Thursday, 16 August 2018

लाख चिराग़ जलाओगे रौशनी के लिये ( अटल बिहारी वाजपेयी की याद ) डॉ लोक सेतिया

            लाख चिराग़ जलाओगे रौशनी के लिये 

                  ( अटल बिहारी वाजपेयी की याद ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 


    
    मैं शायद इस काबिल भी नहीं कि उन पर लिख सकूं , उनका परिचय उनकी शख्सियत को बयान करना कोई आसान कार्य नहीं है। भारत की राजनीति मैं ही नहीं विश्व की राजनीति में भी उन जैसा दूसरा कोई है न हो सकेगा शायद। मुझे गर्व है ऐसे महान लोगों को जो राजनेता मात्र नहीं बल्कि जनता के दिलों में बसे हुए सच्चे नायक थे उन्हें देखने और सुनने का सौभाग्य मुझे मिला कभी । किसी को ये बात अजीब लग सकती है मगर मुझे लगता है आपको भगवान हज़ारों मिल सकते हैं तलाश करने से मगर राजनीति में ऐसे इंसान और इंसानियत को ढूंढते रहेंगे हम। गांधी जी के लिए कहते हैं आने वाली सदियां यकीन नहीं करेंगी कि हाड़ मांस का ऐसा आदमी कोई दुनिया में हुआ था , मगर मुझे लगता है गांधी होना आसान है अटल और जेपी होना बेहद कठिन। मैंने देखा है बहुत कवि जब शासक बने अधिकारी सत्ताधारी नेता बने तो उनके भीतर का कवि सब से पहले मर गया , सत्ता और राजनीति के शिखर पर कविता को ज़िंदा रखना सब के बस की बात नहीं है। नीरज जी भी ऐसे ही लोगों में थे जो सिनेमा जगत में रहकर भी नकलीपन से बचे रहे। ये कैसा इत्तेफ़ाक़ है कि इतने करीब अंतराल में अटल जी और नीरज जी साथ साथ दुनिया से चले गये अपनी दुनिया में। भगवान भी अगर है तो उनका स्वागत द्वार पर खड़े होकर कर रहा होगा। राजनीति में दलों की दलदल से बचे हुए कमल वही थे , ऐसा किसी और को आदर शायद ही मिला हो जैसा अटल जी को विपक्षी दल में होते हुए जवाहरलाल नेहरू जी ने इन शब्दों से संबोधित किया हो कि आप उधर क्यों हैं आपको तो इधर होना चाहिए। इक युवा नये राजनेता को भविष्य का बड़ा नेता बताना किसी और को नहीं मिली ऐसी पहचान और अटल जी अगर हीरा थे तो नेहरू जी उसे परखने वाले जोहरी थे। लोग सत्ताधारी नेता कलाकार धनवान लोग सब चाहते हैं शोहरत हासिल करना और जतन करते हैं महान कहलाने को मगर जो वास्तव में महान होते हैं उनको इसकी कोई चाहत नहीं होती है।
                                  भाषण देकर तालियां बटोरना बहुत लोग जानते हैं मगर कोई कोई विरला ही होता है जिसकी हर बात सब को जोड़ती है अपने साथ संवाद करते हुए। उनके भाषण को इक ग़ज़ल का शेर बयां करता है :-

             फूलों की तरह लब लब खोल कभी , खुशबू की ज़ुबां में बोल कभी। 

          उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है क्योंकि उन जैसा दूसरा कोई है भी नहीं हुआ भी नहीं। हज़ारों नहीं लाखों नहीं करोड़ों साल में कोई ऐसा इंसान पैदा होता है जो कहीं भी हो इंसान ही रहता है। हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहां , सामने जिनके वो सच मुच का खुदा कुछ भी नहीं। जीने को सब जीते हैं मगर जीने का सलीका शायद ही किसी को आता है। दुश्मन तो कोई था ही नहीं मगर दुश्मन देश भी जिसे देख कर सर आदर से झुकाते हों , विरोधी भी जिसे दिल से प्यार करते हों उस में कितनी विशेषताएं इक साथ होंगी। आपत्काल में कैद में रहने के बाद बाहर आते ही अपने भाषण में बारिश में ऊबे हुए लोगों को अपने शब्दों से ऊर्जा भर देना , ये कहकर , बहुत दिनों के बाद मिले हैं दीवाने , कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने , ज़रा खुली हवा में सांस तो ले लें , कब तक है आज़ादी कौन जाने। चार लाईनों में सब कह दिया क्या कमाल था। जिसे कोई प्रधानमंत्री विपक्षी दल में होते हुए भी जिनेवा में देश के प्रतिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजता हो वो कोई दूसरा है किसी देश के पास। विदेश में जाकर पहली बार अपनी भाषा हिंदी में बोलना इक इतिहास ही नहीं है इतिहास को बदलना है। शोर बहुत लोग करते हैं मगर जो वास्तव में कर दिखाते है वो कोई और ही होते हैं। आज जिन देश की खुली बड़ी बड़ी सड़कों पर हम सफर करते हैं , राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के कारण उन्हीं की सोच की देन है। आज भी स्वार्थ के गठबंधन सभी दल करते है जो सुविधा होने तक रहते हैं अवसर मिलते ही टूट जाते हैं। मगर 24 अलग अलग विचार वाले दलों को इक साथ इक धागे में पिरोना और माला की तरह जोड़े रखना जिस धागे का काम था वो थे अटल जी। 
         इक साहस और ईमानदारी चाहिए ये कहने के लिए जो उनके भाषणों में से चुने कुछ शब्द है , पढ़ना और सोचना समझना। विश्वास मत पर चर्चा अभी भी सुनी देखी है , मगर अटल जी की भावनात्मक स्पीच कोई भूल नहीं सकता है। आप कहते हैं अटल जी अच्छे हैं मगर गलत दल में हैं मगर आज उस अच्छे अटल से आप क्या करने जा रहे हैं। जोड़तोड़ से और अनैतिक ढंग से मिली सत्ता को चिमटे से भी नहीं छूना चाहूंगा। मैं जा रहा हूं त्यागपत्र देने , इक शान के साथ कहना कोई भूल सकता है। हार नहीं मानूंगा , वो हार अटल जी की हर नहीं थी , हारा कोई और था और देश सब देख रहा था। जनता देश है सरहदों की सीमा नहीं और हर धर्म हर वर्ग के लोग जिसे चाहते हों मानते हों भरोसा करते हों ऐसा कोई और नहीं है। आज सुनाई देता है मुझ से पहले कुछ भी नहीं हुआ , मगर अटल बिहारी वाजपेयी जी संसद में खुले आम कहते हैं कि जो भी ऐसा कहता है वो देश के लोगों किसानों मज़दूरों और तमाम बाकी लोगों के साथ अनुचित करता है। विपक्ष में रहकर सरकार की नीतियों की आलोचना की जा सकती है कठोर से कठोर शब्दों में मगर देश की वास्विकता को अनदेखा करना अनुचित है। अपने से पहले के नेताओं की देशभक्ति और काम पर सवाल नहीं उठाये थे कभी उन्होंने। बड़े होने की निशानी है बड़े बोल नहीं बोलते हैं।  बड़बोले लोग कभी बड़े नहीं होते हैं। 
            कहने को बहुत है मगर आखिर में सवाल इक है। अटल जी को श्रद्धासुमन भेंट करना चाहते हैं तो सभी दल वाले उनकी राजनीति से एक प्रतिशत भी सबक सीख लें तो बहुत कुछ बदल सकता है। काश कोई और अटल आज फिर देश के पास कहीं से मिल जाये।



1 comment:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विनम्र श्रद्धांजलि - श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी - ब्लॉग बुलेटिन परिवार में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।