Thursday, 30 August 2018

जीने का हक हमारा भी तो है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

     जीने का हक हमारा भी तो है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं नहीं नहीं , हम इंसान हैं इंसानियत की बात करते हैं ,
किसी की जान की कीमत नहीं लगाते हैं सिक्कों से हम ,
आपकी जान भी जान है हम भी जान की कीमत जानते हैं ,
आदमी आदमी को दुश्मन समझे इसको गलत मानते हैं।

आप सौ साल जियें खुश रहें हम दिल से दुआ करते हैं ,
मगर हम भी जीने के हकदार हैं इतनी  इल्तिज़ा करते हैं ,
आपकी सियासत ये क्या सियासत है आपने सोचा कभी ,
किस तरह देश के लोग हर दिन बेमौत भी मरा करते हैं। 

आप की हिफाज़त कितनी ज़रूरी है बस इसी का ध्यान है ,
हम आम लोगों की खातिर श्मशान और कबरिस्तान है ,
लाखों की मौत की कोई बात नहीं होती है क्यों भला ,
आपको डर है अगर तो हर तरफ मचा कोहराम है। 

जो कहते हैं हम सब की पल पल की खबर रखते हैं ,
क्या कभी गरीबों पर भी  इनायत की नज़र रखते है ,
खेलते हैं भावनाओं से जनता की इशारों पर किसके ,
काश खुद को देखते क्या जताते हैं और क्या करते हैं।

मौत को किसने बाज़ार बनाया  है ज़रा बतलाओ ,
बस करो ज़हर नफरतों का अब और ना फैलाओ ,
सुरक्षा आपकी हम करें या आपने हमारी करनी है ,
आग को आग से नहीं पानी से कभी खुद बुझाओ।

हम कभी ज़िंदा थे शायद खबर आपको भी होगी ,
कत्ल हुआ ख़ुदकुशी की या बेमौत मर गये हम ,
आपकी जान के सदके लाख बार करते हैं लोग सब ,
ज़हर देता रहा चारागर बन खबर आपको भी होगी।

               ( ये अधकचरी रचना है मगर मज़बूरी में जल्दी पब्लिश करनी पड़ी है ,
                    अगली पोस्ट पर मौत कत्ल और ख़ुदकुशी की ही बात होगी।
                        अब किस तरह भला ज़िंदगी की बात होगी )


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