Saturday, 4 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 10 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -10 

                                     डॉ लोक सेतिया 

    3 अगस्त की कहानी सदियों पुरानी है , आधुनिक परिवेश में बदले रूप में। जुआ या सट्टा या फिर खेल की जीत हार पर शर्त से लेकर आदत कुछ भी हो सकती है। जब शुरुआत ही कोई दोस्त के साथ शर्त लगाकर लड़की को परपोज़ करने से होती है तो आगे अंजाम क्या होना था। किसी धर्म वालों को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता मगर सवाल तो आते हैं मन में चिंतन तो किया जाना उचित है। द्रोपती को दांव पर किसने लगाया धर्मराज से पहले उसका विवाह मछली की आंख में तीर लगाने वाले से करने की शर्त खुद पिता ही ने रखी थी। बेटी कोई गाय बकरी है जो किसी के हाथ दे सकते हैं। जनक जी को भी धनुष तोड़ने की शर्त रखने की क्या ज़रूरत थी। जो पंडित बतलाते हैं राम और सीता की कुंडली के 36 के 36 गुण मिलते थे उन्होंने कभी सोचना ही नहीं चाहा कि विवाह की शर्त से पहले क्या सभी स्वयंबर में आये युवकों की कुंडलियां मिलाई गई थी। खुद को जुए में दांव पर लगाने वाले पतियों को द्रोपती ने छोड़ नहीं दिया था तो प्यार में अंधी लड़की जो खुद ही पिता के समझाने के बावजूद जुआरी सट्टेबाज़ से शादी करती है भला खुद को दांव पर लगाने वाले पति को कैसे छोड़ देती। फिर जो उसको शादीशुदा होने के बावजूद भी पति से अलग करवाने को वही करता है जुए में दांव ही लगाता है दूसरे को खलनायक साबित करने को।  नायक कैसे हो सकता है। जब एक जैसे हैं तो पहले जिस से प्यार किया विवाह किया उसी को चुनना उचित ही था। कहानी में अंत में समझा जाता है अब उसको समझ आ गई है और वो आगे से जुआ सट्टा खेलना छोड़ देगा। वास्तविकता में ऐसा होता शायद ही देखते हैं। मैंने अपने आस पास कितने ही घर तबाह होते देखे हैं इसी कारण। मगर आप इस को सिर्फ जुए सट्टे और शेयर मार्किट की बात मत समझना। 
                     हम हर चुनाव में अपने वोट को इसी तरह दांव पर लगाते हैं। विचार करते हैं कैसा है क्या चाहता है। इतना धन क्यों खर्च करता है। हर बार सत्ता भले जिस किसी दल को मिलती है और जो भी दल सत्ता से वंचित रहता है उनकी जीत हार खेल की तरह है मगर जनता द्रोपती की तरह दांव पर लगाई जाती ही नहीं बल्कि हर बार हारती वही है जनता ही। वास्तव में जिसकी जीत होनी चाहिए वो खुद ही बिना सोचे समझे वरमाला डालती है जो जुए की तरह ही लड़ते हैं चुनाव। जीतने पर लाख गुणा और हारने पर जो लगाया गया पानी में , मगर उनकी कोई मेहनत की खून पसीने की कमाई नहीं होती है हम जानते हैं। जिस संसद में शायद सौ से अधिक आपराधिक कार्यों से संबंधित चुने हुए बैठे हों उस संसद से कानून व्यवस्था की समझने की उम्मीद रखना खुद को ठगना है। 
                                 लॉटरी पर रोक है मगर टीवी शो पर यही धंधा बड़े बड़े नाम वाले खेलते नहीं खिलाते हैं और खुद करोड़पति नहीं अरबपति बनते जाते हैं। आपको कितनी अच्छी अच्छी बातें समझाते हैं खुद पैसे की खातिर जो मर्ज़ी करते जाते हैं। आजकल ऐसे लोग आदर्श कहलाते हैं। मैं आज बेहद हैरान हुआ देख कर अख़बार के ऊपरी स्थान पर महान लोगों की जहां नैतिकता की मूल्यों की बातें छापते हैं इक आधुनिक सफल कारोबारी की कही बात लिखी थी " सब को अवसर समान मिलते हैं मगर जो अवसर का उपयोग करते हैं वो सफल होते हैं। " कौन सवाल करेगा क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाते हैं। हर सत्ताधारी से मधुर संबंध बनाते हैं , बिना लाइसेंस लिए मोबाइल के बाज़ार में आते हैं और देश को चूना लगा सरकार से माफ़ करवाते हैं।  जनाब ईमानदारी की भाषा में ये अवसरवादी असल में चोर कहलाते हैं। चलो छोडो आदर्श की बातें आओ हम सब मिलकर गुनगुनाते हैं। गलती से मिस्टेक करने वाला गीत गाते हैं। क्या खूब है गुमराह करते हैं मार्गदर्शक कहलाते हैं।

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