिधान पहनाने पड़ते हैं। बच्चा बोला देखकर मंदिर आलीशान एक तुम्हारे रहने को इतना बड़ा मकान। बच्चा है अभी नहीं समझता खुदाई की शान सियासत की आन बान शान कितनी ज़रूरी है। जनता भूखी जी सकती है सत्ता को छप्पन भोग की आदत है। इस दुनिया का चलन देखा कोई ताकवर है खुद को शाही ढंग से रहने की आदत है तो हर कोई मानता है शेर भूखा भी होता है तो घास नहीं खाता उसको चाहिए और जीभर मनपसंद का खाना है। किस से कैसे लिया उसकी मज़बूरी है कोई कहना नहीं ये बहाना है। फिर फ़कीर बनकर कोई आया है जिसके पास हर खज़ाना है। अपनी किस्मत खोटी है हवा खाकर जी लेते हैं पानी पीने को बचा नहीं और खाने को भी न इक दाना है। मुहब्बत की बात कैसे भूल गई उस खुदा को भी तो मनाना है। रूठे रब को मनाना आसान है रूठे यार को मनाना मुश्किल है। जग के बदले यार मिले तो यार का मोल दूं दूना किसी ने यार को अपना कपड़ा लत्ता यार को अपना गहना की बात कही थी। किसी और दुनिया की बात रही होगी अब रूठने वाले को मनाने पर गुरु जी जनाब आर पी महरिष जी त्ज़मीनें लिखते हुए कहते हैं।

बशीर बद्र के शेरों पर ( त्ज़मीनें किसी बड़े शायर की ज़मीन लेकर अपनी बात कही जाती है )

रूठने वालों से मन जाने की फरमाइश रहे 

फिर मिलें पहली तरह , दिल में न आलाइश रहे 

याद ऐ अहले-जहां , इतनी सी फहमाईश रहे 

" दुश्मनी जम कर करो , लेकिन ये गुंजाइश रहे। जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों। 

बस राजनीति करने वालों से हम दुनिया के सभी लोगों को इक यही सबक समझ नहीं आया। पढ़ा ज़रूर भुला दिया भूला नहीं है। ढाई आखर पढ़ने नहीं सीखे आज तलक हम। जानता हूं आपको लगने लगा कि बात कुछ समझ नहीं आई किस की बात थी किसकी बनती किसी और की हो गई है। आपका कोई कसूर नहीं भाई दुनिया में जाने किस किस की पढ़ाई है स्कूल कॉलेज कोचिंग क्लासेज हैं। मुहब्बत का आशिक़ी का कोई स्कूल खुला नहीं सियासत की पढ़ाई कहीं पढ़ाई जाती ही नहीं है और इबादत की बात उस जगह करते हैं जिस जगह खुदा अल्लाह भगवान होता ही नहीं। ऊपर वाला दुखियों की नहीं सुनता रे कौन है जो उसको गगन से उतारे। बस हर कोई अपने लिए मांगता है जेब कतरों को छोड़कर जो दुआ मांगते हैं। ऊपर वाले तेरी दुनिया में कभी जेब किसी की न खली रहे। कोई भी गरीब न हो जग में हर पॉकेट में हरियाली रहे।

    आपसे अपनी ग़ज़ल सुनाने का वादा किया था निभाना पड़ेगा। हाज़िर है मेरी ग़ज़ल।

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ,
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते।

ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन ,
लोग फिर भी बगावत नहीं करते।

इस कदर भा गया है कफस हमको ,
अब रिहाई की हसरत नहीं करते।

हम भरोसा करें किस तरह उन पर ,
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते।

आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं ,
हम कभी ये शिकायत नहीं करते।

पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो ,
चाँद छूने की चाहत नहीं करते।

तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है ,
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।

पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा" ,
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते।

बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार ( सूरत ए हाल ) डॉ लोक सेतिया

    बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार ( सूरत ए हाल ) 

                                      डॉ लोक सेतिया

   बहुत शोर सुना विश्व में भारत का नाम रौशन हो रहा है। जाने ये क्या मानसिकता की बात है हम अपने बारे खुद सामने अपनी नज़र से नहीं देखते कोई विदेशी कहता है तो यकीन कर लेते हैं। मगर यहां भी मीठा मीठा गप कड़वा कड़वा थू की बात है। विदेशी हमारे बिगड़ते स्वस्थ्य बदहाल आर्थिक हालात शिक्षा की बिगड़ती दशा से लेकर देश में आम लोगों की सुरक्षा विशेषकर महिलाओं के शोषण पर नकारात्मक टिप्पणी करते हैं अपने नागरिकों को भारत आने से पहले सचेत करने को मगर हम अपमानित नहीं महसूस करते हैं। विदेश से आने वाले हर किसी को आकर शक भरी नज़र से देखते हैं मगर हम चंद रुपयों की चाह में इस को स्वीकार करते हैं। घटनाएं घटती हैं तो राज्य सरकार देश की सरकार ब्यान जारी करती है भविष्य में ये नहीं होने दिया जायेगा। इक इमारत में आग लगती है तो हमारे अग्नि शमन विभाग के पास सीढ़ी तक छोटी पड़ जाती है। अपने देश के नागिकों की जान की सुरक्षा की कीमत कुछ भी नहीं है। 

     ये खबर भी विदेशी संस्था देती है कि इन चुनावों में पिछली बार से अधिक संख्या में टिकट हर दल ने अपराधी छवि वाले लोगों को बांटे हैं और चुनाव घोषित होने के बाद जब हमारे टीवी चैनल मज़ाकिया शायरी और अनावश्यक हस्ताक्षेप एंकर करते हुए रौब गांठते हैं तब कोई विदेशी खबरची आंकड़े जमा कर सूचना देता है इस बार संसद में अपराधी पहले से कितने अधिक बढ़ जाएंगे। जब सत्ता मिलने का मतलब ही दौलत की बरसात होना हो तब अपराधी तत्व किसी और जगह खतरे उठाने क्यों जाएंगे। अब उनको जेल नहीं सुरक्षा उपलब्ध करवाई जाएगी। करिये अगर गर्व कर सकते हैं तो ऐसी तमाम बातों को जो शायद आजकल कोई समाचार ही नहीं हैं। इक आतंकवाद की दोषी चुनाव लड़ती है जीत जाती है क्या इसी तरह से हम आतंकवाद को मिटाना चाहते हैं। जिस तरह की भाषा गाली गलौच से लेकर बदज़ुबानी करने तक चुनाव में तथाकथित देश के जाने माने नेता देते रहे हैं उसको लेकर क्या देश के शिक्षित लोग थोड़ा भी चिंतित हैं। मगर कोई विदेश में बैठा लिखने वाला अचरज व्यक्त करता है इस महान देश के सच के झंडाबरदार आंखें कान बंद कर खुद अपनी बढ़ाई करने में खोये हुए हैं। नहीं उनकी हर बात सच साबित नहीं हो सकती मगर उनका आगाह करना गैर वाजिब भी नहीं है कि हम कितनी गलत दिशा को जाते जा रहे हैं। कैसे गुंडे बदमाश नेता बना लिए हैं और हम उनको जितवा कर खुद अपने लिए बड़ा खतरा मोल ले रहे हैं। चुनाव आयोग सर्वोच्च न्यायालय बेबस हैं और जब यही अपराधी किसी संवैधानिक पद पर नियुक्त किये जाते हैं तब न्याय कानून की धज्जियां उड़ती हैं क्योंकि उनको जकड़ने को उन्हीं की इजाज़त की ज़रूरत होती है। मगर आप देखेंगे जल्द ही संविधान की शपथ लेकर सबको समानता और न्याय देने की पक्षपात नहीं करने की बात भी फिर कही अवश्य जाएगी निभाई कभी नहीं जाएगी। जो अपराधी अपने दल में शामिल हो विजयी हुआ उसको कहा जाएगा जनता ने माफ़ कर दिया या बेगुनाही का सबूत है। अगर ऐसा है तो पुलिस थाने अदालत को बंद कर सभी फैसले जनता से जनमत लेकर किये जा सकते हैं भले नतीजा बड़े बड़े अपराधी निर्णय छीन सकते हैं या खरीद सकते हैं। ये ज़हर मीठा लगता है आपको तो लगे मगर इसका असर अच्छा हो नहीं सकता है।

दोबारा शहंशाह बनकर पहला संबोधन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  दोबारा शहंशाह बनकर पहला संबोधन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी  कभी किसी लिखने वाले की सोई किस्मत जागती है तब छप्पर फाड़ कर धनवर्षा होने लगती है। किसी को साहित्य अकादमी का निदेशक बनाती है सरकार किसी को कोई रुतबा कोई सदस्य्ता मिल जाती है। मगर ऐसा नसीब से अवसर बेहद मुश्किल से किसी को मिलता है बड़े नेता का विशेष अवसर पर संबोधन को लिखने का दायित्व मिलना। इस नाचीज़ को यही काम करने को दोबारा शहंशाह बनने वाले नेता जी ने सौंपा है। ये वास्तव में गौरव की बात है और इसको लिखते हुए इसकी ऐतिहासिकता को ध्यान में रखना बेहद ज़रूरी है। अभी पांडुलिपि जमा करने जैसी बात है स्वीकार होने पर छपने से पहले खुद शहंशाह अपनी ज़ुबान से मधुर वाणी में पढ़ कर सत्ता की कमान संभालने का कार्य करेंगे। जो लिखा इस तरह से है। 

    अपने सोच समझ कर मुझे सत्ता पर सिंघासन पर सुशोभित किया है। कोई छुपी हुई भावना नहीं रही इस बार बड़े साफ शब्दों में मेरे नाम की सरकार बनाने की बात कही थी। राजा की सरकार राजा के नाम से हुआ करती है। जनता की सरकार बनाने का काम आज तक सफल नहीं हो पाया है। भारत सरकार हमेशा किसी एक नेता या दल अथवा गठबंधन की सरकार कहलाई है , पिछली बार मेरे सत्ताधारी शासक होते हुए भी दल की ही साकार कहलाती रही है बेशक दल का कोई महत्व नहीं बचा था। जब नाचन लागी तो घूंघट काहे यही विचार कर पासा फैंका था अपने नाम की सरकार वाला। शतरंज में राजा बचना चाहिए प्यादे कुर्बान होने को ही रखते हैं। अभी शंका की बात कोई नहीं है दल वाले घठबंधन वाले विपक्ष वाले सबको खबर है इस सरकार का मतलब ही मैं हूं मैं ही मैं और केवल मैं ही मैं ही हूं। अपने देखा होगा चुनाव के बाद भगवान के दरवाज़े पर भी मैं गया तो राजा की तरह की पोशाक और शानो शौकत के साथ। भगवान के भक्तों की भक्ति और संख्या अब मुझसे बढ़कर नहीं रही है। स्वर्ग के आसन की लड़ाई देवता लड़ते रहे होंगे इस भारत देश की धरती किसी स्वर्ग से कदापि कम नहीं है और मेरी विजय निर्विवाद सत्य की तरह है। 

        मैंने इस अवसर पर जो पोशाक पहनी है विशेष तौर से सिलवाई गई है जिसकी विशेषता है कि सिर्फ मेरे सच्चे भक्त ही इसकी चमक को देख सकते हैं और देखकर मेरी शोभायात्रा निलकते समय जय हो का उद्घोष कर सकते हैं। जिनको इसकी सुंदरता इसकी बेमिसाल चमक दिखाई नहीं देगी और वो जय हो शहंशाह जी की नहीं बोलेंगे उनको मुजरिम करार दिया जा सकता है मगर मैं जनता हूं सब जय हो का उद्घोष कर एकता और अखंडता की मिसाल कायम करेंगे और इतनी ऊंची आवाज़ सुनाई देगी जो ऊपर आसमान पर मुझसे पहले के शासकों को भी सुनाई देगी। आज से देश मेरा है आपका राजा मैं संविधान लोकतंत्र कानून सब मैं ही हूं। सबको  इस वास्तविकता को स्वीकार करना ही होगा कि मुझसे पहले कोई अच्छा और सच्चा ईमानदार शासक भारत ही नहीं दुनिया भर में कहीं भी हुआ नहीं है और न ही कोई कभी भविष्य में हो ही सकता है। मुझे लगता है कि अब जैसे पुराने समय में राजा का नाम उसकी तस्वीर सिक्कों पर अंकित हुआ करती थी अब देश में असली नोटों की पहचान मुझसे की जानी चाहिए। घबराना नहीं इस बार कोई नोटबंदी नहीं की जाएगी लोग चाहेंगे तो पिछले हज़ार पांच सौ वाले नोट फिर से मेरे नाम की मोहर से जारी किये जाने का भी विचार हो सकता है। लक्ष्मी काली सफेद नहीं होती है सुनहरी आभा की हर रंग की होती है। मुझे  फ़कीर समझ कर आपने मेरी झोली भर दी है बस इक चाहत अभी सीने में दबी हुई है मेरी मूर्ति बनवाने लगे तो उसकी ऊंचाई किसी की मूर्ति से कम नहीं होनी चाहिए। सरकारी विज्ञापनों की तरह अब घर घर दफ्तर दफ्तर दुकान दुकान हर रेहड़ी खोखे के धंधे की जगह मेरी तस्वीर लगाई जानी ज़रूरी होगी और सुबह शाम धूपबत्ती करने से सबकी गरीबी दुःख दर्द मिट जाएंगे की आरती गाई जाया करेगी। 

    मुझे भरोसा है शहंशाह की दिल की हर चाहत को इस लेख में शामिल किया गया है और इसको पसंद कर पढ़ने के बाद मुझे भारत रत्न की उपाधि मिल जाये तो कोई हैरानी नहीं होगी। माया की बात क्या देने वाला जब भी देता देता छप्पर फाड़ के ये हेरा फेरी फिल्म का गीत सच साबित हो भी सकता है।

Friday, 24 May 2019

साईल नहीं समझा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      साईल नहीं समझा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आज की बात की शुरुआत इक अपनी पुरानी ग़ज़ल से , तीसरी नंबर की लिखी ग़ज़ल है। हम अपनी दास्तान किसको सुनाएं। पहली। नया दोस्त कोई बनाने चले हो। दूसरी। अब तीसरी पूरी पेश है। 

  हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा - लोक सेतिया  "तनहा"

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा ,

दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा। 

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन ,

घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने ,

महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने ,

अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने ,

काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल ,

वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने ,

पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा।   

                             (  अब आज की रचना  ) 

      शीर्षक यही चुना है शायद कुछ लोगों को साईल शब्द का अर्थ नहीं मालूम हो तो पहले वही बता देता हूं। साईल कहा जाता है भिक्षुक को और ज्ञान चाहने वाले को भी , भीख मांगने वाला भिक्षुक कहलाता है। फ़कीर की बात अलग होती है झोली खाली हो या भरी हुई उसको मतलब नहीं होता। फ़कीर अगले पल की चिंता नहीं किया करते हैं। आई मौज फकीर की दिया झौंपड़ा फूक। फकीरी करना आसान नहीं है कौन सच्चा फकीर है इसकी इक छोटी सी कहानी सुनते हैं उसके बाद आधुनिक फकीरी पर चर्चा की जानी है। 

      इक धनवान अपने बेटे को इक सन्यासी गुरु के पास लेकर गया और बताया वो फ़कीर बनना चाहता है। गुरु ने उसके बेटे को कहा पहले देख लो ये फकीराना अंदाज़ होता क्या है। उसको अगली सुबह रात के आखिरी पल ठंड के मौसम में दूर इक सुनसान जंगल जाकर इक फ़कीर को दूर से ही देखते रहने को कहा। जब उस जगह पहुंचा तो देखा इक फ़कीर आंखें बंद किये चिंतन में व्यस्त है। इक चादर से ढका हुआ शरीर ठंड से बेखबर ध्यान में मग्न। तभी देखा कोई रथ पर उधर से गुज़र रहा था अमीर आदमी होगा जब देखा सर्दी में फ़कीर को तो अपना कीमती दोशाला उतार कर चुपके से जाकर उसको ओड़ा दिया बिना आवाज़ किये और अपनी राह बढ़ गया। कुछ ही क्षण में इक चोर उधर से गुज़रा तो उसको लगा इतना कीमती दोशाला इसके पास और चुपके से दबे पांव जाकर उसके बदन से दोशाला उठाया और लेकर चल दिया। वो सोचने लगा क्या इसको खबर ही नहीं कोई दान दे गया कोई चोरी कर गया। तभी इक राहगीर जाते जाते अपने झोले से कुछ लड्डू निकाल कर फ़कीर के सामने रख कर अपने सफर पर चला गया। इतने में इक कुत्ता आया और फ़कीर के सामने से रखे लड्डू खाने लगा फिर भी फ़कीर को कोई हलचल नहीं करते देख वो अपने को रोक नहीं पाया और फ़कीर के पास जाकर कहा आपको खबर भी है कोई आपका दोशाला चुरा गया कोई आपके लड्डू खा रहा है। फ़कीर हंस दिया। जब जो जो हुआ उसका विवरण सुना तो बोला भाई मैं तो अपने आप में मस्त था मुझे इस सब से कोई मतलब ही नहीं था। कोई दोशाला डाल गया कोई दूसरा उठाकर ले गया तो मुझे क्या लेना देना , कोई मैंने मोल तो नहीं लिया था न ही मांगा ही था। जो दे गया उसको ज़रूरत नहीं रही होगी और जिसको ज़रूरत थी लेकर चला गया। जब मेरा था ही नहीं मुझे किस बात की चिंता और कोई लड्डू रख गया जिसको भूख लगी थी खा गया तो वो भी मेरे नहीं थे। इस तरह उस धनवान के बेटे को समझ आई बात दुनिया से विरक्त होना किस को कहते हैं। 

       बचपन से देखता था कुछ लोग सन्यास लेने के बाद भी रिश्तों से मोह रखते थे। दादाजी को कथा सुनाया करता था इसलिए सोचने लगा और सवाल करता आप साधु हैं तो नाते की बात क्यों कहते हैं। इक बात और पता चली कोई सन्यास लेना चाहता है तो उसको विवाह से पहले माता पिता से और विवाहित होने पर धर्मपत्नी से अनुमति लेनी होती है पहला भगवा कपड़ा घर से लेकर शुरुआत की जाती है। शायद अब आपको माजरा समझ आने लगा है। कुछ लोग घर से भागते हैं जीवन से हार के और भगवा भैस धारण कर मांग कर खाने के आदी बन जाते हैं। उनको कोई मतलब नहीं होता असली नकली संत होने से। असली फ़कीर कैसे होते हैं उनकी बात ही और होती है। ग़ालिब कहते थे बदल के फकीरों का हम भेस ग़ालिब तमाशा ए अहले करम देखते हैं।

      इक देश के शासक को अपनी शान बाकी राजाओं से बढ़कर दिखानी की चाहत थी। उसने आस पास के सभी देशों के साधु संतों और भिक्षुक फ़कीर लोगों को बुलवाया दान देने को। जितने भी आये सभी को सोने चांदी हीरे मोती जवाहरात देकर उनकी झोलियां भर कर भेजते हुए कहा अपने अपने देश जाकर बताना कोई राजा इतना बड़ा दानवीर है। इक फ़कीर दरबार से बाहर निकला और मिली खैरात को वहीं खड़े भिखारियों को बांट कर उनसे कहा जाओ अपने राजा को बताओ हमारे इक देश में ऐसे फ़कीर भी रहते हैं जो जितना भी मिले सब औरों को बांट देते हैं मगर कोई भी  अहंकार दिखाते । ऐसा ही इक फ़कीर जब इक राजा के पास आया तो देखा राजा ऊपर वाले से कुछ और देने की विनती कर रहा है। वापस जाने लगा तो राजा ने रोककर पूछा मांगो क्या चाहिए और फ़कीर ने कहा मैं तो राजा समझ कर आया था मगर आकर देखा आप तो खुद ऊपर वाले से मांग रहे हैं तो लगा इक भिक्षुक से क्या लेनी भीख , मांगनी होगी तो उसी से मांगेंगे जो राजा को भी देता है।

        नाम बदलने की इतनी जल्दी नहीं उपनाम जो रख लिया बदलने की जल्दी नज़र आई। सेवक चौकीदार नहीं अब फ़कीर हैं कहकर दिल जीत लिया सबका। संतन को क्या सीकरी से काम। मगर कभी नहीं सुना था कोई ऐसा फ़कीर होता है क्या राजसी शान क्या शासक होने का एहसास क्या खुद को महान होते देखने की चाहत जो किसी से छिपती नहीं छिपाने से। इतनी सुरक्षा की ज़रूरत किसी फ़कीर को नहीं होती है फकीरी का अर्थ ही बदल कर रख दिया है। ये लोग भी खूब हैं किसी का जादू सर चढ़कर बोलता है तो हर बात पर वाह वाह क्या बात है। इक नानक जी थे घर परिवार सब था सन्यास लेने की घर बार त्याग करने की कोई बात ही नहीं की कभी। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे खैर। ये कैसा आधुनिक फ़कीर है कि  लोग डरते हैं किसी दिन किसी को सूली चढ़ाने की बात भी कह दे तो हैरान नहीं होना , जान की खैर मनानी है तो चुप रहना सीखो या उसकी जय कहना जो भी मुमकिन है। कई साईस लोग अपने बच्चों के नाम गरीबदास रखते थे जानकर उनकी अमीरी को नज़र नहीं लग जाये ये सोचते थे। और कोई फुटपाथ पर रहने वाला बच्चे का नाम अमीर चंद रख कर सोचता नाम से तकदीर बदल जाये शायद। शेक्सपीयर कहते थे नाम में क्या रखा है।  दुनिया आपका सिक्का मानती है कौन आपको फ़कीर समझेगा ये फकीरी आपको कहीं परेशान नहीं कर दे। फ़कीर फकीरी और फकीराना अंदाज़ आप नहीं समझोगे बाबू चुटकी भर सिंदूर की कीमत क्या होती है। कोई है जो आपको अपने सर का ताज मानती है फ़कीर नहीं भले आप कभी अपना धर्म नहीं निभाओ मगर इतना ज़ुल्म भी मत ढाओ खुद को फ़कीर मत बताओ। बड़े झूठे हो चलो जाओ। 

Thursday, 23 May 2019

सवाल हैं जवाब कहां हैं ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया

     सवाल हैं जवाब कहां हैं ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   जीत जाने से सवाल खत्म नहीं होते हैं। और कोई कहता है जनादेश साबित करता है मेरी कोई गलती नहीं है तो आपसे पहले जिनको देश की जनता ने फिर से जितवाया क्या अपने उन पर लगाए आरोप छोड़ दिए थे। आपात्काल हटाने के बाद जिस इंदिरा गांधी की ज़मानत ज़ब्त हुई 1977 के चुनाव में 1980 में फिर उन्हीं को जितवा दिया उसी जनता ने मगर क्या कुर्सी बचाने को इमरजेंसी लगाना भूले लोग। उसी इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद हुई हिंसा का कलंक क्या उसके बाद उनके बेटे राजीव गांधी को मिली जीत से मिट सका है। लोग पुरानी बातों को छोड़ देते हैं बुरा सपना या खराब हालात मानकर मगर भुलाते नहीं हैं। उसी तरह से किसी को जीत मिलना उसके अच्छे बुरे सभी कार्यों को वैध नहीं बनाता है। राजनीति करने वालों को ये पसंद है कि घोटालों दंगों या भ्र्ष्टाचार के आरोपों से अदालत बरी कर से सबूत नहीं मिलने के कारण या फिर जनता दोबारा वोट देकर चुन दे तो उसे अपनी बेगुनाही का तमगा बना पेश करते रहें। 

      खेल खेलते हैं तो खेलने के नियम भी पालन करने पड़ते हैं। गली के बच्चे नहीं हैं जो आउट होने पर आउट होने को राज़ी नहीं होते और निर्णय नहीं मानते हैं। अपने मैच फिक्सिंग की भी बात सुनी होगी जब कोई खिलाड़ी बिक जाता है खराब खेलता है हारता है पैसे की खातिर। सवाल किसी भी दल का नहीं है किसी भी एक उम्मीदवार का नहीं है सब के सब जीते या हारे मगर चुनाव आयोग के नियम को ताक पर रखकर करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद। ये जीतना नैतिकता की देश के कानून की हार है। जिस देश को चलाने को निर्वाचित सांसद खुद नियम तोड़कर सीमा का उलंघन कर चुनाव लड़ते हैं उनसे भला कोई कैसे ईमानदारी की आशा कर सकता है। देशसेवा और देशभक्ति कोई तमगा नहीं है जिसको सीने पर लगाए आडंबर किया जाये खुद अपने आप से सवाल करिये अपने देश को दिया क्या और कितनी महंगी कीमत वसूल की है अपना उचित कर्तव्य भी पूरी तरह से नहीं निभाने की। 

          कहने को सोचने समझने को कितनी बातें हैं मगर इक आखिरी लाख टके का सवाल करना हर सरकार हर नेता हर जीतने वाले से ज़रूरी है। सवाल ये है कि देश का संविधान देश की जनता को अधिकार देता है खुद अपनी सरकार चुनने बनाने का मगर बनते ही हर सरकार किसी दल किसी परिवार किसी व्यक्ति की बनकर रह जाती है। हम सरकार बदलते हैं नाम बदल जाते हैं लेकिन व्यवस्था पुरानी ही जारी रहती है। सत्ता किसी एक के हाथ से किसी दूसरे के हाथ चली जाती है। जनता संसद बनाती है बदलाव लाने को मगर जनता के लिए बदलता कभी कुछ भी नहीं है। किसी शायर के दो शेर हैं याद आते हैं। 

पंछी ये समझते हैं चमन बदला है ,

हंसते हैं सितारे कि गगन बदला है। 

श्मशान की ख़ामोशी मगर कहती है ,

है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है।


जीतने के कारण तौर और तरीके ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 जीतने के कारण तौर और तरीके ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   चुनाव सम्पन होने के बाद नतीजे घोषित होने ही थे इस में अचरज की कोई बात नहीं है। और नतीजे आने पर किसी को विजयी किसी को पराजित भी घोषित किया जाना ही था। अब हर कोई जीत पर हार पर चर्चा करेगा किसी को जीत का किसी को हारने का ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। किसी को जीत का सेहरा बांध कर बधाई दी जाएगी तो किसी को हारने की वजह कहकर ठीकरा उसके सर फोड़ने की बात होगी। जिस जनता ने जितवाया या फिर हरवाने में योगदान दिया उसकी बात कहीं पीछे छूट जाएगी या औपचारिक धन्यवाद दे का समझेंगे हक अदा कर दिया। शासक कोई भी हम लोगों को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला है। मगर कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें हैं जिनको समझना जानना भविष्य में काम आ सकता है। अब इस रचना में इक छुपी हुई मगर कोई राज़ नहीं ऐसी कहानी बताई जाएगी। आज की कथा की शुरुआत इसी तरह की जानी चाहिए। 

      ये झूठ के देवता के घर या फिर मंदिर कह सकते हैं उसकी महानता की सत्य कथा है। सच कभी पराजित नहीं होता मानते थे मगर झूठ हमेशा विजयी रहता है इस बात को पहले किसी ने किसी को बताया तक नहीं था। साल भर पहले खुद झूठ के देवता ने आकर मुझे उसका भव्य मंदिर बनवाने को कहा था और तब मुझे भी हैरानी हुई थी इसकी ज़रूरत से अधिक ये काम मुझे सौंपने को लेकर। 30 जून 2018 को इसी ब्लॉग पर लिखी रचना विस्तार से पढ़ी जा सकती है। उसके बाद भी बीच बीच में समय समय पर चर्चा की जाती रही है। इन चुनाओं से पहले घोषित किया गया था इस झूठ के देवता के दर्शन करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। रात दिन चौबीस घंटे दर्शन करने लोग आते हैं आएंगे आते रहेंगे भविष्य में भी। झूठ के देवता की महिमा का गुणगान बढ़ता जा रहा है और जितने भी नेता चुनाव जीतने को यहां हरियाणा के फतेहाबाद शहर आकर दर्शन करते रहे उन सभी को जीत हासिल हुई है। कोई दल का भेदभाव नहीं हुआ है सत्ता पक्ष विपक्षी सभी आने वाले विजयी भये हैं। जिनको झूठ के देवता पर भरोसा नहीं था अब हारने के बाद पछता रहे हैं। 

     समय दस्तक देता है अगर आप ध्यान रखते हैं , हर युग में अपने अपने देवी देवता अपने भक्तों को चाहने वालों को वरदान देते हैं उनका कल्याण करते हैं। जो इस बार नहीं आये फिर कभी दर्शन को आ सकते हैं। ये केवल राजनीति करने वालों का विशेषाधिकार नहीं है। झूठ बोलने से आपका भी भला ही हो सकता है कुछ भी बुरा नहीं होता बेशक आपको किसी तरह से किसी मकसद को लेकर झूठ बोलना पड़े। झूठ के देवता के पास आकर कभी सच नहीं बोलने की शपथ उठानी है और आपके सारे बिगड़े काम बन जाने हैं हर उलझन खुद ब खुद सुलझती जाएगी। कोई चढ़ावा नहीं कोई शुल्क भी नहीं बस केवल झूठ की आरती सुबह शाम उतारनी होगी। जिनको अभी तक समझ नहीं आया उनको जीतने के सबसे ज़रूरी तीन उपाय ध्यान रखना सीखना होगा जिनसे किसी ने जीत हासिल की है। पहला काम अपने जो भी किया है उसकी चर्चा रात दिन भाषण इश्तिहार सोशल मीडिया पर करने के साथ पहले के सत्ताधारी नेताओं को दोषी ठहराने का काम खूब ज़ोर शोर से करना चाहिए। दूसरी बात जो आपको करना चाहिए था मगर किया नहीं बस झूठे वादे साबित हुए उनकी बात कोई अख़बार कोई टीवी चैनल आपसे सवाल नहीं करे इसका उपाय करने को उनका मुंह बंद रखने को सरकारी खज़ाने से विज्ञापन के नाम पर पैसा देकर अपना गुणगान करवाना चाहिए। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है जो भी अनुचित अपने किया संविधान या संस्थाओं को लेकर उनकी भनक तक लोगों को लगने नहीं देनी चाहिए।

        अभी तक अपने जो हुआ जैसे हुआ को लेकर बात समझी है आगे की बात और भी अधिक विचारणीय है। जब कुछ लोगों से जानना चाहा अपने उसी सरकार को दुबारा चुना है तो क्या आपको उनका काम काज पसंद आया है सब अच्छा किया है पिछले पांच साल में सरकार ने। जवाब मिला नहीं हमारा क्या है हम तो जैसे तैसे जीने के आदी हो चुके हैं थोड़ी उम्मीद थी इस सरकार से मगर बहुत जल्दी जान लिया था ये भी पहले वालों से कम नहीं हैं। पर हमने देखा कि इस बार किसी नेता ने विदेश जाकर अपनी शानो शौकत खूब बढ़ा चढ़ाकर देश की गरीब वाली छवि को बदल दिया है। विदेश में रहने वाले एनआरआई अब शर्मसार नहीं होते अपने देश की भूखे नंगे गरीबों की तस्वीरों को देख कर। अब उनको अच्छा लगता है इक मामूली जनता का सेवक कहलाने वाला राजसी ढंग से विलासिता पूर्वक जीवन जीता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे ऊंचे ऊंचे टावर्स पर जगमगाती रौशनियां मीलों तक अंधेरी बस्तियों को छुपाने का काम करते हैं। पहली बार कोई राजनेता इतनी महंगी सज धज और पहनावे से गांधीवादी विचार को लालबहादुर शास्त्री के सादगी से जीने को और सादा जीवन उच्च विचार की बात को किसी पुराने युग की निर्रथक सोच बना दिया है जिस से लोग इतने कठिन मार्ग से बच सकते हैं। अब कोई कहां चाहता है सब कुछ उपलब्ध होते भी नहीं करें ताकि बाकी लोग थोड़ा पाने के अधिकारी बन जाएं।

         शायद किसी को आज ये इक काल्पनिक कहानी लग सकती है मगर इस देश में बहुत लोग काफी दिनों से इक दहशत या डर लेकर घबरा रहे थे कि क्या होगा अगर इस बार इक नेता को हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि उसको हारने का अनुभव भी नहीं था और हार को स्वीकार करने की मानसिकता भी उसके पास नहीं है जबकि पहले सभी राजनेता हार जीत को राजनीति के सिक्के के दो पहलू समझा करते थे। लोग घबरा रहे थे कि कहीं उसकी जीत नहीं हुई तो आसमान से कोई कयामत टूट सकती है। जैसे पहले इक नेता ने कुर्सी को जाने से बचाने को आपात्काल की घोषणा कर दी थी। इतिहास का वो काला अध्याय फिर से दोहराये जाने की आशंका छाई हुई थी। लोग सब झेल सकते हैं मगर कोई लोकतंत्र को ही फिर से कैद में डाल दे नहीं होने देना चाहते थे। बस अभी आगे काफी कुछ है जो सामने नहीं पर्दे के पीछे सत्ता का नाटक नेपथ्य में ख़ामोशी से चलता है।

Wednesday, 22 May 2019

गलत सवाल का सही जवाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  गलत सवाल का सही जवाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   अभी चुनाव नतीजे सामने नहीं आये हैं रुझान देख कर पता चला है सारे बच्चे फेल होने वाले हैं। और होता भी क्या जब सवाल किया गया हो पहले मुर्गी हुई या अंडा जवाब जो भी बताओ आपको अंक ज़ीरो मिलने तय हैं। बिना अंडे मुर्गी कैसे और मुर्गी नहीं तो अंडा कहां से। देश की जनता उलझी हुई है कब से इस ऐसे सवाल में जिसका जवाब ही नहीं जवाब खुद सवाल बन जाता है। दुष्यंत कुमार फिर बीच में चले आते हैं। हमने सोचा जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है। मगर आज आपकी चिंता का समाधान भले नहीं हो चिंताराम की चिंता का अंत हो जाएगा। अब सही वक़्त है आपको वास्तविक सवाल भी बताया जाये चाहे आप समझ सकें या बिना समझे हंसी में टाल दें , ये चुटकुलों की खराब आदत पड़ी है हर कोई सोशल मीडिया पर संजीदा विषय को भी मज़ाक बनाने लगता है। आज इस गंभीर बात को चुटकुला मत बनाना इतनी विनती करनी है मुझे आप सभी से।

          राजनेता जानते हैं जनता को कभी कोई खुश नहीं कर सकता है। मगर जनता ही ने वरमाला जीत की पहनानी है इसलिए उसको इस गलतफ़हमी को विश्वास समझना ज़रूरी है कि हम उसकी ख़ुशी चाहते हैं। ठीक जैसे घर में पत्नी को भरोसा करवाना होता है उसकी ख़ुशी को पति आसमान से चांद सितारे तोड़ कर लेकर उसकी झोली में भर सकते हैं। पागल महिला इतना भी नहीं सोचती कि हैं सितारे कहां इतने आकाश पर हर किसी को अगर इक सितारा मिले। कश्तियों के लिए ये भंवर भी तो हैं क्या ज़रूरी है सबको किनारा मिले। बस यही सोचकर हम बड़े चैन से डूब जाने लगे थे , मगर रो पड़े। ग़ज़ल अच्छी लगी होगी बात भी समझ आई होगी। नेता जनता को और पति पत्नी को खुश करना चाहते नहीं कभी भी बस खुश रखना चाहते हैं इस झांसे में रखते रखते अपनी हर चाहत पूरी करते रहते हैं।

      जो बात संभव ही नहीं है भगवान देवता पय्यमबर भी खुश नहीं कर सकते अपनी पत्नी को देवियों को कोई मानुष भला कैसे असंभव को संभव कर दिखायेगा। कोई अलादीन का चिराग़ नहीं मेरे पास किसी दिल ये सच बोल दिया था इक नेता ने तो लोग हंसने लगे कुर्सी से बढ़कर कोई अलादीन का चिराग नहीं होता है। बेटी को हर पिता भरोसा दिलाता है राजकुमार ढूंढ लाएगा बेटी रानी बन राज करेगी। कहां ऐसे सुनहरे ख्वाब सच हुए हैं किसी राजकुमारी बेटी के। देश की जनता के सामने हर पांच साल बाद जो सवाल रखा जाता है किसी अच्छे सच्चे नेता को चुनकर भेजने का वो सवाल ही उल्टा है जिनको चुनाव लड़ना है शरीफ लोग नहीं हुआ करते शराफत से रहना है तो राजनीति की चौखट को नहीं लांघना बज़ुर्ग समझाते थे इनका कोई भरोसा नहीं गिरगिट से जल्दी बदलते हैं रंग अपना। पत्थरों के शहर में आदमी ढूंढते फिरते  हैं लोग और ज़ख़्मी होकर तीर चलाने वाले को दुआ भी देते हैं हाय री मज़बूरी। 

सत्ता के मुजरे का सुहाना सफर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता के मुजरे का सुहाना सफर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     राजनीति की वैश्या नाम बदलती है , साधना फिल्म की चंपा रजनी बन जाती है। वसंतसेना की कहानी याद थी भूल जाती है। भले घर में बहु बनकर रामायण सुनाती है सासु मां को बहुत भाती है। ये कहानियां फ़िल्मी हैं मगर सत्ता के कोठे का कड़वा सच यही है। सफर बेहद लंबा है मगर दिलकश है सुहाना है उसको कितनी बार दोहराया गया है। ये किरदार जिस किसी नायिका ने निभाया है उसकी पहचान बन गया है कोई बड़ी फ़िल्मी तारिका शायद ही है जिसने इस किरदार को नहीं निभाया हो। पाकीज़ा की मीनाकुमारी जब बदनाम गली के कोठे से गुलाबी महल की साहिब जान बन जाती है तो बड़े बड़े रईस मुजरा देखने आते हैं। ठेकेदार को अपनी औकात पता है वो दरवाज़े पर बैठा लुत्फ़ उठाता है मगर किसी खानदानी नवाब से नौंक झौंक होने पर कीमत भी चुकाता है। हंसते ज़ख्म की कहानी और है गलती से पुलिस वाले की बेटी को नाचने गाने वाली की बच्ची समझ गुंडे उठा ले जाते हैं किरदार बदल जाते हैं आखिर अपनी ही बेटी को पुलिस वाला अनजाने में वापस उसी दलदल में भेजने की बात करता है जिस जगह से पकड़ कर थाने लाया था और समझाया था बेटी किसी भले आदमी से शादी कर घर बसा लो छोड़ दो ये धंधा। किस किस जिस्मफरोश की बात की जाये।  चलो आज की राजनीति की वैश्या से मुलाकात की जाये। वही खुशबू वही शराब वही कमरा जिस्म बेचने वाली सगरेट सुलगाती हुई सोचती है और कौन होगा ये उसी की पहचान है। फ़िल्मी इत्तेफाक हुआ करते हैं आशिक़ चला आता है दोस्त ने भेजा होता है दिल बहलाने को। ये कमाल का जादू है लोग जिस मुजरेवाली पर लट्टू होते हैं हर दिन उसी का नाच गाना सुनने को चले जाते हैं। सत्ता की मुजरेवाली कभी बूढ़ी होती नहीं है चिरयौवन का वरदान मिला हुआ है। 

          पांच साल में समझना मुश्किल नहीं कि इस सत्ता की मुजरेवाली का प्यार झूठा है और बिकाऊ है। वो हर बार कोई नया पासा फैंकती है अबकि वफ़ा की मिसाल बनके दिखाएगी जन्नत की सैर पे साथ लेकर जाएगी। हम फिर उसकी चाल को  समझते और उसके झूठे आंसू झूठी मज़बूरी की कहानी सुनकर जाल में फंसने चले आते हैं। चुनाव आने पर राजनेता क्या क्या रंग दिखाते हैं नाचते झूमते नचवाते हैं खूब काली घटा बनकर छा जाते हैं मगर ये बिना पानी के बादल वोट मिलते ही बरसे बिना खो जाते हैं। लोग प्यासे के प्यासे रह जाते हैं सत्ता के खिलाड़ी अपनी प्यास बुझाते हैं जाम से जाम टकराते हैं। छलकाए जाम आइये  आपकी आंखों के नाम होंटों के नाम , कहानी बदल जाती है नायिका वही है शरीफ लड़की है शराबी से दिल लगाती है। लाख वफ़ा करती रहे बेवफ़ा कहलाती है। राजनीति करना सबकी बस की बात नहीं है पल पल बदलती रहती है बरखा रानी मौसम की तरह। सत्तर साल में कितने नाम से कितने ठिकाने बदल बदल कर सबकी प्यास बुझाने की कसम खाती है चौखट पर माथा टेकती है सर झुकाती है अच्छी बहुरानी बनकर रहने की बात करती है। समय बदलता है सेवा करने वाली मालकिन बन जाती है , किराये की दुल्हन कहीं रिश्ता निभाती है। 

      लो आज फिर उसी मोड़ पर खड़े हुए हैं हम आशिक़ बनकर। सज संवर कर निकलेगी डोली उसकी जिस की जीत की वरमाला पहनाई थी हमने रात बिना देखे पहचाने नशे की हालत में। गवाही देगा जिसने निकाह पढ़ा था और जाने क्या क्या समझा समझाया था। उसने इस बार बिल्कुल नया दिल बहलाने का हुनर सीख कर आने का भरोसा दिलाया है। कथककली से डिस्को से गुज़रा सफर अब आइटम सांग पर चला आया है। नाचने वाली को हमने भी नचवाया है। पग घुंगरू बांध मीरा नाची थी और हम नाचे बिन घुंघरू के क्या गाया है अपना रंग जमाया है। पर हम नाच देखने वाले कितनी बार नचनिया बन सकते हैं आखिर तो उनके लटके झटके ठुमके उन्हीं के हैं हम उनकी नकल कर सकते हैं वो बात नहीं हो सकती है। राज़ की बात यही है लोग समझते हैं राजकपूर नायक हीरा बाई का खेल देखने जाता है मगर मुहब्बत की बाज़ी हार जाता है तब तीसरी कसम खाता है। फिर कभी किसी नाचने वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठायेगा। हम भी बार बार धोखा खाते हैं उनको हटाने की कसम खाते हैं मगर हर बार उसी कातिल को बदले लिबास में घर लेकर आते हैं। सत्ता अपना मुजरा करती है हम उनकी जीत का जश्न मनाते हैं। दुल्हनिया लेने वाले राह से डोलियां उठवा जाते हैं हम बहु बेग़म फिल्म की तरह खली डोली घर लाते हैं। चलो आपका दिल बहलाते हैं इक ग़ज़ल सुनाते हैं। 

चंद धाराओं के इशारों पर - लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर ,
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते ,
जो न करते यकीं सहारों पर।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग ,
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर ,
अब भरोसा नहीं कहारों पर।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम,
जिन को उम्मीद थी सितारों पर।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,
फूल रख आये हम मज़ारों पर।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये ,
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर। 


जाते जाते इक मुजरे की भी बात हो जाए तो क्या खूब हो।  ये वीडियो पेश है पाकीज़ा फिल्म से।

 

 


Tuesday, 21 May 2019

राह से भटके को मंज़िल नहीं मिलती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  राह से भटके को मंज़िल नहीं मिलती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  बात सभी की है देश के सभी वर्गों की और बाकी सभी से पहले खुद अपनी भी। मंज़िल तो कुछ और ही थी जिसको पाना था मगर हम राह किसी और पर चलते रहे। राजनेताओं आम जनता से पहले हम जो तथाकथित शिक्षित लोग आईना दिखाने की बात करते हैं सच बोलने का हौंसला ही नहीं और आधा सच आधा झूठ मिलाकर चटनी की तरह परोसते हैं ताकि सबको स्वाद पसंद आये और भाई वाह कहे हर कोई। पहला सवाल आज देश में लोकसभा चुनाव का है राजनीति का है और चिंतन का है कि क्या सब ठीक है क्या यही लोकतंत्र है जिसकी बात हम करते हैं। अभी इक विषय पर अटके खड़े हैं ईवीएम मशीन को लेकर भरोसा नहीं है मगर भरोसा बचा कहां है कोई भी तो भरोसे के काबिल नहीं है जब हमें विश्वास स्थापित करना चाहिए हम शक की बात करते हैं और शक करने वाले पर शक कर इक कंचों का खेल खेलते हैं जीत हार की नहीं हिसाब की बात पर बहस है। जिनको समझ है वो विचार कर सकते हैं कि केवल मशीन बदल कर चुनाव नहीं जीता जा सकता है इतना बड़ा देश है इतनी मशीनें और उनको रखने के ढंग और सुरक्षा के तरीके के साथ हर मशीन पर जो चुनाव लड़ रहे उनके नुमायदों के हस्ताक्षर इतना सब आसानी से बड़े स्तर पर धांधली होने नहीं देता। इस पर विचार किया जा सकता है और निष्पक्ष चुनाव होना ज़रूरी है कैसे हो मंथन की ज़रूरत है विषय आसानी का भी नहीं विषय देश की व्यवस्था का है पांच साल और हर बार का है तो रास्ता कठिन हो कोई बात नहीं मगर दिशा हीनता नहीं होनी चाहिए। अभी हम दिशाहीन भटकते लग रहे हैं। असली उद्देश्य संविधान लोकतंत्र और देश की जनता की अपनी चुनी सरकार होने का है। मुद्दे से भटके नहीं भटका दिए गए हैं वास्तविक मुद्दे हैं ही नहीं और अनावश्यक चर्चा टीवी अख़बार और राजनेता करने में व्यस्त हैं। 

       क्या चुनाव ईमानदारी से लड़े जा रहे हैं कोई नहीं बात करता। हम्माम में सभी नंगे हैं शुरुआत ही गलत है कितना खर्च नियमानुसार किया जाना है परवाह ही नहीं है। कोई भी दल उम्मीदवार खड़े करते हुए अच्छे सच्चे को नहीं देखता और जीतने को जातीय समीकरण से धनबल और बाहुबल हर सही गलत ढंग अपनाया जाता है। बात विचारधारा की होनी चाहिए  मगर होता ये है कि उसकी कमीज़ मैली है मेरी चादर उजली है क्या ये मानसिक दिवालियापन नहीं है। बड़े बड़े राजनेताओं के भाषण का स्तर गिरकर इतना नीचे आ गया है कि बोलने वाले नहीं सुनने वालों को शर्म आती है क्या यही नेता हैं इनको सुनने आये थे हम। जिस देश में तीस फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं उस में हज़ारों करोड़ चुनाव पर बर्बाद करना अपराध ही है। और किसी को गरीबी भूख पीने का पानी बदहाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बात महत्वपूर्ण नहीं लगती है। क्या सत्ता पाने को सब उचित है और अगर है तो आपकी देशभक्ति और जनता की सेवा की बातें सब से बड़ा धोखा हैं। खेद की बात है कभी हमने एक मंच से आमने सामने दोनों पक्षों को बहस करते हुए देखा है शालीनता से बात की जाती थी। संसद में असहमत होते हुए भी विपक्षी की बात बड़े ध्यान से सुनते थे और गहराई से विचार भी करते थे। अपने ऐसे वास्तविक अच्छे नेताओं की परंपरा को छोड़ हम कीचड़ की होली खेलने लगे हैं गंदगी उछालते हैं। ऐसा कर अपने आप को ऊंचा नहीं उठा रहे गिर रहे हैं। 

       चुनाव कोई समय था त्यौहार से लगते थे दुश्मनी नहीं कोई जंग नहीं लगते थे। आपस की मर्यादा का उलंघन कोई नहीं करता था हमने सीखा हुआ था कमर से नीचे वार नहीं करना है। अब तो लगता है मुकाबला ही खुद को नीचे लाने का है उसने अमर्यादित भाषा उपयोग की हम गाली की भाषा से भी नीचे की बात करेंगे। मां बहन बाप दादा तक सभी को लेकर घटिया तरह की बातें क्या शोभा देती हैं देश की संसद का चुनाव किसी बस्ती की लड़ाई जैसा बन गया है। मगर इस सब में खोया क्या है ये विचार ही नहीं करते हैं। इक मंज़िल की तलाश थी ऐसा वातावरण बनाना था जिस में हर कोई भागीदार भी हो और अपने कर्तव्य निभाकर अधिकार भी हासिल कर सके। इक शायर 43 साल पहले दुनिया से रुक्सत हो चुका मगर उसका दर्द अभी भी सालता है। उनकी ग़ज़ल की किताब का शीर्षक ही समझने को काफी है। चलो साये में धूप , की बात करते हैं। पहली ग़ज़ल से शुरुआत करते हैं। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं , इस सफ़र के लिए।
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैँ बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए।
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को ,
ये अहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।


( काश हम सब इसी एक ग़ज़ल को समझ लें , और हर दिन याद रखें अपने पूर्वजों के सपनों को )
अब कुछ और शेर दुष्यंत की ग़ज़लों से :::::::


अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।
कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।
( क्या ये उनके लिए भी नहीं जो उजाला करने की बातें करने को आये थे और जो उम्मीद थी वो भी खत्म की )


ये रौशनी है हक़ीकत में एक छल लोगो ,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।
किसी भी कौम की तारीख के उजाले में ,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो।
वे कह रहे हैं गज़लगो नहीं रहे शायर ,
मैं सुन रहा हूँ हरेक सिम्त से ग़ज़ल लोगो।
( दुष्यंत के ये शेर जो अब सुनाने लगा बेहद ज़रूरी हैं याद रखना ::::: : )


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी।
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


( मित्रो इस आग को अब अपने अपने सीनों में जलाना ज़रूरी है )


खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर ,
कर दी है शहर भर में मनादी तो लीजिए।
फिरता है कैसे कैसे सवालों के साथ वो ,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।


हाथ में अंगारों को लिये सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।
मुझमें रहते करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है।
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ,
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है।


( चलो अब और आगे चलते हैं इस ग़ज़ल को पढ़ते हैं )


होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए।
गूँगे निकल पड़े हैं ज़ुबाँ की तलाश में ,
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए।
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।


( साये में धूप की आखिरी दो ग़ज़लें पूरी पढ़नी ज़रूरी हैं )


अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे खड़े हैं बेशुमार।
रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें ,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार।
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार।
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
हालते इनसान पर बरहम न हों अहले वतन ,
वो कहीं से ज़िंदगी भी माँग लाएँगे उधार।
रौनके जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।


( चलिये इस अंतिम ग़ज़ल को भी पढ़ लें )


तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं।
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह ,
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं।
तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं।
तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है , तू मशीन नहीं।
बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है हसीन नहीं।
ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर फेर करो।
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं।


( साये में धूप से साभार )


हमारे देश समाज का आदर्श मुहब्बत है नफरत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 हमारे देश समाज का आदर्श मुहब्बत है नफरत नहीं है ( आलेख )

                                       डॉ लोक सेतिया 

    दौलत के पुजारी नहीं हैं हम हमने हमेशा सच्चाई अच्छाई ईमानदारी को सबकी भलाई को ही अपनाया है। गैरों को भी अपनाया हमने जो जिस से मिला सीखा हमने , हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। गंगा जमुनी संस्कृति हमारी पहचान है जो भेदभाव की अलगाव की नफरत की बात करते हैं हमने कभी उनको अपना आदर्श नहीं बनाया है। कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा। सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा इसी कारण है। शांति अहिंसा हमारे आदर्श हैं और हमारे नायक हमेशा लोक कल्याण की भावना को महत्व देने वाले लोग बने हैं। फिर ये कैसे हो रहा है कि कोई इन सभी आदर्शों के विपरीत आचरण करता है और ये भी चाहता है लोग उसको महान समझें या स्वीकार करें। बाकी सबको छोटा और खराब घोषित करने से कोई कैसे नायक बन सकता है उस समाज में जो मानता है बड़े होने पर विनम्रता आती है अहंकार नहीं और माफ़ करना गुण समझा जाता है बड़पन्न कहलाता है। देश के बड़े और जनता के दिल में बसे हुए नेताओं को लेकर तब जब उनका निधन हुए बड़ा अर्सा बीत चुका है सभ्यता को ताक पर रखकर अशोभनीय शब्दों का उपयोग करना क्या इसको अच्छे संस्कार कहा जा सकता है। आसमान की तरफ थूकने का अर्थ जानते हैं सभी लोग। कोई भी बड़ा और महान अपने अच्छे कामों से बनता है किसी को बुरा कहने से आप अच्छे नहीं हो सकते हैं। इस देश में अधिकतर समय सत्ताधारी विपक्ष को आदर देते रहे हैं और जब किसी ने ऐसा नहीं किया उस काल को इतिहास का काला अध्याय समझा जाता है। लेकिन आज बेहद खेदजनक बात होती है जब कोई विपक्ष को समाप्त करने की अलोकतांत्रिक बात कहता है ये भूलकर कि ऐसी सोच रखने वालों को देश कभी स्वीकार नहीं करता है। देश की एकता अखंडता सबसे अधिक महत्वपूर्ण है किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा या फिर सत्ता की चाहत से बढ़कर समाज है संविधान है और सभी को समानता का जीने का विचार व्यक्त करने का बराबरी का हक भी है। नहीं विभाजित करने वालों नफरत की बात या सोच रखने वालों को देश पसंद नहीं करता है। जो ऐसा समझते हैं उनको इतिहास की धर्म की नैतिक मूल्यों की जानकारी हासिल करने ज़रूरी है। प्यार मुहब्बत भाईचारा हमारी पहचान भी हैं और हमारी महानता भी इन्हीं से है। भौतिकता की कीमत इनसे बढ़कर कदापि नहीं समझी जा सकती है।

Monday, 20 May 2019

अस्मत लुटवा बैठी अबला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      अस्मत लुटवा बैठी अबला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    जिस दुल्हन की डोली उठने से पहले ऐसा हादिसा हो जाये बेचारी रो भी नहीं सकती। खबर भी नहीं बाहर आती पर चेहरे की हवाईयां उड़ी हुई समझा देती हैं। लागा ईवीएम गायब होने का दाग़ छुपाऊं कैसे निष्पक्ष चुनाव करवाऊं कैसे। धुआं उठता है तो आग लगने का सबूत समझते हैं बिना आग धुंआ नहीं उठता कभी। पर हम लोग भी कमाल हैं मुझे क्या सबको लगता है कौन किसी के फटे में टांग अड़ाए। चलो दिल लगाने को फ़िल्मी बातें करते हैं। साधना फिल्म का गीत औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया कोई नहीं गाता सुनता जब मामला मीटू तक चला आया है। चुनाव आयोग इस खबर की पुष्टि कैसे करता कि बहु बेग़म फिल्म की तरह ईवीएम निकाह की रात अर्थात चुनाव से पहले गायब हो गई। नवाब साहब की हवेली डोली पहुंची तब ननद ने देखा डोली खाली है और सब नौकरानियों को उस कमरे से निकाल दिया ये कहकर कि भाभी जान गर्मी से बेहोश हो गई हैं। नवाब साहब की इज़्ज़त की लाज रखनी थी किसी कोठे से नाचने वाली को ले आये पैसा पास हो तो सब मुमकिन है। उनका भी कहना है उनके लिए सब मुमकिन है जनता खिलाफ भी हो जीतना मुमकिन है। ये कमाल फिल्मी होता रहा है कि घर से शादी की रात भागी नायिका किसी कोठे पर पहुंचती है और जिस घर दुल्हन बनकर पहुंचना था कोठे वाली बनकर पहुंचती है। पहुंची उसी जगह मगर गलत ढंग से उस रास्ते से जो बदनाम गलियों से जाता है। 

     मीनाकुमारी तब भी पाकीज़ा रहती है आशिक़ की बेटी की मां बनने वाली होती है और खुद ही कब्रिस्तान चली जाती है ज़िंदा लाश की तरह। दस्तक फिल्म की नायिका बेहद शरीफ है मगर रहने को घर मिलता है बदनाम गली में और हर कोई चला आता है खरीदार बनकर।  हम हैं मताये कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफ़ा का नाम , हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह। ये बातें फ़िल्मी हैं और पुराने ज़माने की हैं जब अस्मत लुटने पर लूटने वाले का नहीं जिसकी अस्मत लुटी उसी का दोष समझते थे चुप चाप हादिसे को भुला देते थे अगर हर कोई सामने आकर अपराध दर्ज करवाता तो जाने कितने शरीफ लोग बेआबरू हो कर निकलते घर से। बेदाग़ कोई नज़र नहीं आता मुमकिन है।  हम तो अपने गुनाहों को ढकने को कविता लिखते हैं गीत लिखते हैं औरत तेरी यही कहानी अंचल में है दूध आंखों में पानी। 

       चुनाव ही गया नतीजा जो भी हो चुनाव आयोग के घर से जो आवाज़ेंसुनाई दे रही हैं उनसे लोग हैरान हैं समझदार कहते हैं उनका आपसी झगड़ा है आपको कोई हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। देश की व्यवस्था लोकतंत्र की अस्मत संविधान की मर्यादा की लाज को यूं चुप रहकर लुटता नहीं देखा जा सकता है। माना आजकल कुंवारी लड़की कुंवारी हो इसकी चिंता कोई नहीं करता है जब खुद लड़के ही एक नहीं जितनी पट सकती हैं गर्ल फ्रेंड बनाते हैं मगर बूथ कैप्चर करना और ईवीएम गायब होना बराबर नहीं हैं। क्या कहते हैं उनके पास कोई पर्स ही नहीं है झोला भी खाली है कोई आगे न पीछे क्या करना है लूट कर। कोई सबको ऐसी नौकरी दे दे तो हर कोई चौकीदारी को तैयार है। विदेश जाना है शानो शौकत से बादशाह की रहना है हर सुख सुविधा हाज़िर है कोई जहाज़ तैयार है हेलीकॉप्टर भी कारों का काफिला साथ सुरक्षा भी खाने पहनने को रईसी से बढ़कर उपलब्ध है जेब में पर्स करना क्या है। अब युग ऑनलाइन का है किस बैंक में किस का कितना धन है सब गुलाबी है। 

      अब इस पर जितना कम लिखा जाये अच्छा है। आगे से उठाओ तो भी पीछे से हटाओ तो भी नंगा खुद को करना है ढका रहने दो पर्दा है पर्दा है। पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा। बस आखिर में इक पुरानी कहावत याद आती है जो ये है। राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के दो सबसे पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। कोई जिस्म बेचता है कोई ईमान बेचता है कोई है जो हर सामान बेचता है , खरीद लो सारा जहान बेचता है। इंसान भी खरीदता बेचता रहता है बिकने लगा है तो अपना भगवान बेचता है। तू क्या ए दिले नादान बेचता है बिकता नहीं दर्द का वो सामान बेचता है।

Sunday, 19 May 2019

शोले - 2 का पहला शो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    शोले - 2 का पहला शो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   शोले फिल्म दो बनकर तैयार है , पहला शो फिल्म को दर्शकों को दिखाने से पहले ख़ास लोगों और मीडिया वालों के लिए होता ही है। सब अपने शामिल होते हैं और हर फिल्म की सफलता की कामना की जाती है। अख़बार टीवी पर फिल्म को लेकर जानकर लोग राय दिया करते हैं ताकि लोग दर्शक ताली बजाने को खेल तमाशा देखने चले जाएं आखिर फिल्म आम दर्शक के मनोरंजन को बनाई जाती है। असली मकसद कमाई का है इसलिए आजकल उपदेशक या संदेशक तरह की फिल्म कोई नहीं बनाता है हर कोई मौज मस्ती नाच गाने और आईटम सांग सब शामिल करता है हर किसी का ख्याल रखने को। बात राजनीति जैसी है जाति धर्म देशभक्ति भड़काना झूठ का गुणगान सब की इजाज़त है। नायक गब्बर सिंह ही है ऐसा बता रहे हैं अब गब्बर इस बैक की बात है तो गब्बर को खलनायक नहीं कहा जा सकता महानायक बता रहे हैं। कहते हैं रामगढ़ वालों ने समझ लिया है गब्बर से बचने का कोई उपाय नहीं है गब्बर को वोट देना ही एक ही रास्ता है। 

   बसंती पहले से ही गब्बर की नर्तकी बन गई है उसको गब्बर के सामने नाचना अच्छा लगता है गब्बर उसकी कला का सच्चा पारखी है। ठाकुर के हाथ भी काट दिए थे इस बार पांव भी काटने ज़रूरी थे अब जूते भी नहीं पहन सकेगा तो गब्बर का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला है। जय और वीरू भी ठाकुर के लिए काम नहीं करते हैं गब्बर से उनको ज़्यादा पैसा मिलता है तो उसकी महिमा का बखान करते हैं रामगढ़ वालों को समझाते हैं इतना भलामानुष डाकू कोई नहीं हुआ है आज तक। गब्बर गब्बर सबको बोलने को कहते हैं गब्बर के नाम की धूम मची है। फिल्म की कीमत का कोई अंदाज़ा नहीं है इक गब्बर के किरदार पर ही करोड़ों का खर्च किया गया है। फिल्म आने से पहले अधिकार बिक जाते हैं अब तो बनाने वाले को घाटा नहीं होता है कमाई ही कमाई है। लोग छोटे मोटे जेबकतरों को नहीं गब्बर जैसे डाकू को पसंद करते हैं हास्य अभिनेता भी गब्बर के भाई बंधु बन चुके हैं। कहानी बदल चुकी है नर्क को स्वर्ग का नाम दे दिया है गब्बर सिंह ने। अब लोग मरना नहीं चाहते स्वर्ग जाने को जीने को नर्क को स्वीकार कर लिया है ऐसा मीडिया वाले समझा रहे हैं। नेता जी इतिहास बदलने चले थे लेकिन वही पुराना इतिहास दोहरा रहे हैं कलयुगी  रामायण लिखी जा रही है राम कथा सुनाने वाले रावण की स्तुति गा रहे हैं लोग झूम रहे हैं ताली बजा रहे हैं। सरकार इधर चले आ रहे हैं। 

        दर्शक का हाल क्या होगा देखना है कमाल क्या होगा जनता की धोती वही फ़टी हुई है सत्ता का रेशमी रुमाल क्या होगा। धमाल के बाद धमाल होना है और बढ़कर धमाल क्या होगा। बता मेरे लाल क्या होगा , कालिया खामोश है कितने आदमी थे का कोई जवाब नहीं देता है। गब्बर सिंह की अदा पे हर कोई फ़िदा है मारता भी है तो हंसी ठठा करते हुए जिसको कत्ल करना है पहले खुश करता है बच गये साले तीनों बच गये भाषा अच्छी लगने लगी है। होली पर गाली अच्छी लगती है हर कोई खैरात मांगता है गब्बर को सबकी झोली खाली अच्छी लगती है। ताली बजाते रहो ज़िंदा रहना चाहते हो अगर उसको ताली अच्छी लगती है। घरवाली घर पर है कुछ नहीं बोलती जो घरवाली अच्छी लगती है। गब्बर ने बहुत विकास किया है अपने लिए शानदार अड्डा नया बनवा लिया है गब्बर का संदेश रोज़ आता है व्हाट्सएप्प पर लतीफे सुनाता है। ये गब्बर अच्छा है क्या शान से रहता है क्या अंदाज़ से डराता है हर किसी को सपने में आता है। गब्बर का बसंती से बहुत अच्छा नाता है बसंती हुई गब्बर की दीवानी है क्या कमाल की ये कहानी है। देखने वालों का हाल क्या होगा इससे बढ़कर कमाल क्या होगा हाल बेहाल हुआ है बढ़कर  बदहाल क्या होगा।

चिंतन की चिंता का चिंतन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     चिंतन की चिंता का चिंतन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    पहले इक पुरानी बोध कथा सुनते हैं। इक साधु सफर पर था और रास्ते में इक गांव पहुंचा तो ध्यान आया इक संगी साथी साधु दोस्त रहता है यहीं। उसकी कुटिया पहुंच कर किवाड़ की सांकल को बजाया तो भीतर से आवाज़ आई कौन है। मैं हूं साधु ने जवाब दिया और समझा दोस्त है आवाज़ से पहचान लिया होगा मगर कुछ देर बाद भी दरवाज़ा खुला नहीं तो फिर से सांकल बजाई और दोबारा भीतर से वही सवाल किया गया कौन है। इस बार सोचा यार ने आवाज़ नहीं पहचानी लगता है इसलिए जवाब दिया मैं हूं अपना नाम लिया जो भी रहा होगा। किवाड़ तब भी नहीं खुला मगर साधु को समझ नहीं आया ऐसा क्या है जो मुझे आवाज़ से नहीं नाम से भी नहीं पहचाना दोस्त ने। रात भर इंतज़ार करता रहा मगर दरवाज़ा बंद रहा रात भर। भोर हुई तो भीतर से साधु बाहर निकला अपनी आदत के अनुसार और तब फिर बाहर इंतज़ार करते रहे दोस्त ने कहा भाई क्या बात हुई अपने किवाड़ खोला नहीं। साधु दोस्त ने कहा तुमने क्या कहा था मैं हूं यही कहा था ना। अब बताओ क्या तुम हो इतना जानते हो सिर्फ वही एक है भगवान ईश्वर खुदा अल्लाह फिर कोई और कैसे कहता है मैं हूं और जिसको लगता है मैं हूं भला उसको किसी और के घर दर पर आने की ज़रूरत क्या है। 

कहते हैं कोई कितने सालों से चिंतन करता है। चिंतन अपने आपको खोजना है खुद को समझना होता है और संत महात्मा रात भर जागते हैं चिंतन करते हैं। चिंतन आपको दुनिया की मोह माया से अहंकार से किसी से बैर करने से छुटकारा दिलवाता है आपको कोई अपना बेगाना नहीं लगता है कुछ पाने की चाह नहीं रहती कुछ खोने का डर नहीं रहता है। आजकल कुछ लोग चिंतन शिविर लगाते हैं उनके अनुसार सब करना होता है और इक राशि भी चुकानी होती है। ये चिंतन इक कारोबार है वास्तविक चिंतन आपको अकेले अपने आप करना होता है और अकेले होने को कोई जगह नहीं तलाश करनी होती न किसी तरह का आडंबर करना होता है। चिंतन घोषणा कर साहूलियत को देख कर नहीं किया जा सकता है जब किसी को कहीं जाकर चिंतन करना हो तब अपने सभी धंधे काम काज छोड़ जाना होता है। अपने सुना तो होगा कोई राजा राज को त्याग कर चिंतन को चला गया कभी कोई राज पाने को चिंतन करने नहीं जाता सुना होगा। चिंता से मुक्त होने को चिंतन है या मुक्ति की चाह में चिंतन करने चले हो पहले जान तो लो। चिंतन सभी बंधनों से मुक्त होकर खुद को समझने को किया जाता है ऊपर वाले को पाने को चिंतन नहीं किया जाता ये आर्ट ऑफ़ लिविंग वाले लिखते हैं किताब पढ़ लेना और साथ बताया है पढ़ने से नहीं चिंतन किया जाता है सबको छोड़ अपने साथ रहने से। भागने का नाम चिंतन नहीं है जब कोई भाग जाता है और लौटकर कहता है चिंतन करने गया था। कई साधु संत चिंतन करने की बात करते करते चिंतन सिखाने वाले आध्यात्मिक गुरु बन जाते है उसके बाद भगवान होना चाहते हैं। ऐसे चिंतन को चिंतन नहीं कहते हैं चितन अपने को बड़ा नहीं समझने देता चिंतन से जानते हैं हम बेहद छोटे हैं कोई अस्तित्व नहीं है वास्तव में जैसे समंदर में इक बूंद का भी नहीं बुलबुले का सा वजूद है। बस इतना सा है चिंतन का सफर पानी करा बुदबुदा अस मानस की जात नानक जी कहते हैं।

किसके नाम की माला जपी है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    किसके नाम की माला जपी है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

        खड़े हुए हैं अदालत में गुनहगार की तरह। धर्मराज बही-खाता देख कर हैरान हैं ये कैसे लोग हैं इनको इंसान बनाकर कितना सुंदर जीवन दिया था व्यर्थ गंवा कर वापस लौटे हैं। कीड़े मकोड़े पशु पक्षी भी ऐसे नहीं जीते सोच समझ होते भी दिमाग से काम नहीं लिया और पापी नेताओं का नाम जपते रहे कोई अच्छा नाम नहीं लिया। अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल तो मिलना ही है झूठ की जयजयकार करने का सत्ता के भूखे लोगों को मतलबी और कपटी लोगों का गुणगान करने का महापाप किया जीवन भर उसकी भी सज़ा मिलनी है। तुम अंधे नहीं थे आंखें मिली थी सोचने को दिमाग भी मगर तुमने पागलपन में ज़िंदगी बर्बाद कर दी। आजकल कोई आशिक़ भी माशूका का नाम रात दिन नहीं रटता है जब मिले जानू जानम कहता है बाकी दिन भर मस्त रहता है। वास्तविक नाता केवल फोन से है पल भर भी दूरी सही नहीं जाती ये व्यथा कही नहीं जाती।      

 जो भी कोई कहता है मान लेते हैं , खुद अपने कत्ल का सामान लाते  हैं। हम नहीं वो लोग जो रखते हैं दिल दिमाग कोई , जो बदलते हैं दुनिया को जब ठान लेते हैं। वक़्त क्या ज़िंदगी बिता देते हैं बेकार हम मसीहा मानते हैं उन्हीं को जो हमारी जान लेते हैं। तुलसीदास को पत्नी का ताना शिक्षा दे सकता है हम किसी के चाहने वाले बनकर नाहक आपस में लड़ते हैं ढैंचू ढैंचू कहते हैं। देखो ओ दीवानों तुम ये काम न करो आदमी हो आदमी बनकर जिओ चाटुकार बनकर बदनाम इंसान का नाम न करो। 
 
          पागल कौन है कैसे बताया जाये पागल सभी खुद हैं मगर पागल बनाते हैं औरों को। पागल होने की निशानी यही है कि वो सामने असली दुनिया को नहीं देखता और पागलपन में इक अपनी दुनिया बनाकर उसी को वास्तविकता समझता है। हम लोग वास्तविक समाज से बचकर स्मार्ट फोन की झूठी बनावटी दुनिया में जीते हैं और मनोरंजन को बड़ा मकसद समझते हैं। क्या इसको समझदारी कह सकते हैं या फिर इक पागलपन छाया हुआ है। सबसे पहले उनकी बात करते हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित ही नहीं करते बल्कि जिनको हम सब को असली समाज की तस्वीर दिखानी थी लेकिन वो वास्तविकता से बचते हुए इक काल्पनिक दुनिया को देखते और दिखलाते हैं। टीवी चैनल खबर मनोरंजन के नाम पर जिस दुनिया की बात करते हैं देश की तीन चौथाई आबादी से उसका कोई लेना देना नहीं है। फिल्म टीवी सीरियल जाने किस समाज की कैसी कहानियां और संगीत या शो दिखलाते हैं जो हमारी आस पास की दुनिया से मेल नहीं खाता है। सच नहीं है सब झूठ ही झूठ है मगर इस झूठ के सामान को बेचकर ये टीवी चैनल और फ़िल्मकार अभिनय करने वाले मालामाल हो रहे हैं। अर्थात उनको समाज को सच नहीं दिखाना मार्गदर्शन की तो बात ही क्या बस कमाई करनी है चाहे किसी भी तरह से हो। ऐसा लगता है कुछ लोग जो किसी तरह इक आरामदायक जीवन जी रहे हैं उनको बाकी समाज जो साधनविहीन है को लेकर कोई चिंता नहीं है। क्या अपने ही देश के लोगों के लिए ऐसी उदासीनता उचित है। समझा जाये तो हम पागल बन गये हैं और पागलपन पाकर खुश भी हैं।

     हमारी शिक्षा में कुछ खोट ज़रूर है जो हमें सोचने समझने भला बुरा क्या है इसका बोध कराने के किसी काम नहीं आती है। हम आंखें होते हुए भी देखते नहीं हैं परखते नहीं अंधविश्वास करते हैं और भेड़चाल के आदी हैं। पढ़ लिख कर देश की समाज की भलाई की बात की चिंता नहीं करते बस खुद अपनी चिंता रहती है। जो शिक्षा आपको अच्छा इंसान नहीं बनाती केवल इक मशीन बना देती है पैसे कमाना अपने खुद को लेकर सोचना समझना समाज और देश की कोई चिंता नहीं भले कुछ भी होता रहे हमें क्या लेना देना , ये विचार किसी शिक्षित के नहीं कूप मंडूक के लगते हैं। बहुत बातें की जाती हैं आधुनिक शिक्षा महंगी और जाने क्या क्या सिखाती है नहीं सिखलाती तो आदमी बनकर अच्छे इंसान की तरह रहना। केवल अपने मतलब को समझने समझाने वाली पढ़ाई किसी काम की नहीं है। अंक शत प्रतिशत हासिल किये मगर चाल चलन और आचरण वही रहता है स्वार्थ सिद्ध करने को सब करने को राज़ी हैं। शायद वो अनपढ़ लोग ज़्यादा अच्छे थे जो सही को सही गलत को गलत कहने का मादा रखते थे। हम लोग तो राम नाम जपना छोड़ ऐसे इंसानों के नाम की माला जपते हैं जो अच्छे इंसान भी बन नहीं पाए हैं। किस किस शैतान का नाम सुबह शाम लेते हैं हम कभी सोचा है।